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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 332 में से

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पृष्ठ 225

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २३१
रचना का उल्लेख नही मिलता । यह बात अवश्य है कि इस काल की रचना में ब्रज-
भाषा के अंकुर दिखाई पड़ने लगे थे। यह तथ्य उल्लेखनीय है कि नामदेव ने चौदहवी
शताब्दी के पूर्वार्ध में ही ब्रजभाषा में पदों की रचना की है। नामदेव के पदों में यह
स्पष्ट है कि उनमें मराठी और खड़ी बोली के तत्त्व हैं किन्तु यह बिलकुल स्वाभाविक
है। ब्रजभाषा और खड़ी बोली पास-पास की भाषाएँ थी और इनका विकास भी साथ-
साथ हो रहा था । सामान्य लोग दोनों भाषाओं के मिले जुले रूप का प्रयोग करते थे ।
सन्त नामदेव ने भी उसी में अपने पदों को रचा है। मराठी उनकी मातृभाषा थी,
जिसके कई शब्द और रूप उनके हिंदी पदों में सहज ही आ गये हैं। नामदेव के सम-
कालीन अन्य कवियों की भाषा उतनी विकसित ब्रजभाषा नही है जितनी नामदेव के
पदो की । अन्य रचनाओं में अपभ्रन्श के तत्त्व काफी मात्रा में विद्यमान हैं। अतः नाम-
देव को ब्रजभाषा का प्रथम कवि कहा जा सकता है।
अब हम नामदेव की हिन्दी पदावली की भाषा की निम्नलिखित विशेषताओं
पर विचार करेंगे :—
वाक्य रचना
नामदेव की हिन्दी में अधिकांश संज्ञाएँ वाक्य के अन्य शब्दों से अपना सम्बन्ध
बिना कारक-चिह्नों तथा परसर्गों के दिखाती हैं। जिन संज्ञाओ का कर्म के जैसा प्रयोग
हुआ है वे बिना कारक चिन्हो के प्रयुक्त हुई है—
(१) पाखंड भगति राम नहि रीझे । पद २१—पंक्ति ४ (करण कारक)
(२) दहूँ घोड़ा न चढ़ाइ हो कान्हा । पद ३६—पंक्ति ६ (अधिकरण कारक)
(३) जैसे कनकतुला चित राखिला । पद १६—पंक्ति १ (संबंध, अधिकरण)
(४) पावक दार जतन करि काढ़यो । पद ८२—पंक्ति ४ (अपादान कारक)
यद्यपि कुछ वाक्यो मे कर्म अध्याहृत (Understood) होता है फिर भी
संदर्भ से उसका अर्थ समझ में आ सकता है—
'अब मोरी छूटि परी ।' ८-२
इस वाक्याश में कर्म 'बंधन' अध्याहृत है।
कुछ संज्ञाओ के साथ गलत कारक-चिह्नो का प्रयोग किया गया है। जैसे—
(१) गुरु को सबद वैकुंठ—निसरनी । (२६-३)
सम्बन्ध कारक के कारक चिह्न 'का' के स्थान पर यहाँ संप्रदान कारक के
'को' का प्रयोग किया गया है।
निम्नलिखित उदाहरण में इसके ठीक विपरीत कारक का प्रयोग हुआ है—
(२) भाव भगति नाना विधि कीन्ही, फल का कौन करी । ८-३