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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

२४ नामदेव की हिन्दी कविता
मानव ज्यो ज्यो वैज्ञानिक क्षेत्र की सफल खोजो की प्रगति में प्रवेश करता जाता
है त्यो त्यो वह सृष्टि मे अभिव्यक्त बुद्धिवादिता को पहचान कर अपनी व्यक्तिगत क्षुद्र
आशाओ और अभिलाषाओ से भी ऊपर उठ जाता है और सृष्टि के रूप में मूर्तिमान
बुद्धि की महत्ता के सामने उसका सिर भक्ति भाव से झुक जाता है । यह बुद्धि अपने
गम्भीरतम स्वरूप में मानव की पहुँच से परे है । सर आइनस्टाइन बुद्धि का नाम लेकर
ईश्वर की सत्ता का विरोध नही करते । वे लिखते है कि प्रभु का सर्वशक्तिमान्, न्यायी
और दयालु रूप मानव को आश्वासन, साहाय्य और पथ प्रदर्शन प्रदान करता है । १
ब्रह्म का स्वरूप
आचार्यों ने ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप का निर्णय करने के लिए दो प्रकार के
लक्षणो को स्वीकार किया है ।
(१) स्वरूप लक्षण (२) तटस्थ लक्षण
'स्वरूप' लक्षण पदार्थ के सत्य, तात्विक रूप का परिचय देता है परन्तु 'तटस्थ'
लक्षण कुछ देर के लिए होने वाले आगन्तुक गुणों का ही निर्देश करता है ।
लौकिक उदाहरण से इसको देखिये । कोई ब्राह्मण किसी नाटक में एक क्षत्रिय
नरेश की भूमिका ग्रहण कर रंगमंच पर आता है जहाँ वह शत्रुओं को परास्त कर अपनी
विजय वैजयंती फहराता है और अनेक शोभन कृत्यों को कर प्रजा का अनुरंजन करता
moved by profound reverence for the rationality made
manifest in existence By way of the understanding, he
achieves a far reaching emancipation from the shackles of
personal hopes and desires and thereby attains the humble
attitude of mind towards the grandeur of reason incarnate
in existence and which in its profoundest depths, is inacce-
ssible to man'
—'Out of my Later Years' p. 29
— आइनस्टीन
1 'The idea of the existence of an omnipotent, just and omni-
beneficent personal God, is able to accord man solace,
help and guidance'
—'Out of my Later Years' p. 27.
—आइनस्टाइन

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि २५
हैं। परन्तु इस ब्राह्मण के सत्य स्वरूप के निर्णय करने के लिए उसे राजा बतलाना
क्या उचित है ? राजा वह अवश्य है परन्तु कब तक ? जब तक नाटक का व्यापार
चलता रहता है। नाटक समाप्त होते ही वह अपने विशुद्ध रूप में आ जाता है। अतः
उस पुरुष को क्षत्रिय राजा मानना 'तटस्थ' लक्षण हुआ तथा ब्राह्मण बतलाना 'स्वरूप'
लक्षण हुआ।
सगुण ब्रह्म
ब्रह्म जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा लय का कारण है। आगन्तुक गुणों के
समावेश के कारण यह उसका 'तटस्थ' लक्षण है। "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय
उपनिषद् २-१-१) तथा 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (बृहद् उपनिषद् ३।९।२८) ब्रह्म के स्वरूप
के प्रतिपादक लक्षण हैं।
वह सत् (सत्ता) चित् (ज्ञान) और आनन्द (सच्चिदानन्द) रूप है। यही ब्रह्म
का स्वरूप लक्षण है। परन्तु यही ब्रह्म मायावच्छिन्न होने पर सगुण ब्रह्म, अपर ब्रह्म
या ईश्वर कहलाता है जो इस जगत् की स्थिति, उत्पत्ति तथा लय का कारण होता
है। ब्रह्म के दो रूप होते हैं। सगुण तथा निर्गुण। दोनों एक ही हैं परन्तु दृष्टिकोण की
भिन्नता से दो रूपों में गृहीत किये जाते हैं।
जिस प्रकार संसार के पदार्थ असत्य और काल्पनिक हैं उसी प्रकार जीव भी
अविद्या के ऊपर आश्रित रहता है। 'ब्रह्म ही एक मात्र सत्ता है।' इस ज्ञान के अभाव
में ही जीव की सत्ता है। जीव उपासना के लिए ईश्वर की कल्पना करता है। ईश्वर
जगत् का स्वामी तथा नियंता है। इसी लिए जीव उसकी उपासना करता है और उसे
दया, दाक्षिण्य, अगाध करुणा आदि गुणों से मण्डित मानता है। यही है सगुण ब्रह्म या
ईश्वर। इस प्रकार सगुण ब्रह्म की कल्पना उपासना के निमित्त व्यावहारिक दृष्टि से
की गई है।
पांचरात्र या भागवत मत के अनुसार ब्रह्म अद्वैत, अनादि, अक्षत, निर्विकार,
निरवद्य, अन्तर्यामी, सर्वव्यापक, असीम तथा आनन्दस्वरूप है।
सब द्वन्द्वों से विनिर्मुक्त, सब उपाधियों से विवर्जित, सब कारणों का, षड्गुण रूप
परब्रह्म निर्गुण और सगुण दोनों है।
अप्राकृत गुणों से हीन होने के कारण वह निर्गुण है तथा षड्गुण युक्त होने के
कारण वही परब्रह्म 'भगवान्' कहा जाता है। इसी कारण वह सगुण है।
शंकराचार्य ने पांचरात्र के उपर्युक्त मत का खण्डन किया है और इसे अवैदिक
बताया है। परन्तु रामानुजाचार्य ने उसे वेद-विदित सिद्ध कर बादरायण के ब्रह्म-सूत्रों

२६ नामदेव की हिन्दी कविता
की व्याख्या 'श्री भाष्य' में उसे प्रामाणिक कहा है। इसी मत के आधार पर मध्य युग में
वैष्णव भक्ति मार्ग का प्रचार और भगवान् के विभवावतारों की लीलाओं का वर्णन-
कीर्तन किया गया है। भक्ति के अनेक सम्प्रदाय स्थापित हुए, जिनमें भगवान् के सगुण
रूप पर ही बल दिया गया क्योंकि वही पूजा, उपासना, आराधना और ध्यान का सहज
विषय हो सकता है।
इसके विपरीत मध्ययुग में ही निर्गुण उपासना के प्रचारक संत हुए हैं। कबीर,
रैदास, दादू आदि निर्गुण उपासक सन्तों ने ब्रह्म की सगुणता तथा उसके व्यूह, अवतार
तथा मूर्तियों का खण्डन किया है। कभी कभी इस निर्गुणोपासना को तत्कालीन विदेशी
प्रभाव का परिणाम कह दिया जाता है और सगुणोपासना को ही शुद्ध भारतीय भक्ति-
पद्धति घोषित किया जाता है परन्तु वास्तव में निर्गुणवाद उपनिषद् के ब्रह्मवाद से भिन्न
नहीं है। भारतीय उपासना पद्धति में निर्गुणवाद ही कदाचित् प्राचीनतर है। निर्गुण
और सगुण में जो विरोध समझ लिया जाता है वह दोनों के उपर्युक्त सूक्ष्म अन्तर से
भिन्न है।
भक्तिकालीन सगुणोपासक कवियों ने भी निर्गुण की अस्वीकृति नहीं की, प्रत्युत
भक्ति-साधना के लिए उसकी अव्यावहारिकता प्रमाणित की है। गीता की तरह सूरदास
ने 'सूरसागर' के प्रारम्भ में ही अव्यक्त की गति को अनिर्वचनीय कहकर यह निश्चय प्रकट
किया है कि रूप-रेखा-गुण-जाति-युक्ति से रहित अव्यक्त का स्वाद गूँगे के गुड़ के समान
है। अतः मैं सगुण लीला के पद गा रहा हूँ। (पद २)
तुलसीदास ने निर्गुण और सगुण में बराबर अभेद का सिद्धान्त स्वीकार किया
है, परन्तु उन्हें अन्तर्यामी राम की अपेक्षा बहिर्गामी राम ही अधिक अच्छे लगते हैं,
क्योंकि उन्हीं की कृपा का वे प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं। सगुण रूप सुगम है, क्योंकि-
वह इन्द्रियों द्वारा जाना जा सकता है। परन्तु विचार करने पर सगुण रूप ही समझना
अधिक कठिन प्रतीत होता है।
निर्गुण ब्रह्म
'निर्गुण' शब्द अपने पारिभाषिक रूप में सत्त्वादि गुणों से रहित या उनसे परे
समझी आने वाली किसी ऐसी अनिर्वचनीय सत्ता का बोधक है, जिसे बहुधा परम तत्त्व,
परमात्मा अथवा ब्रह्म जैसी संज्ञाओं द्वारा अभिहित किया जाता है।
पारमार्थिक दृष्टि से ब्रह्म निर्गुण है। उस पर जीव या जगत् का कोई भी गुण
आरोपित नहीं किया जा सकता। शंकराचार्य ने श्रुति वचनों के आधार पर प्रमाणित
किया है कि दिक् काल से अमर्यादित, अमृत, अनादि, स्वतन्त्र, अखण्ड, सर्वव्यापी तथा

