सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
२०८ नामदेव की हिन्दी कविता
देखकर कि तू पतित पावन नही है, मैं लोट रहा हूँ। हे देव! तुम इतने उदार हो कि
बिना लिए कुछ देने नही। तुम जैसे कृपण से मैं क्या याचना करूँ? मालूम नही तेरा
नाम पतित पावन किसने रखा?'' उपर्युक्त अभङ्ग मे प्रेम के साथ व्यङ्ग्य भी प्रकट
हुआ है।
सत नामदेव की रग रग मे उनका आराध्य विठ्ठल समाया हुआ था। वे
उसके अनन्य भक्त थे। विठ्ठल से अधिक इस ससार की कोई वस्तु उन्हे प्रिय नही थी।
वे कहते है— 'न मुझे वैकुण्ठ की चाह है, न कैलास की आकाङ्क्षा। मैने अपनी सब
आकाक्षाए विठ्ठल के चरणो मे अर्पित कर दी है। न मुझ सतान चाहिए, न धन मान,
मेरे लिए तो एक विट्ठल का प्यार ही सब कुछ है।'२
नामदेव विठ्ठल की आराधना मे कितने तल्लीन, कितने तन्मय हो गये थे।
कहत हे— हे पुरुषोत्तम ! मै तेरे प्रेम के कारण तुझमे ही लीन हो गया हूँ। मै देह हूँ
तू उसमे रहने वाला आत्मा है। इस प्रकार हम दोनो एक ही है।'३
नामदेव विठ्ठल की अपेक्षा उसकी भक्ति को अधिक महत्त्व देते थे। वे कहते
हे— हे प्रभु ! तू आप्तकामी है पर तेरे चरण तुझसे भी अधिक मधुर हे। तू परा और
अपरा से परे है। तेरे चरण तेरी महानता के प्रतीक है। मैं अपने मन सहित तेरे चरण
चिंतन के आनंद में डूब गया हूँ और अनेक प्रयत्न करने पर भी मेरा चित्त तेरे चरणो
से अलग नही हो पाता। मेरी वासनाएँ मिट चुकी हैं। हे विठ्ठल ! तू मुझे अपने सेवक के
१. पतित पावन नाम ऐकुनी आलो भी द्वारा। पतित पावन न होसी
म्हणुनी जातो माघारा।
घेतो तेव्हा देसी ऐसा अससी उदार। काय धरूनि देवा तुझे
कृपणाचे द्वार।
सोडी देवा ब्रीद आता न होसी अभिमानी।
पतितपावन नाम तुझे ठेवियले कोणी ?
—सकल सत गाथा, अभङ्ग १७३१।
२ आम्हा स्वर्ग सुख मानू जैसा ओक। देखोनिया तुझा पद्धरीये।
न लगे वैकुंठ न वांधू कैलास। सर्वस्वांची आस देवा पायो ॥
—सकल सत गाथा, अभङ्ग ४४१।
३. नामा म्हणे पुरुषोत्तमा। स्वयें जड़लो तुझ्या प्रेमा।
मी धुडो तू आत्मा। स्वयें दोन्ही।
—सकल सत गाथा अभङ्ग १५२६।
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २०६
रूप में स्वीकार कर ।'१
नामदेव के मराठी काव्य की आत्मा उनकी हिंदी रचनाओ में भी संक्रमित हुई
और रस भी ज्यों का त्यों प्रवाहित हुआ है। इसके अतिरिक्त अवस्था के अनुसार और
भ्रमण, चिंतन और सामयिक परिस्थिति के परिणाम-स्वरूप उनके विचारो में जो प्रौढ़ता
सहिष्णुता तथा उदारता आ गई थी अर्थात् उनके विचारो मे जो प्रगल्भता आ गई थी
उसका निचोड़ हमें उनकी हिंदी रचना में मिलता है।
नामदेव अपने हृदय की व्याकुलता को 'तालाबेली' शब्द से व्यक्त करते है। यह
व्याकुलता उस प्रकार की है जिस प्रकार की गाय को बछड़े के बिना या मछली को
पानी के बिना होती है।२
एक अन्य स्थल पर ये कहते है कि जिस प्रकार विषयी नर परनारी से प्रेम कर
तड़पता है उसी प्रकार की मेरी 'तालांबली' ( परमात्मा से मिलने की तीव्र
उत्कंठा) है।३
भक्त के प्रेम की तीव्रता का परिचय या अनुभूति नामदेव लोकानुभूत दृष्टांतो
से कराते हैं—'जैसे भूखे को भोजन प्रिय है, जैसे प्यासा जल को ही अपनी प्रमुख
आवश्यकता मानता है, जैसे मूर्ख को अपना कुटुम्ब ही प्रिय है, नामदेव कहते है कि
उपर्युक्त के समान ही नारायण के प्रति मेरी भक्ति और निष्ठा है।'४
१. बाहेरी भीतरी तुजचि मी देखे । वित्त तेणे सुखे वेडावले ।
संत संगे मज पालट हा झाला । पाहता विठ्ठला रूप तुझें ।
मीपणासहित आनंदी बुडालों । न निघे कांही केलें चित्त माझें ।
नामा म्हणे एक उरली से वासना । स्वामी सेवकपण देई देवा ।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १६६८ ।
२. मोहि लागी तालाबेली
बछरे बिनु गाइ अकेली ।
पानीआ बिनु मीनु तलफे
ऐसे राम नामा बिनु बापुरो नामा ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद २६ ।
३. जैसे बिखै हेत परनारी, ऐसे नामे प्रीति मुरारी ॥
ज्यूँ विषई हेरै परनारी । कोड़ा डारत फिरे जुआरी ॥
—वही, पद ५८ ।
४. जैसो भूखे प्रीति अनाज । तुषावंत जल सेती काज ।
मूरिप नर जैसे कुटुम्ब पराइन । ऐसी नामदेव प्रीति नराइण ॥ १ ॥
१४
२१० नामदेव की हिन्दी कविता
संत नामदेव के हिंदी पदो में मधुरा भक्ति की धारा प्रबलता से बहती है ।
अपने आराध्य प्रभु रामचन्द्रजी की बावली बहू बनकर उन्हें रिझाने के लिए नामदेव
शृङ्गार करना चाहते हैं। अपने प्रियतम से मिलने के लिए वे इतने धृष्ट एवं आतुर बन
गये हैं कि उनको लोकनिंदा का भी भय नही। वे तो उनसे डंके की चोट पर मिलना
चाहते हैं।१
उस एक मात्र राम के प्रति ही अपनी भक्ति का प्रदर्शन करते हुए नामदेव
