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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

१६० नामदेव की हिन्दी कविता
उत्तर भारत में भागवत धर्म की पताका फहराने वाले पहले संत नामदेव थे।
ये परम वैष्णव थे। उन्होंने हरि के दासों (वैष्णवों) की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। संत
(वैष्णव) सदा सुखी हों। उनको दीर्घायु प्राप्त हो। उनको अहंकार का स्पर्श न हो।
पांडुरंग का नाम जिनकी वाणी के लिए थाती बन गया है, ऐसे संतजनों की नामदेव
मंगल कामना करते हैं।१
वैष्णव मत का उपादान—भक्ति तत्व
वैष्णव मत का दूसरा प्रमुख उपादान भक्ति तत्त्व है। वैष्णव धर्म की इस भक्ति
में प्रेम का विशेष महत्त्व है। वैष्णव धर्म का प्रेम प्रधान भक्ति तत्त्व नामदेव को पूर्णतया
मान्य है। उनकी भक्ति प्रेमा भक्ति है। उन्होंने स्थान स्थान पर इस भक्ति की महिमा
का वर्णन किया है—
'मै बावरी हूँ, राम मेरे पति हैं, मैं बडे मनोयोग से रच-रच कर उनके लिए
श्रृंगार करती हूँ।'२
'हे प्रभु ! तुम्हारे सामीप्य के लिए मैं व्यग्र हूँ। जैसे बछड़े के बिना गाय व्याकुल
रहती है, और पानी के बिना मछली तड़पती है—ठीक वैसे ही राम नाम के बिना
बेचारा नामदेव पीड़ित है।'३
'जैसे मारवाड़ी को जल और ऊंट को वनस्पति प्रिय है वैसे ही मेरे मन को
ईश्वर प्रिय है। जैसे पत्नी को पति प्रिय है वैसे ही ईश्वर मेरे मन को प्रिय है।'४
१. आखंड आयुष्य व्हावें तया कुळा । माझिया सकळा हरिच्या दासा ।१।
छलनेची बाधा न हो कोणे काळी । हे संत मंडळी सुखी असो ।२।
अहंकाराचा वारा न लागो राजसा । माझिया विष्णु दासा भाविकासी ।३।
नामा म्हणे तया असावें कल्याण । ज्या मुखा निधान पांडुरंग ।४।
—सकल संत गाथा, अभंग ८८३ ।
२. मैं बउरो मेरा रामु भरतारु
रचि रचि ताकउ करउ सिंगारु । —संत० ना० की हिं० प०, पद २७४ ।
३. मोहि लागी ताला बेली । बछरे बिनु गाइ अरला ।
पानीया बिनु मीनु तलफै । ऐंगे राम नामा बिनु बापुरो नामा ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद २६ ।
४ मारवाड़ी जेम नीरु वाल्हा, बेलि वाल्हा करहला ।
जिउ तरणी कउ कंतु वाल्हा तिउ मरे मनि रामईआ ॥
—स० ना० की हिं० प०, पद २०२।

द्वितीय भाग: आत्म-निवेदन, विठ्ठल-दर्शन एवं रहस्यवादी पद

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६१
पत्नी (जीव) का पति (ब्रह्म) के प्रति कैसा प्रेम होना चाहिए इसके लिए
नामदेव ने क्षुधा ओर तृषातुर, लोभी एवं कामी व्यक्ति और माता तथा सुत के प्रेम का
आदर्श उपस्थित किया है ।¹ आदि वैष्णव भक्ति के अनुरूप ही है ।
भगवान का लोकरक्षक एवं लोकरंजक स्वरूप
भगवान् के लोकरक्षक एवं लोकरंजक स्वरूप की प्रतिष्ठा वैष्णव मत की विशे-
षता है । नामदेव में भी यह विशेषता पाई जाती है । वे कहते हैं कि हे ईश्वर ! तुम्हारी
कृपा से पत्थर समुद्र पर तैर उठे थे । फलस्वरूप तुम्हारा स्मरण करने से भक्त भव-
