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सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 332 में से

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पृष्ठ 26

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि २७
निर्गुण ऐसा एकमेव तत्त्व विश्व की जड़ में है । जैसे-
'इदं सर्वं यदयमात्मा' (बृ. २-४-६)
'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' (मु. २-२-११)
'आत्मैवेदं सर्वम्' (छा. ७-२५-२)
'नेह नानास्ति किंचन' (बृ. ४-४-१९)
'निष्कलं निष्क्रियं शांतं निरवद्यं निरंजनम्' (श्वे. ६-१९)
'अस्थूलमनणु' (बृ. ३-८-८)
'निर्गुण' शब्द 'श्वेताश्वतरोपनिषद्' (६ : ११) में उस अद्वितीय 'देव'
(परमात्मा) का एक विशेषण बनकर आया है, जो सभी भूतो में अन्तर्हित है, सर्वव्यापी
है, सभी कर्मों का अधिष्ठाता है, सब का साक्षी है, सबको चेतनत्व प्रदान करने वाला
तथा निरुपाधि भी है ।
उसी की ओर संकेत करते हुए श्रीकृष्ण द्वारा 'गीता' (१३-१४) में भी कहलाया
गया है- 'उसमें सब इंद्रियों के गुणों का आभास है, पर उसके कोई भी इन्द्रिय नही है,
वह सबसे असक्त रहकर, अर्थात् अलग होकर भी सबका पालन करता है और निर्गुण
होने पर भी गुणों का उपभोग किया करता है।'
उपनिषद् ब्रह्म को 'नेति-नेति' शब्दो के द्वारा अभिहित करते हैं । इसका तात्पर्य
क्या है ? प्रत्येक विधेय उद्देश्य के क्षेत्र को सीमित करता है-यह उसका स्वभाव होता
है । 'यह लेखनी लाल है'—इस वाक्य में 'लाल' यह विधेय, उद्देश्य (लेखनी) के क्षेत्र
को वस्तुतः सीमित करता है । अर्थात् 'लाल' से पृथक् क्षेत्र में 'लेखनी' का कोई भी
सम्बन्ध नहीं माना जा सकता ।
ब्रह्म के विषय में हम किसी विधेय का प्रयोग नही कर सकते क्योकि ऐसा करने
से वह सीमित तथा परिमित बन जायेगा परन्तु वस्तुतः वह अपरिमित सत्ता है । इस
प्रकार उसमें कोई गुण नही रहता । न यह गुण वहाँ है और न वह गुण । सब गुणों के
निषेध करने से जो तत्त्व बच जाता है वही है ब्रह्म । इस प्रकार जिस ब्रह्म के विषय में
श्रुति 'नेति नेति' शब्दों का व्यवहार करती है वह ब्रह्म वस्तुतः निर्गुण ब्रह्म ही है और
यही ब्रह्म का पारमार्थिक रूप है ।
सत कबीर 'निर्गुण' शब्द का एक पर्याय 'अगुन' भी देते जान पड़ते है (क. ग्रं.
पद १८३) । वे उसके द्वारा सूचित किये जाने वाले तत्त्व को 'गुन अतीत' बतलाते है
और फिर उसे 'निर्गुण ब्रह्म' भी कहकर उसकी उपासना का उपदेश देते है (पद
३७५) । वे उसे अन्यत्र 'निर्गुण राम' की भी संज्ञा देते हैं और उसकी 'गति' को अगम्य
ठहराते है (पद ४६) तथा उसे केवल 'निर्गुण' कहकर भी उसी प्रकार अकथनीय बतलाते
(द्वैपद १८६) । परन्तु एक स्थल (पद १८४) पर वे उसके विषय में इस प्रकार भी