सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
१८ नामदेव की हिन्दी कविता
उसकी काय परिणति पर वैज्ञानिको ने जो खोज की है, वह निश्चित रूप से इस दिशा
की ओर संकेत करती है कि सृष्टि अकस्मात् उत्पन्न नही हुई । उसके पीछे एक महान्
शक्ति कार्य कर रही है । और जगत् के सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदि समस्त ग्रह और उपग्रह
ऐसे आकर्षण संबंध में परस्पर सबद्ध हैं, उनकी दूरी, गति एव परिमाण ऐसे निश्चित
और नपे तुले हैं१ और एक दूसरे के सहायक बने हुए वे ऐसे सुरक्षित और सुदृढ हैं कि
उनके इन व्यापारों के पीछे एक अनन्त चेतन सत्ता की विद्यमानता का बरबस अनुभव
होने लगता है ।२
जो विधान इस सृष्टि मे पाया जाता है वही उसकी स्थिति के लिए आवश्यक
है । इस विधान का विधाता कौन है ?३
इस विधान का प्रसार यहाँ किसने किया ?
भूगर्भ विद्या, खगोल विद्या, शरीर विज्ञान, जीव विज्ञान आदि सभी शास्त्र अपने
क्षेत्र में कार्य करने वाले नियमो की ओर स्पष्ट संकेत कर रहे हैं । इस समय विज्ञान की
कोई भी ऐसी शाखा नही है, जो विश्व के किसी भी विभाग को नियम नियंत्रण विहीन
घोषित करती हो ।
प्रसिद्ध दार्शनिक प्रिंगल पटिसन के इस कथन४ की वास्तविकता विज्ञान के सभी
१ यो अन्तरिक्षे रजसो विमान । यजु ३२ ६ ( जिसने अन्तरिक्ष में लोको
को नाप तोल कर रखा है । )
२ फ्लिंट ने अपने ग्रन्थ ‘Theism’ के पृष्ठ १३८ पर इसी प्रकार के विचार
प्रकट किये हैं Each orb is affecting the other Each is
doing what, if unchecked would destroy itself and the en-
tire system, but so wonderously is the whole constructed
that these seemingly dangerous disturbances are the very
means of preventing destruction and securing the unive sal
welfare
३ Pringle Pattison अपने ग्रन्थ ‘The Idea of God’ के पृ० १५ पर
लिखते हैं—There is an eternal, inherent principle of order
in the world which proves an omnipotent mind All the
sciences almost lead us to acknowledge a first intelligent
author
४ ‘विश्व के समग्र रूप को एक साथ लेकर अथवा उसके किसी एक अंश पर
ध्यानपूर्वक विचार कीजिये तो वह एक बृहत् यन्त्र प्रतीत होगा, जिसके भीतर
अपरिमित छोटे छोटे यन्त्र हैं । इन छोटे छोटे यन्त्रों के भीतर पुनः अनेक
हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि १६
क्षेत्रों की खोजों से सिद्ध हो रहा है।
पृथ्वी मंडल पर जो जीवन पाया जाता है वह आकस्मिक नहीं है। उसका एक
विशिष्ट उद्देश्य है। पार्थिव वनस्पतियाँ सूर्य से आती हुई प्राण-शक्ति को लेकर अपने
सरल अणुओं (molecules) को विविध अणुओं में परिणत कर देती हैं। वृक्षों से भरे
हुए जंगल पृथ्वी की उर्वरा शक्ति को मरुस्थल के आक्रमणों से सुरक्षित रखते हैं। वे
मिट्टी को वर्षा की बाढ़ में वह जाने से भी रोकते हैं। संस्कृत में जल को जीवन कहा
गया है। आधुनिक वैज्ञानिक भी जल के तत्त्वों का विश्लेषण करके इसी परिणाम पर
पहुँचे हैं। कैनेथ वॉकर ने¹ हेंड्रेल का मत उद्धृत करते हुए लिखा है कि जल में
जिस अनुपात से जीवन को सुरक्षित रखनेवाले तत्त्व मिश्रित हैं उनसे बढ़कर हमारे
वातावरण में और कुछ हो नहीं सकता। इस सम्बन्ध में जल के स्थान को और कोई
द्रव्य नहीं ले सकता। जीवन और जीवन संबंधी साधनों का यह विशाल कारखाना
किसकी देखरेख में चल रहा है ?
इस जीवन का भी जीवन निःसंदेह एक मूल महा जीवन है, जिसने तक्षा के
रूप में विभिन्न मूर्तियों के नाना रूप सांचे तैयार किये हैं। वृक्षों के पत्तों और फूलों के
रंगों में उसकी अद्भुत कारीगरी प्रकट हो रही है। पक्षियों के कलरव में वह संगीतकार
लघुतर एवं लघुतम यंत्र विद्यमान हैं जो मानव की खोज शक्ति तथा व्याख्या-
शक्ति की सीमा में आज तक आबद्ध नहीं हो सके। ये विभिन्न यंत्र अपने
समस्त अंशों के साथ ऐसे घनिष्ठ रूप में संयुक्त हैं कि सभी विचारशील
मानव उसकी प्रशंसा करते हैं। प्राकृतिक जगत् में साधन और साध्य का
संबंध सर्वत्र वैसा ही है जैसा मानवीय बुद्धि की कृतियों में दृष्टिगोचर होता
है, अथवा यह कहना युक्तिसंगत होगा कि वह इससे कही अधिक बढ़कर
है। जब कार्यों में समता है, तो कारणों में भी समता होनी ही चाहिए।
अतः मानव-मस्तिष्क की ही भाँति, प्रकृति के महान् कार्य जगत् का रचयिता
एक ऐसा महान् मस्तिष्क होना चाहिए, जिसमें महत् कार्य की अपेक्षा महत्
शक्तियाँ भी विद्यमान हों।'
'The Idea of God' p. 9, 10
—Pringle Pattison.
- The various properties of water are uniquely suitable for
the support of life No other substance could substitute
water in an environment like ours,
—'Meaning and Purpose' p. 102
बना बैठा है। जीवन रसायनी बनकर वह फलों में रस, मसालों में स्वाद और फूलों में
गंध उत्पन्न करता है। जल और कार्बन के पृथक्-पृथक् अनुपात से लकड़ी और शक्कर
भी उसी ने तैयार की है और इस प्रक्रिया द्वारा ओषजन उत्पन्न किया है जो पशुओं का
जीवन है। प्रोटोप्लाज्म की एक अदृश्य बूंद सूर्य से प्राण शक्ति पाकर समस्त जीवन-
जगत् का कारण बनी हुई है। यह जीवन प्रकृति से उत्पन्न नहीं हुआ। फिर इस जीवन
का स्रोत कहाँ है ? हक्सले के शब्दों में इस जीवन का स्रोत जीवन ही है। जीवन किसी
संगठन का परिणाम नही, प्रत्युत उसका कारण है।¹
विज्ञान के अनुसंधान जब स्वयं वैज्ञानिक को सोचने का अवसर देते हैं और
उसके मस्तिष्क पर अपना प्रभाव डालते हैं तो वैज्ञानिक की स्थिति दार्शनिक की-सी
हो जाती है। जब वह देखता है कि सृष्टि में पाया जाने वाला पूर्ण क्रम इसके पूर्व
पूर्णतया अस्त-व्यस्त (Chaotic) सामग्री को अनंत व्यक्तियों या इकाइयों के ढाँचे में
ढालने वाले व्यक्तिकरण (Individuation) के रूप में था तो वह यह सोचता है कि
क्या यह सब अपने आप हो रहा था ?
