सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ३७
निर्गुण एवं सगुण कवियों में हमें रस सम्बन्धी अंतर भी दिखलाई पड़ता है।
निर्गुण काव्यधारा भक्ति, शांत और वीर इसकी वह त्रिवेणी है जिसमें अवगाहन कर
मानव जाति अपने युग-युग के कालुष्य धो सकती है।
इसके विपरीत सगुण काव्यधारा में हमें शृंगार और भक्ति के मधुमय सुहाग से
उद्भूत माधुर्य भाव रूपी शिशु की रसमयी लीलाओं का वैभव मिलता है।
एक धारा पतितपावनी है और दूसरी आनन्दविधायिनी । यही दोनों में
अंतर है।
इसके अतिरिक्त दोनों धाराओं में प्रवृत्तिगत भेद भी दिखाई पड़ता है । निर्गुण
काव्यधारा भूमि बुद्धिवादिता और विचारात्मकता है। इसके विपरीत सगुण काव्यधारा
परम भाव-प्रवण, श्रद्धामूलक और अनुभूति प्रधान है।
दोनों धाराओं में साधना और सिद्धि सम्बन्धी अंतर भी है। निर्गुण काव्यधारा
का सम्बन्ध जीवन के साधना पक्ष से है जब कि सगुण काव्यधारा में जीवन के सिद्धि
पक्ष की झाँकी सजाई गई है।
एक में उन समस्त साधनों और प्रयत्नों का उल्लेख किया गया है जिससे आनन्द
ब्रह्म की उपलब्धि हो सकती है। दूसरे में स्वयं आनन्द रूप ब्रह्म का ही वर्णन किया
गया है।
सगुण कवियों का लक्ष्य भगवान के सगुण, साकार, आनन्दमय रूप की झाँकी
का उद्घाटन करना था। इसके विपरीत निर्गुण कवियों का उद्देश्य अपने हृदयस्थ 'मुनि
मंडलवासी पुरुष' की रहस्यानुभूति करना था। सगुण एवं निर्गुण धारा के इन भेदों ने
ही एक दूसरे को परस्पर अलग कर रखा है।
निर्गुण काव्यधारा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
ऐतिहासिक स्थिति से तात्पर्य निर्गुण काव्यधारा के काल सम्बन्धी सीमा और
विस्तार के निर्णय से है। निर्गुण काव्यधारा के प्रमुख प्रवर्तक संत कबीर माने जाते
हैं, किंतु सच्ची बात यह है कि निर्गुण काव्यधारा का बीजारोपण नामदेव, जयदेव,
त्रिलोचन, सदन, बेनी, रामानन्द, धन्ना, पीपा, सेन आदि संत कबीर से पहले ही कर
चुके थे। कबीर ने उसे व्यवस्थित रूप देकर विकसित, प्रचारित और प्रसारित किया
था। भक्ति की उत्पत्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित उक्ति प्रसिद्ध है :—
भक्ति द्राविड़ उपजी लाये रामानन्द ।
परगट किया कबीर ने सप्त द्वीप नवखंड ॥
यदि इस उक्ति में कोई सार है तो निर्गुण काव्यधारा का उदय १४ वीं शताब्दी
से मानना पड़ेगा । डॉ० गोविंद त्रिगुणायत को तो यह उक्ति विशेष रूप से सारगर्भित