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि २७
निर्गुण ऐसा एकमेव तत्त्व विश्व की जड़ में है । जैसे-
'इदं सर्वं यदयमात्मा' (बृ. २-४-६)
'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' (मु. २-२-११)
'आत्मैवेदं सर्वम्' (छा. ७-२५-२)
'नेह नानास्ति किंचन' (बृ. ४-४-१९)
'निष्कलं निष्क्रियं शांतं निरवद्यं निरंजनम्' (श्वे. ६-१९)
'अस्थूलमनणु' (बृ. ३-८-८)
'निर्गुण' शब्द 'श्वेताश्वतरोपनिषद्' (६ : ११) में उस अद्वितीय 'देव'
(परमात्मा) का एक विशेषण बनकर आया है, जो सभी भूतो में अन्तर्हित है, सर्वव्यापी
है, सभी कर्मों का अधिष्ठाता है, सब का साक्षी है, सबको चेतनत्व प्रदान करने वाला
तथा निरुपाधि भी है ।
उसी की ओर संकेत करते हुए श्रीकृष्ण द्वारा 'गीता' (१३-१४) में भी कहलाया
गया है- 'उसमें सब इंद्रियों के गुणों का आभास है, पर उसके कोई भी इन्द्रिय नही है,
वह सबसे असक्त रहकर, अर्थात् अलग होकर भी सबका पालन करता है और निर्गुण
होने पर भी गुणों का उपभोग किया करता है।'
उपनिषद् ब्रह्म को 'नेति-नेति' शब्दो के द्वारा अभिहित करते हैं । इसका तात्पर्य
क्या है ? प्रत्येक विधेय उद्देश्य के क्षेत्र को सीमित करता है-यह उसका स्वभाव होता
है । 'यह लेखनी लाल है'—इस वाक्य में 'लाल' यह विधेय, उद्देश्य (लेखनी) के क्षेत्र
को वस्तुतः सीमित करता है । अर्थात् 'लाल' से पृथक् क्षेत्र में 'लेखनी' का कोई भी
सम्बन्ध नहीं माना जा सकता ।
ब्रह्म के विषय में हम किसी विधेय का प्रयोग नही कर सकते क्योकि ऐसा करने
से वह सीमित तथा परिमित बन जायेगा परन्तु वस्तुतः वह अपरिमित सत्ता है । इस
प्रकार उसमें कोई गुण नही रहता । न यह गुण वहाँ है और न वह गुण । सब गुणों के
निषेध करने से जो तत्त्व बच जाता है वही है ब्रह्म । इस प्रकार जिस ब्रह्म के विषय में
श्रुति 'नेति नेति' शब्दों का व्यवहार करती है वह ब्रह्म वस्तुतः निर्गुण ब्रह्म ही है और
यही ब्रह्म का पारमार्थिक रूप है ।
सत कबीर 'निर्गुण' शब्द का एक पर्याय 'अगुन' भी देते जान पड़ते है (क. ग्रं.
पद १८३) । वे उसके द्वारा सूचित किये जाने वाले तत्त्व को 'गुन अतीत' बतलाते है
और फिर उसे 'निर्गुण ब्रह्म' भी कहकर उसकी उपासना का उपदेश देते है (पद
३७५) । वे उसे अन्यत्र 'निर्गुण राम' की भी संज्ञा देते हैं और उसकी 'गति' को अगम्य
ठहराते है (पद ४६) तथा उसे केवल 'निर्गुण' कहकर भी उसी प्रकार अकथनीय बतलाते
(द्वैपद १८६) । परन्तु एक स्थल (पद १८४) पर वे उसके विषय में इस प्रकार भी

२८ नामदेव की हिन्दी कविता
कहते हैं— 'राजस, तामस और 'सातिग' (सात्विक) ये तीनो ही उसकी माया है तथा
वह इन तीनो से परे का 'चोथा पद' है । वह गुणातीत होने के कारण 'निगुंण' कहलाता
है, नही तो वह वस्तुत निर्विषय नही ठहराया जा सकता तथा उसे समझ लेना धोखे
की बात होगी ।
लोग उसे 'अजर' कहते हैं और 'अमर' भी बतलाते हैं किन्तु सच्ची बात तो यह
है कि वह 'अलख' होने के कारण अनिर्वचनीय है । कबीर का हरि इन सभी से विल-
क्षण है । (पद १८०) । फिर 'वह जैसा है वैसा समझ लेने में ही आनन्द है, उसे
वस्तुत न जानते हुए भी, उसका कथन करना ठीक नही ।' इसी कारण कबीर ने अपने
को उसे 'सरगुन' की अपेक्षा 'निगुंण' रूप में ही जानने वाला कहा है ।
दोनो की एकता
सगुण तथा निगुंण ब्रह्म में किसी प्रकार का भेद नहीं है । वह एक ही सत्ता है
परन्तु दृष्टिकोण की भिन्नता के कारण वह इन दोनो नामो से पुकारा जाता है । नाट्य-
शाला में रंगमंच पर दुष्यंत की भूमिका में उतरने वाला नट नाट्यशाला से बाहर आने
पर कोई दूसरा व्यक्ति नही बन जाता । वह वही मनुष्य रहता है । नाट्य की दृष्टि से
वह नट कहलाता है परन्तु पारमार्थिक दृष्टि से वह मनुष्य ही रहता है ।
ब्रह्म की भी ठीक यही दशा है । वह संसार की सृष्टि, स्थिति तथा लय करता
है । अत. संसार की अपेक्षा वह ईश्वर है परन्तु निरपेक्ष भाव से देखने पर वही ब्रह्म
है । अत. सगुण ईश्वर तथा निगुंण ब्रह्म में भेद मानना नितांत भ्रामक है । निगुंण
ब्रह्म ही वास्तविक पारमार्थिक सत्ता है परन्तु व्यवहार के लिए उपासना के निमित्त यही
सगुण ईश्वर माना जाता है । तत्त्व एक ही है । दृष्टि भिन्न भिन्न है और इसी लिए
उसके दो रूप हैं ।
एकबारगी हम अंतिम सीढी पर नही पहुँच सकते । ज्ञान के मंदिर में चढ़ने
के लिए सीढ़ियाँ हैं जिनके द्वारा ही साधक उसमें पहुँच सकता है । निगुंण ब्रह्म की
प्राप्ति अंतिम लक्ष्य है परन्तु अभ्रात ज्ञानी ही उसे पा सकता है । उसके सोपान रूप है
उपासना और इसके लिए 'ईश्वर' की महती आवश्यकता है । ईश्वर की उपासना से
सगुण पूजन से चित्त की शुद्धि होती है और तभी साधक विशुद्ध ज्ञान मार्ग का
अवलंबन कर निगुंण ब्रह्म को पा सकता है अन्यथा नही । यही उपासना का
उपयोग है ।
ब्रह्म वास्तव में निगुंण है इस विषय को गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस प्रकार