दूसरी ओर वह बालमनोविज्ञान, जो स्वतः अब एक प्राकृतिक विज्ञान माना
जाने लगा है, के आधार पर बालक के इंद्रिय संवेदन (Sensation), भेदीकरण
(Differentiation) और पदार्थ बोध (Perception) के क्रम में, सृष्टि के उसी क्रम
को देखता है और यहाँ उस चेतना संपन्न बालक की सहायता करने वाले अन्य चेतन
मानवों को देखता है, तो सृष्टि को क्रम को पूर्णता पर पहुँचाने वाली एक महा चेतन
सत्ता की ओर स्वभावतः उसकी कल्पना चली जाती है।
हम स्वयं अपने सामने मिट्टी के ढेर में से पानी तथा कुछ यंत्रों की सहायता
से मानव को ईंटें बनाते और उन ईंटों से महल बनाते देखते हैं। इस निर्माण में भी
फैली हुई सामग्री, सामग्री का व्यक्तिकरण और व्यक्तिकरण से व्यवस्था की ओर चलने
में एक निश्चित क्रम पाया जाता है और उस क्रम के मूल में एक चेतन सत्ता का हाथ
दिखाई देता है। सर जेम्स जोन्स ने इसे चेतना (Thought) और आइन्सटीन ने इसे
बुद्धि (Intelligence) या (Rationality) नाम दिया है।
सृष्टि विभिन्नरूपा होकर भी एक है। अंग्रेजी में इसका नाम ही Universe
है, जिसे हिंदी में एकात्म काव्य कहा जा सकता है। वेद तो इसे देव का काव्य कहता
ही है। काव्य की संगीतात्मक, भावात्मक एवं कल्पनात्मक, एकता उसके जनक चेतन
तत्व की एकरूपता को प्रकट करती है। इसी प्रकार सृष्टि का काव्यत्व (Harmony)
उसके एक स्रष्टा होने का संकेत देता है, जो चेतन है।
बाहर सृष्टि के विभिन्न अवयव मिलकर एक दूसरे को आकर्षित करने तथा
- Life is the cause and not the consequence of organism.
हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि २१
एक नियम में आबद्ध होने के कारण एक हैं। उनकी यह नियमबद्धता ही इस एकता
की निर्देशिका है।¹
इसी प्रकार भीतर भावना, कल्पना और चेतना की एकता है। नियमों की
यह एक प्रकारता पुनः एक नियम है। इस नियम का एक नियामक है। अतः अन्तः
तथा बाह्य चाहे जिस दृष्टि से देखें, यह विविध रूप जीवन और जगत् एक चेतन
नियामक का ही कार्य प्रतीत होता है।
इसी सर्वोपरि चेतन नियामक तत्त्व को ईश्वर कहते हैं। मानव स्वयं इस
सत्ता का अनुभव अपने में करता है।
ईश्वर का विचार मानव की प्रातिभ शक्ति, कल्पना की उपज है, ऐसा भी कहा
जाता है। इसी कल्पना शक्ति द्वारा वह अदृश्य शक्तियों का भी अनुमान किया करता
है। कल्पना शक्ति का क्षेत्र असीम है। मानवी कल्पना की पूर्णता आध्यात्मिक सत्यता
में परिणत हो जाती है। इसी से वह जहाँ योजना, क्रम तथा उद्देश्य की एकता पाता है
वहीं वह उस महान् सत्य ईश्वर के दर्शन करने लगता है। जैसा लिखा जा चुका है,
उसे यह एकता बाहर भी दिखाई देती है और अपने भीतर भी। अतः वह बाहर से
हटकर उस महान् सत्ता का अनुभव अपने हृदय की गुहा में, अपने समीप ही वरनो
सधस्थता में² ही करने लगता है।
संत एवं भक्त कवि तभी तो कहते रहे हैं :
'स्वामी जू मेरे पास हो, केहि विनय सुनाऊँ ?'
अभी तक हमने वैज्ञानिक दृष्टि से इस परम तत्त्व के संबंध में संक्षेप में विचार
किया। विज्ञान के विविध अंगों का दर्शनशास्त्र में विलय हो जाता है। अतः दर्शन-
- Every particle of matter in the universe attracts, to some
extent, every other particle. There is thus presented to the
mind a sublime picture of the inter-relatedness of all things.
All things are subject to law and the universe is in this
respect a unit.
P. W. Brigman
-'Reflections of a Physicist' P. 82.
२. अवयन्त्स्वे सधस्थे देवाना दुर्मतीरीक्षे राजन्नपद्विषः सेध मीढवो अपस्रिधः
सेध । —ऋग्वेद ८।७६।६
(हे परम प्रकाशमय प्रभु ! तुम यही मेरे भीतर मेरे साथ बैठे हो। अतः
जैसे ही देवों की दुर्मतियों को देखो वैसे ही हे अमृत सिंचक ! इन दुर्मतियों
को दूर कर इन द्वेषों और हिंसा वृत्तियों को नष्ट कर दो।)
२२ नामदेव की हिन्दी कविता
शास्त्र की खोज इस परमतत्व के संबंध में कहाँ तक पहुँची है, उसे भी देखना चाहिए।
वैज्ञानिक यदि प्राकृतिक दृश्यों और घटनाओं का उद्घाटन करता है तो दार्श-
निक इस उद्घाटन का संश्लेषण विश्लेषण करता हुआ, प्रकृति के पर्दे को चीर कर उस
सत्ता को साक्षात् कर लेना चाहता है, जो प्रकृति की पल-पल की नवीनरूपता एवं
स्थिरता के मूल में विद्यमान है।¹
प्रकृति परिवर्तनशील है। उसमें नित्य नये परिवर्तन होते रहते हैं। सूर्य चंद्रादि
भी अपनी उत्पत्ति और विनाश की कहानी साथ लिए हुए हैं। दार्शनिक उत्पादक को
ही संहारकर्ता के रूप में भी देखता है और कहता है : 'ये दृश्य, ये खिलौने उसी
खिलाड़ी के हाथ मे हैं। वह लीलामय इनके द्वारा अपनी लीला दिखाता है और फिर
उन्हें बंद कर देता है।'² यह विश्व उसी कलाकार की कला है और उसी के स्वभाव
की अभिव्यक्ति है।
भारत के प्रसिद्ध दार्शनिक बादरायण व्यास ने 'ब्रह्म सूत्र' के प्रारंभ में ही ब्रह्म
की जिज्ञासा करते हुए लिखा :
'जन्माद्यस्य यतः'
जो विश्व के जन्म, स्थिति और संहार का कारण है वह ब्रह्म है। यह ब्रह्म
परिवर्तनशीलों में अपरिवर्तनीय, अनित्यों में नित्य, मर्त्यो में अमर्त्य और अंतिम सत्य है।
प्रकृति के रूप विभक्त हो सकते हैं परन्तु यह अविभाज्य, एक रस शाश्वत सत्ता है।
भारतीय दर्शनों में सांख्य, बौद्ध तथा चार्वाक या बार्हस्पत्य दर्शन निरीश्वरवादी
कहलाते हैं। शेष सभी दर्शनों में ईश्वर के अस्तित्व का प्रतिपादन हुआ है। कपिल
अपने सांख्य दर्शन ५-४७ में वेदों का अपौरुषेयत्व तथा ६-३४ और ५-५१ में वेदों का
स्वतः प्रामाण्य स्वीकार करते हैं परन्तु ईश्वर के संबंध में उनका मत है कि वह प्रमाणों
द्वारा सिद्ध नहीं हो सकता। उसकी सिद्धि में प्रमाणों का अभाव है।
- Philosophy is not knowledge of the world, but knowledge
of the not-worldly, not knowledge of external mass, of the
empirical existence, but knowledge of what is eternal, what
is God and what flows from His nature.