कहते हैं—'जिस प्रकार नाद को श्रवण कर मृग उसमें निरत हो जाता है और मरते
दम तक उसका ध्यान नही टूटता, जिस प्रकार बगुला मछली की ओर दृष्टि लगाये
रहता है, स्वर्णकार सोने का गहना गढ़ते समय एक चित्त रहता है, जिस प्रकार कामी
पर स्त्री की ओर दृष्टिपात करता है और जुआरी अपनी कौडी के फेरे में रहता है
उसी प्रकार मेरी भी दृष्टि उसी एक 'राम' की ओर लगी हुई है। जहाँ देखता हूँ वहाँ
वही है। उसके सिवा और कुछ भी नही है।'२
नामदेव मूलतः भक्त थे। सिर से लेकर पैर तक भक्त। उनका जीवन भक्ति से
सराबोर था। ऐसा भक्त जिसके लिए भगवान ने अपने प्रण को छोड़ दिया, पूरे भक्ति
साहित्य में शायद ही मिले। इस भक्तिभाव का बड़ी ईमानदारी से उन्होंने अपनी हिंदी
रचनाओं में आविष्कार किया है। अपनी भक्ति की प्रामाणिकता का वर्णन करते हुए
नामदेव कहते हैं—'हे परमात्मा ! मुझे तू अपनी भक्ति प्रदान कर। मुक्ति को लेकर
मै क्या करूँगा ? यदि तू अपनी भक्ति न देगा तो मैं अपने शरीर को नष्ट कर दूंगा।
जैसे पर पुरिषा रत नारी । लोभी नर धन कौ हितकारी ।
कामी पुरिष काम रत नारी । ऐसी नामदेव प्रीति मुरारी ॥ २ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ११५ ।
१. मैं बउरी मेरा रामु भतारु ।
रचि रचि ताकउ करउ सिगारु ॥
भले निंदऊ भले विंदऊ लोगू ।
तनु मनु राम पिआरे जोगू ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २१४ ।
२. ऐसे राम ऐसे हेरा । राम छाडि चित अनत न फेरो ॥ टेक ॥
ज्यूँ विषई हेरै परनारी । कौडा डारत फिरै जुवारी ॥ १ ॥
ज्यूँ पासा डारै पसवारा । सोना घढता हरै सोनारा ॥ २ ॥
जत्र जाउँ तत्र तू ही रामा । चित चिंट्ट्या प्रणवै नामा ॥३॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५८ ।
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २११
मे जन्म-जन्मांतर में भटकता रहा। अंत में तेरे नाम से मेरा उद्धार हुआ। नामदेव
कहते हैं कि हे परमात्मा ! तू मेरा सर्वस्व है। यदि तू सागर है तो मैं उस सागर में रहने
वाली मछली हूँ।'"
साक्षात्कार की अनुभूति
नामदेव ने निर्गुण निराकार के साक्षात्कार के लिए साकार प्रतिमा
का ध्यान करते हुए भावोत्कट मनः स्थिति में काव्य रचना की। डॉ० रा० द० रानडे
के अनुसार साधक के जीवन मे ऐसी ही भावुकता अपेक्षित होती है।२
कविता प्रयत्न पूर्वक नहीं बनाई जाती। बल्कि चिंतन करते-करते एक ऐसा
क्षण आता है जहाँ चिंतन संबंधी प्रत्येक अभिव्यक्ति कविता बन जाती है। नामदेव की
रचनाएँ इसी प्रकार के काव्य के अंतर्गत आती है।
नामदेव की रचनाओं में अनुभूति की घनता (density) विशेष रूप से प्रतीत
होती है। उस परम तत्त्व का साक्षात्कार होने पर नामदेव को जो अलौकिक आनंद
होता है वह उच्चरित तथा लिखित दोनों रूपों में व्यक्त करने में भाषा असमर्थ है।
भाषा भावों को व्यक्त करने में तब असमर्थ होती है जब अनुभूति घनी हो।
नामदेव कहते हैं कि मुझे परमात्मा का साक्षात्कार हुआ। 'मैं चाहता हूँ कि
वाद्य बजाकर मैं भगवान से जा मिलूं। भले ही कोई मेरी स्तुति अथवा निंदा करे।
श्रीरंग (प्रभु) से मेरी भेंट निश्चित है।'३
'उन्मनी अवस्था' में उन्हें 'लय योग' की जो अनुभूति हुई उसका वर्णन वे इस
प्रकार करते हैं-'मुझे ईश्वर के दर्शन हुए और झिलमिल प्रकाश दिखाई देने लगा।
अनहद नाद सुनाई दे रहा था। मेरी आत्मज्योति परमात्म-ज्योति में समा गई। अन्तः-
१. भगति आपि मोरे बाबुला। तेरी मुकति न मांगू हरि बीठुला ॥
भगति न आपे तौ तन आडौ । कोटि करै तो भगति न छाँडौ ॥
अनेक जनम भरमतौ फिरयौ । तेरो नाँव ले ले उबरयौ ।
नामदेव कहै तू जीवन मोरा। तू सागर मैं मंछा तोरा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४६ ।
2. A mystical life is supremely emotional.
—Mysticiim in Maharashtra P. 26
३. अब जीअ जानि ऐसी बनि आई। मिलऊ गुपाल नीसानु बजाई ॥
असतुति निंदा करै नरु कोई। नामैं श्रीरंगु भेटले सोई ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २१४ ।
२१२ नामदेव की हिन्दी कविता
करण की कोठरी रत्न के प्रकाश से जाज्वल्यमान हो उठी। वही बिजली भी चमकने
लगी। भगवान को दूरी नही रह गई। आत्मा उसी से प्रापूर हो गई। असख्य दीपज्योति
को मद करने वाले सूर्य्य का प्रकाश छा गया। नामा उसी में सहज समा गया।' १
जो सिद्धावस्था को पहुँचता है उसे सर्वव्यापी परमात्मा जहाँ तहाँ प्रतीत होता
है नामदेव कहते हैं—'विठ्ठल अणु-रेणु में व्याप्त है उसके दर्शन चाहे जहाँ हो सकते
हैं।'२
'मैं उस परमेश्वर की मानस पूजा करता हूँ जो मन्दिर और मसजिद में नहीं
होता।'३
उनका सेवक सेव्य भाव भी जाता रहा। ४
सचमुच नामदेव अभेद भक्ति का आस्वाद ले रहे थे। वे कहते हैं—'हे माधव !
