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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 332 में से

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पृष्ठ 31

३२ नामदेव की हिन्दी कविता
उन्हें दशरथ सुत माना है किन्तु वे साधारण, लौकिक जीव नहीं। उनके राजसिंहासन
के समय वेद उन्हीं को निर्गुण कह कर स्तुति करते हैं। वे पृथ्वी का भार हल्का करने
के लिए अवतार लेते हैं। परन्तु वस्तुत वे निराकार सच्चिदानन्द स्वरूप ही हैं।
मीरा के प्रभु हरि अविनाशी हैं किन्तु साथ ही वे सर्वगुणसम्पन्न मनोहर रूप-
धारी हैं। सिद्धांत रूप से इनके प्रभु निर्गुण ही है जो समस्त संसार में व्याप्त हैं किन्तु
व्यवहार की दृष्टि से वे ठाकुर की मूर्ति में भी विद्यमान हैं तभी तो मीरा वृन्दावन के
मंदिरों में कृष्ण के सम्मुख आत्म-विभोर होकर नृत्य करने लगती हैं। साथ ही साथ
निर्गुण होने के कारण उनका मिलना कठिन है। फिर भी वह पंचरंग चोला पहनकर
अपने प्रिय से झिरमिट में खेलने जाती है।
निर्गुण शब्द और उसके अर्थ का ऐतिहासिक विकास
श्रौत साहित्य में इस शब्द का प्रयोग कहीं नहीं मिलता है। इसका कारण
सम्भवत यह है कि उस युग में सगुण और निर्गुणमूलक साम्प्रदायिकता का उदय नहीं हो
पाया था।
निर्गुण शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम महाभारत १ और गीता में २ मिलता है।
इन दोनों ग्रन्थों में यह शब्द 'गुण रहित' के सामान्य अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
गीता और महाभारत के पश्चात् इस शब्द का प्रयोग चूलिकोपनिषद् ३ में पाया
जाता है। यहाँ पर वह निर्विशेष ब्रह्म तत्त्व के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
शंकराचार्य ने इस शब्द का प्रयोग कई बार किया है। वे उसे हृदयस्थ
यौगिक ब्रह्म से विलक्षण सत्य संकल्पादि गुणों से विनिर्मुक्त आत्म तत्त्व का वाचक
मानते थे। ४
रामानुज और उनके मतानुयायियों ने भी इस शब्द का प्रयोग किया है, किन्तु
उन लोगों ने इसका अर्थ शांकर मतावलम्बियों द्वारा किये गये अर्थ से भिन्न रूप में
निर्धारित किया है। उनकी दृष्टि में वह जरा मरण आदि त्याज्य गुणों से रहित सगुण
ब्रह्म का ही वाचक है। ५
१. महाभारत शान्ति पर्व—३६६। २१-२८
२. 'असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुण भोक्तृ च।' अध्याय १३-१४
३. 'स विशेषत्वे निर्गुणम्'—चूलिकोपनिषद। अध्याय-७ में
४. छन्दोग्योपनिषद्—'शांकर भाष्य' गीता प्रेस, ८०४-५
५. सर्व दर्शन संग्रह—संपादक: वासुदेव शास्त्री, १६५१, पूना।
(पृ० ११० पर निर्गुणवाद शब्द का प्रयोग और निर्गुण शब्द की व्याख्या)