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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 332 में से

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पृष्ठ 32

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ३३
रामानन्दी संप्रदाय के 'आनन्द भाष्य' मे भी लगभग ऐसा ही अर्थ किया है ।
अन्य दर्शनाचार्यों ने भी इस शब्द के अर्थ को अपनी सांप्रदायिक दृष्टि के अनुकूल बद-
लने की चेष्टा की थी ।१
नाथ संप्रदाय में इस शब्द का प्रचुर प्रयोग मिलता है ।२ वे लोग अपने
हृदयस्थ यौगिक ब्रह्म को अभिव्यंजित प्रायः इसी शब्द के माध्यम से करते थे ।
मध्यकालीन आचार्यों ओर नाथ पंथियों के द्वारा किये गये निर्गुण शब्द के
प्रयोग से मध्ययुग के कुछ संत कवि इतने अधिक प्रभावित हुए कि वे उसी को केन्द्र
बनाकर अपनी विचारधारा प्रसारित करने लगे । वे लोग अपने इष्टदेव, अपनी साधना
और अपने मत सबको निर्गुण कहते थे ।
संत बुल्ला साहव ने अपने इष्टदेव को 'निर्गुण, दयाल, दानी'३ कहा है ।
राम को वे निर्गुण शब्द का सार रूप मानते थे ।४
संतो ने अपने इष्टदेव के प्रसंग में निर्गुण शब्द का प्रयोग अधिकतर 'द्वैताद्वैत
विलक्षण परम तत्त्व रूपी हृदयस्थ यौगिक ब्रह्म' के अर्थ मे किया है । यारी साहव अपने
निर्गुण ब्रह्म को सुषुम्ना की शैया पर सोया हुआ बताते हैं, साथ ही उसे वे परमतत्त्व
रूप भी मानते है । वे लिखते हैं—
'सुखमन सेज परम तत रहिया किया निर्गुण निरंकार ।'५
संतो ने प्रायः अपनी साधना को भी निर्गुण ही कहा है । उनकी साधना का
प्रमुख अंग ध्यान है । उससे पहिले निर्गुण शब्द का प्रयोग करते हुए संत जगजीवन
साहव ने लिखा है—
'जगजीवन गुरु चरन परि के निरगुन धरि ध्यान ।'६
इस प्रकार हम देखते हैं कि मध्यकालीन संतो के एक वर्ग मे निर्गुणवाद का
१. 'आनन्द भाष्य' १।१२ मे लिखा है :
निर्गता निकृष्टा सत्वादयः प्राकृता गुणा यस्मात्तन्निर्गुणमिति
व्युत्पत्तेर्निकृष्ट गुणराहित्यमेव निर्गुणत्वम् ।
२. सिद्ध सिद्धात पद्धति—संपादिका कल्याणी बोस, पृ० ७०
'निर्गुणं च शिवं शान्तं शान्तं गगने विश्वतोमुखम् ।
भ्रूमध्ये दृष्टिमादाय ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ॥
३. बुल्ला साहव की बानी—पृ० २६
४. बुल्ला साहव की बानी—पृ० १६ 'तुम तो राम हउ निर्गुन सार'
५. संत सुधा सार खण्ड २, पृ० ७३
६. संत बानी संग्रह भाग २, पृ० १३
३