तुम मुझसे बाजी क्यो नही लगाते ? भगवान् से भक्त और भक्त से भगवान् है, अद्वैत
का यही खेल भक्त और तुम्हारे साथ पड़ा है। तुम्हीं देवता हो, तुम्हीं मंदिर हो और
तुम्हीं पुजारी हो।'५
आगे चलकर वे कहते हैं कि 'मै ही अपनी मानसिक स्थिति को भली भाँति
जानता हूँ। वह किससे कहे ? कौन उसको समझ सकेगा ? मेरे हृदय में पूर्णतया प्रभु
१. जब देखा तब गावा। तउ जन धीरजु पावा।
नादि समाइलो रे सतिगुर भेटिले देवा
जह झिलिमिलो कारु दिसंता।
तह अनहद शब्द अजंता ॥ —सं० ना० हि० प० पद २००।
२. ईभै बीठलु, ऊभै बीठलु, बीठल बिनु ससारु नहो ।
थान थनंतरि नामा प्रणवै पूरि रहिउ तू सरब मही ।
—पंजाबातील नामदेव, पद ३।
३. हिंदू पूजै देहुरा मुसलमाणु मसीत ।
नामै सोई सेविआ जह देहुरा न मसीत ॥
—सं० ना० हि० प०, पद २०८।
४. प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुर को दासा रे ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ३६।
५. बदहु कोन होड माधऊ मोसिऊ ।
ठाकुर ते जनु जन ते ठाकुर खेलु परिउ है तोसिऊ ॥
आपन देउ देहुरा आपन आप लगावै पूजा ॥
—सं० ना० हि० प०, पद १६१।
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २१३
का वास्तव्य है । मेरा मानसिक द्वन्द्व और भ्रम बिलकुल नष्ट हुआ है। मैं राम में समा
गया हूँ ।'१
अभेद भक्ति की अनुभूति कितनी बढ़िया उपमाओं द्वारा करायी गई है। 'पर-
मेश्वर सर्वव्यापी है । जैसे शीशे में देखने वाले को अपना मुँह प्रतिबिंबित दिखाई देता
है वैसे ही ब्रह्मज्ञानी को सर्वत्र परमात्मा के दर्शन होते हैं ।'२
इस अनुभूति से रंगे हुए नामदेव के पद पारमार्थिक भाव-गीत ( Metaphy-
sical lyrics ) हैं ।
नामदेव की कविता में रस
नामदेव की कविता भक्ति रस परिप्लुत है । भरत की रस व्यवस्था में भक्ति
को स्थान नही था । रूप गोस्वामी तथा मधुसूदन सरस्वती ने भक्ति को रस व्यवस्था
में न केवल स्थान ही दिला दिया अपितु उसको प्रधानता भी दिलवाई । शरणागति
( Submission ) भक्ति का स्थायी भाव है । नामदेव की वाणी मानो भक्ति रस की
मंदाकिनी है । उत्कट प्रेमाभक्ति का उदाहरण देना हो तो कहेंगे 'यथा नामदेवस्य ।'
नामदेव के विट्ठल प्रेम में याचक की आर्तता तथा चातक की अनन्यता है।
उनके मराठी के अभंगों तथा हिंदी के पदों में भक्ति तथा वात्सल्य रस परस्पर विलीन
हो गये हैं । मराठी के भक्त कवियों की यह विशेषता है कि वे अपने आराध्य विट्ठल
का माता के रूप में स्मरण करते हैं । उनके लिए वह वात्सल्य सिंधु है, करुणा का
सागर है ।
यदि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विचार किया जाय तो वात्सल्य भक्ति अन्य सब
प्रकार की भक्तियों से उच्च प्रतीत होगी क्योकि वात्सल्य भाव में किसी प्रकार के
स्वार्थ की गन्ध तक नही होती । यह एक व्यापक भाव है क्योकि इसको स्थिति प्राणि-
मात्र में होती है । केवल वात्सल्य ही भक्ति का सर्व शुद्ध भाव है जिसमे न तो विरक्ति
की भावना है, न इंद्रिय सुख की कामना हो । इसमें लोक धर्म का भी उल्लंघन नही है ।
१. मनकी बिरथा मनु ही जाने कै बूझन आगे कहीए ।
अन्तरजामी रामु रमाई मैं डर कैसे चहीए ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ५६ ।
२. ऐसो रामराई अन्तरजामी । जैसे दरपन महि बदन पहानी ।
बसै घटाघट लेपन छीपै । बन्धन मुकता जानु न दीसै ॥
पानी माहि देखु मुखु जैसा । नामे को सुआमी बीठलु ऐसा ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ५७ ।
२१४ नामदेव की हिन्दी कविता
वात्सल्य रस का विश्लेषण
स्थायी भाव —सन्तान विषयक प्रेम
आलंबन —नामदेव
आश्रय —विट्ठल
उद्दीपन —नामदेव का रूठना,
विट्ठल से दूध पीने के लिए हठ करना ।
अनुभाव —नामदेव का पुलकित होना, विलाप करना,
विट्ठल से बातें करना, आह भरना ।
संचारी —निर्वेद, ग्लानि, शंका, दीनता आदि ।
नामदेव भक्त और भगवान् का सम्बन्ध माता और बालक का-सा मानते हैं । वे
कहते हैं—'हे विट्ठल ! तू मेरी मैया है और मैं तेरा बालक हूँ । मुझे स्तन पान करा ।'¹
'विट्ठल रूपी माता पुत्र वत्सल है । उसका अन्तःकरण बहुत कोमल है । उसका
स्मरण करते ही वह अपने भूखे बालक को स्तन पान कराती है ।'²
अपने एक हिन्दी पद में नामदेव कहते हैं—'बालक यदि रोदन भी करे तो
माता उसको विष कैसे पिला सकती है ?'³
'मेरो माता तथा पिता तू ही है । हे हरि !