सागर क्यो न तर जायेंगे ?²
इस प्रकार यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि नामदेव वैष्णव मत से प्रभावित
है जिसके फलस्वरूप उन्होंने वैष्णवों के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की ।
(ख) महाराष्ट्रीय वारकरी संप्रदाय—महाराष्ट्र का भागवत धर्म जो वारकरी
ग्रन्थ के नाम से प्रसिद्ध है पूर्ण रूप से वैदिक है। यह वारकरी पंथ चतुर्व्यूह के सिद्धान
को बिलकुल नही मानता । अद्वैत ज्ञान के साथ भक्ति का मंजुल सम्मिलन वारकरी पंथ
की विशेषता है । इस पंथ के देवता श्री विट्ठल (थो पाडुरंग) हैं जो श्रीकृष्ण के बाल
रूप माने जाते हैं ।
वारकरी संप्रदाय का उदय
इस संप्रदाय का उदय कब हुआ इस विषय में विद्वानो के भिन्न-भिन्न मत हैं।
संत तुकाराम की शिष्या बहिणाबाई ने एक अभङ्ग में³ वारकरी पंथ के मंदिर के
१. जैसी भूखै प्रीति अनाज । तृषावंत जल सेती काज ।
जैसी पर पुरखारत नारी । लोभी नर धन का हितकारी ।
जैसी प्रीति बारिक अरन माता । ऐसा हरि सेती मनु राता ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ४८ ।
२. देवा पाहन तारीअले ।
—राम कहत जन कस न तरे ॥१॥ सं० ना० हिं० प०, पद १४६ ।
३. संत कृपा झाली । इमारत फळा आली ॥१॥
ज्ञानदेवे रचिला पाया । उभारिले देवालय ॥२॥
नामा तयाचा किंकर । तेणे केला हा विस्तार ॥३॥
जनार्दन एकनाथ । ध्वज उभारिला भागवत ॥४॥
भजन करा सावकाश । तुका झालासे कळस ॥५॥
—भागवत संप्रदाय, पृ० ५७२
११

निर्माण का बड़ा आलंकारिक वर्णन किया है जो इतिहास की घटनाओं से विरोध नही
खाता । परन्तु यहाँ ज्ञानदेव द्वारा 'पाया' (नींव) रखने का मतलब यह नही है कि
उन्होने इस मत का प्रारम्भ किया । यथार्थ बात तो यह है कि ज्ञानदेव के पूर्व ही इस
सम्प्रदाय के भक्तों की स्थिति थी परन्तु वे इधर-उधर बिखरे हुए थे । इन सब को
एक सूत्र में संगठित कर पथ को व्यवस्थित रूप देने का स्तुत्य कार्य ज्ञानेश्वर ने किया
इसीलिए वे इस संप्रदाय के मान्य आचार्य हैं । कृष्ण भक्ति के प्रचार के निमित्त ज्ञानदेव
ने अपने भ्राता निवृत्तिनाथ तथा सोपानदेव एवं भगिनी मुक्ताबाई के सहयोग से जो
महनीय कार्य किया उसके कारण आज भी महाराष्ट्र में अद्वैतवाद के साथ कृष्ण-भक्ति
का मनोरम सामंजस्य दिखाई देता है ।
प्रसिद्ध है कि संत ज्ञानेश्वर के पिता विट्ठलपंत ने संन्यास ले लिया था परन्तु
अपने गुरु रामानन्द के आग्रह से फिर वे गृहस्थी में प्रवृत्त हुए । इन्हीं के पूर्वोक्त चार
संतानें हुईं । इनकी गुरु परम्परा नाथ संप्रदाय के आचार्यों से संबद्ध मानी जाती है ।
गोरखनाथ के शिष्य गैनीनाथ ने निवृत्तिनाथ को स्वयं कृष्ण भक्ति की दीक्षा दी थी
और निवृत्तिनाथ ने फिर अपने दोनों अनुजों तथा भगिनी मुक्ताबाई को स्वयं दीक्षा
देकर अध्यात्म मार्ग का पथिक बनाया । निवृत्तिनाथ का कथन है कि प्राणियों का उद्धार
कर्ता वह श्रीधर है । कर्म सहित ब्रह्म साक्षात् श्रीकृष्ण मूर्ति है । वह रूप इस भूमंडल पर