हिंदी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि २६
प्रकट किया है :—
एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदानंद परधामा ॥
'कल्याण' का श्री मानस अंक, बालकांड, पृ० ७१ ।
अगुन अखंड अनंत अनादि । जेहि चिन्तहि परमारथवादी ।
नेति नेति जेहि वेद निरूपा । चिदानन्द निरुपाधि अनूपा ॥
व्यापक अकल अनीह अज निर्गुण नाम न रूप ॥
'कल्याण' का श्री मानस अंक बालकांड पृ० ७१ ।
वही ब्रह्म निर्गुण भी है और सगुण भी । इस लिए स्थान स्थान पर ब्रह्म का
निर्गुण भावात्मक वर्णन भी पाया जा सकता है । उपनिषद् कहती है—
स पर्यगाच्छुक्रम कायम् व्रण सस्नाविर शुद्धमपापविद्धं ।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयं भूर्याथातथ्यतोऽर्थान्
व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥
—ईश. ८
गीता के अनुसार :—
सर्वेन्द्रिय गुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
आसक्त सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुण भोक्तृ च ॥ १३-१२
श्रीमद् भागवत की उक्ति है :—
सर्वं त्वमेव सगुणो विगुणश्च भूमन् ।
नान्यत् त्वदरूपि मनोवचसा निरूक्तम् ॥
—भागवत ७-६, ४८
ब्रह्म चाहे निर्गुण हो चाहे सगुण इतना तो निश्चित है कि वह सर्वव्यापी है।
जब वह सर्वव्यापी है तो वह निराकार भी होगा ही क्योंकि आकार मे एकदेशीयता आ
जाती है और जो सर्वदेशीय है वह केवल एकदेशीय नही हो सकता । इसी लिए जहाँ
ब्रह्म के रूप की चर्चा की गई है वहाँ कोई विशिष्ट आकार न बताकर उसकी विश्व-
रूपता का ही वर्णन किया गया है। सर्वान्तर्यामी के रूप का इससे बढ़िया वर्णन और
हो ही क्या सकता है। वेद कहते है :—
सहस्रशीर्षाः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्र पात् ।
सभूमिं विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशांगुलम् ॥
—ऋग्वेद का पुरुष सूक्त

३० नामदेव की हिन्दी कविता
उपनिषदों में कहा गया है—
अग्निमूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ
दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः
वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य
पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्व भूतान्तरात्मा ।
—मुण्डक २—१, ४
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतो बाहुरुत विश्वतस्पात् ।
स बाहुभ्यां धमति स पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥
—श्वेताश्वेतर ३—३
गीता में भी इसी का प्रतिपादन किया गया है—
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरो मुखं ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
—गीता १३—१३
श्रीमद्भागवत का कहना है—
एकायनऽसौ द्विफल स्त्रिमूलश्चतुरसः पंचविधः षडात्मा ।
सप्तत्वगष्टविटपो नवाक्षो दशच्छदी द्विखगो ह्यादि वृक्षः ॥
—भागवत १० पू०—२, २१
ब्रह्म की इस निराकारता अथवा विश्वरूपता को भगवद् विग्रह के व्यक्तित्व की
अपेक्षा अधिक महत्त्व देते हुए भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं :—
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥
—गीता ७—२४
एक ही ब्रह्म के दो रूपों को कैसे स्वीकार किया गया ?
ब्रह्म के संबंध में सभी संत कवियों ने अपनी रचनाओं में प्रायः एक-सा विचार
प्रकट किया है । संत, सूफी तथा भक्त आदि सभी कवियों ने ब्रह्म को निर्गुण, निराकार,
निर्लेप, अगम, अगोचर कहा है । जो सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी तथा सृष्टिकर्ता है उसी
से जड़ जगत् तथा चेतन जीव का जन्म हुआ । अंतर केवल इतना ही है कि संतों का
ब्रह्म निर्गुण ही है उसमें गुणों का समावेश हो ही नहीं सकता । वह शून्य का प्रतीक
है । राम भक्त तथा कृष्ण भक्त कवियों का ब्रह्म निर्गुण होते हुए भी सगुण रूप धारण
करता है :—
अगुनहि सगुनहि नहि कछु भेदा ।
गावहि मुनि पुरान बुध वेदा ।

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ३१
अगुन अरूप अलख अज जोई।
भगत प्रेम वश सगुन सो होई॥
जो गुन रहित सगुन सोई कैसे?
जल हिम उपल बिलग नहि जैसे।
—बालकाण्ड, पृ० १४७ कल्याण, मानस अङ्क
सूर तथा अष्टछाप के अन्य कवियों ने कृष्ण को जो कि उनके इष्टदेव है—पूर्ण
ब्रह्म पुरुषोत्तम माना है जिनके सगुण निर्गुण दो रूप है। ब्रह्म का निर्गुण रूप अगम है
अतः सगुण का आधार आवश्यक है। सूरदासजी के इस पद में—
अविगत गति कछु कहत न आवै ।
ज्यों गूँगे मीठे फल को रस अंतरगतही भावै ।
परम स्वाद सब ही सु निरंतर अमित तोष उपजावै ।
मन बानी को अगम अगोचर सो जाने, जो पावै ।
रूप रेख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब कित धावै ।
सब विधि अगम विचारहिं ताते सूर सगुन पद गावै ॥
यहाँ निर्गुण के विचार को 'परम स्वाद' और 'अमित तोष' उत्पन्न करने वाला
स्वीकार किया गया है पर यह तोष और वह स्वाद गूँगे के गुड़ की भाँति मन में ही
आस्वाद्य और प्राप्य है। जो उसे पाता है वही जानता है औरों के लिए वह 'सब विधि
अगम' है।
—'सूर सुषमा' पृष्ठ १,
संपादक . पं० नंददुलारे वाजपेयी ।
गीता कहती है :—
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्त चेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥
जो देहवान् है उनसे अव्यक्त को उपासना कठिनाई से हो सकती है।
गो० तुलसीदास जी कहते है—
(१) अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।
—मानसांक, बालकांड, पृष्ठ ८०
(२) व्यापकु एक ब्रह्म अविनासी । सत चेतन घन आनंद रासी।
अस प्रभु हृदयँ अछत अविकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥
—मानसांक, बालकांड पृष्ठ ८०
(३) भरि लोचन विलोकि अवधेसा, तब सुनिहौं निरगुन उपदेसा।
तुलसी के राम ब्रह्म स्वरूप हैं। वे ही संसार के कर्त्ता है। यद्यपि तुलसी ने

