सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 227, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की रचनाओ का साहित्यिक मूल्यांकन २३३
शैली
कुछ स्थलों पर समानार्थी शब्दो की पुनरावृत्ति हुई है—
(अ) 'आन देव फोकट बेकामा' (३०-८)
'फोकट' और 'बेकाम' समानार्थी शब्द है ।
(ब) 'नामा कहे मेरे बंध न भाई ।' (पद ५७-पंक्ति ८)
बंध (बंधु)—भाई, भाई-भाई
(क) घड़ी मूहूरति पल नाही टाई । (३७-३)
घड़ी-क्षण, मुहूर्त-क्षण
(ङ) अमृत सुधानिधि अंत न जाइला । (४५-५)
अमृत, सुधा-निधि-अमृत का खजाना
बल (emphasis) के लिए संबंधित शब्द के साथ 'ही' का प्रयोग किया गया
है। जैसे—
(१) 'आपै पवन आप ही पाणी ।' (११०-४)
(वह स्वयं पवन तथा पानी है ।)
(२) 'घट ही भीतरि न्हाउँगा । (६६-४)
(गुरु ने मेरे शरीर के भीतर मुझे अडसठ तीर्थ दिखाये उन्ही में मैं
नहाऊँगा ।)
कहो-कहीं 'पुनि' का भी प्रयोग मिलता है—
'आपै पुरिष, नारि पुनि आपै ।' (११०-५)
(वह स्वयं पुरुष तथा स्त्री है ।)
नामदेव की हिन्दी के कुछ विशिष्ट प्रयोग
नामदेव की हिन्दी में कुछ प्रयोग ऐसे है जो रूप और अर्थ दोनो में विशिष्ट है ।
कई शब्दो का ऐसे अर्थो में प्रयोग हुआ है जिनमें वे सामान्यतः प्रयुक्त नहीं होते । इसी
प्रकार कुछ प्रयोग व्याकरण और रचना को दृष्टि से विशिष्ट है ।
शब्द संग्रह : संज्ञाएँ
अधिकाई (२-३) विशेषता पयाना (११-१) लक्ष्य
कविलास (६५-१) कैलाश पालिक (१४१-४) पालना
करवा (६३-१) शरीर पूठि (६८-५) पीठ
कापट (५२-५) कपट पैज (१३१-६) दरवाजा
कालकुष्ट (२७-३) कालकूट विष वीठो (३६-१) विट्ठल