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २१५
शांत रस
संसार की असारता, उसको वस्तुओ की नश्वरता तथा परमात्मा के स्वरूप का
ज्ञान होने से चित्त को ऐसी शांति मिलती है जो संसार के विविध सुखो के उपभोग से
कभी नही मिलती । इसी शांति का वर्णन पाठक या श्रोता के हृदय में 'शांत' रस की
उद्भावना करता है ।
नामदेव एक साक्षात्कारी संत थे । अतः अपने आराध्य पंढरी के विट्ठल के प्रति
उनके हृदय में असीम अनुराग था । इस तथ्य के आधार पर शांत रस की निष्पत्ति इस
प्रकार होगी—
(१) स्थायी भाव—निर्वेद, संसार के विषयों से उदासीन होना ।
(२) आलंबन—विट्ठल अथवा भगवान के अवतार ।
(३) उद्दीपन—गुरु उपदेश, मंदिर का द्वार घूमना,
भगवान का दूध पीना आदि ।
(४) अनुभाव—गद्गद होना, सिहाना आदि अनुभाव है ।
(५) संचारी भाव—स्मरण, हर्ष, सभी के प्रति सौहार्द आदि ।
अपने एक अभंग में नामदेव कहते है कि 'यह संसार क्षणभंगुर है, असार है ।
पानी के पृष्ठभाव पर दिखाई देने वाले बुलबुले देखते-देखते नष्ट हो जाते हैं । यही हाल
इस संसार का है । वह जादूगर के इन्द्रजाल के समान है । संसार असार है सार रूप
केवल हरि का नाम है ।'१
हिंदी के एक पद में अपने मन को संसार की अनित्यता से सचेत करते हुए
कहते हैं—'रे मन ! संसार माया जाल है । तू आवागोन के फेर में फँसा हुआ है, काल
का पंजा सदैव तेरे सिर पर है । यौवन रूपी धन पर तू गर्व न कर । आत्मा शरीर रूपी
पिंजरा छोड़ जायेगी तो केवल मुट्ठी भर राख रह जायेगी । हे त्रिलोचन ! तू यहाँ चार
दिन का मेहमान है ।'२
१. जली बुडबुडे देखता देखता । क्षण न लागता दिसेनाती ।
तैसा हा संसार पाहता पाहता । अंतकाली हाता काय नाही ॥
गारुडयाचा खेल दिसे क्षण भर । तैसा हा संसार दिसे खरा ।
नामा म्हणे तेथें कांही नसे बरे । क्षणाचें हे सर्व हरें आहे ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १६५७ ।
२. रे मन पंछीया न परीस पिंजरे । संसार माया जाल रे ।
येक दिन मै तीन फेरा । तोहि सदा झंपै काल रे ॥ टेक ॥
धन जोबन रूप देखि करि । गरब्यो कहाँ गंवार रे ।
कुंभ काचौ नीर भर्यो । बिनसता नहो बार रे ॥ १ ॥
२१६ नामदेव की हिन्दी कविता
करुण रस
प्रिय व्यक्ति के पीड़ित या गत होने, प्रिय वस्तु के वैभवविहीन होने अथवा
अप्रिय व्यक्ति वा अनिष्ट वस्तु के प्राप्त होने से हृदय को जो क्षोभ या क्लेश होता है
उसी की व्यंजना से करुण रस की उत्पत्ति होती है।
(१) स्थायी भाव—शोक
(२) आलंबन—संत ज्ञानेश्वर का समाधि-ग्रहण
(३) आश्रय—संत जन
(४) उद्दीपन—उनके सहवास की स्मृतियाँ
(५) अनुभाव—रोना, प्रलाप, विवर्णता, स्तंभ आदि ।
(६) संचारी—निर्वेद, ग्लानि, स्मृति, विषाद, चिंता, दैन्य आदि ।
'ज्ञानदेव की समाधि' नामक प्रकरण में करुण रस चरम उत्कर्ष को पहुँच गया
है। नामदेव ने बड़ी तन्मयता से इस घटना का वर्णन किया है। ज्ञानियों का वह राजा,
योगियों का सखा जीवित समाधि ग्रहण करेगा, यह ज्ञान-रत्न फिर दिखाई न देगा इस
कल्पना से नामदेव विचलित हुए ।
'जैसे मछली पानी के बिना तड़पती है वैसे ही ज्ञानदेव के वियोग की कल्पना से मैं
व्याकुल हो रहा हूँ। दश-दिशाएँ उदास हैं मानो वे भी शोक कर रही हों। मेरे
प्राण ज्ञानेश्वर के लिए तड़प रहे हैं। एक महान् योगी के प्रयाण से मुझे ऐसा लगता
है कि मेरा सब कुछ लुट गया। मैं शोक-सागर में डूब गया ।' '
भनत नामदेव सुनूँ हो तिलोचन । घटि दया ध्रम पालि रे ।
पाहुना दिन च्यारी फेरा । सुकृत राम संभारि रे ॥ २ ॥
—सं० ना० हि० प० पद ७५ ।
१. कासावीस प्राण मन तलमली ।
जैसी का मासोली जीवनाविण ॥ १ ॥
दाही दिशा वोस वाटती उदास ।
करिताती सोस मनामाजी ॥ २ ॥
धातियेली घोण प्राण आला कंठी ।
ज्ञानदेवा साठी तलमली ॥ ३ ॥
नामा म्हणे देवा वाटतसे खंती ।
चालली विभूती योगियांची ॥ ४ ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १०५६ ।
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २१७
'चील जब घोंसले को सदा के लिए छोड़ जाती है तब उसके बच्चे अनाथ हो
जाते हैं। संत ज्ञानेश्वर के महानिर्वाण पर सारे संत अनाथ हो गये।' १
नामदेव की कविता का कला पक्ष
गीति काव्य—आधुनिक गीतिकाव्य पश्चिम की देन है। नामदेव का प्रत्येक
अभंग गीति अथवा गीति काव्य का सुन्दर आदर्श प्रस्तुत करता है। गीति काव्य वेदना
का विस्फोट है। वर्डस्वर्थ ने 'भाव' को प्रधानता देते हुए लिखा है कि 'काव्य शांति के
समय स्मरण किए हुए प्रबल मनोवेगों का स्वच्छंद प्रवाह है।' ३ वर्डस्वर्थ की यह परि-
भाषा समग्र काव्य की अपेक्षा गीति काव्य पर अधिक खरी उतरती है।
श्रीमती महादेवी वर्मा की २ गीत की परिभाषा भी गीति काव्य के स्वरूप पर
प्रकाश डालने में समर्थ है।
एक आलोचक के अनुसार 'भावों अथवा 'मनोवेगों' के आवेशपूर्ण आग्रह को
आत्माभिव्यंजन कहते हैं। गीति काव्य में प्रत्यक्ष आत्माभिव्यंजन का अवसर होता है।
प्रगीत, गीत अथवा गीति काव्य को हम गेय मुक्तक कहेंगे। अंग्रेज़ी में इसे 'लिरिक'
( lyric ) कहते हैं। अंग्रेज़ी आलोचना संबंधी ग्रन्थों में 'लिरिक' के गेय तत्त्व पर
जोर दिया गया । ४
गीति काव्य में स्वतः स्फूर्ति (spontaniety) की मात्रा कुछ अधिक होती है।
मनोवेग अथवा भावावेश उसका प्रेरक होता है।
गीति काव्य का कवि जो कुछ कहता है अपने निजी दृष्टिकोण से लिखता है।
१. नामा म्हणे देवा घार गेली उडोन ।
बालें दानादान पडियेली ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १०६७।
2. Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings. It
takes its origin from emotion recollected in tranquility.
३. साधारणतः गीत व्यक्तिगत सीमा में तीव्र सुखदुःखात्मक अनुभूति का वह शब्द-रूप
है जो अपनी ध्वन्यात्मकता में गेय हो सके।
—महादेवी का विवेचनात्मक गद्य, पृ० १४७।
4. Lyric poetry, as the name implies, is poetry originally intended
to be accompanied by the lyre or by some other instrument of
music. The term has come to signify any out-burst in song
which is composed under a strong impulse of emotion or inspi-
ration.
—Judgment in Literature—p. 97.
