सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 30, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ३१
अगुन अरूप अलख अज जोई।
भगत प्रेम वश सगुन सो होई॥
जो गुन रहित सगुन सोई कैसे?
जल हिम उपल बिलग नहि जैसे।
—बालकाण्ड, पृ० १४७ कल्याण, मानस अङ्क
सूर तथा अष्टछाप के अन्य कवियों ने कृष्ण को जो कि उनके इष्टदेव है—पूर्ण
ब्रह्म पुरुषोत्तम माना है जिनके सगुण निर्गुण दो रूप है। ब्रह्म का निर्गुण रूप अगम है
अतः सगुण का आधार आवश्यक है। सूरदासजी के इस पद में—
अविगत गति कछु कहत न आवै ।
ज्यों गूँगे मीठे फल को रस अंतरगतही भावै ।
परम स्वाद सब ही सु निरंतर अमित तोष उपजावै ।
मन बानी को अगम अगोचर सो जाने, जो पावै ।
रूप रेख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब कित धावै ।
सब विधि अगम विचारहिं ताते सूर सगुन पद गावै ॥
यहाँ निर्गुण के विचार को 'परम स्वाद' और 'अमित तोष' उत्पन्न करने वाला
स्वीकार किया गया है पर यह तोष और वह स्वाद गूँगे के गुड़ की भाँति मन में ही
आस्वाद्य और प्राप्य है। जो उसे पाता है वही जानता है औरों के लिए वह 'सब विधि
अगम' है।
—'सूर सुषमा' पृष्ठ १,
संपादक . पं० नंददुलारे वाजपेयी ।
गीता कहती है :—
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्त चेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥
जो देहवान् है उनसे अव्यक्त को उपासना कठिनाई से हो सकती है।
गो० तुलसीदास जी कहते है—
(१) अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।
—मानसांक, बालकांड, पृष्ठ ८०
(२) व्यापकु एक ब्रह्म अविनासी । सत चेतन घन आनंद रासी।
अस प्रभु हृदयँ अछत अविकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥
—मानसांक, बालकांड पृष्ठ ८०
(३) भरि लोचन विलोकि अवधेसा, तब सुनिहौं निरगुन उपदेसा।
तुलसी के राम ब्रह्म स्वरूप हैं। वे ही संसार के कर्त्ता है। यद्यपि तुलसी ने