सचमुच पांडुरंग रूप है, जो पुण्डलीक के निर्धार से यहाँ खड़ा है ।१ निवृत्तिनाथ की
शिक्षा में योग के साथ भक्ति का मंजुल मिश्रण था ।
वारकरी मत के सिद्धांत
(१) विट्ठल—वारकरी मत में सर्वश्रेष्ठ देवता पंढरीनाथ है जो बालकृष्ण के
ही रूप है । इस प्रकार यह कृष्णोपासक संप्रदाय है । यह विट्ठल संप्रदाय सं० १२६६
(ई० स० १२०६) के लगभग पंढरपुर में प्रचारित हुआ । इसके प्रचारक कन्नड संत
पुंडलीक कहे जाते है । विट्ठल संप्रदाय, वैष्णव तथा शैव संप्रदायों का मिश्रित रूप है ।
इस प्रकार विट्ठल संप्रदाय के संत विष्णु और शिव में कोई अन्तर नही मानते । विट्ठल
की उपासना विष्णु के अवतार वासुदेव कृष्ण की उपासना से ही आरम्भ हुई पर
१. प्राणिया उद्धार सर्व हा श्रीधर ।
ब्रह्म हें साचार कृष्णमूर्ती ।
तें रूप भीवरें पांडुरंग खरें ।
पुण्डलीक निर्धारि उभे असे ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग २३० ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६३
आगे चल कर विट्ठल और पांडुरंग में कोई अन्तर नही रह गया । पांडुरंग वस्तुतः श्वेत
अंग वाले शिव ही हैं। इस प्रकार विष्णु ही शिव है। और शिव ही विष्णु हैं। पंढरपुर
में विट्ठल की मूति शिवलिंग को शीश पर धारण किये हुए विष्णु की ही है।¹ ये
विट्ठल इस भांति एक सर्वव्यापी ब्रह्म के प्रतीक बन कर समस्त महाराष्ट्र में आराध्य
मान लिए गए। ऐसा ज्ञात होता है कि आठवी शताब्दी के शैव धर्म से ग्यारहवी
शताब्दी के वैष्णव धर्म का समझोता विट्ठल संप्रदाय के रूप में हुआ जिसके सबसे
महान् संत नामदेव हुए। ज्ञानेश्वर और नामदेव ने साथ-साथ सारे उत्तर भारत का
पर्यटन किया और अपने इस व्यापक धर्म का प्रचार किया। इस विट्ठल संप्रदाय के
अन्तर्गत अनेक संत हुए जिनमें गोरा कुम्हार, सावंता माली, नरहरी सोनार, चोखा
मेला, दासी जनाबाई, सेना नाई तथा कन्होपात्रा वेश्यापुत्री प्रमुख है।२
इस संप्रदाय में दक्षिण भारत के शैवो और वैष्णवो के बीच चलने वाले संघर्ष
का कही नाम व निशान तक नही है । कृष्णोपासक होने पर भी शिव को पूर्ण मान्यता
प्रदान करने का एक ऐतिहासिक हेतु भी है। ज्ञानदेव जो इस संप्रदाय के आदि
प्रतिष्ठापक थे स्वयं नाथ सप्रदाय में दीक्षित थे और नाथ संप्रदाय के आदि आचार्य
शिवजी ही है जो 'आदि नाथ' नाम से विख्यात है। इस प्रकार वारकरी संप्रदाय धार्मिक
मामलों में सदा उदार तथा समन्वयवादी रहा।³
(२) भक्ति तथा अद्वैत ज्ञान—वारकरी संप्रदाय की समन्वयवादी प्रवृत्ति का
दूसरा उदाहरण है अद्वैत ज्ञान तथा भक्ति का पूर्ण सामंजस्य । वारकरी पंथ आदि से
लेकर अन्त तक भक्ति-प्रधान है परन्तु उपनिषदों का 'एकमेवाद्वितीय ब्रह्म' तथा 'नेह
नानास्ति किंचन' आदि वाक्यो के द्वारा प्रतिपादित अद्वैत ब्रह्म में भी इसके अनुयायियों
की पूर्ण आस्था है। संत तुकाराम का स्पष्ट कथन है कि यह जगत् विष्णुमय है, वैष्णवों