२१८ नामदेव की हिन्दी कविता
उसमें निजीपन के साथ रागात्मकता रहती है। यह रागात्मकता आत्मनिवेदन के रूप
में प्रकट होती है। रागात्मकता में तीव्रता बनाये रखने के लिए उसका अपेक्षाकृत छोटा
होना आवश्यक है। आकार की इस संक्षिप्तता के साथ भाव की एकता और अन्विति
लगी रहती है। छोटेपन की सार्थकता भाव की अन्विति में है। गीति काव्य में विवि-
धता रहती है किंतु वह प्रायः एक ही केन्द्रीय भाव की पुष्टि के लिए होती है। यह
केन्द्रीय भाव प्रायः टेक में रहता है और बार-बार दुहराया जाता है। इस प्रकार
प्रभाव घनीभूत होता रहता है और भाव की अन्विति भी हो जाती है।
गीति काव्य के इन लक्षणों पर नामदेव के अभंग पूरे उतरते हैं। गीति काव्य
में कवि आत्माविष्कार करता है। यही कारण है कि नामदेव की रचना आत्मलक्षी,
विषयोगत (subjective) है। अंग्रेजी के सुविख्यात निबंधकार ए० जी० गार्डिनर का
यह कथन 'It is myself portray' नामदेव की कविता पर पूरी तरह से लागू
होता है।
स्वयं नामदेव ही अपनी कविता के विषय हैं। घर के लोगो द्वारा उनकी विट्ठल
भक्ति का विरोध, मुक्ताबाई द्वारा उनकी भर्त्सना, 'तीर्थावली' में उनका और ज्ञानेश्वर
का वार्तालाप, आत्मसुख की प्राप्ति की उनकी व्याकुलता आदि अवसरों पर नामदेव
द्वारा रचित अभंग उनके भावुकता भरे हृदय के साक्षी हैं।
नामदेव का अलंकार विधान
अप्रस्तुत योजन काव्य का अभिन्न अंग है। काव्य के दो पक्ष होते हैं—भाव तथा
कला पक्ष। ये दोनो अन्योन्याश्रित हैं। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना सम्भव नहीं
है। काव्य में कलात्मकता और रमणीयता का संचार करने का समस्त श्रेय और दायित्व
अप्रस्तुत योजना पर है। कवि के लिये अप्रस्तुत योजना की शक्ति प्रकृति का बड़ा
भारी वरदान है।
नामदेव के लिए काव्य रचना एक साधन था, साध्य नहीं। फिर भी उनकी
कविता में अलंकार स्वतः सिद्ध हैं। उनकी रचनाओ में केवल उन्ही अलंकारों का बाहुल्य
है जिन की योजना, कवि की प्रतिभा अज्ञात रूप से भावो को प्रभावपूर्ण बनाने के लिए,
किया करती है। उनके काव्य में उपमा, रूपक अनुप्रासादि अलंकारों की प्रचुरता का
यही कारण है।
शब्दालंकार
अनुप्रास—अनुप्रास के कितने ही उदाहरण नामदेव की कविता में अनायास ही
मिल जाते हैं—
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २१६
(१) असुदान गजदान ऐसो दानु नित नित हि कीजे । पद ६१
इसमें 'असुदान गजदान' में 'द' तथा 'न' की तथा 'दानु नित नित ही' में 'न'
की एक एक बार आवृत्ति है ।
(२) देवा बेनु बाजे गगन गाजे । शब्द अनाहद बोने ॥ पद ६५
इस काव्य पंक्ति के प्रथमार्ध 'न' तथा 'ज' की दो बार आवृत्ति हुई है तथा
द्वितीयार्ध में 'द' की दो बार ।
उपर्युक्त दो उदाहरणों में अनेक वर्णों की एक बार और कभी दो बार समता
हो जाने से छेकानुप्रास अलंकार हो गया है ।
(३) जोगी जन न्याइ जुगे जुगि जीवै । (पद ६७)
ज कार का तालु स्थान होने से यह श्रुत्यनुप्रास है ।
श्रुत्यनुप्रास वहाँ होता है जहाँ कण्ठ, तालु आदि किसी एक ही स्थान से उच्च-
रित होने वाले वर्णों में समानता पायी जाय ।
उपमा
निम्नलिखित पद में उपमाओं की सुन्दरता देखिए—
ऐसो रामराई अंतरजामी । जैसे दरपनमहि बदन पछानी ॥
बसै घटाघट लीपन छीपै । बंधन मुकता जातु न दोपै ॥
पानी माहि देखु मुखु जेहा । नामे को सुआमी बीठलु ऐसा ॥
परमेश्वर सर्वव्यापी है परन्तु जैसे शीशे में देखने वाले को अपना मुँह प्रतिबि-
बित हुआ दिखाई देता है वैसे ही ब्रह्मज्ञानी को सर्वत्र परमेश्वर के दर्शन होते हैं । सिद्ध
अथवा ब्रह्मज्ञानी को जाति की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए । वह जाति-पाँति के बंधन
के परे होता है । जैसे जल में अपना प्रतिबिंब दीख पड़ता है वैसे ही बंधन-मुक्त को सब
प्राणियों के हृदय में परमात्मा दिखाई देता है ।
कम से कम नामदेव तो अपने स्वामी विट्ठल का दर्शन सब जगह करते हैं ।
अभेद-भक्ति की अनुभूति कितनी बढ़िया उपमाओं के द्वारा कराई गई है । संत नामदेव
जितने ऊँचे भक्त थे उतने ही ऊँचे कवि भी थे ।
नामदेव को अपने इष्टदेव के दर्शन की उत्कंठा लगी हुई है । इसे वे 'तालावेली'
शब्द से परिचित कराते हैं, जिसका अर्थ है व्याकुलता । यह ऐसी व्याकुलता है जिसमें
तीव्रता है—आतुरता है । वे कहते हैं—
मोहि लागी तालावेली
बछरे बिन गाइ अकेली
पानीआ बिनु मीनु तलफै
