सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 217

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २२३
चित्र विधान
जो काम चित्रकार अपनी तूलिका से करता है वह रेखाचित्रकार शब्दों से
करता है। नामदेव ने कुछ घटनाओं (प्रसंगों) तथा व्यक्तियों के कलापूर्ण रेखा-चित्र
अंकित किये हैं।
प्रसंग वर्णन
कृष्ण का मृत्तिका भक्षण :- कुछ गोप बालक यशोदा से कृष्ण के मृत्तिका
भक्षण की बात कहते हैं। इसपर यशोदा उनको डांटती है। श्रीकृष्ण के खुले मुंह में
जब वह ब्रह्मांड का दर्शन करती है तब आश्चर्यचकित हो जाती है। १
इसके अतिरिक्त "तीर्थयात्रा' के दिनों में नामदेव का अपनी भक्ति के जोरपर
सूखे कुएँ में से पानी निकालना, ज्ञानेश्वर की समाधि, नामदेव का भक्ति गर्व परिहार
आदि प्रसंगों का नामदेव ने कलापूर्ण अंकन किया है।
व्यक्ति चित्र
नामदेव द्वारा धनी-मानी, सगे-सम्बन्धी, धर्मभ्रष्ट, ब्राह्मण, ढोंगी साधु, संत
सज्जन आदि के अंकित चित्र बड़े ही मनोज्ञ हैं।
बगला भक्तों की आलोचना करते हुए नामदेव कहते हैं कि 'नारायण से इनका
मन नही लगता। इनसे संयम का पालन नहीं होता। तालाब में प्रवेश कर शरीर को
स्वच्छ करते है पर इनका अंतःकरण अशुद्ध ही रहता है।"२
आडंबर का भंडा फोड़ करते हैं कि 'वह गुणसागर गोपाल छल-कपट से नहीं
मिलता। गोपीचंद का टीका लगाना तथा गले में माला पहनाना दिखावा मात्र है।'
१. मुलें सांगताती। माती खातो गे श्रीपती ॥
लाकूड घेऊनि हातांत। माती खातो का पुसत ॥
भावा भुललासे खरा। कांपतसे थरथरा ॥
मुख दिये उघडोनि। दावी तेव्हा चक्रपाणी ॥
ब्रह्मांडे देखिली। नामा म्हणे वेड़ी झाली ॥
—अभंग ६६।
२. नराइन सू मन न रंजे। संजम चूके अरु ध्रत पडे।
जलहर पैसि पषाले काया। अंतरि मैल न लउ उतरे ॥
—सं० ना० हि० प०, पद १०३।