सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ३६
आचार्यों द्वारा ही हुआ। उत्तरी भारत में हर्षवर्द्धन तक इसे फलने-फूलने के लिए राज-
कीय सहारा मिला। बिंबसार, अशोक, कनिष्क आदि राजाओं से इसे पर्याप्त सहारा
मिला। हर्षवर्द्धन के पश्चात् राजकीय सहायता न मिलने के कारण बौद्ध संन्यासियो को
उन जगहों में जाना पड़ा जहाँ वे निम्न स्तर के लोगो के बीच अपने नानाविध चमत्कार
दिखाकर कुछ अर्जित कर सकने में समर्थ हो सकते। फलस्वरूप उनमे उच्च एवं शिष्ट
मानसिक एवं नैतिक प्रेरणाओं का अभाव बढ़ने लगा और वे जादू टोनी, तंत्रों-मंत्रों की
ओर अत्यंत वेग से मुड़ गये। मंत्रयान का ही अग्रिम विकास वज्रयान की संज्ञा से अभि-
हित किया जाता है। दोनो में अन्तर बहुत ही कम है। सौम्य अवस्था का नाम मंत्रयान
और उग्र रूप की संज्ञा वज्रयान। महात्मा बुद्ध ने तो मंत्र तंत्र तथा जादू-टोना को
'मिथ्या जीव' (Bad living) कहकर तिरस्कृत ही किया। किन्तु आगे चलकर उन्ही
के अनुयायियो ने इन्हें निर्वाण-प्राप्ति का एक प्रमुख अंग ही मान लिया और बुद्ध के
मानव व्यक्तित्व के तिरस्कार ने उन्हें मानव लोक से ऊपर उठाकर दिव्य लोक में पहुँचा
दिया। छोटे बड़े मंत्रों की रचना होने लगी। इनके साथ ही हठयोग की जटिल विधियाँ
भी इन लोगों ने अपनाईं। इस प्रकार इन सिद्धो ने भोली-भाली जनता का विश्वास
अर्जित किया। मंत्र, मैथुन तथा हठयोग वज्रयान के तीन प्रमुख तत्त्व मान लिए गये।
राहुलजी के अनुसार इन संप्रदायों का उद्भव-स्थान दक्षिण का श्री पर्वत और
धान्य कटक (गुंटूर, जिला मद्रास) था। वज्रयानी सिद्धों ने मंत्र के उपर्युक्त तत्त्वो के साथ
मद्य और मांस को भी शामिल कर पंच तत्त्वों को 'पंच मकार' को अपनी सहज साधना
का अंग बनाया।
धर्म के नाम पर तो अनाचार का समावेश हुआ ही साथ ही हठयोग की
प्रक्रियाएँ भी इनकी साधना का मुख्य अंग बनीं। इसके परिणामस्वरूप घट के भीतर
चक्र, नाड़ी, शून्य देश आदि की कल्पना करके नाद, बिंदु, सुरति, निरति आदि परि-
भाषिक शब्दो के सहारे अन्तस्साधना का विधान किया गया। इसके कारण वे अपने को
रहस्यदर्शी करार देने लगे और रहस्यमय भाषा में ही पहेलियाँ कह कर लोगो को
आश्चर्य चकित करने लगे।
नाथ पंथ
नाथ पंथ का मूल बौद्धों की यही वज्रयान शाखा है। चौरासी सिद्धों में गोरख-
नाथ (गोरक्ष पा) भी गिन लिए गये हैं। पर यह स्पष्ट है कि उन्होने अपना मार्ग अलग
कर लिया। योगियो की इस हिन्दू शाखा ने वज्रयानियो के अश्लील और वीभत्स
विधानों से अपने को अलग रखा। गोरख ने पतंजलि के उच्च लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति को
लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया। वज्रयानी सिद्धो का लीला क्षेत्र भारत का पूर्वी भाग