सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ नामदेव की हिन्दी कविता
मानव ज्यो ज्यो वैज्ञानिक क्षेत्र की सफल खोजो की प्रगति में प्रवेश करता जाता
है त्यो त्यो वह सृष्टि मे अभिव्यक्त बुद्धिवादिता को पहचान कर अपनी व्यक्तिगत क्षुद्र
आशाओ और अभिलाषाओ से भी ऊपर उठ जाता है और सृष्टि के रूप में मूर्तिमान
बुद्धि की महत्ता के सामने उसका सिर भक्ति भाव से झुक जाता है । यह बुद्धि अपने
गम्भीरतम स्वरूप में मानव की पहुँच से परे है । सर आइनस्टाइन बुद्धि का नाम लेकर
ईश्वर की सत्ता का विरोध नही करते । वे लिखते है कि प्रभु का सर्वशक्तिमान्, न्यायी
और दयालु रूप मानव को आश्वासन, साहाय्य और पथ प्रदर्शन प्रदान करता है । १
ब्रह्म का स्वरूप
आचार्यों ने ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप का निर्णय करने के लिए दो प्रकार के
लक्षणो को स्वीकार किया है ।
(१) स्वरूप लक्षण (२) तटस्थ लक्षण
'स्वरूप' लक्षण पदार्थ के सत्य, तात्विक रूप का परिचय देता है परन्तु 'तटस्थ'
लक्षण कुछ देर के लिए होने वाले आगन्तुक गुणों का ही निर्देश करता है ।
लौकिक उदाहरण से इसको देखिये । कोई ब्राह्मण किसी नाटक में एक क्षत्रिय
नरेश की भूमिका ग्रहण कर रंगमंच पर आता है जहाँ वह शत्रुओं को परास्त कर अपनी
विजय वैजयंती फहराता है और अनेक शोभन कृत्यों को कर प्रजा का अनुरंजन करता
moved by profound reverence for the rationality made
manifest in existence By way of the understanding, he
achieves a far reaching emancipation from the shackles of
personal hopes and desires and thereby attains the humble
attitude of mind towards the grandeur of reason incarnate
in existence and which in its profoundest depths, is inacce-
ssible to man'
—'Out of my Later Years' p. 29
— आइनस्टीन
1 'The idea of the existence of an omnipotent, just and omni-
beneficent personal God, is able to accord man solace,
help and guidance'
—'Out of my Later Years' p. 27.
—आइनस्टाइन