—Constructive Basis for Theology p. 191-192.
James Ten Brooke - Our world is God's handiwork and a real expression of
His nature.
—Religion and Biology p. 98.
अर्नैस्ट ई० अनविन
हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि २३
'ईश्वरासिद्धेः ।' १-९२ (सांख्य दर्शन) तथा
'प्रमाणाभावान्न तत्सिद्धिः ।' ५-१० (सांख्य दर्शन)
महर्षि गौतम ने न्याय दर्शन, चतुर्थ अध्याय के प्रथम आह्निक में
'ईश्वरः कारणं पुरुष कर्मा फल्यदर्शनात्' सूत्र द्वारा ईश्वर को समस्त प्रपंच के आदि
कारण तथा जीवों के कर्मफल-प्रदाता के रूप में स्वीकार किया है।
नैयायिकों का ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरूप है। उसमें अधर्म, मिथ्या, ज्ञान और
प्रमाद नहीं है। वह रचना करने में सर्व शक्तिमान् है। वह आप्त-कर्म-फल है। जैसे
पिता पुत्र के लिये कार्य करता है उसी प्रकार ईश्वर जीवों के उद्धार के लिये जगत् की
रचना करता है।
जैसे खिचड़ी अपने आप नहीं पक जाती उसे कोई पकाता है वैसे ही वैदिक
विधान अपने आप नहीं बन गये। उनका बनाने वाला चेतन ईश्वर है। वेद को किसी
पुरुष ने नहीं बनाया। अतः ये अपौरुषेय हैं। वे सर्वज्ञ ईश्वर की कृति हैं।
वेदों में अभौतिक दैवी तत्त्वों के उल्लेख तथा सर्वज्ञशास्त लोकोत्तर सिद्धान्त
साधारण जीवों के ज्ञान के विषय (परिणाम) नहीं हो सकते। ज्ञान का जो तारतम्य
यहाँ दृष्टिगोचर होता है, वह भी अपनी पूर्णता के लिये ईश्वर जैसी सर्वज्ञ सत्ता की
ओर संकेत करता है। पातंजल सूत्र—"तत्र निरतिशयं सर्वज्ञ बीजं" १-१६ इसी तथ्य
को प्रकाशित करता है। पुरुष और प्रकृति का संयोग तथा वियोग ईश्वर ही
कराता है।१
वैशेषिक दर्शन 'तद् वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' १-१-३ सूत्र में 'आम्नाय'
अर्थात् वेद को ईश्वर का वचन मानकर ईश्वर को ज्ञान का स्रोत स्वीकार करता है।
पूर्व मीमांसा तथा उत्तर मीमांसा (वेदान्त अथवा ब्रह्म सूत्र) क्रमशः धर्म और
ईश्वर की व्याख्या से सम्बन्ध रखते हैं।
इस प्रकार दर्शन और विज्ञान दोनों ने, हमें उस पुरुष विशेष ईश्वर तक पहुँचाने
का प्रयत्न किया है। पर वे उस परम तत्त्व की झलक मात्र देखने और दिखाने में
समर्थ हुए हैं। उसका संपूर्ण स्वरूप विवेचना, आलोचना, मीमांसा, मति, मनोषा, बुद्धि
आदि सब शक्तियों से ऊपर और अग्राह्य है। उस महा चेतन सत्ता की अनंत क्षमता का
पार न आज तक कोई पा सका है और न भविष्य में पा सकेगा।२
- Dr. Radhakrishnan : 'Indian Philosophy' Vol. II
-(Ed. 1951) pp. 169-172. - 'But who ever has undergone the intense experience of
successful advances made in the domain of science, is
२४ नामदेव की हिन्दी कविता
मानव ज्यो ज्यो वैज्ञानिक क्षेत्र की सफल खोजो की प्रगति में प्रवेश करता जाता
है त्यो त्यो वह सृष्टि मे अभिव्यक्त बुद्धिवादिता को पहचान कर अपनी व्यक्तिगत क्षुद्र
आशाओ और अभिलाषाओ से भी ऊपर उठ जाता है और सृष्टि के रूप में मूर्तिमान
बुद्धि की महत्ता के सामने उसका सिर भक्ति भाव से झुक जाता है । यह बुद्धि अपने
गम्भीरतम स्वरूप में मानव की पहुँच से परे है । सर आइनस्टाइन बुद्धि का नाम लेकर
ईश्वर की सत्ता का विरोध नही करते । वे लिखते है कि प्रभु का सर्वशक्तिमान्, न्यायी
और दयालु रूप मानव को आश्वासन, साहाय्य और पथ प्रदर्शन प्रदान करता है । १
ब्रह्म का स्वरूप
आचार्यों ने ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप का निर्णय करने के लिए दो प्रकार के
लक्षणो को स्वीकार किया है ।
(१) स्वरूप लक्षण (२) तटस्थ लक्षण
'स्वरूप' लक्षण पदार्थ के सत्य, तात्विक रूप का परिचय देता है परन्तु 'तटस्थ'
लक्षण कुछ देर के लिए होने वाले आगन्तुक गुणों का ही निर्देश करता है ।
लौकिक उदाहरण से इसको देखिये । कोई ब्राह्मण किसी नाटक में एक क्षत्रिय
नरेश की भूमिका ग्रहण कर रंगमंच पर आता है जहाँ वह शत्रुओं को परास्त कर अपनी
विजय वैजयंती फहराता है और अनेक शोभन कृत्यों को कर प्रजा का अनुरंजन करता
moved by profound reverence for the rationality made
manifest in existence By way of the understanding, he
achieves a far reaching emancipation from the shackles of
personal hopes and desires and thereby attains the humble
attitude of mind towards the grandeur of reason incarnate
in existence and which in its profoundest depths, is inacce-
ssible to man'
—'Out of my Later Years' p. 29
— आइनस्टीन
1 'The idea of the existence of an omnipotent, just and omni-
beneficent personal God, is able to accord man solace,
help and guidance'
—'Out of my Later Years' p. 27.
