सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ४३
वज्रयान मंत्रयान का विकसित और परिवर्धित रूप माना जाता है। वज्र का
अर्थ है शून्यता। वज्रयान में सब कुछ पूर्ण शून्य रूप माना जाता है। इस बात को डॉ०
एस० बी० दासगुप्ता ने अपने 'तांत्रिक बुद्धिज्म' में स्पष्ट किया है।
निर्गु णिया कवियों पर बौद्ध तांत्रिकों का ऋण
बौद्ध तांत्रिकों से संतों का सीधा संबंध था। यही कारण है कि वे लोग उनसे
बहुत अधिक प्रभावित हुए थे।१
वेदांत दर्शन की भांति बौद्ध तांत्रिक लोग तत्त्व को अनुभवगम्यता में ही विशेष
विश्वास करते थे। कोई आश्चर्य नही कि संतों को इस दिशा में भी प्रेरणा मिली हो।
उन्हो से प्रभावित होकर उन्होंने तर्क का विरोध और अनुभव का महत्त्व प्रतिपादित
किया है। यही नहीं उन्होंने बौद्ध तांत्रिकों के अनुकरण पर षट् शास्त्रादि की भी निंदा
की है। संत सुन्दरदास२ कहते हैं—
सुन्दर कहत षट शास्त्र माही भयो वाद ।
जाके अनुभव ज्ञान वाद में न बह्यो हैं···
संतों ने वेद शास्त्र की जी खोलकर निंदा की है। संत दरिया३ 'वेद कतेब' को
बंधन रूप मानते थे। कबीर ने कहा है—
वेद किताब कहो मत झूठा, झूठा जो न विचारे ।
संत मलूकदास४ ने तो यहाँ तक लिखा है कि वेद शास्त्र पढ़कर पंडित भी भ्रम
में पड़ गये हैं :—
वेद पढ़ पढ़ पंडित भूले ।
१. 'बौद्ध तांत्रिकों की तत्त्व की अनुभवगम्यता, धर्म ग्रन्थों की अमान्यता, तत्त्व का
वाच्यावाच्य परे होना, सहज तत्त्व की स्वरूप धारणा, सहजावस्था की धारणा,
शून्यवाद, अभिव्यक्ति विलक्षणता, नाद बिंदु साधना, कल्पनावाद, खण्डन-मण्डन की
प्रवृत्ति, साधनों में काम या राग का महत्त्व, काया शोधन, गुह्यवाद एवं योग साधना
आदि बातों ने संतों को पूरी पूरी प्रेरणा प्रदान की थी। उनकी बानियों पर इन
सब का प्रभाव परिलक्षित होता है।'
—'हिंदी की निर्गुण काव्यधारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि' पृ० २६२ ।
२. संत बानी संग्रह, पृ० १११ ।
३. वेद कतेब दोई फंद रचिया पंधी जित संसार ।
—संत दरिया बिहार वाले के चुने हुए पद, पृ० ४५ ।
४. मलूकदास की बानी, पृ० ४ ।