सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० नामदेव की हिन्दी कविता
यह तालाबेली उस प्रकार की है जिस प्रकार गाय को बछड़े के बिना होती
है और मछली को पानी के बिना होती है।
नामदेव ने उपमानो का चयन जन जीवन से किया है। इसलिए उनकी उपमाएँ
आकर्षक बन पड़ी है।
रूपक
जैसे जैसे सत नामदेव की आध्यात्मिक योग्यता बढ़ती गई वैसे ही उनकी
काव्य प्रतिभा भी प्रौढ़ होती गई। वे आध्यात्मिक रूपको से अपनी कविता को सजाने
लगे। यहाँ उनके पदो को उद्धृत करने के मोह का संवरण नही किया जाता।
बढ़िया रूपको का आस्वाद लीजिये—
मन मेरे गजू जिह्वा मेरी काती ।
मपि मपि काटउ जम की फासी ॥
कहा करउ जाती कहा करउ पाती ॥
राम को नाम जपउ दिनराती ॥
रागनि रागउ सीवनि सीवउ ॥
रामनाम बिनु घरीअ न जीवऊ ॥
भगति करउ हरि के गुन गावउ ॥
आठ पहर अपना खसम धिआवऊ ॥
सुइने की सुई रूपे का धागा ॥
नामे का चितु हरि सउ लागा ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ४।
सत नामदेव दर्जी थे अतः उन्होंने दर्जी के व्यवसाय से संबद्ध रूपक उपर्युक्त पद
में प्रयुक्त किया है। वे कहते है कि मन रूपी गज और जिह्वा रूपी कैंची की सहायता
से मैं यम की फाँस धीरे धीरे काट रहा हूँ। जाति पाँति से मुझे कोई सरोकार नहीं।
दिन रात में कपड़ा सीने तथा रंगने का व्यवसाय करता हूँ परन्तु राम नाम का स्मरण
किये बिना में एक क्षण भी नही रह सकता। मेरी सुई सोने की है तथा धागा रूपे का
है। मेरा मन हरि की ओर लगा है। नीचे के पद में एक अधिक सरस रूपक का
आस्वाद लीजिये —
लोभ लहरि अति नीझर वाजे । कइआ डूबे केसवा ॥
ससार समुद्रे तारि गोविंद । तारिले बाप बीठुला ॥
अनिल बेड़ा हऊ खेवि न साकऊ । तेरा पारु न पाइआ बीठुला ॥
होहु दइआलु सतिगुरु मेलि । तू मोकऊ पारि उतारे केसवा ॥