—आइनस्टाइन
हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि २५
हैं। परन्तु इस ब्राह्मण के सत्य स्वरूप के निर्णय करने के लिए उसे राजा बतलाना
क्या उचित है ? राजा वह अवश्य है परन्तु कब तक ? जब तक नाटक का व्यापार
चलता रहता है। नाटक समाप्त होते ही वह अपने विशुद्ध रूप में आ जाता है। अतः
उस पुरुष को क्षत्रिय राजा मानना 'तटस्थ' लक्षण हुआ तथा ब्राह्मण बतलाना 'स्वरूप'
लक्षण हुआ।
सगुण ब्रह्म
ब्रह्म जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा लय का कारण है। आगन्तुक गुणों के
समावेश के कारण यह उसका 'तटस्थ' लक्षण है। "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय
उपनिषद् २-१-१) तथा 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (बृहद् उपनिषद् ३।९।२८) ब्रह्म के स्वरूप
के प्रतिपादक लक्षण हैं।
वह सत् (सत्ता) चित् (ज्ञान) और आनन्द (सच्चिदानन्द) रूप है। यही ब्रह्म
का स्वरूप लक्षण है। परन्तु यही ब्रह्म मायावच्छिन्न होने पर सगुण ब्रह्म, अपर ब्रह्म
या ईश्वर कहलाता है जो इस जगत् की स्थिति, उत्पत्ति तथा लय का कारण होता
है। ब्रह्म के दो रूप होते हैं। सगुण तथा निर्गुण। दोनों एक ही हैं परन्तु दृष्टिकोण की
भिन्नता से दो रूपों में गृहीत किये जाते हैं।
जिस प्रकार संसार के पदार्थ असत्य और काल्पनिक हैं उसी प्रकार जीव भी
अविद्या के ऊपर आश्रित रहता है। 'ब्रह्म ही एक मात्र सत्ता है।' इस ज्ञान के अभाव
में ही जीव की सत्ता है। जीव उपासना के लिए ईश्वर की कल्पना करता है। ईश्वर
जगत् का स्वामी तथा नियंता है। इसी लिए जीव उसकी उपासना करता है और उसे
दया, दाक्षिण्य, अगाध करुणा आदि गुणों से मण्डित मानता है। यही है सगुण ब्रह्म या
ईश्वर। इस प्रकार सगुण ब्रह्म की कल्पना उपासना के निमित्त व्यावहारिक दृष्टि से
की गई है।
पांचरात्र या भागवत मत के अनुसार ब्रह्म अद्वैत, अनादि, अक्षत, निर्विकार,
निरवद्य, अन्तर्यामी, सर्वव्यापक, असीम तथा आनन्दस्वरूप है।
सब द्वन्द्वों से विनिर्मुक्त, सब उपाधियों से विवर्जित, सब कारणों का, षड्गुण रूप
परब्रह्म निर्गुण और सगुण दोनों है।
अप्राकृत गुणों से हीन होने के कारण वह निर्गुण है तथा षड्गुण युक्त होने के
कारण वही परब्रह्म 'भगवान्' कहा जाता है। इसी कारण वह सगुण है।
शंकराचार्य ने पांचरात्र के उपर्युक्त मत का खण्डन किया है और इसे अवैदिक
बताया है। परन्तु रामानुजाचार्य ने उसे वेद-विदित सिद्ध कर बादरायण के ब्रह्म-सूत्रों
२६ नामदेव की हिन्दी कविता
की व्याख्या 'श्री भाष्य' में उसे प्रामाणिक कहा है। इसी मत के आधार पर मध्य युग में
वैष्णव भक्ति मार्ग का प्रचार और भगवान् के विभवावतारों की लीलाओं का वर्णन-
कीर्तन किया गया है। भक्ति के अनेक सम्प्रदाय स्थापित हुए, जिनमें भगवान् के सगुण
रूप पर ही बल दिया गया क्योंकि वही पूजा, उपासना, आराधना और ध्यान का सहज
विषय हो सकता है।
इसके विपरीत मध्ययुग में ही निर्गुण उपासना के प्रचारक संत हुए हैं। कबीर,
रैदास, दादू आदि निर्गुण उपासक सन्तों ने ब्रह्म की सगुणता तथा उसके व्यूह, अवतार
तथा मूर्तियों का खण्डन किया है। कभी कभी इस निर्गुणोपासना को तत्कालीन विदेशी
प्रभाव का परिणाम कह दिया जाता है और सगुणोपासना को ही शुद्ध भारतीय भक्ति-
पद्धति घोषित किया जाता है परन्तु वास्तव में निर्गुणवाद उपनिषद् के ब्रह्मवाद से भिन्न
नहीं है। भारतीय उपासना पद्धति में निर्गुणवाद ही कदाचित् प्राचीनतर है। निर्गुण
और सगुण में जो विरोध समझ लिया जाता है वह दोनों के उपर्युक्त सूक्ष्म अन्तर से
भिन्न है।
भक्तिकालीन सगुणोपासक कवियों ने भी निर्गुण की अस्वीकृति नहीं की, प्रत्युत
भक्ति-साधना के लिए उसकी अव्यावहारिकता प्रमाणित की है। गीता की तरह सूरदास
ने 'सूरसागर' के प्रारम्भ में ही अव्यक्त की गति को अनिर्वचनीय कहकर यह निश्चय प्रकट
किया है कि रूप-रेखा-गुण-जाति-युक्ति से रहित अव्यक्त का स्वाद गूँगे के गुड़ के समान
है। अतः मैं सगुण लीला के पद गा रहा हूँ। (पद २)
तुलसीदास ने निर्गुण और सगुण में बराबर अभेद का सिद्धान्त स्वीकार किया
है, परन्तु उन्हें अन्तर्यामी राम की अपेक्षा बहिर्गामी राम ही अधिक अच्छे लगते हैं,
क्योंकि उन्हीं की कृपा का वे प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं। सगुण रूप सुगम है, क्योंकि-
वह इन्द्रियों द्वारा जाना जा सकता है। परन्तु विचार करने पर सगुण रूप ही समझना
अधिक कठिन प्रतीत होता है।
निर्गुण ब्रह्म
'निर्गुण' शब्द अपने पारिभाषिक रूप में सत्त्वादि गुणों से रहित या उनसे परे
समझी आने वाली किसी ऐसी अनिर्वचनीय सत्ता का बोधक है, जिसे बहुधा परम तत्त्व,
परमात्मा अथवा ब्रह्म जैसी संज्ञाओं द्वारा अभिहित किया जाता है।
पारमार्थिक दृष्टि से ब्रह्म निर्गुण है। उस पर जीव या जगत् का कोई भी गुण
आरोपित नहीं किया जा सकता। शंकराचार्य ने श्रुति वचनों के आधार पर प्रमाणित
किया है कि दिक् काल से अमर्यादित, अमृत, अनादि, स्वतन्त्र, अखण्ड, सर्वव्यापी तथा
हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि २७
निर्गुण ऐसा एकमेव तत्त्व विश्व की जड़ में है । जैसे-
'इदं सर्वं यदयमात्मा' (बृ. २-४-६)
'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' (मु. २-२-११)
'आत्मैवेदं सर्वम्' (छा. ७-२५-२)
'नेह नानास्ति किंचन' (बृ. ४-४-१९)
'निष्कलं निष्क्रियं शांतं निरवद्यं निरंजनम्' (श्वे. ६-१९)
'अस्थूलमनणु' (बृ. ३-८-८)
'निर्गुण' शब्द 'श्वेताश्वतरोपनिषद्' (६ : ११) में उस अद्वितीय 'देव'
(परमात्मा) का एक विशेषण बनकर आया है, जो सभी भूतो में अन्तर्हित है, सर्वव्यापी
है, सभी कर्मों का अधिष्ठाता है, सब का साक्षी है, सबको चेतनत्व प्रदान करने वाला
तथा निरुपाधि भी है ।
उसी की ओर संकेत करते हुए श्रीकृष्ण द्वारा 'गीता' (१३-१४) में भी कहलाया
गया है- 'उसमें सब इंद्रियों के गुणों का आभास है, पर उसके कोई भी इन्द्रिय नही है,
वह सबसे असक्त रहकर, अर्थात् अलग होकर भी सबका पालन करता है और निर्गुण
होने पर भी गुणों का उपभोग किया करता है।'
उपनिषद् ब्रह्म को 'नेति-नेति' शब्दो के द्वारा अभिहित करते हैं । इसका तात्पर्य
क्या है ? प्रत्येक विधेय उद्देश्य के क्षेत्र को सीमित करता है-यह उसका स्वभाव होता
है । 'यह लेखनी लाल है'—इस वाक्य में 'लाल' यह विधेय, उद्देश्य (लेखनी) के क्षेत्र
को वस्तुतः सीमित करता है । अर्थात् 'लाल' से पृथक् क्षेत्र में 'लेखनी' का कोई भी
सम्बन्ध नहीं माना जा सकता ।
ब्रह्म के विषय में हम किसी विधेय का प्रयोग नही कर सकते क्योकि ऐसा करने
से वह सीमित तथा परिमित बन जायेगा परन्तु वस्तुतः वह अपरिमित सत्ता है । इस
प्रकार उसमें कोई गुण नही रहता । न यह गुण वहाँ है और न वह गुण । सब गुणों के
निषेध करने से जो तत्त्व बच जाता है वही है ब्रह्म । इस प्रकार जिस ब्रह्म के विषय में
श्रुति 'नेति नेति' शब्दों का व्यवहार करती है वह ब्रह्म वस्तुतः निर्गुण ब्रह्म ही है और
यही ब्रह्म का पारमार्थिक रूप है ।
सत कबीर 'निर्गुण' शब्द का एक पर्याय 'अगुन' भी देते जान पड़ते है (क. ग्रं.