३२ नामदेव की हिन्दी कविता
उन्हें दशरथ सुत माना है किन्तु वे साधारण, लौकिक जीव नहीं। उनके राजसिंहासन
के समय वेद उन्हीं को निर्गुण कह कर स्तुति करते हैं। वे पृथ्वी का भार हल्का करने
के लिए अवतार लेते हैं। परन्तु वस्तुत वे निराकार सच्चिदानन्द स्वरूप ही हैं।
मीरा के प्रभु हरि अविनाशी हैं किन्तु साथ ही वे सर्वगुणसम्पन्न मनोहर रूप-
धारी हैं। सिद्धांत रूप से इनके प्रभु निर्गुण ही है जो समस्त संसार में व्याप्त हैं किन्तु
व्यवहार की दृष्टि से वे ठाकुर की मूर्ति में भी विद्यमान हैं तभी तो मीरा वृन्दावन के
मंदिरों में कृष्ण के सम्मुख आत्म-विभोर होकर नृत्य करने लगती हैं। साथ ही साथ
निर्गुण होने के कारण उनका मिलना कठिन है। फिर भी वह पंचरंग चोला पहनकर
अपने प्रिय से झिरमिट में खेलने जाती है।
निर्गुण शब्द और उसके अर्थ का ऐतिहासिक विकास
श्रौत साहित्य में इस शब्द का प्रयोग कहीं नहीं मिलता है। इसका कारण
सम्भवत यह है कि उस युग में सगुण और निर्गुणमूलक साम्प्रदायिकता का उदय नहीं हो
पाया था।
निर्गुण शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम महाभारत १ और गीता में २ मिलता है।
इन दोनों ग्रन्थों में यह शब्द 'गुण रहित' के सामान्य अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
गीता और महाभारत के पश्चात् इस शब्द का प्रयोग चूलिकोपनिषद् ३ में पाया
जाता है। यहाँ पर वह निर्विशेष ब्रह्म तत्त्व के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
शंकराचार्य ने इस शब्द का प्रयोग कई बार किया है। वे उसे हृदयस्थ
यौगिक ब्रह्म से विलक्षण सत्य संकल्पादि गुणों से विनिर्मुक्त आत्म तत्त्व का वाचक
मानते थे। ४
रामानुज और उनके मतानुयायियों ने भी इस शब्द का प्रयोग किया है, किन्तु
उन लोगों ने इसका अर्थ शांकर मतावलम्बियों द्वारा किये गये अर्थ से भिन्न रूप में
निर्धारित किया है। उनकी दृष्टि में वह जरा मरण आदि त्याज्य गुणों से रहित सगुण
ब्रह्म का ही वाचक है। ५
१. महाभारत शान्ति पर्व—३६६। २१-२८
२. 'असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुण भोक्तृ च।' अध्याय १३-१४
३. 'स विशेषत्वे निर्गुणम्'—चूलिकोपनिषद। अध्याय-७ में
४. छन्दोग्योपनिषद्—'शांकर भाष्य' गीता प्रेस, ८०४-५
५. सर्व दर्शन संग्रह—संपादक: वासुदेव शास्त्री, १६५१, पूना।
(पृ० ११० पर निर्गुणवाद शब्द का प्रयोग और निर्गुण शब्द की व्याख्या)

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ३३
रामानन्दी संप्रदाय के 'आनन्द भाष्य' मे भी लगभग ऐसा ही अर्थ किया है ।
अन्य दर्शनाचार्यों ने भी इस शब्द के अर्थ को अपनी सांप्रदायिक दृष्टि के अनुकूल बद-
लने की चेष्टा की थी ।१
नाथ संप्रदाय में इस शब्द का प्रचुर प्रयोग मिलता है ।२ वे लोग अपने
हृदयस्थ यौगिक ब्रह्म को अभिव्यंजित प्रायः इसी शब्द के माध्यम से करते थे ।
मध्यकालीन आचार्यों ओर नाथ पंथियों के द्वारा किये गये निर्गुण शब्द के
प्रयोग से मध्ययुग के कुछ संत कवि इतने अधिक प्रभावित हुए कि वे उसी को केन्द्र
बनाकर अपनी विचारधारा प्रसारित करने लगे । वे लोग अपने इष्टदेव, अपनी साधना
और अपने मत सबको निर्गुण कहते थे ।
संत बुल्ला साहव ने अपने इष्टदेव को 'निर्गुण, दयाल, दानी'३ कहा है ।
राम को वे निर्गुण शब्द का सार रूप मानते थे ।४
संतो ने अपने इष्टदेव के प्रसंग में निर्गुण शब्द का प्रयोग अधिकतर 'द्वैताद्वैत
विलक्षण परम तत्त्व रूपी हृदयस्थ यौगिक ब्रह्म' के अर्थ मे किया है । यारी साहव अपने
निर्गुण ब्रह्म को सुषुम्ना की शैया पर सोया हुआ बताते हैं, साथ ही उसे वे परमतत्त्व
रूप भी मानते है । वे लिखते हैं—
'सुखमन सेज परम तत रहिया किया निर्गुण निरंकार ।'५
संतो ने प्रायः अपनी साधना को भी निर्गुण ही कहा है । उनकी साधना का
प्रमुख अंग ध्यान है । उससे पहिले निर्गुण शब्द का प्रयोग करते हुए संत जगजीवन
साहव ने लिखा है—
'जगजीवन गुरु चरन परि के निरगुन धरि ध्यान ।'६
इस प्रकार हम देखते हैं कि मध्यकालीन संतो के एक वर्ग मे निर्गुणवाद का
१. 'आनन्द भाष्य' १।१२ मे लिखा है :
निर्गता निकृष्टा सत्वादयः प्राकृता गुणा यस्मात्तन्निर्गुणमिति
व्युत्पत्तेर्निकृष्ट गुणराहित्यमेव निर्गुणत्वम् ।
२. सिद्ध सिद्धात पद्धति—संपादिका कल्याणी बोस, पृ० ७०
'निर्गुणं च शिवं शान्तं शान्तं गगने विश्वतोमुखम् ।
भ्रूमध्ये दृष्टिमादाय ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ॥
३. बुल्ला साहव की बानी—पृ० २६
४. बुल्ला साहव की बानी—पृ० १६ 'तुम तो राम हउ निर्गुन सार'
५. संत सुधा सार खण्ड २, पृ० ७३
६. संत बानी संग्रह भाग २, पृ० १३
३

