सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ नामदेव की हिन्दी कविता
उसकी काय परिणति पर वैज्ञानिको ने जो खोज की है, वह निश्चित रूप से इस दिशा
की ओर संकेत करती है कि सृष्टि अकस्मात् उत्पन्न नही हुई । उसके पीछे एक महान्
शक्ति कार्य कर रही है । और जगत् के सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदि समस्त ग्रह और उपग्रह
ऐसे आकर्षण संबंध में परस्पर सबद्ध हैं, उनकी दूरी, गति एव परिमाण ऐसे निश्चित
और नपे तुले हैं१ और एक दूसरे के सहायक बने हुए वे ऐसे सुरक्षित और सुदृढ हैं कि
उनके इन व्यापारों के पीछे एक अनन्त चेतन सत्ता की विद्यमानता का बरबस अनुभव
होने लगता है ।२
जो विधान इस सृष्टि मे पाया जाता है वही उसकी स्थिति के लिए आवश्यक
है । इस विधान का विधाता कौन है ?३
इस विधान का प्रसार यहाँ किसने किया ?
भूगर्भ विद्या, खगोल विद्या, शरीर विज्ञान, जीव विज्ञान आदि सभी शास्त्र अपने
क्षेत्र में कार्य करने वाले नियमो की ओर स्पष्ट संकेत कर रहे हैं । इस समय विज्ञान की
कोई भी ऐसी शाखा नही है, जो विश्व के किसी भी विभाग को नियम नियंत्रण विहीन
घोषित करती हो ।
प्रसिद्ध दार्शनिक प्रिंगल पटिसन के इस कथन४ की वास्तविकता विज्ञान के सभी
१ यो अन्तरिक्षे रजसो विमान । यजु ३२ ६ ( जिसने अन्तरिक्ष में लोको
को नाप तोल कर रखा है । )
२ फ्लिंट ने अपने ग्रन्थ ‘Theism’ के पृष्ठ १३८ पर इसी प्रकार के विचार
प्रकट किये हैं Each orb is affecting the other Each is
doing what, if unchecked would destroy itself and the en-
tire system, but so wonderously is the whole constructed
that these seemingly dangerous disturbances are the very
means of preventing destruction and securing the unive sal
welfare
३ Pringle Pattison अपने ग्रन्थ ‘The Idea of God’ के पृ० १५ पर
लिखते हैं—There is an eternal, inherent principle of order
in the world which proves an omnipotent mind All the
sciences almost lead us to acknowledge a first intelligent
author
४ ‘विश्व के समग्र रूप को एक साथ लेकर अथवा उसके किसी एक अंश पर
ध्यानपूर्वक विचार कीजिये तो वह एक बृहत् यन्त्र प्रतीत होगा, जिसके भीतर
अपरिमित छोटे छोटे यन्त्र हैं । इन छोटे छोटे यन्त्रों के भीतर पुनः अनेक