ऐसे नाम-रामा बिनु बापुरो नामा ॥
२२० नामदेव की हिन्दी कविता
यह तालाबेली उस प्रकार की है जिस प्रकार गाय को बछड़े के बिना होती
है और मछली को पानी के बिना होती है।
नामदेव ने उपमानो का चयन जन जीवन से किया है। इसलिए उनकी उपमाएँ
आकर्षक बन पड़ी है।
रूपक
जैसे जैसे सत नामदेव की आध्यात्मिक योग्यता बढ़ती गई वैसे ही उनकी
काव्य प्रतिभा भी प्रौढ़ होती गई। वे आध्यात्मिक रूपको से अपनी कविता को सजाने
लगे। यहाँ उनके पदो को उद्धृत करने के मोह का संवरण नही किया जाता।
बढ़िया रूपको का आस्वाद लीजिये—
मन मेरे गजू जिह्वा मेरी काती ।
मपि मपि काटउ जम की फासी ॥
कहा करउ जाती कहा करउ पाती ॥
राम को नाम जपउ दिनराती ॥
रागनि रागउ सीवनि सीवउ ॥
रामनाम बिनु घरीअ न जीवऊ ॥
भगति करउ हरि के गुन गावउ ॥
आठ पहर अपना खसम धिआवऊ ॥
सुइने की सुई रूपे का धागा ॥
नामे का चितु हरि सउ लागा ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ४।
सत नामदेव दर्जी थे अतः उन्होंने दर्जी के व्यवसाय से संबद्ध रूपक उपर्युक्त पद
में प्रयुक्त किया है। वे कहते है कि मन रूपी गज और जिह्वा रूपी कैंची की सहायता
से मैं यम की फाँस धीरे धीरे काट रहा हूँ। जाति पाँति से मुझे कोई सरोकार नहीं।
दिन रात में कपड़ा सीने तथा रंगने का व्यवसाय करता हूँ परन्तु राम नाम का स्मरण
किये बिना में एक क्षण भी नही रह सकता। मेरी सुई सोने की है तथा धागा रूपे का
है। मेरा मन हरि की ओर लगा है। नीचे के पद में एक अधिक सरस रूपक का
आस्वाद लीजिये —
लोभ लहरि अति नीझर वाजे । कइआ डूबे केसवा ॥
ससार समुद्रे तारि गोविंद । तारिले बाप बीठुला ॥
अनिल बेड़ा हऊ खेवि न साकऊ । तेरा पारु न पाइआ बीठुला ॥
होहु दइआलु सतिगुरु मेलि । तू मोकऊ पारि उतारे केसवा ॥
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २२१
नामा कहै हऊ तरि भी न जानऊ।
मोकऊ बाह देहि बाह देहि बीठुला ॥
हे प्रभो ! संसार रूपी सागर में लोभ रूपी लहरें इतनी भयावह है और उनकी
आवाज इतनी आतंकपूर्ण है कि मेरी नाव उनमें डूब जाने का भय लगता है । नामदेव
कहते हैं कि हे विट्ठल ! मैं तैरना नहीं जानता । तू मुझे बाँह दे । कितने समुचित रूपकों
द्वारा नामदेव अपना आशय व्यक्त करते हैं ।
दृष्टांत
नामदेव ने दुरूह-तम दार्शनिक तथा आध्यात्मिक अनुभूतियों को बोधगम्य
बनाने के लिए दृष्टांतों का प्रचुर मात्रा में उपयोग किया है ।
(१) ऐसे रामहि जानौ रे भाई ।
जैसे भृङ्गी कीट रहै ल्यो लाई ॥टेक॥ पद ५७
एकांतिक भक्ति किस प्रकार की जाय, यह एक दृष्टांत द्वारा समझाते हैं ।
नामदेव कहते है—'हे भाई ! जैसे भृङ्गी कीट से लौ लगाये रहती है वैसे तुम राम से
लौ लगाओ ।'
(२) ज्यूँ विषई हेरै परनारी । कोडा डारत फिरै जुआरी ॥
ज्यूँ पासा डारै पववारा । सोना घड़ता हरै सोनारा ॥ पद ५८
ईश्वर भक्ति में चित्त किस तरह एकाग्र हो, यह बात नामदेव दृष्टांतों द्वारा
समझाते हैं ।
जैसे कोई कामात्त परस्त्री की ओर देखता है, जैसे कोई जुआरी बड़े शोक से
पांसा डालता है, जैसे सुनार सोने का जेवर बनाते समय उसमें से थोड़ा-सा सोना
उड़ा लेता है, उसी प्रकार हमारा सारा ध्यान परमात्मा पर केंद्रित हो ।
नामदेव की उपमाओं की भाँति उनके दृष्टांत भी जन-जीवन से संगृहीत हैं ।
ये दृष्टांत व्यापार-साम्य और गुण-साम्य संपन्न होने के कारण प्रभावशाली और रोचक
बन गये हैं ।
विभावना
विभावना में कारणान्तर की कल्पना की जाती है । गगन-मण्डल (मस्तक) के
सहस्राधार में प्राणों के पहुँचने पर अनहद-नाद का और अमृत के झरने का कैसा
अनुभव होता है, इसे विभावना द्वारा समझाते हैं—
"अणमड़िया मंदलु बाजै
बिनु सावन घनेहरू गाजै
बादल बिनु बरखा होई ।" —सं०ना० हिं० प०, पद १५४ ।
२२२ नामदेव की हिन्दी कविता
बिना मढा मृदंग बजता है, बिना सावन के, बिना बादल के वर्षा होती है।
सचमुच नामदेव के अलंकार अनुभूति को रूप देने के लिए हैं—हृदयंगम कराने
के लिए हैं : इनमें कही चमत्कारिता नही है ।
उदाहरण
काल हमारे सुख का कभी भी अंत कर सकता है। मछली पानी में रहती है।
वह समझती है कि वह सुरक्षित और सुखी है, परन्तु अचानक जाल रूपी काल में फँस
जाती है। उसका सुख तिरोहित हो जाता है । इसे 'उदाहरण' से स्पष्ट करते हैं—
जैसे मीनु पानी में रहे
काल जाल को सुधि नही लहै ।
—पञ्जाबातील नामदेव
मधुमक्खी मधु का संचय करती है, क्या वह उसका उपभोग ले पाती है ?
