सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 213, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २१६
(१) असुदान गजदान ऐसो दानु नित नित हि कीजे । पद ६१
इसमें 'असुदान गजदान' में 'द' तथा 'न' की तथा 'दानु नित नित ही' में 'न'
की एक एक बार आवृत्ति है ।
(२) देवा बेनु बाजे गगन गाजे । शब्द अनाहद बोने ॥ पद ६५
इस काव्य पंक्ति के प्रथमार्ध 'न' तथा 'ज' की दो बार आवृत्ति हुई है तथा
द्वितीयार्ध में 'द' की दो बार ।
उपर्युक्त दो उदाहरणों में अनेक वर्णों की एक बार और कभी दो बार समता
हो जाने से छेकानुप्रास अलंकार हो गया है ।
(३) जोगी जन न्याइ जुगे जुगि जीवै । (पद ६७)
ज कार का तालु स्थान होने से यह श्रुत्यनुप्रास है ।
श्रुत्यनुप्रास वहाँ होता है जहाँ कण्ठ, तालु आदि किसी एक ही स्थान से उच्च-
रित होने वाले वर्णों में समानता पायी जाय ।
उपमा
निम्नलिखित पद में उपमाओं की सुन्दरता देखिए—
ऐसो रामराई अंतरजामी । जैसे दरपनमहि बदन पछानी ॥
बसै घटाघट लीपन छीपै । बंधन मुकता जातु न दोपै ॥
पानी माहि देखु मुखु जेहा । नामे को सुआमी बीठलु ऐसा ॥
परमेश्वर सर्वव्यापी है परन्तु जैसे शीशे में देखने वाले को अपना मुँह प्रतिबि-
बित हुआ दिखाई देता है वैसे ही ब्रह्मज्ञानी को सर्वत्र परमेश्वर के दर्शन होते हैं । सिद्ध
अथवा ब्रह्मज्ञानी को जाति की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए । वह जाति-पाँति के बंधन
के परे होता है । जैसे जल में अपना प्रतिबिंब दीख पड़ता है वैसे ही बंधन-मुक्त को सब
प्राणियों के हृदय में परमात्मा दिखाई देता है ।
कम से कम नामदेव तो अपने स्वामी विट्ठल का दर्शन सब जगह करते हैं ।
अभेद-भक्ति की अनुभूति कितनी बढ़िया उपमाओं के द्वारा कराई गई है । संत नामदेव
जितने ऊँचे भक्त थे उतने ही ऊँचे कवि भी थे ।
नामदेव को अपने इष्टदेव के दर्शन की उत्कंठा लगी हुई है । इसे वे 'तालावेली'
शब्द से परिचित कराते हैं, जिसका अर्थ है व्याकुलता । यह ऐसी व्याकुलता है जिसमें
तीव्रता है—आतुरता है । वे कहते हैं—
मोहि लागी तालावेली
बछरे बिन गाइ अकेली
पानीआ बिनु मीनु तलफै
ऐसे नाम-रामा बिनु बापुरो नामा ॥