सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 40

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ४१
जिस प्रकार सिद्धो की संख्या चौरासी प्रसिद्ध है उसी प्रकार नाथों की संख्या
नौ। नाथ पंथ सिद्धो की परम्परा से छंटकर निकला है, इसमें कोई संदेह नही।
श्री विनयकुमार के अनुसार गोरख दसवी शती के अंतिम चरण और ग्यारहवी
शती के प्रारम्भ के सम-सामयिक थे ।१
गोरखनाथ की हठयोग-साधना ईश्वरवाद को लेकर चली थी। अतः उसमें
मुसलमानों के लिए भी आकर्षण था। ईश्वर से मिलाने वाला योग, हिन्दुओ और मुसल-
मानों दोनो के लिये एक सामान्य साधना के रूप में आगे रखा जा सकता है, यह बात
गोरखनाथ को दिखाई दी थी। उसमें मुसलमानों को अप्रिय मूर्तिपूजा और बहुदेवोपासना
की आवश्यकता न थी। अतः उन्होंने दोनों के विद्वेष भाव को दूर करके साधना का
एक सामान्य मार्ग निकालने की संभावना समझी थी और वे उसका संस्कार अपनी
शिष्य परम्परा में छोड़ गये।
नाथ संप्रदाय के सिद्धांत ग्रन्थों में ईश्वरोपासना के बाह्य विधानों के प्रति
उपेक्षा प्रकट की गई है। घट के भीतर ही ईश्वर को प्राप्त करने पर जोर दिया गया
है। वेद शास्त्र का अध्ययन व्यर्थ ठहराकर विद्वानों के प्रति अश्रद्धा प्रकट की गई है
तीर्थाटन आदि निष्फल कहे गये हैं।
'नाद,' 'बिंदु' आदि संज्ञाएँ वज्रयानी सिद्धो में बराबर चलती रही हैं। गोरख
सिद्धांत में उनकी व्याख्या इस प्रकार की गई है—
नाथांशो नादो, नादांशः प्राणः।
शक्त्यंशो बिन्दु, बिन्दोरंशः शरीरम् ॥
गोरक्ष सिद्धांत संग्रह
( गोपीनाथ कविराज संपादित )
'नाद' और 'बिंदु' के योग से जगत् की उत्पत्ति सिद्ध और हठयोग दोनो
मानते थे।
१. 'जहाँ तक गोरख के आविर्भाव काल का सवाल है हम ज्ञानदेव की सूची का उल्टा
सीधा अर्थ लगा कर उन्हें १३ वीं सदी तक खींच लाने के पक्षपाती नहीं हैं। उपरि
लिखित 'रत्नाकर जोयम कथा' 'विमुक्त मंजरी' और 'गोरक्ष सिद्धांत संग्रह' जैसे
प्रामाणिक ग्रन्थो में—जो राहुलजी के अनुसार भूटान में रहने के कारण सदियो के
हेर-फेर से बचे रहे—सहसा अविश्वास भी नहीं किया जा सकता। इस तरह हमारा
दृढ़ विश्वास है कि गोरख दसवी शती के अंतिम चरण और ग्यारहवी के प्रारम्भ
के समसामयिक थे।'
'साहित्य संदेश' अंक १२, मार्च १६४५, पृ० ३६५।