का यही धर्म है। हरि के विषय मे भेदाभेद मानना अमंगलकारक भ्रम है।४
यह संप्रदाय निष्काम कर्म की शिक्षा सर्वतोभावेन देता है। यह पूर्ण प्रवृत्ति-
मार्गी है।
१. रूप पाहता डोलसू । सुंदर पाहता गोपवेपु ।।
महिमा वर्णिता महेसू । जेणे मस्तकी वंदिला ।।
—श्री ज्ञानेश्वर का अभंग, भागवत संप्रदाय, पृ० ५८७ ।
२. हिंदी साहित्य (द्वितीय खण्ड) पृ० १६१ ।
३. भागवत संप्रदाय ; डॉ० बलदेव उपाध्याय, पृ० ५८७ ।
४. विष्णुमय जग वैष्णवाचा धर्म ।
भेदाभेद भ्रम अमंगल ॥
—संत तुकाराम का गाथा ।

१६४ नामदेव की हिन्दी कविता
संतो को ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर ब्रह्म रूप बनकर जगत् में प्राणियों के भीतर अंतर्यामी
रूप से विद्यमान ब्रह्म की सेवा करनी चाहिए । इस विषय का बड़ी रोचक वर्णन संत
ज्ञानेश्वर ने किया है। उन्होने अपने 'अमृतानुभव' में एक बड़ा ही सुंदर दृष्टांत उस
सामंजस्य की तुलना के लिए दिया है । वे कहते हैं कि 'यदि एक ही पर्वत को काटकर
उसकी गुफा के भीतर देवता, देवालय तथा भक्त-परिवार का निर्माण एक साथ किया
जा सकता है, तो अद्वैत भाव के साथ भक्ति क्यों संभव नही है ?'१
'ज्ञानेश्वरी' में ज्ञानेश्वर इस तथ्य को आत्मानुभव का उदाहरण मानते हैं जो
शब्दो के द्वारा ठीक-ठीक प्रकट नही किया जा सकता । साढ़े पंद्रह के सोने में अर्थात्
खरे सोने में खरा सोना मिला देने पर ही उत्तम सुवर्ण तैयार होता है उसी प्रकार
मद् रूप होने पर ही मद्भक्ति उत्पन्न होती है । यदि गंगा समुद्र से भिन्न होती तो उसके
साथ मिलकर वह एकाकार कैसे बन जाती ?'२ इसी प्रकार भगवान् का भक्त भगवान को
अद्वैत रीति से जान कर ही उसका सच्चा भक्त बन सकता है ।
नामदेव ने इस संप्रदाय की विशेषता अद्वैत ज्ञान के साथ भक्ति का मृदुल सामंजस्य
कर बतलाई है । इन भक्तों की पूर्ण निष्ठा थी कि उपनिषदो का परब्रह्म ही विट्ठल के
रूप में प्रकट हुआ है । ज्ञान के साथ भक्ति का योग हो जाने से इनकी वाणी में अतीव
मृदुता और मधुरता आ गई है । इनका विश्वास था कि निर्गुण ब्रह्म ही नाम रूप को
ग्रहण कर भक्तो की मंगल-कामना के निमित्त इंद्रिय गम्य बन गया है। नामदेव ने
अभंगो द्वारा ब्रह्म रस तथा भक्ति रस के ऐक्य का प्रतिपादन किया है । नामदेव भगवान्
को सख्य कर पुकार रहे हैं कि 'भगवान् जल्दी आइए, पुकारते-पुकारते गला सूख गया,
शरीर पुलकित हो गया तथा अश्रु धाराओ से पृथ्वी भीग गई । हे दीन दयालु ! आने में
इतनी देर क्यों कर रहे हो ? किसी भक्त के यहाँ तो नही फँस गये ?'३
१. देव देऊल परिवारु । कीजे कोरूनि डोंगरू ॥
तैसा भक्तीचा वेव्हारु । का न व्हावा ? ॥ ४१ ॥
—अमृतानुभव ।
२. साडे पंधरा मिसलावे । तें साडे पंधराचि होआवे ।
तेवि मो आलिया समवे । भक्ति माझी ॥ ५६७ ॥
ह्वां गा सिंधूसि आनी होती । तरि गंगा कैसेनि मिलती ।
म्हणोनि मी न होता भक्तो । अन्वयो आहे ॥ ५६८ ॥
—ज्ञानेश्वरी, अध्याय १५ ।
३. येवडा वेल का लाविला । कोण्या भवताने गोविला ?
