सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 218, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ नामदेव की हिन्दी कविता
सच्ची भक्ति नही ।'१
मराठी रचनाओं में ऐसे व्यक्तियों के चित्र पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। वेष-
धारी साधु छापा तिलक लगाते हैं और भोले भाले जनों को लूटते हैं।२ वे लोगों से
कहते हैं कि वे हरि के भक्त हैं पर उनका मन घर-गृहस्थी में फँसा रहता है, उससे
विरक्त नही होता ।३
नामदेव द्वारा अंकित मुक्ताबाई का चित्र बहुत सरस बन पड़ा है।४ नामदेव
द्वारा वर्णित प्रसंग तथा उनके बनाये रेखा चित्र उनकी सरल भाषा शैली के प्रमाण हैं।
नामदेव की छंदोरचना
मराठी रचनाओं में प्रयुक्त छंद—प्राचीन मराठी का सारा साहित्य आद्य कवि
मुकुंदराज से लेकर समर्थ रामदास तक पद्यात्मक ही है। 'ओवी' तथा 'अभंग' इन संत
कवियों के प्रिय छंद रहे हैं। लयबद्धता तथा गान सुलभता मराठी के अभंग की विशेप-
ताएँ हैं। इस पर ज्ञानदेव के उत्कृष्ट अभंगों का आदर्श नामदेव के सामने था ही। अत
रचना की सुकरता की दृष्टि से कहिये अथवा अनुकरणशीलता की दृष्टि से कहिये,
नामदेव ने अभंग ही को अपनाया।
अभंग की लंबाई की कोई सीमा नही होती। इसीलिए यह अभंग (अटूट)
कहलाता है। दो से लेकर दो सौ 'चौक' भी एक अभंग में आ सकते हैं। एक अभंग के
चार चरण होते हैं और साढ़े तीन चरणों का एक 'चौक' होता है। इन चरणों में अक्षर
मात्रा और गण का कोई नियम लागू नही होता।
छंद दोष
नामदेव की रचनाओं में यत्र तत्र छंद दोष पाये जाते हैं। वे स्वीकार करते हैं
———
१ कपट मैं न मिलै गोविंद गुन सागर गोपाल ।
गोपी चंदन तिलक बनावै । कठहु लावै माल ॥ टेक ॥
—स० ना० हि० प०, पद १४२ ।
२ टिळे टोपी माला दावी । भोल्या भाविकांसी गोंवी ॥
—अभंग १८३७ ।
३ लोकापुढे सांगे आम्हो हरिभक्त । न होय विरक्त स्थिति ज्याची ।
—सकल संत गाथा, अभंग १८३६ ।
४ लहानशी मुक्ताई जैसी सणकाडी ।