पद १८३) । वे उसके द्वारा सूचित किये जाने वाले तत्त्व को 'गुन अतीत' बतलाते है
और फिर उसे 'निर्गुण ब्रह्म' भी कहकर उसकी उपासना का उपदेश देते है (पद
३७५) । वे उसे अन्यत्र 'निर्गुण राम' की भी संज्ञा देते हैं और उसकी 'गति' को अगम्य
ठहराते है (पद ४६) तथा उसे केवल 'निर्गुण' कहकर भी उसी प्रकार अकथनीय बतलाते
(द्वैपद १८६) । परन्तु एक स्थल (पद १८४) पर वे उसके विषय में इस प्रकार भी
२८ नामदेव की हिन्दी कविता
कहते हैं— 'राजस, तामस और 'सातिग' (सात्विक) ये तीनो ही उसकी माया है तथा
वह इन तीनो से परे का 'चोथा पद' है । वह गुणातीत होने के कारण 'निगुंण' कहलाता
है, नही तो वह वस्तुत निर्विषय नही ठहराया जा सकता तथा उसे समझ लेना धोखे
की बात होगी ।
लोग उसे 'अजर' कहते हैं और 'अमर' भी बतलाते हैं किन्तु सच्ची बात तो यह
है कि वह 'अलख' होने के कारण अनिर्वचनीय है । कबीर का हरि इन सभी से विल-
क्षण है । (पद १८०) । फिर 'वह जैसा है वैसा समझ लेने में ही आनन्द है, उसे
वस्तुत न जानते हुए भी, उसका कथन करना ठीक नही ।' इसी कारण कबीर ने अपने
को उसे 'सरगुन' की अपेक्षा 'निगुंण' रूप में ही जानने वाला कहा है ।
दोनो की एकता
सगुण तथा निगुंण ब्रह्म में किसी प्रकार का भेद नहीं है । वह एक ही सत्ता है
परन्तु दृष्टिकोण की भिन्नता के कारण वह इन दोनो नामो से पुकारा जाता है । नाट्य-
शाला में रंगमंच पर दुष्यंत की भूमिका में उतरने वाला नट नाट्यशाला से बाहर आने
पर कोई दूसरा व्यक्ति नही बन जाता । वह वही मनुष्य रहता है । नाट्य की दृष्टि से
वह नट कहलाता है परन्तु पारमार्थिक दृष्टि से वह मनुष्य ही रहता है ।
ब्रह्म की भी ठीक यही दशा है । वह संसार की सृष्टि, स्थिति तथा लय करता
है । अत. संसार की अपेक्षा वह ईश्वर है परन्तु निरपेक्ष भाव से देखने पर वही ब्रह्म
है । अत. सगुण ईश्वर तथा निगुंण ब्रह्म में भेद मानना नितांत भ्रामक है । निगुंण
ब्रह्म ही वास्तविक पारमार्थिक सत्ता है परन्तु व्यवहार के लिए उपासना के निमित्त यही
सगुण ईश्वर माना जाता है । तत्त्व एक ही है । दृष्टि भिन्न भिन्न है और इसी लिए
उसके दो रूप हैं ।
एकबारगी हम अंतिम सीढी पर नही पहुँच सकते । ज्ञान के मंदिर में चढ़ने
के लिए सीढ़ियाँ हैं जिनके द्वारा ही साधक उसमें पहुँच सकता है । निगुंण ब्रह्म की
प्राप्ति अंतिम लक्ष्य है परन्तु अभ्रात ज्ञानी ही उसे पा सकता है । उसके सोपान रूप है
उपासना और इसके लिए 'ईश्वर' की महती आवश्यकता है । ईश्वर की उपासना से
सगुण पूजन से चित्त की शुद्धि होती है और तभी साधक विशुद्ध ज्ञान मार्ग का
अवलंबन कर निगुंण ब्रह्म को पा सकता है अन्यथा नही । यही उपासना का
उपयोग है ।
ब्रह्म वास्तव में निगुंण है इस विषय को गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस प्रकार
हिंदी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि २६
प्रकट किया है :—
एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदानंद परधामा ॥
'कल्याण' का श्री मानस अंक, बालकांड, पृ० ७१ ।
अगुन अखंड अनंत अनादि । जेहि चिन्तहि परमारथवादी ।
नेति नेति जेहि वेद निरूपा । चिदानन्द निरुपाधि अनूपा ॥
व्यापक अकल अनीह अज निर्गुण नाम न रूप ॥
'कल्याण' का श्री मानस अंक बालकांड पृ० ७१ ।
वही ब्रह्म निर्गुण भी है और सगुण भी । इस लिए स्थान स्थान पर ब्रह्म का
निर्गुण भावात्मक वर्णन भी पाया जा सकता है । उपनिषद् कहती है—
स पर्यगाच्छुक्रम कायम् व्रण सस्नाविर शुद्धमपापविद्धं ।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयं भूर्याथातथ्यतोऽर्थान्
व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥
—ईश. ८
गीता के अनुसार :—
सर्वेन्द्रिय गुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
आसक्त सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुण भोक्तृ च ॥ १३-१२
श्रीमद् भागवत की उक्ति है :—
सर्वं त्वमेव सगुणो विगुणश्च भूमन् ।
नान्यत् त्वदरूपि मनोवचसा निरूक्तम् ॥
—भागवत ७-६, ४८
ब्रह्म चाहे निर्गुण हो चाहे सगुण इतना तो निश्चित है कि वह सर्वव्यापी है।
जब वह सर्वव्यापी है तो वह निराकार भी होगा ही क्योंकि आकार मे एकदेशीयता आ
जाती है और जो सर्वदेशीय है वह केवल एकदेशीय नही हो सकता । इसी लिए जहाँ
ब्रह्म के रूप की चर्चा की गई है वहाँ कोई विशिष्ट आकार न बताकर उसकी विश्व-
रूपता का ही वर्णन किया गया है। सर्वान्तर्यामी के रूप का इससे बढ़िया वर्णन और
हो ही क्या सकता है। वेद कहते है :—
सहस्रशीर्षाः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्र पात् ।
सभूमिं विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशांगुलम् ॥
—ऋग्वेद का पुरुष सूक्त
३० नामदेव की हिन्दी कविता
उपनिषदों में कहा गया है—
अग्निमूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ
दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः
वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य
पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्व भूतान्तरात्मा ।
—मुण्डक २—१, ४
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतो बाहुरुत विश्वतस्पात् ।
स बाहुभ्यां धमति स पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥
—श्वेताश्वेतर ३—३
गीता में भी इसी का प्रतिपादन किया गया है—
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरो मुखं ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
—गीता १३—१३
श्रीमद्भागवत का कहना है—
एकायनऽसौ द्विफल स्त्रिमूलश्चतुरसः पंचविधः षडात्मा ।
सप्तत्वगष्टविटपो नवाक्षो दशच्छदी द्विखगो ह्यादि वृक्षः ॥
—भागवत १० पू०—२, २१
ब्रह्म की इस निराकारता अथवा विश्वरूपता को भगवद् विग्रह के व्यक्तित्व की
अपेक्षा अधिक महत्त्व देते हुए भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं :—
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥
—गीता ७—२४
एक ही ब्रह्म के दो रूपों को कैसे स्वीकार किया गया ?
