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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 332 में से

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पृष्ठ 224

२३० नामदेव की हिन्दी कविता
उन दिनो प्रचार के इतने साधन उपलब्ध न होते हुए भी नामदेव ने जो कार्य
किया उसे देखकर हम आश्चर्यचकित होते है। उन्होंने यह सब कुछ भक्ति के प्रचार
के लिए किया, इसमें उनका कोई स्वार्थ नही था। वे परमात्मा से यही प्रार्थना करते
है कि संत सदा सुखी हो, हरि के भक्तों को दीर्घायु प्राप्त हो तथा जिनकी जिह्वा पर
पाडुरंग का नाम है, उनका कल्याण हो।
नामदेव की लोकप्रियता का प्रमाण इसीसे मिलता है कि निम्नलिखित परवर्ती
संत कवियो ने आदर के साथ उनका स्मरण किया है—
(१) गुरु परसादी जैदेव नामा। भगति के प्रेम इन्हहि है जाना।
—कबीर
(२) नामा कबीर सु फोन पे गुन राश बाँका।
भगति समानी सब घरति तजि कुल काना मा॥
—रज्जबजी
(३) जैसे नाम कबीरजो यों साधु कहाया।
आदि अंत सौ आइके राम राम समाया॥
—सुन्दरदास
(४) नामदेव कबीर जुलाहो जन रैदास तिरे।
दादू बेगि बार नहिं लागे, हरि सौं सबै खरे॥
—दादू दयाल
(५) धू प्रहलाद, कबीर, नामदेव पापंड कोई न राख्या।
बैठि इवंत नाव निज सीमा वेद भागोत यूँ भाख्या।
—बषानाजी
(६) नामदेव, कबीर, तिलोचन सधना सैनु तरे।
कहि रविदास सुनहु रे संतों, हरि जीउ ते सबै सरे।
—रैदास
'नामदेव की वाणी यद्यपि सीधी-सादी भाषा में है तथापि वह भक्ति रसमयी
और अन्तर को भेदने वाली है। उसमें हम योग साधना की निर्मलता के साथ-साथ
भक्ति की विह्वलता भी पाते हैं। हिन्दी के संत साहित्य को नामदेव महाराज की भाव
पूर्ण वाणी पर गर्व है।'
—वियोगी हरि, संक्षिप्त सन्त सुधा सार, पृ० २३।
नामदेव की हिन्दी पदावली की भाषा की कुछ विशेषताएँ
भाषा के इतिहास में चौदहवीं शताब्दी में लिखित ब्रजभाषा की किसी अन्य