३४ नामदेव की हिन्दी कविता
बहुत अधिक प्रचार था। निर्गुण शब्द उनमें द्वैताद्वैत विलक्षण परमतत्त्व रूपी यौगिक
ब्रह्म, यौगिक साधना और वेदांतिक विचारधारा के पारिभाषिक अर्थ में रूढ़ हो
गया था।
निर्गुण काव्य
निर्गुण काव्यधारा का उदय रूढ़िवादी अंध विश्वास प्रधान धार्मिक संप्रदायो
की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था। सच्चे निर्गुणिया कवि पथ निर्माण की प्रवृत्ति को
हेय समझते थे। ये लोग अलौकिक प्रतिभासंपन्न होते थे। सैकड़ों साधु संत उनकी
प्रतिभा से प्रभावित होकर उनके शिष्य हो जाते थे।
निर्गुण संप्रदाय के अंतर्गत उन्ही संतो को लिया जाता है जिनका व्यक्तित्व
किन्ही विशेष विवृत विधि-विधानो, अंध विश्वासो और मिथ्याचारो से कलंकित नही
हुआ है। इनमें भी उन्हीं संतो के अध्ययन पर विशेष जोर दिया गया है जिनमें काव्यत्व
का स्फुरण और मधुर रहस्य-भावना का उन्मेष पाया जाता है। इस दृष्टि से निम्न-
लिखित कवि ही महत्त्वपूर्ण प्रतीत होते है—
कबीर, धर्मदास, नानक, रैदास, दादू, रज्जब, सुंदरदास, गरीबदास, यारी
साहब, बुल्ला साहब, जगजीवन साहब, गुलाल साहिब, भीखा साहब, पलटू साहब,
दरिया साहब (बिहार वाले), मलूकदास, चरनदास, दयाबाई, सहजोबाई और तुलसी
साहब।
सारग्राहिता इन संतो की प्राणभूत विशेषता थी। उन्होंने अपने समय की
समस्त प्रचलित धार्मिक एवं दार्शनिक विचारधाराओ, साधनाओ और साधु संप्रदायो के
सारभूत तत्त्वो को 'अनुभो' के द्वारा आत्मसात करके तथा उन्हे अपनी प्रतिभा के साँचे
में ढालकर एक अभिनव रूप दे दिया है, जो उनकी मौलिक देन है। वे सत्य के अनन्य
उपासक थे। उन्हे झूठ और मिथ्यात्व से घृणा थी। यही कारण है कि उन्हे जहाँ कही
भी मिथ्यात्व दिखाई पड़ा है वहाँ उन्होने उसका डटकर विरोध किया है। सत्य के
मंडन और अनृत के खंडन की उनकी यह प्रवृत्ति बहुत महत्त्वपूर्ण है।
निर्गुणिया संत निर्गुणोपासक थे। उनमे निर्गुण शब्द का प्रयोग अधिकतर
द्वैताद्वैत विलक्षण हृदयस्थ यौगिक ब्रह्म के लिए हुआ। कुछ स्थलों पर वह निर्विशेष
ब्रह्म का वाचक बनकर भी आया है। निर्गुण शब्द के इन दोनो अर्थों की दो परम्पराएँ
उन्हें पृष्ठभूमि के रूप में प्राप्त हुई थी। प्रथम अर्थ की परम्परा उन्हें नाथ पंथियो से
मिली थी। और दूसरे अर्थ की प्रेरणा का श्रेय अद्वैत वेदांतियो को है। इससे स्पष्ट है
कि उन्होंने प्रचलित साधनाओ में समन्वय स्थापित करने की भी चेष्टा की थी। यही

निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि
कारण है कि उनकी साधना में ज्ञान, भक्तियोग और वैराग्य के समन्वित रूप पर ही
विशेष बल दिया गया है।
उन्होंने एक दूसरा सबसे बड़ा कार्य प्रचलित जटिल विचारधाराओं, साधनाओं
और सांप्रदायिक आचारों के सहजीकरण का किया था। सहजीकरण की अपनी इस
प्रवृत्ति के कारण वे मध्यकालीन संतों में अलग खड़े दिखलाई पड़ते हैं। बुद्धिवादिता,
सदाचरणप्रियता, सामाजिक और आध्यात्मिक साम्यवाद, विचारात्मकता आदि उनकी
अन्य प्रमुख उल्लेखनीय प्रवृत्तियाँ हैं। उनकी इन्हीं विशेषताओं ने उन्हें एक सूत्र में बाँध
रखा है। इसी लिए उनकी परम्परा अन्य संतों की परम्पराओं से विलक्षण और निर-
पेक्ष दिखाई पड़ती है ।
सगुण काव्य में पार्थक्य
मध्ययुग में वैष्णव साधना दो रूपों में विकसित हुई थी : निर्गुण और सगुण ।
निर्गुणोपासना पद्धति शुद्ध वैष्णव नहीं रह पाई। उस पर अपने युग की समस्त साध-
नाओं और विचारधाराओं का पूरा-पूरा प्रभाव पड़ा। तंत्र मत, नाथ पंथ और निरंजन
पंथ ने उसका स्वरूप ही बदल दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि वह वैष्णव होते
हुए भी उससे बिलकुल भिन्न प्रतीत होने लगी ।
सगुण और निर्गुण धाराओं का मौलिक भेद रूपोपासना से संबंधित है ।¹
निर्गुंनियां संत हृदयस्थ द्वैताद्वैत विलक्षण अलख निरंजन निर्गुण ब्रह्म के उपा-
सक थे। उनका यह निर्गुण ब्रह्म रूप और आकार से विहीन, पुष्प की गंध से भी
सूक्ष्मतर और अनिर्वचनीय है ।²
किन्तु यह वेदांतियों के ब्रह्म के सदृश शुष्क तत्त्व मात्र नहीं है। और न बौद्धों
१. 'मध्यकालीन धर्मसाधना' डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० २३०
'दोनों में प्रधान भेद रूपोपासना के विषय में है। दूसरी श्रेणी के अर्थात् सगुण
मार्गी भक्त ठोस रूप के उपासक हैं।'
सूरदास कहते हैं—
सुंदर मुख कौ बलि बलि जाऊँ ।
लावण्य निधि, गुन निधि, शोभा निधि ॥
२. कबीर ग्रंथावली
जाके मुंह माथा नही, नाही रूप और अरूप।
पुहुप वास से पातरा, ऐसा रूप अनूप।

३६ नामदेव की हिन्दी कविता
का शून्य ही है। यह सूक्ष्मतम और अनिर्वचनीय होते हुए भी करुणामय, गरीबनिवाज
और भक्तवत्सल है।
भक्तों के भगवान की इन विशेषताओं से विशिष्ट होने पर भी यह उसे उससे
सर्वथा भिन्न है। भक्तों के भगवान 'बाहिरजामी' किन्तु इनके राम 'अंतरजामी' है।
अंतरजामी होते हुए भी वे भक्तों को दर्शन देते हैं। उनका यह रूप अनिर्वचनीय
होता है।१
यदि भक्त किसी प्रकार उसका वर्णन करने का प्रयास भी करे तो उसको कोई
समझ नहीं सकता। यदि थोड़ा बहुत समझने लगे तो उस पर उसे विश्वास नहीं
होता।२
इस प्रकार हम देखते हैं कि संतों का निर्गुण उपास्य रूपवान और अरूप होते
हुए भी दोनों से विलक्षण है। इसके विपरीत सगुणवादियों का उपास्य मानवों के बीच
में उन्हीं के रूप में प्रतिष्ठित रहता है।
मानव जीवन की संपूर्ण शक्ति, सारा सौंदर्य और समस्त शील का पूर्ण आविर्भाव
उन्हीं में मिलता है। यही कारण है कि एक का उपास्य केवल अनुभूति और साधना-
गम्य मात्र होने के कारण रहस्यपूर्ण है और दूसरे का प्रत्यक्ष होने के कारण प्रेम और
श्रद्धा का पात्र है।
भगवान का प्रथम रूप केवल बुद्धिवादी साधकों को ही आकृष्ट कर पाता है जब
कि उनका दूसरा रूप संपूर्ण सृष्टि को तन्मय और रसमग्न रखने की क्षमता रखता है।
उपास्य रूप सम्बन्धी इस अंतर ने निर्गुण और सगुण काव्य धाराओं को बिलकुल अलग
कर रखा है।
निर्गुण और सगुणवादी कवियों में स्वभावगत भेद भी दिखाई पड़ता है।
निर्गुणवादी अधिकतर क्रांतिदर्शी, सत्यान्वेषी, अक्खड़, फक्कड़ और घुमक्कड़ होते थे।
उनके व्यक्तित्व की ये विशेषताएँ उनकी रचनाओं में स्पष्ट प्रतिबिंबित मिलती हैं।
इसके विपरीत सगुणवादी कवि अधिकतर सामंजस्यवादी, रूढ़िवादी, सत्त्ववादी प्रेमी
जीव होते थे। उनके व्यक्तित्व की इन विशेषताओं ने उनकी रचनाओं को निर्गुनिया
कवियों की रचनाओं की अपेक्षा अधिक कोमल, रागरंजित और मधुर बना दिया है।
निर्गुण काव्यधारा सगुण काव्यधारा से इस दृष्टि से भी भिन्न है।
१. कबीर ग्रन्थावली पृ० १५
कबीर देखा एक अंग महिमा कही न जाई।
२. कबीर ग्रन्थावली पृ० १७
दीठा है तो कस कहू, कह्या न कोइ पतियाइ।

