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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 332 में से

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पृष्ठ 223

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २१६
की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।१
संत नामदेव का असाधारण कर्तृत्व
संत नामदेव एक महान् भगवद् भक्त हुए। महाराष्ट्र के वारकरी सम्प्रदाय के
वे प्रभावशाली प्रवर्तक थे। इस संप्रदाय के संतों के वे आद्य चरित्रकार हैं। 'नाम वेद'
के प्रमुख प्रचारक हैं। प्रेमाभक्ति के प्रणेता हैं। सांप्रदायिकों के श्रद्धा स्थान हैं।
कीर्तन प्रथा के तो एक प्रकार से वे अध्वर्यु ही हैं।
१३ वीं शताब्दी में उत्तरी भारत पर मुसलमानों का आतंक छाया हुआ था।
ऐसी परिस्थिति में नामदेव ने भागवत धर्म का झंडा उत्तर भारत मे फहराया। वे
निर्गुण मत के प्रथम प्रचारक तथा हिंदी गीत शैली के प्रथम गायक कहे जा सकते हैं।
उन्होंने अपने उपदेशों से कबीर तथा अन्य परवर्ती संतों का मार्ग प्रशस्त किया। इस
संदर्भ में आचार्य विनयमोहन शर्मा२ तथा प० परशुराम चतुर्वेदी३ के मन्तव्य उल्लेखा-
नीय हैं।
१. 'नामदेव की कविता में हमें उस प्रकाश के रोमांच का अनुभव होता है जो समुद्र
या धरती पर कभी नहीं उतरा। उसमें हमे उस स्वप्न के दर्शन होते हैं जो इस
मिट्टी के धरती पर कभी नही झलका, उस प्रेम की प्रतीति होती है जिसने वासना
को कभी उत्तेजित नही किया। उसमे वो करुणा, विश्वास और भक्ति का रोमांच
है तथा मानव आत्मा का परमात्म शक्ति के प्रति आत्मसमर्पण है। उसमें हम
भक्ति अथवा आध्यात्मिक प्रेम का रोमांच, हृदय का हृदय के प्रति संगीतमय
निवेदन और उद्वेलित भावातुर हृदय के उद्गार पाते है।'
—विल्सन फिलालॉजिकल व्याख्यान माला।
२. 'उनमें उत्तरी भारत की संत परम्परा का पूर्व आभास मिलता है। उनके परवर्ती
संतो पर निश्चय ही उनका प्रभाव पड़ा है जिसे उन्होंने सर्व भाव से स्वीकार किया
है। ऐसी दशा में उन्हे उत्तर भारत में निर्गुण भक्ति का प्रवर्तक मानने में हमे
कोई झिझक नहीं होनी चाहिए। संभवतः हिंदी जगत् तक उनके सम्बन्ध मे
पर्याप्त जानकारी न पहुँच सकने के कारण उन्हें वह स्थान नहीं प्राप्त हो सका
जिसके वे अधिकारी हैं।'
—हिंदी को मराठी संतों की देन, पृ० १२६।
३. 'किन्तु इतना हम निःसंकोच भाव के साथ कह सकते हैं कि उत्तरी भारत
के संत भी नामदेव के बहुत ऋणी है और उनके लिए (तथा महाराष्ट्र के संतो
के लिए भी) सन्त नामदेव ने एक पथ प्रदर्शक का काम किया है।'
—उत्तरी भारत की संत परम्परा, पृ० १०७।