सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 22, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निर्गुण काव्यधारा की पृष्ठभूमि २३
'ईश्वरासिद्धेः ।' १-९२ (सांख्य दर्शन) तथा
'प्रमाणाभावान्न तत्सिद्धिः ।' ५-१० (सांख्य दर्शन)
महर्षि गौतम ने न्याय दर्शन, चतुर्थ अध्याय के प्रथम आह्निक में
'ईश्वरः कारणं पुरुष कर्मा फल्यदर्शनात्' सूत्र द्वारा ईश्वर को समस्त प्रपंच के आदि
कारण तथा जीवों के कर्मफल-प्रदाता के रूप में स्वीकार किया है।
नैयायिकों का ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरूप है। उसमें अधर्म, मिथ्या, ज्ञान और
प्रमाद नहीं है। वह रचना करने में सर्व शक्तिमान् है। वह आप्त-कर्म-फल है। जैसे
पिता पुत्र के लिये कार्य करता है उसी प्रकार ईश्वर जीवों के उद्धार के लिये जगत् की
रचना करता है।
जैसे खिचड़ी अपने आप नहीं पक जाती उसे कोई पकाता है वैसे ही वैदिक
विधान अपने आप नहीं बन गये। उनका बनाने वाला चेतन ईश्वर है। वेद को किसी
पुरुष ने नहीं बनाया। अतः ये अपौरुषेय हैं। वे सर्वज्ञ ईश्वर की कृति हैं।
वेदों में अभौतिक दैवी तत्त्वों के उल्लेख तथा सर्वज्ञशास्त लोकोत्तर सिद्धान्त
साधारण जीवों के ज्ञान के विषय (परिणाम) नहीं हो सकते। ज्ञान का जो तारतम्य
यहाँ दृष्टिगोचर होता है, वह भी अपनी पूर्णता के लिये ईश्वर जैसी सर्वज्ञ सत्ता की
ओर संकेत करता है। पातंजल सूत्र—"तत्र निरतिशयं सर्वज्ञ बीजं" १-१६ इसी तथ्य
को प्रकाशित करता है। पुरुष और प्रकृति का संयोग तथा वियोग ईश्वर ही
कराता है।१
वैशेषिक दर्शन 'तद् वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' १-१-३ सूत्र में 'आम्नाय'
अर्थात् वेद को ईश्वर का वचन मानकर ईश्वर को ज्ञान का स्रोत स्वीकार करता है।
पूर्व मीमांसा तथा उत्तर मीमांसा (वेदान्त अथवा ब्रह्म सूत्र) क्रमशः धर्म और
ईश्वर की व्याख्या से सम्बन्ध रखते हैं।
इस प्रकार दर्शन और विज्ञान दोनों ने, हमें उस पुरुष विशेष ईश्वर तक पहुँचाने
का प्रयत्न किया है। पर वे उस परम तत्त्व की झलक मात्र देखने और दिखाने में
समर्थ हुए हैं। उसका संपूर्ण स्वरूप विवेचना, आलोचना, मीमांसा, मति, मनोषा, बुद्धि
आदि सब शक्तियों से ऊपर और अग्राह्य है। उस महा चेतन सत्ता की अनंत क्षमता का
पार न आज तक कोई पा सका है और न भविष्य में पा सकेगा।२
- Dr. Radhakrishnan : 'Indian Philosophy' Vol. II
-(Ed. 1951) pp. 169-172. - 'But who ever has undergone the intense experience of
successful advances made in the domain of science, is