सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि २१
एक नियम में आबद्ध होने के कारण एक हैं। उनकी यह नियमबद्धता ही इस एकता
की निर्देशिका है।¹
इसी प्रकार भीतर भावना, कल्पना और चेतना की एकता है। नियमों की
यह एक प्रकारता पुनः एक नियम है। इस नियम का एक नियामक है। अतः अन्तः
तथा बाह्य चाहे जिस दृष्टि से देखें, यह विविध रूप जीवन और जगत् एक चेतन
नियामक का ही कार्य प्रतीत होता है।
इसी सर्वोपरि चेतन नियामक तत्त्व को ईश्वर कहते हैं। मानव स्वयं इस
सत्ता का अनुभव अपने में करता है।
ईश्वर का विचार मानव की प्रातिभ शक्ति, कल्पना की उपज है, ऐसा भी कहा
जाता है। इसी कल्पना शक्ति द्वारा वह अदृश्य शक्तियों का भी अनुमान किया करता
है। कल्पना शक्ति का क्षेत्र असीम है। मानवी कल्पना की पूर्णता आध्यात्मिक सत्यता
में परिणत हो जाती है। इसी से वह जहाँ योजना, क्रम तथा उद्देश्य की एकता पाता है
वहीं वह उस महान् सत्य ईश्वर के दर्शन करने लगता है। जैसा लिखा जा चुका है,
उसे यह एकता बाहर भी दिखाई देती है और अपने भीतर भी। अतः वह बाहर से
हटकर उस महान् सत्ता का अनुभव अपने हृदय की गुहा में, अपने समीप ही वरनो
सधस्थता में² ही करने लगता है।
संत एवं भक्त कवि तभी तो कहते रहे हैं :
'स्वामी जू मेरे पास हो, केहि विनय सुनाऊँ ?'
अभी तक हमने वैज्ञानिक दृष्टि से इस परम तत्त्व के संबंध में संक्षेप में विचार
किया। विज्ञान के विविध अंगों का दर्शनशास्त्र में विलय हो जाता है। अतः दर्शन-
- Every particle of matter in the universe attracts, to some
extent, every other particle. There is thus presented to the
mind a sublime picture of the inter-relatedness of all things.
All things are subject to law and the universe is in this
respect a unit.
P. W. Brigman
-'Reflections of a Physicist' P. 82.
२. अवयन्त्स्वे सधस्थे देवाना दुर्मतीरीक्षे राजन्नपद्विषः सेध मीढवो अपस्रिधः
सेध । —ऋग्वेद ८।७६।६
(हे परम प्रकाशमय प्रभु ! तुम यही मेरे भीतर मेरे साथ बैठे हो। अतः
जैसे ही देवों की दुर्मतियों को देखो वैसे ही हे अमृत सिंचक ! इन दुर्मतियों
को दूर कर इन द्वेषों और हिंसा वृत्तियों को नष्ट कर दो।)