सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 27, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ें२८ नामदेव की हिन्दी कविता
कहते हैं— 'राजस, तामस और 'सातिग' (सात्विक) ये तीनो ही उसकी माया है तथा
वह इन तीनो से परे का 'चोथा पद' है । वह गुणातीत होने के कारण 'निगुंण' कहलाता
है, नही तो वह वस्तुत निर्विषय नही ठहराया जा सकता तथा उसे समझ लेना धोखे
की बात होगी ।
लोग उसे 'अजर' कहते हैं और 'अमर' भी बतलाते हैं किन्तु सच्ची बात तो यह
है कि वह 'अलख' होने के कारण अनिर्वचनीय है । कबीर का हरि इन सभी से विल-
क्षण है । (पद १८०) । फिर 'वह जैसा है वैसा समझ लेने में ही आनन्द है, उसे
वस्तुत न जानते हुए भी, उसका कथन करना ठीक नही ।' इसी कारण कबीर ने अपने
को उसे 'सरगुन' की अपेक्षा 'निगुंण' रूप में ही जानने वाला कहा है ।
दोनो की एकता
सगुण तथा निगुंण ब्रह्म में किसी प्रकार का भेद नहीं है । वह एक ही सत्ता है
परन्तु दृष्टिकोण की भिन्नता के कारण वह इन दोनो नामो से पुकारा जाता है । नाट्य-
शाला में रंगमंच पर दुष्यंत की भूमिका में उतरने वाला नट नाट्यशाला से बाहर आने
पर कोई दूसरा व्यक्ति नही बन जाता । वह वही मनुष्य रहता है । नाट्य की दृष्टि से
वह नट कहलाता है परन्तु पारमार्थिक दृष्टि से वह मनुष्य ही रहता है ।
ब्रह्म की भी ठीक यही दशा है । वह संसार की सृष्टि, स्थिति तथा लय करता
है । अत. संसार की अपेक्षा वह ईश्वर है परन्तु निरपेक्ष भाव से देखने पर वही ब्रह्म
है । अत. सगुण ईश्वर तथा निगुंण ब्रह्म में भेद मानना नितांत भ्रामक है । निगुंण
ब्रह्म ही वास्तविक पारमार्थिक सत्ता है परन्तु व्यवहार के लिए उपासना के निमित्त यही
सगुण ईश्वर माना जाता है । तत्त्व एक ही है । दृष्टि भिन्न भिन्न है और इसी लिए
उसके दो रूप हैं ।
एकबारगी हम अंतिम सीढी पर नही पहुँच सकते । ज्ञान के मंदिर में चढ़ने
के लिए सीढ़ियाँ हैं जिनके द्वारा ही साधक उसमें पहुँच सकता है । निगुंण ब्रह्म की
प्राप्ति अंतिम लक्ष्य है परन्तु अभ्रात ज्ञानी ही उसे पा सकता है । उसके सोपान रूप है
उपासना और इसके लिए 'ईश्वर' की महती आवश्यकता है । ईश्वर की उपासना से
सगुण पूजन से चित्त की शुद्धि होती है और तभी साधक विशुद्ध ज्ञान मार्ग का
अवलंबन कर निगुंण ब्रह्म को पा सकता है अन्यथा नही । यही उपासना का
उपयोग है ।
ब्रह्म वास्तव में निगुंण है इस विषय को गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस प्रकार