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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 332 में से

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पृष्ठ 219

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २२५

कि 'मैं बहुतश्रुत तथा ज्ञानशील नही हूँ ।'¹ अभङ्ग की रचना किस प्रकार की जाय यह
भी मैं नही जानता ।'² कारण यह है कि उन्होने छंदशास्त्र का विधिवत् अध्ययन नही
किया था । उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि काव्य के लिए तीव्र अनुभूति और
चिंतन की गहनता अपेक्षित है न कि छंद, अलंकार, शब्द शक्ति और अन्य काव्य गुण ।
हिंदी रचनाओं में प्रयुक्त छंद
नामदेव की हिंदी रचनाओ में कुछ पद हैं और कुछ साखियां ये छोटे-छोटे छंद
हैं । श्री गुरु ग्रन्थ साहब में संगृहीत नामदेव के ६१ पदों के साथ रागों के नाम
दिये गये हैं। पूना विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित 'संत नामदेव की हिंदी पदावली'
में कुछ ही पदों पर रागों के नाम दिये गये हैं, शेष पर नही । इन पदों में गउडी, चैती,
आसा, गूजरी, सोरठि, धनासरी, टोडी, तिलंगु, बिलावलु, रामकली, मारू, भैरउ,
बसंतु, सारंग, मलार, कानडा, प्रभाती आदि राग-रागनियां प्रयुक्त हैं। इस संदर्भ में
डॉ० रामचंद्र मिश्र का मत द्रष्टव्य है ।³
शैली
जैसे भाषा भावो और विचारों का वाहन है वैसे ही शैली का भी ।
क्योकि शैली भाषा के रूप में ही हमारे सम्मुख आती है । शैलीकार का एकमेव लक्ष्य
होता है अपने श्रोता, पाठक या दर्शक को प्रभावित करना । इस उद्दिष्ट की पूर्ति के
लिए शैलीकार का सारा अवधान अपनी शैली के शृंगार पर केन्द्रीभूत होता है ।
नामदेव का काव्य उत्स्फूर्त है, उसमें अनुभूति और अभिव्यक्ति में विलक्षण एक-
रूपता है । उन्होंने अपने एक अभंग⁴ में सांग रूपक के द्वारा पांडुरंग की षोडशोपचार
पूजा का चित्र अंकित किया है । उनकी अनुभूतियां अलंकृत होकर ही अभिव्यक्त होतो
१. नव्हे बहुश्रुत, नव्हे ज्ञानशील । —वही, अभंग ६२४ ।
२. अभंगाची कला नाहो मी नेणत ।
—श्री नामदेव गाथा, अभग, १३८२ ।
३. नामदेव के पदो में गृहीत राग-रागिनियां शास्त्रीय ध्रुपद शैली में गेय रही है
जिनकी दीर्घ परम्परा भारतीय संगीत शास्त्रो में विद्यमान है । इन रागो के अपने
रूप हैं, अपने गान-काल हैं और अपने रस है ।
—हिंदी पद परम्परा और तुलसीदास, पृ० ६५-६६ ।
४. देह देव्हारा पाट हृदय संपुट । मधी कृष्ण मूर्त बसविली ।
प्रेमाचे पाण्यानें प्रक्षालीन तुज । आत्मस्वरूप नि पांडुरंगा ।।
—अभंग, १८०२ ।
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