सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ नामदेव की हिन्दी कविता
करुण रस
प्रिय व्यक्ति के पीड़ित या गत होने, प्रिय वस्तु के वैभवविहीन होने अथवा
अप्रिय व्यक्ति वा अनिष्ट वस्तु के प्राप्त होने से हृदय को जो क्षोभ या क्लेश होता है
उसी की व्यंजना से करुण रस की उत्पत्ति होती है।
(१) स्थायी भाव—शोक
(२) आलंबन—संत ज्ञानेश्वर का समाधि-ग्रहण
(३) आश्रय—संत जन
(४) उद्दीपन—उनके सहवास की स्मृतियाँ
(५) अनुभाव—रोना, प्रलाप, विवर्णता, स्तंभ आदि ।
(६) संचारी—निर्वेद, ग्लानि, स्मृति, विषाद, चिंता, दैन्य आदि ।
'ज्ञानदेव की समाधि' नामक प्रकरण में करुण रस चरम उत्कर्ष को पहुँच गया
है। नामदेव ने बड़ी तन्मयता से इस घटना का वर्णन किया है। ज्ञानियों का वह राजा,
योगियों का सखा जीवित समाधि ग्रहण करेगा, यह ज्ञान-रत्न फिर दिखाई न देगा इस
कल्पना से नामदेव विचलित हुए ।
'जैसे मछली पानी के बिना तड़पती है वैसे ही ज्ञानदेव के वियोग की कल्पना से मैं
व्याकुल हो रहा हूँ। दश-दिशाएँ उदास हैं मानो वे भी शोक कर रही हों। मेरे
प्राण ज्ञानेश्वर के लिए तड़प रहे हैं। एक महान् योगी के प्रयाण से मुझे ऐसा लगता
है कि मेरा सब कुछ लुट गया। मैं शोक-सागर में डूब गया ।' '
भनत नामदेव सुनूँ हो तिलोचन । घटि दया ध्रम पालि रे ।
पाहुना दिन च्यारी फेरा । सुकृत राम संभारि रे ॥ २ ॥
—सं० ना० हि० प० पद ७५ ।
१. कासावीस प्राण मन तलमली ।
जैसी का मासोली जीवनाविण ॥ १ ॥
दाही दिशा वोस वाटती उदास ।
करिताती सोस मनामाजी ॥ २ ॥
धातियेली घोण प्राण आला कंठी ।
ज्ञानदेवा साठी तलमली ॥ ३ ॥
नामा म्हणे देवा वाटतसे खंती ।
चालली विभूती योगियांची ॥ ४ ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १०५६ ।