झडकरी येई गा विठ्ठला । कंठ आळविता सुकला ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६५
(३) भगवत् रूप—वारकरी पंथ को भगवान् के दोनों रूप—सगुण तथा
निर्गुण मान्य हैं। पूर्ण सगुणोपासक होने पर वह परमात्मा को व्यापक एवं निर्गुण-
निराकार भी मानता है तथा इस निराकार ब्रह्म की प्राप्ति का साधन सगुणोपासना,
नाम स्मरण तथा भजन है।
वारकरी संतों ने ज्ञान तथा भक्ति के परस्पर सहयोग तथा मैत्री भाव पर
विशेष बल दिया है। संत एकनाथ ने भक्ति तथा ज्ञान के परस्पर संबंध की सूचना
बड़े ही रोचक उदाहरण द्वारा दी है। वे भक्ति को मूल, ज्ञान को फल तथा वैराग्य को
फूल बतलाते हैं। जिस प्रकार बिना मूल के फल उत्पन्न नहीं हो सकता और बिना
फूल के फल असम्भव है उसी प्रकार बिना भक्ति और वैराग्य के ज्ञान का उदय नहीं
हो सकता। 'भक्ति के उदर से ज्ञान उत्पन्न होता है। भक्ति ने ही ज्ञान को उसका
गौरव प्रदान किया है। अतः दोनों का मधुर समन्वय ही साधक के लिए अवश्यमेव
संपादनीय व्यापार है।'१
वारकरी पन्थ के सिद्धान्त की विशेषता
वारकरी पंथ के सिद्धांत का प्रतिपादन करने वाला संत तुकाराम का एक
प्रसिद्ध अभंग है जिसमें वे कहते हैं कि 'मुख से विट्ठल के नाम का उच्चारण, गले में
तुलसी की माला धारण करना तथा एकादशी का व्रत रखना—ये तीन इस पंथ के
मान्य सिद्धांत हैं।'२ इष्टदेव तो विट्ठल हैं। विष्णु के सभी अवतार मान्य हैं परन्तु
राम-कृष्ण विशेष रूप से अभीष्ट हैं। भगवान् के सगुण तथा निर्गुण रूप एक ही हैं।
ध्येय है अभेद-भक्ति, अद्वैत भक्ति अथवा मुक्ति के परे की भक्ति। अद्वैत का सिद्धांत
इस सम्प्रदाय को स्वीकार है परन्तु इस कौशल के साथ इस ध्येय को प्राप्त करना उचित
है कि अभेद को सिद्ध करके भी संसार में प्रेम-सुख बढ़ाने के लिए भेद को भी अभेद
कर रखना। इस पंथ में भक्ति और ज्ञान दोनों की एकरूपता मानी गई है, जिसके
नामा गहिवरें दाटला । पूर धरणिये लोटला ॥
—नामदेवाचा गाथा ।
१. भक्तिचें उदरीं जन्मलें ज्ञान । भक्तीनें ज्ञानासी दिधलें महिमान ॥
भक्ती तें मूल, ज्ञान तें फल । वैराग्य केवळ तेथीचे फूल ॥
—संत वचनामृत : रा० द० रानडे, पृ० १६६ ।
२. आम्ही तेणें सुखी, म्हणा विट्ठल-विट्ठल मुखीं ।
कंठी मिरवा तुलसी, व्रत करा एकादशी ॥
—भागवत सम्प्रदाय—पृ० ५१६ पर उद्धृत ।

१६६ नामदेव की हिन्दी कविता
केंद्र स्थल में हैं स्वयं भगवान् श्रीहरि विट्ठल । सम्प्रदाय का मुख्य मंत्र है—'राम कृष्ण
हरि ।'
यह सम्प्रदाय चैतन्य सम्प्रदाय के समान युगल उपासना में कृष्ण के साथ राधा
को सम्मिलित नहीं करता बल्कि उसके स्थान में रुक्मिणी को महत्त्व देता है। इसका
सुपरिणाम यह हुआ कि महाराष्ट्र में कृष्ण भक्ति का नितांत समुज्ज्वल तथा उदात्त रूप
दृष्टिगोचर होता है। यहाँ उस विकृत रूप का दर्शन नहीं होता जो उत्तर भारत के
कतिपय प्रांतों में अश्लीलता की कोटि तक पहुँच कर भावुकों के लिए उद्वेग-जनक
होता है ।
इस प्रकार वैष्णव धर्म परम्परा का प्रभाव नामदेव पर पर्याप्त मात्रा में है।
उनके पूर्व जो वैष्णव आचार्य हुए, जिनका विशेष प्रचार उत्तरी भारत में था, नामदेव
पर उनकी विचार-धाराओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। एक ओर नामदेव
