सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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बहुत अधिक प्रचार था। निर्गुण शब्द उनमें द्वैताद्वैत विलक्षण परमतत्त्व रूपी यौगिक
ब्रह्म, यौगिक साधना और वेदांतिक विचारधारा के पारिभाषिक अर्थ में रूढ़ हो
गया था।
निर्गुण काव्य
निर्गुण काव्यधारा का उदय रूढ़िवादी अंध विश्वास प्रधान धार्मिक संप्रदायो
की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था। सच्चे निर्गुणिया कवि पथ निर्माण की प्रवृत्ति को
हेय समझते थे। ये लोग अलौकिक प्रतिभासंपन्न होते थे। सैकड़ों साधु संत उनकी
प्रतिभा से प्रभावित होकर उनके शिष्य हो जाते थे।
निर्गुण संप्रदाय के अंतर्गत उन्ही संतो को लिया जाता है जिनका व्यक्तित्व
किन्ही विशेष विवृत विधि-विधानो, अंध विश्वासो और मिथ्याचारो से कलंकित नही
हुआ है। इनमें भी उन्हीं संतो के अध्ययन पर विशेष जोर दिया गया है जिनमें काव्यत्व
का स्फुरण और मधुर रहस्य-भावना का उन्मेष पाया जाता है। इस दृष्टि से निम्न-
लिखित कवि ही महत्त्वपूर्ण प्रतीत होते है—
कबीर, धर्मदास, नानक, रैदास, दादू, रज्जब, सुंदरदास, गरीबदास, यारी
साहब, बुल्ला साहब, जगजीवन साहब, गुलाल साहिब, भीखा साहब, पलटू साहब,
दरिया साहब (बिहार वाले), मलूकदास, चरनदास, दयाबाई, सहजोबाई और तुलसी
साहब।
सारग्राहिता इन संतो की प्राणभूत विशेषता थी। उन्होंने अपने समय की
समस्त प्रचलित धार्मिक एवं दार्शनिक विचारधाराओ, साधनाओ और साधु संप्रदायो के
सारभूत तत्त्वो को 'अनुभो' के द्वारा आत्मसात करके तथा उन्हे अपनी प्रतिभा के साँचे
में ढालकर एक अभिनव रूप दे दिया है, जो उनकी मौलिक देन है। वे सत्य के अनन्य
उपासक थे। उन्हे झूठ और मिथ्यात्व से घृणा थी। यही कारण है कि उन्हे जहाँ कही
भी मिथ्यात्व दिखाई पड़ा है वहाँ उन्होने उसका डटकर विरोध किया है। सत्य के
मंडन और अनृत के खंडन की उनकी यह प्रवृत्ति बहुत महत्त्वपूर्ण है।
निर्गुणिया संत निर्गुणोपासक थे। उनमे निर्गुण शब्द का प्रयोग अधिकतर
द्वैताद्वैत विलक्षण हृदयस्थ यौगिक ब्रह्म के लिए हुआ। कुछ स्थलों पर वह निर्विशेष
ब्रह्म का वाचक बनकर भी आया है। निर्गुण शब्द के इन दोनो अर्थों की दो परम्पराएँ
उन्हें पृष्ठभूमि के रूप में प्राप्त हुई थी। प्रथम अर्थ की परम्परा उन्हें नाथ पंथियो से
मिली थी। और दूसरे अर्थ की प्रेरणा का श्रेय अद्वैत वेदांतियो को है। इससे स्पष्ट है
कि उन्होंने प्रचलित साधनाओ में समन्वय स्थापित करने की भी चेष्टा की थी। यही