गाय अपने बछड़े के लिए दूध का संचय करती है, पर क्या वह उसके बच्चे को मिल
पाता है ? अहीर गला बाँधकर उसे दुह लेता है :—
जिउ मधुमाखी संचै अपार
मधु लीनो मुखि दीनी छारु ।
गउ बाछरुऊ संचै खीरु
गला बांधि दुहि लैहि अहीरु ।
—पंजाबातील नामदेव ।
इसीलिए नामदेव कहते हैं कि अपने या अपने कुटुम्बियों के लिए धन-संचय
करने में क्यो अपने जीवन को गँवाते हो ? निर्भय होकर भगवान का भजन करो।
मारवाडी को जैसे पानी प्यारा है और ऊँट को जैसे वनस्पति प्रिय है उसी
तरह मुझे मेरा विठ्ठल प्यारा है—
मारवाडि जैसे नीरु बालहा बेलि बालहा करहला ॥
—सं० ना० हि० प०, (२०२)
कितने अनुभूत और सूक्ष्म-भरे उदाहरण हैं ।
उत्प्रेक्षा
नामदेव ने अपने भावो की व्यंजना में सादृश्यमूलक अलंकारों का आश्रय
अधिक लिया है अतः उनकी रचनाओ में उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग नही के बराबर
हुआ है।
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २२३
चित्र विधान
जो काम चित्रकार अपनी तूलिका से करता है वह रेखाचित्रकार शब्दों से
करता है। नामदेव ने कुछ घटनाओं (प्रसंगों) तथा व्यक्तियों के कलापूर्ण रेखा-चित्र
अंकित किये हैं।
प्रसंग वर्णन
कृष्ण का मृत्तिका भक्षण :- कुछ गोप बालक यशोदा से कृष्ण के मृत्तिका
भक्षण की बात कहते हैं। इसपर यशोदा उनको डांटती है। श्रीकृष्ण के खुले मुंह में
जब वह ब्रह्मांड का दर्शन करती है तब आश्चर्यचकित हो जाती है। १
इसके अतिरिक्त "तीर्थयात्रा' के दिनों में नामदेव का अपनी भक्ति के जोरपर
सूखे कुएँ में से पानी निकालना, ज्ञानेश्वर की समाधि, नामदेव का भक्ति गर्व परिहार
आदि प्रसंगों का नामदेव ने कलापूर्ण अंकन किया है।
व्यक्ति चित्र
नामदेव द्वारा धनी-मानी, सगे-सम्बन्धी, धर्मभ्रष्ट, ब्राह्मण, ढोंगी साधु, संत
सज्जन आदि के अंकित चित्र बड़े ही मनोज्ञ हैं।
बगला भक्तों की आलोचना करते हुए नामदेव कहते हैं कि 'नारायण से इनका
मन नही लगता। इनसे संयम का पालन नहीं होता। तालाब में प्रवेश कर शरीर को
स्वच्छ करते है पर इनका अंतःकरण अशुद्ध ही रहता है।"२
आडंबर का भंडा फोड़ करते हैं कि 'वह गुणसागर गोपाल छल-कपट से नहीं
मिलता। गोपीचंद का टीका लगाना तथा गले में माला पहनाना दिखावा मात्र है।'
१. मुलें सांगताती। माती खातो गे श्रीपती ॥
लाकूड घेऊनि हातांत। माती खातो का पुसत ॥
भावा भुललासे खरा। कांपतसे थरथरा ॥
मुख दिये उघडोनि। दावी तेव्हा चक्रपाणी ॥
ब्रह्मांडे देखिली। नामा म्हणे वेड़ी झाली ॥
—अभंग ६६।
२. नराइन सू मन न रंजे। संजम चूके अरु ध्रत पडे।
जलहर पैसि पषाले काया। अंतरि मैल न लउ उतरे ॥
—सं० ना० हि० प०, पद १०३।
१२४ नामदेव की हिन्दी कविता
सच्ची भक्ति नही ।'१
मराठी रचनाओं में ऐसे व्यक्तियों के चित्र पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। वेष-
धारी साधु छापा तिलक लगाते हैं और भोले भाले जनों को लूटते हैं।२ वे लोगों से
कहते हैं कि वे हरि के भक्त हैं पर उनका मन घर-गृहस्थी में फँसा रहता है, उससे
विरक्त नही होता ।३
नामदेव द्वारा अंकित मुक्ताबाई का चित्र बहुत सरस बन पड़ा है।४ नामदेव
द्वारा वर्णित प्रसंग तथा उनके बनाये रेखा चित्र उनकी सरल भाषा शैली के प्रमाण हैं।
नामदेव की छंदोरचना
मराठी रचनाओं में प्रयुक्त छंद—प्राचीन मराठी का सारा साहित्य आद्य कवि
मुकुंदराज से लेकर समर्थ रामदास तक पद्यात्मक ही है। 'ओवी' तथा 'अभंग' इन संत
कवियों के प्रिय छंद रहे हैं। लयबद्धता तथा गान सुलभता मराठी के अभंग की विशेप-
ताएँ हैं। इस पर ज्ञानदेव के उत्कृष्ट अभंगों का आदर्श नामदेव के सामने था ही। अत
रचना की सुकरता की दृष्टि से कहिये अथवा अनुकरणशीलता की दृष्टि से कहिये,
नामदेव ने अभंग ही को अपनाया।
अभंग की लंबाई की कोई सीमा नही होती। इसीलिए यह अभंग (अटूट)
कहलाता है। दो से लेकर दो सौ 'चौक' भी एक अभंग में आ सकते हैं। एक अभंग के
चार चरण होते हैं और साढ़े तीन चरणों का एक 'चौक' होता है। इन चरणों में अक्षर
मात्रा और गण का कोई नियम लागू नही होता।
छंद दोष
नामदेव की रचनाओं में यत्र तत्र छंद दोष पाये जाते हैं। वे स्वीकार करते हैं
———
१ कपट मैं न मिलै गोविंद गुन सागर गोपाल ।
गोपी चंदन तिलक बनावै । कठहु लावै माल ॥ टेक ॥
—स० ना० हि० प०, पद १४२ ।
२ टिळे टोपी माला दावी । भोल्या भाविकांसी गोंवी ॥
—अभंग १८३७ ।
३ लोकापुढे सांगे आम्हो हरिभक्त । न होय विरक्त स्थिति ज्याची ।
—सकल संत गाथा, अभंग १८३६ ।
४ लहानशी मुक्ताई जैसी सणकाडी ।
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २२५
कि 'मैं बहुतश्रुत तथा ज्ञानशील नही हूँ ।'¹ अभङ्ग की रचना किस प्रकार की जाय यह
भी मैं नही जानता ।'² कारण यह है कि उन्होने छंदशास्त्र का विधिवत् अध्ययन नही
किया था । उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि काव्य के लिए तीव्र अनुभूति और
चिंतन की गहनता अपेक्षित है न कि छंद, अलंकार, शब्द शक्ति और अन्य काव्य गुण ।
हिंदी रचनाओं में प्रयुक्त छंद
नामदेव की हिंदी रचनाओ में कुछ पद हैं और कुछ साखियां ये छोटे-छोटे छंद
हैं । श्री गुरु ग्रन्थ साहब में संगृहीत नामदेव के ६१ पदों के साथ रागों के नाम
दिये गये हैं। पूना विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित 'संत नामदेव की हिंदी पदावली'
में कुछ ही पदों पर रागों के नाम दिये गये हैं, शेष पर नही । इन पदों में गउडी, चैती,
