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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 332 में से

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पृष्ठ 34

निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि
कारण है कि उनकी साधना में ज्ञान, भक्तियोग और वैराग्य के समन्वित रूप पर ही
विशेष बल दिया गया है।
उन्होंने एक दूसरा सबसे बड़ा कार्य प्रचलित जटिल विचारधाराओं, साधनाओं
और सांप्रदायिक आचारों के सहजीकरण का किया था। सहजीकरण की अपनी इस
प्रवृत्ति के कारण वे मध्यकालीन संतों में अलग खड़े दिखलाई पड़ते हैं। बुद्धिवादिता,
सदाचरणप्रियता, सामाजिक और आध्यात्मिक साम्यवाद, विचारात्मकता आदि उनकी
अन्य प्रमुख उल्लेखनीय प्रवृत्तियाँ हैं। उनकी इन्हीं विशेषताओं ने उन्हें एक सूत्र में बाँध
रखा है। इसी लिए उनकी परम्परा अन्य संतों की परम्पराओं से विलक्षण और निर-
पेक्ष दिखाई पड़ती है ।
सगुण काव्य में पार्थक्य
मध्ययुग में वैष्णव साधना दो रूपों में विकसित हुई थी : निर्गुण और सगुण ।
निर्गुणोपासना पद्धति शुद्ध वैष्णव नहीं रह पाई। उस पर अपने युग की समस्त साध-
नाओं और विचारधाराओं का पूरा-पूरा प्रभाव पड़ा। तंत्र मत, नाथ पंथ और निरंजन
पंथ ने उसका स्वरूप ही बदल दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि वह वैष्णव होते
हुए भी उससे बिलकुल भिन्न प्रतीत होने लगी ।
सगुण और निर्गुण धाराओं का मौलिक भेद रूपोपासना से संबंधित है ।¹
निर्गुंनियां संत हृदयस्थ द्वैताद्वैत विलक्षण अलख निरंजन निर्गुण ब्रह्म के उपा-
सक थे। उनका यह निर्गुण ब्रह्म रूप और आकार से विहीन, पुष्प की गंध से भी
सूक्ष्मतर और अनिर्वचनीय है ।²
किन्तु यह वेदांतियों के ब्रह्म के सदृश शुष्क तत्त्व मात्र नहीं है। और न बौद्धों
१. 'मध्यकालीन धर्मसाधना' डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० २३०
'दोनों में प्रधान भेद रूपोपासना के विषय में है। दूसरी श्रेणी के अर्थात् सगुण
मार्गी भक्त ठोस रूप के उपासक हैं।'
सूरदास कहते हैं—
सुंदर मुख कौ बलि बलि जाऊँ ।
लावण्य निधि, गुन निधि, शोभा निधि ॥
२. कबीर ग्रंथावली
जाके मुंह माथा नही, नाही रूप और अरूप।
पुहुप वास से पातरा, ऐसा रूप अनूप।