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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 332 में से

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पृष्ठ 212

२१८ नामदेव की हिन्दी कविता
उसमें निजीपन के साथ रागात्मकता रहती है। यह रागात्मकता आत्मनिवेदन के रूप
में प्रकट होती है। रागात्मकता में तीव्रता बनाये रखने के लिए उसका अपेक्षाकृत छोटा
होना आवश्यक है। आकार की इस संक्षिप्तता के साथ भाव की एकता और अन्विति
लगी रहती है। छोटेपन की सार्थकता भाव की अन्विति में है। गीति काव्य में विवि-
धता रहती है किंतु वह प्रायः एक ही केन्द्रीय भाव की पुष्टि के लिए होती है। यह
केन्द्रीय भाव प्रायः टेक में रहता है और बार-बार दुहराया जाता है। इस प्रकार
प्रभाव घनीभूत होता रहता है और भाव की अन्विति भी हो जाती है।
गीति काव्य के इन लक्षणों पर नामदेव के अभंग पूरे उतरते हैं। गीति काव्य
में कवि आत्माविष्कार करता है। यही कारण है कि नामदेव की रचना आत्मलक्षी,
विषयोगत (subjective) है। अंग्रेजी के सुविख्यात निबंधकार ए० जी० गार्डिनर का
यह कथन 'It is myself portray' नामदेव की कविता पर पूरी तरह से लागू
होता है।
स्वयं नामदेव ही अपनी कविता के विषय हैं। घर के लोगो द्वारा उनकी विट्ठल
भक्ति का विरोध, मुक्ताबाई द्वारा उनकी भर्त्सना, 'तीर्थावली' में उनका और ज्ञानेश्वर
का वार्तालाप, आत्मसुख की प्राप्ति की उनकी व्याकुलता आदि अवसरों पर नामदेव
द्वारा रचित अभंग उनके भावुकता भरे हृदय के साक्षी हैं।
नामदेव का अलंकार विधान
अप्रस्तुत योजन काव्य का अभिन्न अंग है। काव्य के दो पक्ष होते हैं—भाव तथा
कला पक्ष। ये दोनो अन्योन्याश्रित हैं। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना सम्भव नहीं
है। काव्य में कलात्मकता और रमणीयता का संचार करने का समस्त श्रेय और दायित्व
अप्रस्तुत योजना पर है। कवि के लिये अप्रस्तुत योजना की शक्ति प्रकृति का बड़ा
भारी वरदान है।
नामदेव के लिए काव्य रचना एक साधन था, साध्य नहीं। फिर भी उनकी
कविता में अलंकार स्वतः सिद्ध हैं। उनकी रचनाओ में केवल उन्ही अलंकारों का बाहुल्य
है जिन की योजना, कवि की प्रतिभा अज्ञात रूप से भावो को प्रभावपूर्ण बनाने के लिए,
किया करती है। उनके काव्य में उपमा, रूपक अनुप्रासादि अलंकारों की प्रचुरता का
यही कारण है।
शब्दालंकार
अनुप्रास—अनुप्रास के कितने ही उदाहरण नामदेव की कविता में अनायास ही
मिल जाते हैं—