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ३७
निर्गुण एवं सगुण कवियों में हमें रस सम्बन्धी अंतर भी दिखलाई पड़ता है।
निर्गुण काव्यधारा भक्ति, शांत और वीर इसकी वह त्रिवेणी है जिसमें अवगाहन कर
मानव जाति अपने युग-युग के कालुष्य धो सकती है।
इसके विपरीत सगुण काव्यधारा में हमें शृंगार और भक्ति के मधुमय सुहाग से
उद्भूत माधुर्य भाव रूपी शिशु की रसमयी लीलाओं का वैभव मिलता है।
एक धारा पतितपावनी है और दूसरी आनन्दविधायिनी । यही दोनों में
अंतर है।
इसके अतिरिक्त दोनों धाराओं में प्रवृत्तिगत भेद भी दिखाई पड़ता है । निर्गुण
काव्यधारा भूमि बुद्धिवादिता और विचारात्मकता है। इसके विपरीत सगुण काव्यधारा
परम भाव-प्रवण, श्रद्धामूलक और अनुभूति प्रधान है।
दोनों धाराओं में साधना और सिद्धि सम्बन्धी अंतर भी है। निर्गुण काव्यधारा
का सम्बन्ध जीवन के साधना पक्ष से है जब कि सगुण काव्यधारा में जीवन के सिद्धि
पक्ष की झाँकी सजाई गई है।
एक में उन समस्त साधनों और प्रयत्नों का उल्लेख किया गया है जिससे आनन्द
ब्रह्म की उपलब्धि हो सकती है। दूसरे में स्वयं आनन्द रूप ब्रह्म का ही वर्णन किया
गया है।
सगुण कवियों का लक्ष्य भगवान के सगुण, साकार, आनन्दमय रूप की झाँकी
का उद्घाटन करना था। इसके विपरीत निर्गुण कवियों का उद्देश्य अपने हृदयस्थ 'मुनि
मंडलवासी पुरुष' की रहस्यानुभूति करना था। सगुण एवं निर्गुण धारा के इन भेदों ने
ही एक दूसरे को परस्पर अलग कर रखा है।
निर्गुण काव्यधारा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
ऐतिहासिक स्थिति से तात्पर्य निर्गुण काव्यधारा के काल सम्बन्धी सीमा और
विस्तार के निर्णय से है। निर्गुण काव्यधारा के प्रमुख प्रवर्तक संत कबीर माने जाते
हैं, किंतु सच्ची बात यह है कि निर्गुण काव्यधारा का बीजारोपण नामदेव, जयदेव,
त्रिलोचन, सदन, बेनी, रामानन्द, धन्ना, पीपा, सेन आदि संत कबीर से पहले ही कर
चुके थे। कबीर ने उसे व्यवस्थित रूप देकर विकसित, प्रचारित और प्रसारित किया
था। भक्ति की उत्पत्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित उक्ति प्रसिद्ध है :—
भक्ति द्राविड़ उपजी लाये रामानन्द ।
परगट किया कबीर ने सप्त द्वीप नवखंड ॥
यदि इस उक्ति में कोई सार है तो निर्गुण काव्यधारा का उदय १४ वीं शताब्दी
से मानना पड़ेगा । डॉ० गोविंद त्रिगुणायत को तो यह उक्ति विशेष रूप से सारगर्भित

३८ नामदेव की हिन्दी कविता
प्रतीत होती है। उनके अनुसार निर्गुण काव्यधारा का उदय १४ वो शताब्दी से मानना
ही ठीक है।१
डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदीजी का भी यही मत है।२
निर्गुण काव्यधारा की अंतिम सीमा निश्चित करना थोड़ा कठिन मालूम होता
है क्योंकि निर्गुणिया संतों की परम्परा भारत में आज भी जीवित है। विविध पंथों के
रूप में नहीं अपितु उनकी जैसी प्रवृत्ति वाले साधु संतों के रूप में भी। किन्तु संत तुलसी
साहब के बाद के संतों में कोई ऐसा अलौकिक प्रतिभासंपन्न संत नहीं हुआ जिसकी
वाणी में सरस काव्य का उन्मेष हो। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि संत तुलसी साहब
के बाद यह धारा केवल नाम मात्र को ही शेष रह गई थी। संत तुलसी साहब के काल
के सम्बन्ध में थोड़ा मतभेद है। कुछ विद्वान् उनका काल १८१७ विक्रमी से लेकर
१८६६ विक्रमी तक मानते हैं और कुछ १८२० से लेकर १६०० विक्रमी तक निश्चित
करते हैं। इस संदर्भ में डॉ० गोविंद त्रिगुणायत का मत समीचीन जान पड़ता है।३
सिद्ध संप्रदाय (सिद्धों की परंपरा) : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
उपनिषदों में कर्मकाण्ड के विरुद्ध जो प्रतिक्रिया मिलती है वह अन्तर्धारा के रूप
में (अप्रत्यक्ष रूप में) ही। उसका प्रत्यक्ष रूप में खण्डन और विरोध तो बौद्ध धर्म ने
ही किया। बौद्ध निरीश्वरवादी थे। सदाचार, अहिंसा, आत्मविश्वास, समाधि, शील
और प्रज्ञा आदि ही बौद्ध धर्म के वे अनमोल रत्न हैं जिनके द्वारा 'निर्वाण' की प्राप्ति
हो सकती है। कालान्तर में बौद्ध धर्म दो भागों में बँट गया—हीनयान और महायान।
आगे चलकर महायान के भी कई टुकड़े हो गये। वज्रयान और सहजयान इसके अंतिम
टुकड़े हैं। इसमें कष्टपूर्ण व्रतसंयम आदि की कोई गुंजाइश नहीं रह गई।
बौद्ध धर्म में कालान्तर में अनाचार का प्रवेश हो गया। लेकिन इस देश से इस धर्म
का निष्कासन प्रधानतः शंकर, कुमारिल तथा उदयन आदि वेदान्तिक और मीमांसक
१. हिंदी की निर्गुण काव्यधारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठ भूमि, पृ० १४।
२. मध्यकालीन धर्मसाधना, डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ६५।
३. 'तुलसी साहब की स्थिति के सम्बन्ध में हम उपर्युक्त दोनों मतों में से चाहे किसी
को स्वीकार करें, पर उनकी अंतिम तिथि के सम्बन्ध में कोई विशेष मतभेद नहीं
है। इस आधार पर हम निर्गुण काव्य धारा की अंतिम अवधि १६ वो शताब्दी
का अंतिम वर्ष मान सकते हैं।'
—'हिंदी की निर्गुण काव्यधारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि' पृ० १४।

