सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 29

३० नामदेव की हिन्दी कविता
उपनिषदों में कहा गया है—
अग्निमूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ
दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः
वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य
पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्व भूतान्तरात्मा ।
—मुण्डक २—१, ४
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतो बाहुरुत विश्वतस्पात् ।
स बाहुभ्यां धमति स पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥
—श्वेताश्वेतर ३—३
गीता में भी इसी का प्रतिपादन किया गया है—
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरो मुखं ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
—गीता १३—१३
श्रीमद्भागवत का कहना है—
एकायनऽसौ द्विफल स्त्रिमूलश्चतुरसः पंचविधः षडात्मा ।
सप्तत्वगष्टविटपो नवाक्षो दशच्छदी द्विखगो ह्यादि वृक्षः ॥
—भागवत १० पू०—२, २१
ब्रह्म की इस निराकारता अथवा विश्वरूपता को भगवद् विग्रह के व्यक्तित्व की
अपेक्षा अधिक महत्त्व देते हुए भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं :—
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥
—गीता ७—२४
एक ही ब्रह्म के दो रूपों को कैसे स्वीकार किया गया ?
ब्रह्म के संबंध में सभी संत कवियों ने अपनी रचनाओं में प्रायः एक-सा विचार
प्रकट किया है । संत, सूफी तथा भक्त आदि सभी कवियों ने ब्रह्म को निर्गुण, निराकार,
निर्लेप, अगम, अगोचर कहा है । जो सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी तथा सृष्टिकर्ता है उसी
से जड़ जगत् तथा चेतन जीव का जन्म हुआ । अंतर केवल इतना ही है कि संतों का
ब्रह्म निर्गुण ही है उसमें गुणों का समावेश हो ही नहीं सकता । वह शून्य का प्रतीक
है । राम भक्त तथा कृष्ण भक्त कवियों का ब्रह्म निर्गुण होते हुए भी सगुण रूप धारण
करता है :—
अगुनहि सगुनहि नहि कछु भेदा ।
गावहि मुनि पुरान बुध वेदा ।