ब्रह्म के संबंध में सभी संत कवियों ने अपनी रचनाओं में प्रायः एक-सा विचार
प्रकट किया है । संत, सूफी तथा भक्त आदि सभी कवियों ने ब्रह्म को निर्गुण, निराकार,
निर्लेप, अगम, अगोचर कहा है । जो सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी तथा सृष्टिकर्ता है उसी
से जड़ जगत् तथा चेतन जीव का जन्म हुआ । अंतर केवल इतना ही है कि संतों का
ब्रह्म निर्गुण ही है उसमें गुणों का समावेश हो ही नहीं सकता । वह शून्य का प्रतीक
है । राम भक्त तथा कृष्ण भक्त कवियों का ब्रह्म निर्गुण होते हुए भी सगुण रूप धारण
करता है :—
अगुनहि सगुनहि नहि कछु भेदा ।
गावहि मुनि पुरान बुध वेदा ।
हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ३१
अगुन अरूप अलख अज जोई।
भगत प्रेम वश सगुन सो होई॥
जो गुन रहित सगुन सोई कैसे?
जल हिम उपल बिलग नहि जैसे।
—बालकाण्ड, पृ० १४७ कल्याण, मानस अङ्क
सूर तथा अष्टछाप के अन्य कवियों ने कृष्ण को जो कि उनके इष्टदेव है—पूर्ण
ब्रह्म पुरुषोत्तम माना है जिनके सगुण निर्गुण दो रूप है। ब्रह्म का निर्गुण रूप अगम है
अतः सगुण का आधार आवश्यक है। सूरदासजी के इस पद में—
अविगत गति कछु कहत न आवै ।
ज्यों गूँगे मीठे फल को रस अंतरगतही भावै ।
परम स्वाद सब ही सु निरंतर अमित तोष उपजावै ।
मन बानी को अगम अगोचर सो जाने, जो पावै ।
रूप रेख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब कित धावै ।
सब विधि अगम विचारहिं ताते सूर सगुन पद गावै ॥
यहाँ निर्गुण के विचार को 'परम स्वाद' और 'अमित तोष' उत्पन्न करने वाला
स्वीकार किया गया है पर यह तोष और वह स्वाद गूँगे के गुड़ की भाँति मन में ही
आस्वाद्य और प्राप्य है। जो उसे पाता है वही जानता है औरों के लिए वह 'सब विधि
अगम' है।
—'सूर सुषमा' पृष्ठ १,
संपादक . पं० नंददुलारे वाजपेयी ।
गीता कहती है :—
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्त चेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥
जो देहवान् है उनसे अव्यक्त को उपासना कठिनाई से हो सकती है।
गो० तुलसीदास जी कहते है—
(१) अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।
—मानसांक, बालकांड, पृष्ठ ८०
(२) व्यापकु एक ब्रह्म अविनासी । सत चेतन घन आनंद रासी।
अस प्रभु हृदयँ अछत अविकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥
—मानसांक, बालकांड पृष्ठ ८०
(३) भरि लोचन विलोकि अवधेसा, तब सुनिहौं निरगुन उपदेसा।
तुलसी के राम ब्रह्म स्वरूप हैं। वे ही संसार के कर्त्ता है। यद्यपि तुलसी ने
३२ नामदेव की हिन्दी कविता
उन्हें दशरथ सुत माना है किन्तु वे साधारण, लौकिक जीव नहीं। उनके राजसिंहासन
के समय वेद उन्हीं को निर्गुण कह कर स्तुति करते हैं। वे पृथ्वी का भार हल्का करने
के लिए अवतार लेते हैं। परन्तु वस्तुत वे निराकार सच्चिदानन्द स्वरूप ही हैं।
मीरा के प्रभु हरि अविनाशी हैं किन्तु साथ ही वे सर्वगुणसम्पन्न मनोहर रूप-
धारी हैं। सिद्धांत रूप से इनके प्रभु निर्गुण ही है जो समस्त संसार में व्याप्त हैं किन्तु
व्यवहार की दृष्टि से वे ठाकुर की मूर्ति में भी विद्यमान हैं तभी तो मीरा वृन्दावन के
मंदिरों में कृष्ण के सम्मुख आत्म-विभोर होकर नृत्य करने लगती हैं। साथ ही साथ
निर्गुण होने के कारण उनका मिलना कठिन है। फिर भी वह पंचरंग चोला पहनकर
अपने प्रिय से झिरमिट में खेलने जाती है।
निर्गुण शब्द और उसके अर्थ का ऐतिहासिक विकास
श्रौत साहित्य में इस शब्द का प्रयोग कहीं नहीं मिलता है। इसका कारण
सम्भवत यह है कि उस युग में सगुण और निर्गुणमूलक साम्प्रदायिकता का उदय नहीं हो
पाया था।
निर्गुण शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम महाभारत १ और गीता में २ मिलता है।
इन दोनों ग्रन्थों में यह शब्द 'गुण रहित' के सामान्य अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
गीता और महाभारत के पश्चात् इस शब्द का प्रयोग चूलिकोपनिषद् ३ में पाया
जाता है। यहाँ पर वह निर्विशेष ब्रह्म तत्त्व के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
शंकराचार्य ने इस शब्द का प्रयोग कई बार किया है। वे उसे हृदयस्थ
यौगिक ब्रह्म से विलक्षण सत्य संकल्पादि गुणों से विनिर्मुक्त आत्म तत्त्व का वाचक
मानते थे। ४
रामानुज और उनके मतानुयायियों ने भी इस शब्द का प्रयोग किया है, किन्तु
उन लोगों ने इसका अर्थ शांकर मतावलम्बियों द्वारा किये गये अर्थ से भिन्न रूप में
निर्धारित किया है। उनकी दृष्टि में वह जरा मरण आदि त्याज्य गुणों से रहित सगुण
ब्रह्म का ही वाचक है। ५
१. महाभारत शान्ति पर्व—३६६। २१-२८
२. 'असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुण भोक्तृ च।' अध्याय १३-१४
३. 'स विशेषत्वे निर्गुणम्'—चूलिकोपनिषद। अध्याय-७ में
४. छन्दोग्योपनिषद्—'शांकर भाष्य' गीता प्रेस, ८०४-५
५. सर्व दर्शन संग्रह—संपादक: वासुदेव शास्त्री, १६५१, पूना।
(पृ० ११० पर निर्गुणवाद शब्द का प्रयोग और निर्गुण शब्द की व्याख्या)
हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ३३
रामानन्दी संप्रदाय के 'आनन्द भाष्य' मे भी लगभग ऐसा ही अर्थ किया है ।
अन्य दर्शनाचार्यों ने भी इस शब्द के अर्थ को अपनी सांप्रदायिक दृष्टि के अनुकूल बद-
लने की चेष्टा की थी ।१
नाथ संप्रदाय में इस शब्द का प्रचुर प्रयोग मिलता है ।२ वे लोग अपने
हृदयस्थ यौगिक ब्रह्म को अभिव्यंजित प्रायः इसी शब्द के माध्यम से करते थे ।
