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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 332 में से

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पृष्ठ 209

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २१५
शांत रस
संसार की असारता, उसको वस्तुओ की नश्वरता तथा परमात्मा के स्वरूप का
ज्ञान होने से चित्त को ऐसी शांति मिलती है जो संसार के विविध सुखो के उपभोग से
कभी नही मिलती । इसी शांति का वर्णन पाठक या श्रोता के हृदय में 'शांत' रस की
उद्भावना करता है ।
नामदेव एक साक्षात्कारी संत थे । अतः अपने आराध्य पंढरी के विट्ठल के प्रति
उनके हृदय में असीम अनुराग था । इस तथ्य के आधार पर शांत रस की निष्पत्ति इस
प्रकार होगी—
(१) स्थायी भाव—निर्वेद, संसार के विषयों से उदासीन होना ।
(२) आलंबन—विट्ठल अथवा भगवान के अवतार ।
(३) उद्दीपन—गुरु उपदेश, मंदिर का द्वार घूमना,
भगवान का दूध पीना आदि ।
(४) अनुभाव—गद्गद होना, सिहाना आदि अनुभाव है ।
(५) संचारी भाव—स्मरण, हर्ष, सभी के प्रति सौहार्द आदि ।
अपने एक अभंग में नामदेव कहते है कि 'यह संसार क्षणभंगुर है, असार है ।
पानी के पृष्ठभाव पर दिखाई देने वाले बुलबुले देखते-देखते नष्ट हो जाते हैं । यही हाल
इस संसार का है । वह जादूगर के इन्द्रजाल के समान है । संसार असार है सार रूप
केवल हरि का नाम है ।'१
हिंदी के एक पद में अपने मन को संसार की अनित्यता से सचेत करते हुए
कहते हैं—'रे मन ! संसार माया जाल है । तू आवागोन के फेर में फँसा हुआ है, काल
का पंजा सदैव तेरे सिर पर है । यौवन रूपी धन पर तू गर्व न कर । आत्मा शरीर रूपी
पिंजरा छोड़ जायेगी तो केवल मुट्ठी भर राख रह जायेगी । हे त्रिलोचन ! तू यहाँ चार
दिन का मेहमान है ।'२
१. जली बुडबुडे देखता देखता । क्षण न लागता दिसेनाती ।
तैसा हा संसार पाहता पाहता । अंतकाली हाता काय नाही ॥
गारुडयाचा खेल दिसे क्षण भर । तैसा हा संसार दिसे खरा ।
नामा म्हणे तेथें कांही नसे बरे । क्षणाचें हे सर्व हरें आहे ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १६५७ ।
२. रे मन पंछीया न परीस पिंजरे । संसार माया जाल रे ।
येक दिन मै तीन फेरा । तोहि सदा झंपै काल रे ॥ टेक ॥
धन जोबन रूप देखि करि । गरब्यो कहाँ गंवार रे ।
कुंभ काचौ नीर भर्यो । बिनसता नहो बार रे ॥ १ ॥