सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 221

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २२७
संसारी जनों को चेतावनी
नामदेव ने अपना काव्य कलात्मक प्रदर्शन के लिए नही लिखा। उनका प्रमुख
उद्देश्य था सामाजिक प्रबोधन अथवा जागरण। लोक मंगल की भावना ही इसकी प्रेरक
रही है।
किसी वस्तु अथवा व्यक्ति से सचेत अथवा सतर्क रहने का आदेश या उपदेश
चेतावनी है। नामदेव के काव्य में ऐसी चेतावनियां प्रचुर मात्रा में मिलती हैं। नामदेव
अपनी अनुभूति के आधार पर कहते हैं—'हे जीव ! तू जाग, तू अपना रास्ता भूल गया
है। हे अज्ञानी ! यह औघट घाट है और तुझे दूर जाना है।'१
'हे मेरे मन ! तू गोविंद के चरणों से लो लगा। हरि को छोड़ अन्यत्र न जा।
बलिराजा के समान श्रेष्ठ राजा भी चार युग तक न जिये। 'मेरा मेरा' कहनेवाले अंत
में संसार को छोड़कर चले गये।'२
'हे नर ! मनुष्य जन्म पाकर भी तू सचेत नही होता। काल का पंजा सदैव
तेरे सिर पर है!'३
'नामस्मरण कर मैं भव सागर पार हुआ। हरिभजन के बिना तू आवागौन के
फेर से मुक्त न होगा।'४
उनकी कथन शैली की विशेषता उनके छल-हीन हृदय, निद्वंद्व जीवन एवं
आध्यात्मिक उल्लास द्वारा अनुप्राणित है और वह बिना सुझाये ही विदित हो जाती है।
ईश्वरोन्मुख होने के लिए नामदेव ने कतिपय प्रेरणाएँ दी हैं जिनके द्वारा कोई भी
व्यक्ति भगवद्भक्त हो सकता है।
१. जागि रे जीव कहा भुलाना। आगे पीछे जाना ही जाना॥
भगत नामदेव चेति अयाना। औघट घाट अरु दूरि पयोना॥
—पद १२२।
२. मन मंझा तू गोविंद चरन चित लाइ रे।
हरि तजि अनत न जाइ रे॥ टेक॥
—१०५।
३. मनिषा जनम आई र्नहि चेता। अंधे पसु गंवांरा।
तेरे सिर काल सदा सर साधै। नामदेव करत पुकारा रे नर॥
—पद ६२।
४. नामदेव उतरयो पार। चेतहु रे चेतनहार।
हरि की भगति बिन। औतरोगे बारंबार॥
—पद ६८।