सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ नामदेव की हिन्दी कविता
नाथ संप्रदाय जब फैला तब उसमें भी जनता की नीची और अशिक्षित श्रेणियों
के बहुत से लोग आए जो शास्त्र संपन्न न थे, जिनकी बुद्धि का विकास बहुत सामान्य
कोटि का था ।१
निर्गुण उपासना का विकास कैसे हुआ ?
मध्यकाल में उत्तरी भारत में बौद्ध तांत्रिकों का प्रभुत्व था२ इस भू-भाग के
कोने-कोने में बौद्ध तांत्रिकों की साधना फैली हुई थी । इन बौद्ध तांत्रिकों ने सामान्य
जनता को बहुत अधिक प्रभावित किया । निर्गुंणिया संत इसी सामान्य जनता से संबंधित
थे । यही कारण है कि उन पर बौद्ध तंत्रों का प्रभाव दिखाई देता है ।
मंत्रयान
बौद्ध तंत्र मतों का उदय महायान और उसकी शाखाओं एवं उपशाखाओं में
हुआ । यों तो तंत्र मत की हल्की झलक प्राचीन३ बौद्ध साहित्य में भी मिलती है किंतु
तंत्र मत का उदय महायान की मंत्रयान शाखा से स्पष्ट दिखाई दिया । इस मंत्रयान में
तंत्र, मंत्र तथा मुद्रा, मंडल आदि को विशेष महत्त्व दिया गया है ।४ इस संप्रदाय का
सबसे प्रथम ग्रन्थ ‘मंजुश्री मूल कल्प’ माना जा सकता है । इसका रचना काल प्रथम
या दूसरी शताब्दी ई० माना जाता है ।५
इससे स्पष्ट है कि मंत्रयान का उदय दूसरी शताब्दी के आसपास हो चला था ।
किंतु मंत्रों के गूढ़ रहस्यो का प्रचार साधारण जनता में न हो सका । परिणाम यह
हुआ कि मंत्रयान को अपनी वेशभूषा बदलनी पड़ी और उसे उन सामान्य जादू-टोना,
जंत्र मंत्र तथा यौनमूलक यौगिक साधना अपनानी पड़ी । इन लोगों ने इन पूर्व प्रच-
लित जादू टोने, यौनयोगिक प्रक्रियाओं आदि को बौद्धिक विचारधारा से अनुप्राणित
करके प्रस्तुत करने का प्रयास किया । मंत्रयान का यह नया रूप ही वज्रयान
कहलाया ।६
1 'The system of mystic culture introduced by Gorakhnath does
not seem to have spread widely through the educated classes.'
—गोपीनाथ कविराज और झा
( सरस्वती भवन स्टडीज )
2. Introduction to Budhist Esoterism, p 166.
३. बौद्ध दर्शन मीमांसा—डॉ० बलदेव उपाध्याय, पृ० ४२५ ।
4. Introduction to Tantrik Budhism : —Das Gupta. p 69.
५. साधना माला-भाग २ (भूमिका)
६. बौद्ध दर्शन मीमांसा —डॉ० बलदेव उपाध्याय, पृ० ४२८ ।