मध्यकालीन आचार्यों ओर नाथ पंथियों के द्वारा किये गये निर्गुण शब्द के
प्रयोग से मध्ययुग के कुछ संत कवि इतने अधिक प्रभावित हुए कि वे उसी को केन्द्र
बनाकर अपनी विचारधारा प्रसारित करने लगे । वे लोग अपने इष्टदेव, अपनी साधना
और अपने मत सबको निर्गुण कहते थे ।
संत बुल्ला साहव ने अपने इष्टदेव को 'निर्गुण, दयाल, दानी'३ कहा है ।
राम को वे निर्गुण शब्द का सार रूप मानते थे ।४
संतो ने अपने इष्टदेव के प्रसंग में निर्गुण शब्द का प्रयोग अधिकतर 'द्वैताद्वैत
विलक्षण परम तत्त्व रूपी हृदयस्थ यौगिक ब्रह्म' के अर्थ मे किया है । यारी साहव अपने
निर्गुण ब्रह्म को सुषुम्ना की शैया पर सोया हुआ बताते हैं, साथ ही उसे वे परमतत्त्व
रूप भी मानते है । वे लिखते हैं—
'सुखमन सेज परम तत रहिया किया निर्गुण निरंकार ।'५
संतो ने प्रायः अपनी साधना को भी निर्गुण ही कहा है । उनकी साधना का
प्रमुख अंग ध्यान है । उससे पहिले निर्गुण शब्द का प्रयोग करते हुए संत जगजीवन
साहव ने लिखा है—
'जगजीवन गुरु चरन परि के निरगुन धरि ध्यान ।'६
इस प्रकार हम देखते हैं कि मध्यकालीन संतो के एक वर्ग मे निर्गुणवाद का
१. 'आनन्द भाष्य' १।१२ मे लिखा है :
निर्गता निकृष्टा सत्वादयः प्राकृता गुणा यस्मात्तन्निर्गुणमिति
व्युत्पत्तेर्निकृष्ट गुणराहित्यमेव निर्गुणत्वम् ।
२. सिद्ध सिद्धात पद्धति—संपादिका कल्याणी बोस, पृ० ७०
'निर्गुणं च शिवं शान्तं शान्तं गगने विश्वतोमुखम् ।
भ्रूमध्ये दृष्टिमादाय ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ॥
३. बुल्ला साहव की बानी—पृ० २६
४. बुल्ला साहव की बानी—पृ० १६ 'तुम तो राम हउ निर्गुन सार'
५. संत सुधा सार खण्ड २, पृ० ७३
६. संत बानी संग्रह भाग २, पृ० १३
३
३४ नामदेव की हिन्दी कविता
बहुत अधिक प्रचार था। निर्गुण शब्द उनमें द्वैताद्वैत विलक्षण परमतत्त्व रूपी यौगिक
ब्रह्म, यौगिक साधना और वेदांतिक विचारधारा के पारिभाषिक अर्थ में रूढ़ हो
गया था।
निर्गुण काव्य
निर्गुण काव्यधारा का उदय रूढ़िवादी अंध विश्वास प्रधान धार्मिक संप्रदायो
की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था। सच्चे निर्गुणिया कवि पथ निर्माण की प्रवृत्ति को
हेय समझते थे। ये लोग अलौकिक प्रतिभासंपन्न होते थे। सैकड़ों साधु संत उनकी
प्रतिभा से प्रभावित होकर उनके शिष्य हो जाते थे।
निर्गुण संप्रदाय के अंतर्गत उन्ही संतो को लिया जाता है जिनका व्यक्तित्व
किन्ही विशेष विवृत विधि-विधानो, अंध विश्वासो और मिथ्याचारो से कलंकित नही
हुआ है। इनमें भी उन्हीं संतो के अध्ययन पर विशेष जोर दिया गया है जिनमें काव्यत्व
का स्फुरण और मधुर रहस्य-भावना का उन्मेष पाया जाता है। इस दृष्टि से निम्न-
लिखित कवि ही महत्त्वपूर्ण प्रतीत होते है—
कबीर, धर्मदास, नानक, रैदास, दादू, रज्जब, सुंदरदास, गरीबदास, यारी
साहब, बुल्ला साहब, जगजीवन साहब, गुलाल साहिब, भीखा साहब, पलटू साहब,
दरिया साहब (बिहार वाले), मलूकदास, चरनदास, दयाबाई, सहजोबाई और तुलसी
साहब।
सारग्राहिता इन संतो की प्राणभूत विशेषता थी। उन्होंने अपने समय की
समस्त प्रचलित धार्मिक एवं दार्शनिक विचारधाराओ, साधनाओ और साधु संप्रदायो के
सारभूत तत्त्वो को 'अनुभो' के द्वारा आत्मसात करके तथा उन्हे अपनी प्रतिभा के साँचे
में ढालकर एक अभिनव रूप दे दिया है, जो उनकी मौलिक देन है। वे सत्य के अनन्य
उपासक थे। उन्हे झूठ और मिथ्यात्व से घृणा थी। यही कारण है कि उन्हे जहाँ कही
भी मिथ्यात्व दिखाई पड़ा है वहाँ उन्होने उसका डटकर विरोध किया है। सत्य के
मंडन और अनृत के खंडन की उनकी यह प्रवृत्ति बहुत महत्त्वपूर्ण है।
निर्गुणिया संत निर्गुणोपासक थे। उनमे निर्गुण शब्द का प्रयोग अधिकतर
द्वैताद्वैत विलक्षण हृदयस्थ यौगिक ब्रह्म के लिए हुआ। कुछ स्थलों पर वह निर्विशेष
ब्रह्म का वाचक बनकर भी आया है। निर्गुण शब्द के इन दोनो अर्थों की दो परम्पराएँ
उन्हें पृष्ठभूमि के रूप में प्राप्त हुई थी। प्रथम अर्थ की परम्परा उन्हें नाथ पंथियो से
मिली थी। और दूसरे अर्थ की प्रेरणा का श्रेय अद्वैत वेदांतियो को है। इससे स्पष्ट है
कि उन्होंने प्रचलित साधनाओ में समन्वय स्थापित करने की भी चेष्टा की थी। यही
निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि
कारण है कि उनकी साधना में ज्ञान, भक्तियोग और वैराग्य के समन्वित रूप पर ही
विशेष बल दिया गया है।
उन्होंने एक दूसरा सबसे बड़ा कार्य प्रचलित जटिल विचारधाराओं, साधनाओं
और सांप्रदायिक आचारों के सहजीकरण का किया था। सहजीकरण की अपनी इस
प्रवृत्ति के कारण वे मध्यकालीन संतों में अलग खड़े दिखलाई पड़ते हैं। बुद्धिवादिता,
सदाचरणप्रियता, सामाजिक और आध्यात्मिक साम्यवाद, विचारात्मकता आदि उनकी
अन्य प्रमुख उल्लेखनीय प्रवृत्तियाँ हैं। उनकी इन्हीं विशेषताओं ने उन्हें एक सूत्र में बाँध
रखा है। इसी लिए उनकी परम्परा अन्य संतों की परम्पराओं से विलक्षण और निर-
पेक्ष दिखाई पड़ती है ।
सगुण काव्य में पार्थक्य
मध्ययुग में वैष्णव साधना दो रूपों में विकसित हुई थी : निर्गुण और सगुण ।
निर्गुणोपासना पद्धति शुद्ध वैष्णव नहीं रह पाई। उस पर अपने युग की समस्त साध-
नाओं और विचारधाराओं का पूरा-पूरा प्रभाव पड़ा। तंत्र मत, नाथ पंथ और निरंजन
पंथ ने उसका स्वरूप ही बदल दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि वह वैष्णव होते
हुए भी उससे बिलकुल भिन्न प्रतीत होने लगी ।
