सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 24

हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि २५
हैं। परन्तु इस ब्राह्मण के सत्य स्वरूप के निर्णय करने के लिए उसे राजा बतलाना
क्या उचित है ? राजा वह अवश्य है परन्तु कब तक ? जब तक नाटक का व्यापार
चलता रहता है। नाटक समाप्त होते ही वह अपने विशुद्ध रूप में आ जाता है। अतः
उस पुरुष को क्षत्रिय राजा मानना 'तटस्थ' लक्षण हुआ तथा ब्राह्मण बतलाना 'स्वरूप'
लक्षण हुआ।
सगुण ब्रह्म
ब्रह्म जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा लय का कारण है। आगन्तुक गुणों के
समावेश के कारण यह उसका 'तटस्थ' लक्षण है। "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय
उपनिषद् २-१-१) तथा 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (बृहद् उपनिषद् ३।९।२८) ब्रह्म के स्वरूप
के प्रतिपादक लक्षण हैं।
वह सत् (सत्ता) चित् (ज्ञान) और आनन्द (सच्चिदानन्द) रूप है। यही ब्रह्म
का स्वरूप लक्षण है। परन्तु यही ब्रह्म मायावच्छिन्न होने पर सगुण ब्रह्म, अपर ब्रह्म
या ईश्वर कहलाता है जो इस जगत् की स्थिति, उत्पत्ति तथा लय का कारण होता
है। ब्रह्म के दो रूप होते हैं। सगुण तथा निर्गुण। दोनों एक ही हैं परन्तु दृष्टिकोण की
भिन्नता से दो रूपों में गृहीत किये जाते हैं।
जिस प्रकार संसार के पदार्थ असत्य और काल्पनिक हैं उसी प्रकार जीव भी
अविद्या के ऊपर आश्रित रहता है। 'ब्रह्म ही एक मात्र सत्ता है।' इस ज्ञान के अभाव
में ही जीव की सत्ता है। जीव उपासना के लिए ईश्वर की कल्पना करता है। ईश्वर
जगत् का स्वामी तथा नियंता है। इसी लिए जीव उसकी उपासना करता है और उसे
दया, दाक्षिण्य, अगाध करुणा आदि गुणों से मण्डित मानता है। यही है सगुण ब्रह्म या
ईश्वर। इस प्रकार सगुण ब्रह्म की कल्पना उपासना के निमित्त व्यावहारिक दृष्टि से
की गई है।
पांचरात्र या भागवत मत के अनुसार ब्रह्म अद्वैत, अनादि, अक्षत, निर्विकार,
निरवद्य, अन्तर्यामी, सर्वव्यापक, असीम तथा आनन्दस्वरूप है।
सब द्वन्द्वों से विनिर्मुक्त, सब उपाधियों से विवर्जित, सब कारणों का, षड्गुण रूप
परब्रह्म निर्गुण और सगुण दोनों है।
अप्राकृत गुणों से हीन होने के कारण वह निर्गुण है तथा षड्गुण युक्त होने के
कारण वही परब्रह्म 'भगवान्' कहा जाता है। इसी कारण वह सगुण है।
शंकराचार्य ने पांचरात्र के उपर्युक्त मत का खण्डन किया है और इसे अवैदिक
बताया है। परन्तु रामानुजाचार्य ने उसे वेद-विदित सिद्ध कर बादरायण के ब्रह्म-सूत्रों