सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 216

२२२ नामदेव की हिन्दी कविता
बिना मढा मृदंग बजता है, बिना सावन के, बिना बादल के वर्षा होती है।
सचमुच नामदेव के अलंकार अनुभूति को रूप देने के लिए हैं—हृदयंगम कराने
के लिए हैं : इनमें कही चमत्कारिता नही है ।
उदाहरण
काल हमारे सुख का कभी भी अंत कर सकता है। मछली पानी में रहती है।
वह समझती है कि वह सुरक्षित और सुखी है, परन्तु अचानक जाल रूपी काल में फँस
जाती है। उसका सुख तिरोहित हो जाता है । इसे 'उदाहरण' से स्पष्ट करते हैं—
जैसे मीनु पानी में रहे
काल जाल को सुधि नही लहै ।
—पञ्जाबातील नामदेव
मधुमक्खी मधु का संचय करती है, क्या वह उसका उपभोग ले पाती है ?
गाय अपने बछड़े के लिए दूध का संचय करती है, पर क्या वह उसके बच्चे को मिल
पाता है ? अहीर गला बाँधकर उसे दुह लेता है :—
जिउ मधुमाखी संचै अपार
मधु लीनो मुखि दीनी छारु ।
गउ बाछरुऊ संचै खीरु
गला बांधि दुहि लैहि अहीरु ।
—पंजाबातील नामदेव ।
इसीलिए नामदेव कहते हैं कि अपने या अपने कुटुम्बियों के लिए धन-संचय
करने में क्यो अपने जीवन को गँवाते हो ? निर्भय होकर भगवान का भजन करो।
मारवाडी को जैसे पानी प्यारा है और ऊँट को जैसे वनस्पति प्रिय है उसी
तरह मुझे मेरा विठ्ठल प्यारा है—
मारवाडि जैसे नीरु बालहा बेलि बालहा करहला ॥
—सं० ना० हि० प०, (२०२)
कितने अनुभूत और सूक्ष्म-भरे उदाहरण हैं ।
उत्प्रेक्षा
नामदेव ने अपने भावो की व्यंजना में सादृश्यमूलक अलंकारों का आश्रय
अधिक लिया है अतः उनकी रचनाओ में उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग नही के बराबर
हुआ है।