सगुण और निर्गुण धाराओं का मौलिक भेद रूपोपासना से संबंधित है ।¹
निर्गुंनियां संत हृदयस्थ द्वैताद्वैत विलक्षण अलख निरंजन निर्गुण ब्रह्म के उपा-
सक थे। उनका यह निर्गुण ब्रह्म रूप और आकार से विहीन, पुष्प की गंध से भी
सूक्ष्मतर और अनिर्वचनीय है ।²
किन्तु यह वेदांतियों के ब्रह्म के सदृश शुष्क तत्त्व मात्र नहीं है। और न बौद्धों
१. 'मध्यकालीन धर्मसाधना' डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० २३०
'दोनों में प्रधान भेद रूपोपासना के विषय में है। दूसरी श्रेणी के अर्थात् सगुण
मार्गी भक्त ठोस रूप के उपासक हैं।'
सूरदास कहते हैं—
सुंदर मुख कौ बलि बलि जाऊँ ।
लावण्य निधि, गुन निधि, शोभा निधि ॥
२. कबीर ग्रंथावली
जाके मुंह माथा नही, नाही रूप और अरूप।
पुहुप वास से पातरा, ऐसा रूप अनूप।
३६ नामदेव की हिन्दी कविता
का शून्य ही है। यह सूक्ष्मतम और अनिर्वचनीय होते हुए भी करुणामय, गरीबनिवाज
और भक्तवत्सल है।
भक्तों के भगवान की इन विशेषताओं से विशिष्ट होने पर भी यह उसे उससे
सर्वथा भिन्न है। भक्तों के भगवान 'बाहिरजामी' किन्तु इनके राम 'अंतरजामी' है।
अंतरजामी होते हुए भी वे भक्तों को दर्शन देते हैं। उनका यह रूप अनिर्वचनीय
होता है।१
यदि भक्त किसी प्रकार उसका वर्णन करने का प्रयास भी करे तो उसको कोई
समझ नहीं सकता। यदि थोड़ा बहुत समझने लगे तो उस पर उसे विश्वास नहीं
होता।२
इस प्रकार हम देखते हैं कि संतों का निर्गुण उपास्य रूपवान और अरूप होते
हुए भी दोनों से विलक्षण है। इसके विपरीत सगुणवादियों का उपास्य मानवों के बीच
में उन्हीं के रूप में प्रतिष्ठित रहता है।
मानव जीवन की संपूर्ण शक्ति, सारा सौंदर्य और समस्त शील का पूर्ण आविर्भाव
उन्हीं में मिलता है। यही कारण है कि एक का उपास्य केवल अनुभूति और साधना-
गम्य मात्र होने के कारण रहस्यपूर्ण है और दूसरे का प्रत्यक्ष होने के कारण प्रेम और
श्रद्धा का पात्र है।
भगवान का प्रथम रूप केवल बुद्धिवादी साधकों को ही आकृष्ट कर पाता है जब
कि उनका दूसरा रूप संपूर्ण सृष्टि को तन्मय और रसमग्न रखने की क्षमता रखता है।
उपास्य रूप सम्बन्धी इस अंतर ने निर्गुण और सगुण काव्य धाराओं को बिलकुल अलग
कर रखा है।
निर्गुण और सगुणवादी कवियों में स्वभावगत भेद भी दिखाई पड़ता है।
निर्गुणवादी अधिकतर क्रांतिदर्शी, सत्यान्वेषी, अक्खड़, फक्कड़ और घुमक्कड़ होते थे।
उनके व्यक्तित्व की ये विशेषताएँ उनकी रचनाओं में स्पष्ट प्रतिबिंबित मिलती हैं।
इसके विपरीत सगुणवादी कवि अधिकतर सामंजस्यवादी, रूढ़िवादी, सत्त्ववादी प्रेमी
जीव होते थे। उनके व्यक्तित्व की इन विशेषताओं ने उनकी रचनाओं को निर्गुनिया
कवियों की रचनाओं की अपेक्षा अधिक कोमल, रागरंजित और मधुर बना दिया है।
निर्गुण काव्यधारा सगुण काव्यधारा से इस दृष्टि से भी भिन्न है।
१. कबीर ग्रन्थावली पृ० १५
कबीर देखा एक अंग महिमा कही न जाई।
२. कबीर ग्रन्थावली पृ० १७
दीठा है तो कस कहू, कह्या न कोइ पतियाइ।
हिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि ३७
निर्गुण एवं सगुण कवियों में हमें रस सम्बन्धी अंतर भी दिखलाई पड़ता है।
निर्गुण काव्यधारा भक्ति, शांत और वीर इसकी वह त्रिवेणी है जिसमें अवगाहन कर
मानव जाति अपने युग-युग के कालुष्य धो सकती है।
इसके विपरीत सगुण काव्यधारा में हमें शृंगार और भक्ति के मधुमय सुहाग से
उद्भूत माधुर्य भाव रूपी शिशु की रसमयी लीलाओं का वैभव मिलता है।
एक धारा पतितपावनी है और दूसरी आनन्दविधायिनी । यही दोनों में
अंतर है।
इसके अतिरिक्त दोनों धाराओं में प्रवृत्तिगत भेद भी दिखाई पड़ता है । निर्गुण
काव्यधारा भूमि बुद्धिवादिता और विचारात्मकता है। इसके विपरीत सगुण काव्यधारा
परम भाव-प्रवण, श्रद्धामूलक और अनुभूति प्रधान है।
दोनों धाराओं में साधना और सिद्धि सम्बन्धी अंतर भी है। निर्गुण काव्यधारा
का सम्बन्ध जीवन के साधना पक्ष से है जब कि सगुण काव्यधारा में जीवन के सिद्धि
पक्ष की झाँकी सजाई गई है।
एक में उन समस्त साधनों और प्रयत्नों का उल्लेख किया गया है जिससे आनन्द
ब्रह्म की उपलब्धि हो सकती है। दूसरे में स्वयं आनन्द रूप ब्रह्म का ही वर्णन किया
गया है।
सगुण कवियों का लक्ष्य भगवान के सगुण, साकार, आनन्दमय रूप की झाँकी
का उद्घाटन करना था। इसके विपरीत निर्गुण कवियों का उद्देश्य अपने हृदयस्थ 'मुनि
मंडलवासी पुरुष' की रहस्यानुभूति करना था। सगुण एवं निर्गुण धारा के इन भेदों ने
ही एक दूसरे को परस्पर अलग कर रखा है।
निर्गुण काव्यधारा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
ऐतिहासिक स्थिति से तात्पर्य निर्गुण काव्यधारा के काल सम्बन्धी सीमा और
विस्तार के निर्णय से है। निर्गुण काव्यधारा के प्रमुख प्रवर्तक संत कबीर माने जाते
हैं, किंतु सच्ची बात यह है कि निर्गुण काव्यधारा का बीजारोपण नामदेव, जयदेव,
त्रिलोचन, सदन, बेनी, रामानन्द, धन्ना, पीपा, सेन आदि संत कबीर से पहले ही कर
चुके थे। कबीर ने उसे व्यवस्थित रूप देकर विकसित, प्रचारित और प्रसारित किया
था। भक्ति की उत्पत्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित उक्ति प्रसिद्ध है :—
भक्ति द्राविड़ उपजी लाये रामानन्द ।
परगट किया कबीर ने सप्त द्वीप नवखंड ॥
यदि इस उक्ति में कोई सार है तो निर्गुण काव्यधारा का उदय १४ वीं शताब्दी
से मानना पड़ेगा । डॉ० गोविंद त्रिगुणायत को तो यह उक्ति विशेष रूप से सारगर्भित