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ३६
आचार्यों द्वारा ही हुआ। उत्तरी भारत में हर्षवर्द्धन तक इसे फलने-फूलने के लिए राज-
कीय सहारा मिला। बिंबसार, अशोक, कनिष्क आदि राजाओं से इसे पर्याप्त सहारा
मिला। हर्षवर्द्धन के पश्चात् राजकीय सहायता न मिलने के कारण बौद्ध संन्यासियो को
उन जगहों में जाना पड़ा जहाँ वे निम्न स्तर के लोगो के बीच अपने नानाविध चमत्कार
दिखाकर कुछ अर्जित कर सकने में समर्थ हो सकते। फलस्वरूप उनमे उच्च एवं शिष्ट
मानसिक एवं नैतिक प्रेरणाओं का अभाव बढ़ने लगा और वे जादू टोनी, तंत्रों-मंत्रों की
ओर अत्यंत वेग से मुड़ गये। मंत्रयान का ही अग्रिम विकास वज्रयान की संज्ञा से अभि-
हित किया जाता है। दोनो में अन्तर बहुत ही कम है। सौम्य अवस्था का नाम मंत्रयान
और उग्र रूप की संज्ञा वज्रयान। महात्मा बुद्ध ने तो मंत्र तंत्र तथा जादू-टोना को
'मिथ्या जीव' (Bad living) कहकर तिरस्कृत ही किया। किन्तु आगे चलकर उन्ही
के अनुयायियो ने इन्हें निर्वाण-प्राप्ति का एक प्रमुख अंग ही मान लिया और बुद्ध के
मानव व्यक्तित्व के तिरस्कार ने उन्हें मानव लोक से ऊपर उठाकर दिव्य लोक में पहुँचा
दिया। छोटे बड़े मंत्रों की रचना होने लगी। इनके साथ ही हठयोग की जटिल विधियाँ
भी इन लोगों ने अपनाईं। इस प्रकार इन सिद्धो ने भोली-भाली जनता का विश्वास
अर्जित किया। मंत्र, मैथुन तथा हठयोग वज्रयान के तीन प्रमुख तत्त्व मान लिए गये।
राहुलजी के अनुसार इन संप्रदायों का उद्भव-स्थान दक्षिण का श्री पर्वत और
धान्य कटक (गुंटूर, जिला मद्रास) था। वज्रयानी सिद्धों ने मंत्र के उपर्युक्त तत्त्वो के साथ
मद्य और मांस को भी शामिल कर पंच तत्त्वों को 'पंच मकार' को अपनी सहज साधना
का अंग बनाया।
धर्म के नाम पर तो अनाचार का समावेश हुआ ही साथ ही हठयोग की
प्रक्रियाएँ भी इनकी साधना का मुख्य अंग बनीं। इसके परिणामस्वरूप घट के भीतर
चक्र, नाड़ी, शून्य देश आदि की कल्पना करके नाद, बिंदु, सुरति, निरति आदि परि-
भाषिक शब्दो के सहारे अन्तस्साधना का विधान किया गया। इसके कारण वे अपने को
रहस्यदर्शी करार देने लगे और रहस्यमय भाषा में ही पहेलियाँ कह कर लोगो को
आश्चर्य चकित करने लगे।
नाथ पंथ
नाथ पंथ का मूल बौद्धों की यही वज्रयान शाखा है। चौरासी सिद्धों में गोरख-
नाथ (गोरक्ष पा) भी गिन लिए गये हैं। पर यह स्पष्ट है कि उन्होने अपना मार्ग अलग
कर लिया। योगियो की इस हिन्दू शाखा ने वज्रयानियो के अश्लील और वीभत्स
विधानों से अपने को अलग रखा। गोरख ने पतंजलि के उच्च लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति को
लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया। वज्रयानी सिद्धो का लीला क्षेत्र भारत का पूर्वी भाग

४० नामदेव की हिन्दी कविता
था । गोरख ने अपने पंथ का प्रचार देश के पश्चिमी भागो मे—राजपूताने और पंजाब
में किया ।
गोरखनाथ का समय
गोरखनाथ का काल निर्णय करते समय विद्वानों के बीच परस्पर मतभेद हो
जाता है । सामान्यतः इस सम्बन्ध में चार मत मिलते हैं—
१. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मत, जिसमे डॉ० रामकुमार वर्मा और डॉ०
धर्मेन्द्र शास्त्री भी सहमत हैं—गोरख का समय १३ वी शती का
मानता है ।¹
२. डॉ० श्याम सुन्दरदास का मत जो गोरख को १४ वी शती का
मानता है ।२
३. पं० हजारीप्रसाद द्विवेदी और स्व० डॉ० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल का मत
जो गोरख को १० वी शताब्दी का मानता है ।३
४. धी राहुलजी का मत जो गोरख को १० वी शती के अंतिम चरण का
मानता है ।४
ज्ञानदेव की परंपरा
गोरख को १३ वी शती का सम-सामयिक मानने के लिए सबसे बड़ा और सबल
प्रमाण ज्ञानदेव बतलाई वह नाथ परम्परा की सूची है जिसमें उन्होंने अपने को नाथ
परम्परा में मानते हुए अपने पूर्व के नाथो की एक सूची दी है । वह सूची इस
प्रकार है ।५
आदिनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ, गैनीनाथ, निवृत्तिनाथ और ज्ञानदेव ।
ज्ञानदेव महाराष्ट्र के संत थे जो अलाउद्दीन (समय संवत् १३५८) के समकालीन
थे । उपरिलिखित महाराष्ट्र परम्परा के अनुसार गोरखनाथ का समय महाराज पृथ्वीराज
के पीछे आता है ।
१. हिन्दी साहित्य का इतिहास : रामचन्द्र शुक्ल, पृ० १६ ।
२. हिन्दी साहित्य, पृ० ६० ।
३. नाथ संप्रदाय : डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ६६ ।
४. 'गोरख सिद्धांत संग्रह', पृ० ४० ।
५. हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचन्द्र शुक्ल, पृ० १८ ।

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ४१
जिस प्रकार सिद्धो की संख्या चौरासी प्रसिद्ध है उसी प्रकार नाथों की संख्या
नौ। नाथ पंथ सिद्धो की परम्परा से छंटकर निकला है, इसमें कोई संदेह नही।
श्री विनयकुमार के अनुसार गोरख दसवी शती के अंतिम चरण और ग्यारहवी
शती के प्रारम्भ के सम-सामयिक थे ।१
गोरखनाथ की हठयोग-साधना ईश्वरवाद को लेकर चली थी। अतः उसमें
मुसलमानों के लिए भी आकर्षण था। ईश्वर से मिलाने वाला योग, हिन्दुओ और मुसल-
मानों दोनो के लिये एक सामान्य साधना के रूप में आगे रखा जा सकता है, यह बात
गोरखनाथ को दिखाई दी थी। उसमें मुसलमानों को अप्रिय मूर्तिपूजा और बहुदेवोपासना
की आवश्यकता न थी। अतः उन्होंने दोनों के विद्वेष भाव को दूर करके साधना का
एक सामान्य मार्ग निकालने की संभावना समझी थी और वे उसका संस्कार अपनी
शिष्य परम्परा में छोड़ गये।
नाथ संप्रदाय के सिद्धांत ग्रन्थों में ईश्वरोपासना के बाह्य विधानों के प्रति
उपेक्षा प्रकट की गई है। घट के भीतर ही ईश्वर को प्राप्त करने पर जोर दिया गया
है। वेद शास्त्र का अध्ययन व्यर्थ ठहराकर विद्वानों के प्रति अश्रद्धा प्रकट की गई है
तीर्थाटन आदि निष्फल कहे गये हैं।
'नाद,' 'बिंदु' आदि संज्ञाएँ वज्रयानी सिद्धो में बराबर चलती रही हैं। गोरख
सिद्धांत में उनकी व्याख्या इस प्रकार की गई है—
नाथांशो नादो, नादांशः प्राणः।
शक्त्यंशो बिन्दु, बिन्दोरंशः शरीरम् ॥
गोरक्ष सिद्धांत संग्रह
( गोपीनाथ कविराज संपादित )
'नाद' और 'बिंदु' के योग से जगत् की उत्पत्ति सिद्ध और हठयोग दोनो
मानते थे।
१. 'जहाँ तक गोरख के आविर्भाव काल का सवाल है हम ज्ञानदेव की सूची का उल्टा
सीधा अर्थ लगा कर उन्हें १३ वीं सदी तक खींच लाने के पक्षपाती नहीं हैं। उपरि
लिखित 'रत्नाकर जोयम कथा' 'विमुक्त मंजरी' और 'गोरक्ष सिद्धांत संग्रह' जैसे
प्रामाणिक ग्रन्थो में—जो राहुलजी के अनुसार भूटान में रहने के कारण सदियो के
हेर-फेर से बचे रहे—सहसा अविश्वास भी नहीं किया जा सकता। इस तरह हमारा
दृढ़ विश्वास है कि गोरख दसवी शती के अंतिम चरण और ग्यारहवी के प्रारम्भ
के समसामयिक थे।'
'साहित्य संदेश' अंक १२, मार्च १६४५, पृ० ३६५।

