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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

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पृष्ठ 37

३८ नामदेव की हिन्दी कविता
प्रतीत होती है। उनके अनुसार निर्गुण काव्यधारा का उदय १४ वो शताब्दी से मानना
ही ठीक है।१
डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदीजी का भी यही मत है।२
निर्गुण काव्यधारा की अंतिम सीमा निश्चित करना थोड़ा कठिन मालूम होता
है क्योंकि निर्गुणिया संतों की परम्परा भारत में आज भी जीवित है। विविध पंथों के
रूप में नहीं अपितु उनकी जैसी प्रवृत्ति वाले साधु संतों के रूप में भी। किन्तु संत तुलसी
साहब के बाद के संतों में कोई ऐसा अलौकिक प्रतिभासंपन्न संत नहीं हुआ जिसकी
वाणी में सरस काव्य का उन्मेष हो। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि संत तुलसी साहब
के बाद यह धारा केवल नाम मात्र को ही शेष रह गई थी। संत तुलसी साहब के काल
के सम्बन्ध में थोड़ा मतभेद है। कुछ विद्वान् उनका काल १८१७ विक्रमी से लेकर
१८६६ विक्रमी तक मानते हैं और कुछ १८२० से लेकर १६०० विक्रमी तक निश्चित
करते हैं। इस संदर्भ में डॉ० गोविंद त्रिगुणायत का मत समीचीन जान पड़ता है।३
सिद्ध संप्रदाय (सिद्धों की परंपरा) : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
उपनिषदों में कर्मकाण्ड के विरुद्ध जो प्रतिक्रिया मिलती है वह अन्तर्धारा के रूप
में (अप्रत्यक्ष रूप में) ही। उसका प्रत्यक्ष रूप में खण्डन और विरोध तो बौद्ध धर्म ने
ही किया। बौद्ध निरीश्वरवादी थे। सदाचार, अहिंसा, आत्मविश्वास, समाधि, शील
और प्रज्ञा आदि ही बौद्ध धर्म के वे अनमोल रत्न हैं जिनके द्वारा 'निर्वाण' की प्राप्ति
हो सकती है। कालान्तर में बौद्ध धर्म दो भागों में बँट गया—हीनयान और महायान।
आगे चलकर महायान के भी कई टुकड़े हो गये। वज्रयान और सहजयान इसके अंतिम
टुकड़े हैं। इसमें कष्टपूर्ण व्रतसंयम आदि की कोई गुंजाइश नहीं रह गई।
बौद्ध धर्म में कालान्तर में अनाचार का प्रवेश हो गया। लेकिन इस देश से इस धर्म
का निष्कासन प्रधानतः शंकर, कुमारिल तथा उदयन आदि वेदान्तिक और मीमांसक
१. हिंदी की निर्गुण काव्यधारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठ भूमि, पृ० १४।
२. मध्यकालीन धर्मसाधना, डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ६५।
३. 'तुलसी साहब की स्थिति के सम्बन्ध में हम उपर्युक्त दोनों मतों में से चाहे किसी
को स्वीकार करें, पर उनकी अंतिम तिथि के सम्बन्ध में कोई विशेष मतभेद नहीं
है। इस आधार पर हम निर्गुण काव्य धारा की अंतिम अवधि १६ वो शताब्दी
का अंतिम वर्ष मान सकते हैं।'
—'हिंदी की निर्गुण काव्यधारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि' पृ० १४।