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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

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पृष्ठ 35

३६ नामदेव की हिन्दी कविता
का शून्य ही है। यह सूक्ष्मतम और अनिर्वचनीय होते हुए भी करुणामय, गरीबनिवाज
और भक्तवत्सल है।
भक्तों के भगवान की इन विशेषताओं से विशिष्ट होने पर भी यह उसे उससे
सर्वथा भिन्न है। भक्तों के भगवान 'बाहिरजामी' किन्तु इनके राम 'अंतरजामी' है।
अंतरजामी होते हुए भी वे भक्तों को दर्शन देते हैं। उनका यह रूप अनिर्वचनीय
होता है।१
यदि भक्त किसी प्रकार उसका वर्णन करने का प्रयास भी करे तो उसको कोई
समझ नहीं सकता। यदि थोड़ा बहुत समझने लगे तो उस पर उसे विश्वास नहीं
होता।२
इस प्रकार हम देखते हैं कि संतों का निर्गुण उपास्य रूपवान और अरूप होते
हुए भी दोनों से विलक्षण है। इसके विपरीत सगुणवादियों का उपास्य मानवों के बीच
में उन्हीं के रूप में प्रतिष्ठित रहता है।
मानव जीवन की संपूर्ण शक्ति, सारा सौंदर्य और समस्त शील का पूर्ण आविर्भाव
उन्हीं में मिलता है। यही कारण है कि एक का उपास्य केवल अनुभूति और साधना-
गम्य मात्र होने के कारण रहस्यपूर्ण है और दूसरे का प्रत्यक्ष होने के कारण प्रेम और
श्रद्धा का पात्र है।
भगवान का प्रथम रूप केवल बुद्धिवादी साधकों को ही आकृष्ट कर पाता है जब
कि उनका दूसरा रूप संपूर्ण सृष्टि को तन्मय और रसमग्न रखने की क्षमता रखता है।
उपास्य रूप सम्बन्धी इस अंतर ने निर्गुण और सगुण काव्य धाराओं को बिलकुल अलग
कर रखा है।
निर्गुण और सगुणवादी कवियों में स्वभावगत भेद भी दिखाई पड़ता है।
निर्गुणवादी अधिकतर क्रांतिदर्शी, सत्यान्वेषी, अक्खड़, फक्कड़ और घुमक्कड़ होते थे।
उनके व्यक्तित्व की ये विशेषताएँ उनकी रचनाओं में स्पष्ट प्रतिबिंबित मिलती हैं।
इसके विपरीत सगुणवादी कवि अधिकतर सामंजस्यवादी, रूढ़िवादी, सत्त्ववादी प्रेमी
जीव होते थे। उनके व्यक्तित्व की इन विशेषताओं ने उनकी रचनाओं को निर्गुनिया
कवियों की रचनाओं की अपेक्षा अधिक कोमल, रागरंजित और मधुर बना दिया है।
निर्गुण काव्यधारा सगुण काव्यधारा से इस दृष्टि से भी भिन्न है।
१. कबीर ग्रन्थावली पृ० १५
कबीर देखा एक अंग महिमा कही न जाई।
२. कबीर ग्रन्थावली पृ० १७
दीठा है तो कस कहू, कह्या न कोइ पतियाइ।