महाराष्ट्रीय वारकरी परम्परा के प्रतिनिधि हैं तो दूसरी ओर उत्तरी भारत की वैष्णव
भक्ति परम्परा के । उनमें दोनों परम्पराओं का अभूतपूर्व समन्वय दिखाई पड़ता है ।
नामदेव की रचनाओं में प्राप्त उनके दार्शनिक विचार
सन्त नामदेव महाराष्ट्र के प्रसिद्ध वारकरी सम्प्रदाय के अनुयायियों में से थे। इस
कारण वारकरी सम्प्रदाय के दार्शनिक सिद्धांतों का प्रतिपादन उनकी रचनाओं में पाया
जाना स्वाभाविक है । इस सम्प्रदाय के सन्तों में निर्गुण सर्वात्म-स्वरूप अद्वैत ब्रह्म के
प्रति पूरी निष्ठा पाई जाती है किन्तु सगुण मूर्ति के समक्ष वे कीर्तन भी किया करते थे ।
ब्रह्म (ईश्वर दर्शन)
ब्रह्म परम्परा—पारमार्थिक तत्त्व, परम तत्त्व, अन्ततम सत् एवं परम अस्तित्व
को ब्रह्म की संज्ञा दी गई है ।
उपनिषदों में ब्रह्म की पूर्ण प्रतिष्ठा है । तैत्तिरीयोपनिषद् में—इस सम्पूर्ण
विश्व की उत्पत्ति, गति, पालन और स्थिति तथा इस सम्पूर्ण जगत् के लय के कारण
को ब्रह्म कहा गया है ।१
ब्रह्म ही पूर्ण है, सब कुछ वही है, वह सब प्रकार से पूर्ण है ।२
१. यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, यतो जातानि जीवन्ति ।
यत् प्रयन्ति अभिसं विशन्ति तद् विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्म ॥
—तैत्तिरीयोपनिषद् ३ । १ ।
२. ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
—ईश. शांतिपाठ

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६७
यही एक ब्रह्म अपूर्व, अद्वितीय, अनन्तर और अबाह्य है। १
ब्रह्म एक ही है दूसरा नहीं। २
यह निखिल जगत् ब्रह्म ही है। ३
सकल विश्व ब्रह्म ही है। ४
वह माया से विश्व का सृजन करता है। ५
अद्वैत वेदांत दर्शन ने ब्रह्म ही को पारमार्थिक सत्य कहा है। शंकराचार्य का
कथन है।—जिसका स्वरूप सदा सर्वदा अखण्ड रूप में एक ही सा बना रहे वही
पारमार्थिक सत्ता हो सकती है। ६
नामरूपात्मक जगत् सत्य रूपेण सत्य है अर्थात् ब्रह्म सर्वव्यापी, अखण्ड, एकरस
सब में है अतः ये उसकी विद्यमानता के कारण सत्य है किन्तु विकार-जनित होने से
अपने विशेष नाम व रूपधारी स्वरूप में असत् है क्योंकि ये सब देश, काल और अवस्था
के द्वारा बाधित हो जाते हैं। ७
उपर्युक्त ब्रह्म सम्बन्धी विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि ब्रह्म विश्व का
मूल तत्त्व है। वह निर्गुण, अव्यक्त, अचिंत्य, निराकार तथा अनिर्वचनीय है। व्यक्त
रूप में वही सृष्टिकर्त्ता, धर्त्ता, संहारक आदि भी है।
नामदेव द्वारा ब्रह्म वर्णन
ब्रह्म के सर्व शक्तिमान तथा सर्वव्यापक रूप के पर्याप्त प्रमाण नामदेव के पद
साहित्य में मिलते है।
नामदेव के अनुसार ईश्वर एक है जो सर्वव्यापक और सर्वपूरक है। जिधर
१. तदेतत् ब्रह्म अपूर्वमनपरमनन्तरमवाह्यम् ।
—बृहदा. २।५।१६ ।
२. ब्रह्म एकमेवाद्वितीयम् ।
—छान्दोग्य. उप, ६।१।१।
३. एकमेव सत् नेह नानास्ति किंचन ।
—बृहदा. उप. ३।८।८।
४. सर्वं खल्विदं ब्रह्म ।
—छांदोग्य. उप. ३।१४।१।
५. माया सृजते विश्वमेतत् । —श्वेता. उप, ४।६।
६. एक रूपेण हि अवस्थितो योऽर्थः स परमार्थः ।
—शांकर भाष्य २।१।११।
७. सर्वं च नामरूपादि सदारमनेव सत्यं विकारजातं स्वतस्तु अनृतमेव ।
—छान्दोग्य० उप० ६ । ३ । २ ।

१६८ नामदेव की हिन्दी कविता
