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सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 28

हिंदी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि २६
प्रकट किया है :—
एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदानंद परधामा ॥
'कल्याण' का श्री मानस अंक, बालकांड, पृ० ७१ ।
अगुन अखंड अनंत अनादि । जेहि चिन्तहि परमारथवादी ।
नेति नेति जेहि वेद निरूपा । चिदानन्द निरुपाधि अनूपा ॥
व्यापक अकल अनीह अज निर्गुण नाम न रूप ॥
'कल्याण' का श्री मानस अंक बालकांड पृ० ७१ ।
वही ब्रह्म निर्गुण भी है और सगुण भी । इस लिए स्थान स्थान पर ब्रह्म का
निर्गुण भावात्मक वर्णन भी पाया जा सकता है । उपनिषद् कहती है—
स पर्यगाच्छुक्रम कायम् व्रण सस्नाविर शुद्धमपापविद्धं ।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयं भूर्याथातथ्यतोऽर्थान्
व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥
—ईश. ८
गीता के अनुसार :—
सर्वेन्द्रिय गुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
आसक्त सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुण भोक्तृ च ॥ १३-१२
श्रीमद् भागवत की उक्ति है :—
सर्वं त्वमेव सगुणो विगुणश्च भूमन् ।
नान्यत् त्वदरूपि मनोवचसा निरूक्तम् ॥
—भागवत ७-६, ४८
ब्रह्म चाहे निर्गुण हो चाहे सगुण इतना तो निश्चित है कि वह सर्वव्यापी है।
जब वह सर्वव्यापी है तो वह निराकार भी होगा ही क्योंकि आकार मे एकदेशीयता आ
जाती है और जो सर्वदेशीय है वह केवल एकदेशीय नही हो सकता । इसी लिए जहाँ
ब्रह्म के रूप की चर्चा की गई है वहाँ कोई विशिष्ट आकार न बताकर उसकी विश्व-
रूपता का ही वर्णन किया गया है। सर्वान्तर्यामी के रूप का इससे बढ़िया वर्णन और
हो ही क्या सकता है। वेद कहते है :—
सहस्रशीर्षाः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्र पात् ।
सभूमिं विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशांगुलम् ॥
—ऋग्वेद का पुरुष सूक्त