सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 215

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २२१
नामा कहै हऊ तरि भी न जानऊ।
मोकऊ बाह देहि बाह देहि बीठुला ॥
हे प्रभो ! संसार रूपी सागर में लोभ रूपी लहरें इतनी भयावह है और उनकी
आवाज इतनी आतंकपूर्ण है कि मेरी नाव उनमें डूब जाने का भय लगता है । नामदेव
कहते हैं कि हे विट्ठल ! मैं तैरना नहीं जानता । तू मुझे बाँह दे । कितने समुचित रूपकों
द्वारा नामदेव अपना आशय व्यक्त करते हैं ।
दृष्टांत
नामदेव ने दुरूह-तम दार्शनिक तथा आध्यात्मिक अनुभूतियों को बोधगम्य
बनाने के लिए दृष्टांतों का प्रचुर मात्रा में उपयोग किया है ।
(१) ऐसे रामहि जानौ रे भाई ।
जैसे भृङ्गी कीट रहै ल्यो लाई ॥टेक॥ पद ५७
एकांतिक भक्ति किस प्रकार की जाय, यह एक दृष्टांत द्वारा समझाते हैं ।
नामदेव कहते है—'हे भाई ! जैसे भृङ्गी कीट से लौ लगाये रहती है वैसे तुम राम से
लौ लगाओ ।'
(२) ज्यूँ विषई हेरै परनारी । कोडा डारत फिरै जुआरी ॥
ज्यूँ पासा डारै पववारा । सोना घड़ता हरै सोनारा ॥ पद ५८
ईश्वर भक्ति में चित्त किस तरह एकाग्र हो, यह बात नामदेव दृष्टांतों द्वारा
समझाते हैं ।
जैसे कोई कामात्त परस्त्री की ओर देखता है, जैसे कोई जुआरी बड़े शोक से
पांसा डालता है, जैसे सुनार सोने का जेवर बनाते समय उसमें से थोड़ा-सा सोना
उड़ा लेता है, उसी प्रकार हमारा सारा ध्यान परमात्मा पर केंद्रित हो ।
नामदेव की उपमाओं की भाँति उनके दृष्टांत भी जन-जीवन से संगृहीत हैं ।
ये दृष्टांत व्यापार-साम्य और गुण-साम्य संपन्न होने के कारण प्रभावशाली और रोचक
बन गये हैं ।
विभावना
विभावना में कारणान्तर की कल्पना की जाती है । गगन-मण्डल (मस्तक) के
सहस्राधार में प्राणों के पहुँचने पर अनहद-नाद का और अमृत के झरने का कैसा
अनुभव होता है, इसे विभावना द्वारा समझाते हैं—
"अणमड़िया मंदलु बाजै
बिनु सावन घनेहरू गाजै
बादल बिनु बरखा होई ।" —सं०ना० हिं० प०, पद १५४ ।