आसा, गूजरी, सोरठि, धनासरी, टोडी, तिलंगु, बिलावलु, रामकली, मारू, भैरउ,
बसंतु, सारंग, मलार, कानडा, प्रभाती आदि राग-रागनियां प्रयुक्त हैं। इस संदर्भ में
डॉ० रामचंद्र मिश्र का मत द्रष्टव्य है ।³
शैली
जैसे भाषा भावो और विचारों का वाहन है वैसे ही शैली का भी ।
क्योकि शैली भाषा के रूप में ही हमारे सम्मुख आती है । शैलीकार का एकमेव लक्ष्य
होता है अपने श्रोता, पाठक या दर्शक को प्रभावित करना । इस उद्दिष्ट की पूर्ति के
लिए शैलीकार का सारा अवधान अपनी शैली के शृंगार पर केन्द्रीभूत होता है ।
नामदेव का काव्य उत्स्फूर्त है, उसमें अनुभूति और अभिव्यक्ति में विलक्षण एक-
रूपता है । उन्होंने अपने एक अभंग⁴ में सांग रूपक के द्वारा पांडुरंग की षोडशोपचार
पूजा का चित्र अंकित किया है । उनकी अनुभूतियां अलंकृत होकर ही अभिव्यक्त होतो
१. नव्हे बहुश्रुत, नव्हे ज्ञानशील । —वही, अभंग ६२४ ।
२. अभंगाची कला नाहो मी नेणत ।
—श्री नामदेव गाथा, अभग, १३८२ ।
३. नामदेव के पदो में गृहीत राग-रागिनियां शास्त्रीय ध्रुपद शैली में गेय रही है
जिनकी दीर्घ परम्परा भारतीय संगीत शास्त्रो में विद्यमान है । इन रागो के अपने
रूप हैं, अपने गान-काल हैं और अपने रस है ।
—हिंदी पद परम्परा और तुलसीदास, पृ० ६५-६६ ।
४. देह देव्हारा पाट हृदय संपुट । मधी कृष्ण मूर्त बसविली ।
प्रेमाचे पाण्यानें प्रक्षालीन तुज । आत्मस्वरूप नि पांडुरंगा ।।
—अभंग, १८०२ ।
१५
२२६ नामदेव की हिन्दी कविता
है। उनकी शैली मानो उनके भावों तथा विचारों की भाषागत अभिव्यक्ति ही है। १
आचार्य कुन्तक ने शैली का सम्बन्ध व्यक्ति के स्वभाव से स्थापित किया है।
वे कहते हैं कि शक्तिमान और शक्ति का भेद नहीं किया जा सकता। व्यक्ति के सुकु-
मार आदि स्वभाव के अनुकूल ही उसकी शैली होती है। २
संत नामदेव एक सरल हृदय के व्यक्ति थे। उनकी भावुकता का परिचय उनकी
रचनाओं में सर्वत्र मिलता है। परमात्मा ही एक मात्र सब कुछ है, वही सब के बाहर
तथा भीतर सब कहीं व्याप्त है और उसी के प्रति एकनिष्ठ होकर रहना चाहिए। इसीको
वे अपना धर्म मानते हैं। इसी प्रकार के भावों से उनका हृदय सदा भरा रहता है और
इसी कारण वे सारे जगत् को एक उदार-चेता प्रेमी की दृष्टि से देखा करते हैं।
नामदेव ने अपना काव्य कलात्मक प्रदर्शन के लिए नहीं लिखा। उनकी रचना
का प्रधान उद्देश्य 'स्वान्तः सुखाय' के साथ ही साथ परोपकार भी था। उसमें लोक-
मंगल पर ही अधिक बल दृग्गोचर होता है। संसार के माया-जाल में फँसे हुए अज्ञ जनों
पर उनको तरस आता था। उनके उद्धार का संकल्प वे इस प्रकार घोषित करते हैं—
'कीर्तन में भक्ति का उपदेश करते हुए आनन्द विभोर होकर मैं नाचूँगा और भक्ति के
ज्ञान का दीप इस प्रकार जलाऊँगा कि पाप रूपी अंधकार नष्ट हो जाये।' ३
'मुझे पते की बात विदित हुई। अब मैं भागवत धर्म का प्रचार करूँगा।' ४
'मैं दुख से भरा हुआ यह संसार सुख-मय करूँगा। मैं संतों के साथ कीर्तन में
अपने उपदेश-परक अभंगों का गान करते समय नाचूँगा।' ५
१. All style is gesture, the gesture of the mind and of the soul.
—Style by Walter Raleigh p. 127.
२. कवि स्वभाव भेद निबंधनत्वेन काव्य प्रस्थानभेद गाहते। वक्रोक्तिजीविति,
प्रथमोन्मेष।
३. नाचूँ कीर्तनाचे रंगीं। ज्ञानदीप लावूँ जगीं।
—सकल संत गाथा, अभंग १३६२।
४. आम्हा सापडले वर्म। करुँ भागवत धर्म।
—सकल संत गाथा, अभंग १४२६।
५. अवघाचि संसार सुखाचा करीन। जरी झाला दुःखाचा दुर्धरु हा।
संत समागमी नाचेन रंगणी। तेणे जाईल निघोनी त्रिविध ताप।
—सकल संत गाथा, अभंग १५०१।
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २२७
संसारी जनों को चेतावनी
नामदेव ने अपना काव्य कलात्मक प्रदर्शन के लिए नही लिखा। उनका प्रमुख
उद्देश्य था सामाजिक प्रबोधन अथवा जागरण। लोक मंगल की भावना ही इसकी प्रेरक
रही है।
किसी वस्तु अथवा व्यक्ति से सचेत अथवा सतर्क रहने का आदेश या उपदेश
चेतावनी है। नामदेव के काव्य में ऐसी चेतावनियां प्रचुर मात्रा में मिलती हैं। नामदेव
अपनी अनुभूति के आधार पर कहते हैं—'हे जीव ! तू जाग, तू अपना रास्ता भूल गया
है। हे अज्ञानी ! यह औघट घाट है और तुझे दूर जाना है।'१
'हे मेरे मन ! तू गोविंद के चरणों से लो लगा। हरि को छोड़ अन्यत्र न जा।
बलिराजा के समान श्रेष्ठ राजा भी चार युग तक न जिये। 'मेरा मेरा' कहनेवाले अंत
में संसार को छोड़कर चले गये।'२
'हे नर ! मनुष्य जन्म पाकर भी तू सचेत नही होता। काल का पंजा सदैव
तेरे सिर पर है!'३
'नामस्मरण कर मैं भव सागर पार हुआ। हरिभजन के बिना तू आवागौन के
फेर से मुक्त न होगा।'४
उनकी कथन शैली की विशेषता उनके छल-हीन हृदय, निद्वंद्व जीवन एवं
आध्यात्मिक उल्लास द्वारा अनुप्राणित है और वह बिना सुझाये ही विदित हो जाती है।
ईश्वरोन्मुख होने के लिए नामदेव ने कतिपय प्रेरणाएँ दी हैं जिनके द्वारा कोई भी
व्यक्ति भगवद्भक्त हो सकता है।
१. जागि रे जीव कहा भुलाना। आगे पीछे जाना ही जाना॥
भगत नामदेव चेति अयाना। औघट घाट अरु दूरि पयोना॥
—पद १२२।
२. मन मंझा तू गोविंद चरन चित लाइ रे।
हरि तजि अनत न जाइ रे॥ टेक॥
—१०५।
३. मनिषा जनम आई र्नहि चेता। अंधे पसु गंवांरा।
तेरे सिर काल सदा सर साधै। नामदेव करत पुकारा रे नर॥
—पद ६२।
४. नामदेव उतरयो पार। चेतहु रे चेतनहार।
हरि की भगति बिन। औतरोगे बारंबार॥
—पद ६८।