सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव का नाम महाराष्ट्र के विख्यात 'संत पंचायत' अर्थात् पाँच प्रमुख संतो
के समुदाय में लिया जाता है। उत्तर भारत के सबसे प्रसिद्ध संत कबीर ने उनके प्रति
श्रद्धा के भाव प्रदर्शित करते हुए कहा है—'जिस प्रकार पहले युगों में भक्त उद्धव,
अक्रूर, हनुमान, शुकदेव तथा शंकर हुए थे उसी प्रकार कलि काल में नामदेव तथा
जयदेव का आविर्भाव हुआ था।'१
संत नामदेव में संत ज्ञानेश्वर जैसा काव्यरचना का भाव जागृत नहीं था। वे
विद्वान नहीं थे। उनका साहित्यशास्त्र का अध्ययन भी नहीं था। परन्तु उनका हृदय
स्वाभाविकता से कवि का था। वे अतीव संवेदनक्षम थे। दूसरों के प्रति उनके हृदय में
तड़पन, दया और प्रेम था। अतः उनके अभंगों की आत्मा भावना है न कि कल्पना।
भावोद्भूत काव्य रस प्रधान होता है न कि अलंकृत। 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्' के
अनुसार यह श्रेष्ठ काव्य है। यह पूर्णतया कोमल है। सुकुमारता इसकी प्रकृति है। यह
भक्ति, शांत और करुण रस से ओतप्रोत है। यह उचित शब्दालंकार तथा अर्थालंकार
को धारणा करता है परन्तु कृत्रिम अलंकारों की अपेक्षा स्वाभाविक सुकुमारता तथा
मधुरता की ओर वह अधिक झुका है। संत नामदेव के फुटकर अभङ्ग उनके हृदय में
न समा सकने वाले भक्ति-भाव और प्रेम-रस से लबालब हैं। वे तो भक्ति रस की वर्षा
से सारे महाराष्ट्र को आप्लावित करने को आतुर थे। इसीलिए संत ज्ञानेश्वर ने
कहा था कि 'नामदेव का सरल कथन भी कवित्व है और उसका रस अद्भुत तथा
निरुपम है।'२
अन्य एक स्थान पर वे कहते हैं—'हे नामदेव ! तुम्हारे रस भरे वचन सागर
से भी अथाह हैं। उनके अनुशीलन से नित नया आनंद प्राप्त होता है।'३ इससे अधिक
क्या प्रशंसा हो सकती है ?
पिछली शताब्दी के मार्मिक समीक्षक स्व० प्रो० वा० ब० पटवर्धन ने नामदेव
१. जागे सुक उद्धव अक्रूर हणवंत जागे से लंगूर ।
संकर जागे धरन सेष, कलि जागे नामा जैदेव ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० ३०२ ।
२. परि नामयाचे बोलणें नव्हे हे कवित्व । हा रस अद्भुत निरुपमु ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६२७ ।
३. सिंधूनि सखोल सरस तुझे बोल । आनंदाची डोल नित्य नवी ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ६२५ ।