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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 332 में से

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पृष्ठ 25

२६ नामदेव की हिन्दी कविता
की व्याख्या 'श्री भाष्य' में उसे प्रामाणिक कहा है। इसी मत के आधार पर मध्य युग में
वैष्णव भक्ति मार्ग का प्रचार और भगवान् के विभवावतारों की लीलाओं का वर्णन-
कीर्तन किया गया है। भक्ति के अनेक सम्प्रदाय स्थापित हुए, जिनमें भगवान् के सगुण
रूप पर ही बल दिया गया क्योंकि वही पूजा, उपासना, आराधना और ध्यान का सहज
विषय हो सकता है।
इसके विपरीत मध्ययुग में ही निर्गुण उपासना के प्रचारक संत हुए हैं। कबीर,
रैदास, दादू आदि निर्गुण उपासक सन्तों ने ब्रह्म की सगुणता तथा उसके व्यूह, अवतार
तथा मूर्तियों का खण्डन किया है। कभी कभी इस निर्गुणोपासना को तत्कालीन विदेशी
प्रभाव का परिणाम कह दिया जाता है और सगुणोपासना को ही शुद्ध भारतीय भक्ति-
पद्धति घोषित किया जाता है परन्तु वास्तव में निर्गुणवाद उपनिषद् के ब्रह्मवाद से भिन्न
नहीं है। भारतीय उपासना पद्धति में निर्गुणवाद ही कदाचित् प्राचीनतर है। निर्गुण
और सगुण में जो विरोध समझ लिया जाता है वह दोनों के उपर्युक्त सूक्ष्म अन्तर से
भिन्न है।
भक्तिकालीन सगुणोपासक कवियों ने भी निर्गुण की अस्वीकृति नहीं की, प्रत्युत
भक्ति-साधना के लिए उसकी अव्यावहारिकता प्रमाणित की है। गीता की तरह सूरदास
ने 'सूरसागर' के प्रारम्भ में ही अव्यक्त की गति को अनिर्वचनीय कहकर यह निश्चय प्रकट
किया है कि रूप-रेखा-गुण-जाति-युक्ति से रहित अव्यक्त का स्वाद गूँगे के गुड़ के समान
है। अतः मैं सगुण लीला के पद गा रहा हूँ। (पद २)
तुलसीदास ने निर्गुण और सगुण में बराबर अभेद का सिद्धान्त स्वीकार किया
है, परन्तु उन्हें अन्तर्यामी राम की अपेक्षा बहिर्गामी राम ही अधिक अच्छे लगते हैं,
क्योंकि उन्हीं की कृपा का वे प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं। सगुण रूप सुगम है, क्योंकि-
वह इन्द्रियों द्वारा जाना जा सकता है। परन्तु विचार करने पर सगुण रूप ही समझना
अधिक कठिन प्रतीत होता है।
निर्गुण ब्रह्म
'निर्गुण' शब्द अपने पारिभाषिक रूप में सत्त्वादि गुणों से रहित या उनसे परे
समझी आने वाली किसी ऐसी अनिर्वचनीय सत्ता का बोधक है, जिसे बहुधा परम तत्त्व,
परमात्मा अथवा ब्रह्म जैसी संज्ञाओं द्वारा अभिहित किया जाता है।
पारमार्थिक दृष्टि से ब्रह्म निर्गुण है। उस पर जीव या जगत् का कोई भी गुण
आरोपित नहीं किया जा सकता। शंकराचार्य ने श्रुति वचनों के आधार पर प्रमाणित
किया है कि दिक् काल से अमर्यादित, अमृत, अनादि, स्वतन्त्र, अखण्ड, सर्वव्यापी तथा