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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 332 में से

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पृष्ठ 220

२२६ नामदेव की हिन्दी कविता
है। उनकी शैली मानो उनके भावों तथा विचारों की भाषागत अभिव्यक्ति ही है। १
आचार्य कुन्तक ने शैली का सम्बन्ध व्यक्ति के स्वभाव से स्थापित किया है।
वे कहते हैं कि शक्तिमान और शक्ति का भेद नहीं किया जा सकता। व्यक्ति के सुकु-
मार आदि स्वभाव के अनुकूल ही उसकी शैली होती है। २
संत नामदेव एक सरल हृदय के व्यक्ति थे। उनकी भावुकता का परिचय उनकी
रचनाओं में सर्वत्र मिलता है। परमात्मा ही एक मात्र सब कुछ है, वही सब के बाहर
तथा भीतर सब कहीं व्याप्त है और उसी के प्रति एकनिष्ठ होकर रहना चाहिए। इसीको
वे अपना धर्म मानते हैं। इसी प्रकार के भावों से उनका हृदय सदा भरा रहता है और
इसी कारण वे सारे जगत् को एक उदार-चेता प्रेमी की दृष्टि से देखा करते हैं।
नामदेव ने अपना काव्य कलात्मक प्रदर्शन के लिए नहीं लिखा। उनकी रचना
का प्रधान उद्देश्य 'स्वान्तः सुखाय' के साथ ही साथ परोपकार भी था। उसमें लोक-
मंगल पर ही अधिक बल दृग्गोचर होता है। संसार के माया-जाल में फँसे हुए अज्ञ जनों
पर उनको तरस आता था। उनके उद्धार का संकल्प वे इस प्रकार घोषित करते हैं—
'कीर्तन में भक्ति का उपदेश करते हुए आनन्द विभोर होकर मैं नाचूँगा और भक्ति के
ज्ञान का दीप इस प्रकार जलाऊँगा कि पाप रूपी अंधकार नष्ट हो जाये।' ३
'मुझे पते की बात विदित हुई। अब मैं भागवत धर्म का प्रचार करूँगा।' ४
'मैं दुख से भरा हुआ यह संसार सुख-मय करूँगा। मैं संतों के साथ कीर्तन में
अपने उपदेश-परक अभंगों का गान करते समय नाचूँगा।' ५
१. All style is gesture, the gesture of the mind and of the soul.
—Style by Walter Raleigh p. 127.
२. कवि स्वभाव भेद निबंधनत्वेन काव्य प्रस्थानभेद गाहते। वक्रोक्तिजीविति,
प्रथमोन्मेष।
३. नाचूँ कीर्तनाचे रंगीं। ज्ञानदीप लावूँ जगीं।
—सकल संत गाथा, अभंग १३६२।
४. आम्हा सापडले वर्म। करुँ भागवत धर्म।
—सकल संत गाथा, अभंग १४२६।
५. अवघाचि संसार सुखाचा करीन। जरी झाला दुःखाचा दुर्धरु हा।
संत समागमी नाचेन रंगणी। तेणे जाईल निघोनी त्रिविध ताप।
—सकल संत गाथा, अभंग १५०१।