४२ नामदेव की हिन्दी कविता
नाथ संप्रदाय जब फैला तब उसमें भी जनता की नीची और अशिक्षित श्रेणियों
के बहुत से लोग आए जो शास्त्र संपन्न न थे, जिनकी बुद्धि का विकास बहुत सामान्य
कोटि का था ।१
निर्गुण उपासना का विकास कैसे हुआ ?
मध्यकाल में उत्तरी भारत में बौद्ध तांत्रिकों का प्रभुत्व था२ इस भू-भाग के
कोने-कोने में बौद्ध तांत्रिकों की साधना फैली हुई थी । इन बौद्ध तांत्रिकों ने सामान्य
जनता को बहुत अधिक प्रभावित किया । निर्गुंणिया संत इसी सामान्य जनता से संबंधित
थे । यही कारण है कि उन पर बौद्ध तंत्रों का प्रभाव दिखाई देता है ।
मंत्रयान
बौद्ध तंत्र मतों का उदय महायान और उसकी शाखाओं एवं उपशाखाओं में
हुआ । यों तो तंत्र मत की हल्की झलक प्राचीन३ बौद्ध साहित्य में भी मिलती है किंतु
तंत्र मत का उदय महायान की मंत्रयान शाखा से स्पष्ट दिखाई दिया । इस मंत्रयान में
तंत्र, मंत्र तथा मुद्रा, मंडल आदि को विशेष महत्त्व दिया गया है ।४ इस संप्रदाय का
सबसे प्रथम ग्रन्थ ‘मंजुश्री मूल कल्प’ माना जा सकता है । इसका रचना काल प्रथम
या दूसरी शताब्दी ई० माना जाता है ।५
इससे स्पष्ट है कि मंत्रयान का उदय दूसरी शताब्दी के आसपास हो चला था ।
किंतु मंत्रों के गूढ़ रहस्यो का प्रचार साधारण जनता में न हो सका । परिणाम यह
हुआ कि मंत्रयान को अपनी वेशभूषा बदलनी पड़ी और उसे उन सामान्य जादू-टोना,
जंत्र मंत्र तथा यौनमूलक यौगिक साधना अपनानी पड़ी । इन लोगों ने इन पूर्व प्रच-
लित जादू टोने, यौनयोगिक प्रक्रियाओं आदि को बौद्धिक विचारधारा से अनुप्राणित
करके प्रस्तुत करने का प्रयास किया । मंत्रयान का यह नया रूप ही वज्रयान
कहलाया ।६
1 'The system of mystic culture introduced by Gorakhnath does
not seem to have spread widely through the educated classes.'
—गोपीनाथ कविराज और झा
( सरस्वती भवन स्टडीज )
2. Introduction to Budhist Esoterism, p 166.
३. बौद्ध दर्शन मीमांसा—डॉ० बलदेव उपाध्याय, पृ० ४२५ ।
4. Introduction to Tantrik Budhism : —Das Gupta. p 69.
५. साधना माला-भाग २ (भूमिका)
६. बौद्ध दर्शन मीमांसा —डॉ० बलदेव उपाध्याय, पृ० ४२८ ।

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ४३
वज्रयान मंत्रयान का विकसित और परिवर्धित रूप माना जाता है। वज्र का
अर्थ है शून्यता। वज्रयान में सब कुछ पूर्ण शून्य रूप माना जाता है। इस बात को डॉ०
एस० बी० दासगुप्ता ने अपने 'तांत्रिक बुद्धिज्म' में स्पष्ट किया है।
निर्गु णिया कवियों पर बौद्ध तांत्रिकों का ऋण
बौद्ध तांत्रिकों से संतों का सीधा संबंध था। यही कारण है कि वे लोग उनसे
बहुत अधिक प्रभावित हुए थे।१
वेदांत दर्शन की भांति बौद्ध तांत्रिक लोग तत्त्व को अनुभवगम्यता में ही विशेष
विश्वास करते थे। कोई आश्चर्य नही कि संतों को इस दिशा में भी प्रेरणा मिली हो।
उन्हो से प्रभावित होकर उन्होंने तर्क का विरोध और अनुभव का महत्त्व प्रतिपादित
किया है। यही नहीं उन्होंने बौद्ध तांत्रिकों के अनुकरण पर षट् शास्त्रादि की भी निंदा
की है। संत सुन्दरदास२ कहते हैं—
सुन्दर कहत षट शास्त्र माही भयो वाद ।
जाके अनुभव ज्ञान वाद में न बह्यो हैं···
संतों ने वेद शास्त्र की जी खोलकर निंदा की है। संत दरिया३ 'वेद कतेब' को
बंधन रूप मानते थे। कबीर ने कहा है—
वेद किताब कहो मत झूठा, झूठा जो न विचारे ।
संत मलूकदास४ ने तो यहाँ तक लिखा है कि वेद शास्त्र पढ़कर पंडित भी भ्रम
में पड़ गये हैं :—
वेद पढ़ पढ़ पंडित भूले ।
१. 'बौद्ध तांत्रिकों की तत्त्व की अनुभवगम्यता, धर्म ग्रन्थों की अमान्यता, तत्त्व का
वाच्यावाच्य परे होना, सहज तत्त्व की स्वरूप धारणा, सहजावस्था की धारणा,
शून्यवाद, अभिव्यक्ति विलक्षणता, नाद बिंदु साधना, कल्पनावाद, खण्डन-मण्डन की
प्रवृत्ति, साधनों में काम या राग का महत्त्व, काया शोधन, गुह्यवाद एवं योग साधना
आदि बातों ने संतों को पूरी पूरी प्रेरणा प्रदान की थी। उनकी बानियों पर इन
सब का प्रभाव परिलक्षित होता है।'
—'हिंदी की निर्गुण काव्यधारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि' पृ० २६२ ।
२. संत बानी संग्रह, पृ० १११ ।
३. वेद कतेब दोई फंद रचिया पंधी जित संसार ।
—संत दरिया बिहार वाले के चुने हुए पद, पृ० ४५ ।
४. मलूकदास की बानी, पृ० ४ ।