भी देखो वही दिखाई देता है। माया के विचित्र चित्रों से संसार मुग्ध है, कोई विरला
ही उसे जान पाता है।¹
इधर भगवान है, उधर भगवान है, भगवान के बिना संसार में कुछ भी नही है।
नामदेव कहते हैं—'हे भगवन्। पृथ्वी के जल थल आदि सभी स्थानो में तुम
व्याप्त हो।''²
'हे वैकुंठनाथ तेरी लीला अगाध है। मैं जिधर जाता हूँ उधर तुझे ही देखता
हूँ। जल में, थल में, काष्ट में, पाषाण में तू ही है। आगम, निगम, वेद, पुराण तेरा ही
गुणगान करते हैं।'³
प्रत्येक जीव के हृदय में भगवान है। हाथी और चोटी एक ही मिट्टी के बने
हैं। ये सब उसी भगवान के अंश मात्र हैं। जड़-जंगम आदि सभी में ब्रह्म समान रूप से
व्यापक है।⁴
'जब न माँ थी, न पिता था, न कर्म था, न काया थी, न हम थे, न तुम थे।
तब इस चराचर की सृष्टि कैसे हो गई ? नामदेव ने स्पष्ट कहा है कि वह परमतत्त्व ही
ब्रह्म है जिससे सृष्टि उत्पन्न हुई ।''⁵
'हे परमात्मा ! तुम्हारी भक्ति मुझसे नहीं होती। सकल जीवो की उत्पत्ति
१. एक अनेक विआपक पूरन जत देखउ तत सोई ।
माइआ चित्र विचित्र विमोहित बिरला बूझे कोई ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १५० ।
२. ईभै बीठलु ऊभै बीठलु, बीठल बिनु संसारु नही ।
थान थनंतरि नामा प्रणवै पूरि रहिउ तूं सरब मही ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ३ ।
३. तू अगाध वैकुंठनाथा तेरे परनो मेरा भाषा ।
सरबे भूता नामा पेखूं । जत्र जाऊँ तत्र तूं ही देखूं ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १२ ।
४. एवल माटी कुंजर चोटी भाजन रे बहु नाना ।
थावर जंगम कीट पतंगा सब घटिराम समाना ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ६ ।
५. माइ न होती बापु न होता करमु न होती काइआ ।
नामा प्रणवै परम ततु है सतिपुरु होइ सखाइआ ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद २०६ ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६६
तुमसे हुई है। तुम घट-घट वासी हो।’¹
‘भगवान वैसे ही प्राणिमात्र में अन्तर्यामी है जैसे दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब दिख-
लाई पड़ता है। ब्रह्म घट घट वासी है। ज्ञान हो जाने पर उसका दिव्य प्रकाश छिपता
नहीं।’²
जीवात्मा (आत्म दर्शन)
आत्म परम्परा—मनुष्य के शरीर के भीतर एवं बाहर जिस सत्त्व का प्रकाश
है, उसे जानने का प्रयास सदा से होता आ रहा है। प्राचीन काल ही से मनुष्य की
चेष्टा रही है कि यह आत्मा क्या है, उसका स्वरूप क्या है? उसकी गति-प्रगति आदि
क्या है इसका परिचय प्राप्त करे।
जीवात्मा के स्वरूप का परिचय ऋग्वेद के प्रसिद्ध मंत्र ‘द्वासुपर्णा’ में व्यक्त किया
गया है। इस मंत्र में कहा गया है—‘सदा साथ रहने वाले, परस्पर सख्य भाव रखने
वाले दो पक्षी एक ही वृक्ष का आश्रय लेकर रहते हैं। उनमें एक जीवात्मा उस वृक्ष के
फलों का उपभोग करता है किंतु दूसरा उनका उपभोग न करता हुआ साक्षी रूप में
केवल देखता रहता है।’³
उपनिषदों में आत्म तत्त्व की पूर्ण प्रतिष्ठा है। यहाँ ब्रह्म और आत्मा को
ही ध्वनित किया गया है। यह आत्मा ब्रह्म है।⁴ मैं ब्रह्म हूँ।⁵ यह पुरुष स्वयं ज्योति
है।⁶ यह आत्मा ब्रह्म है, सबका अनुभव करने वाला है।⁷
आत्म-ज्ञान को उपनिषदों में जीवन का चरम लक्ष्य माना गया है। बृहदारण्यक
१. जामै सकल जीव की उतपति। सकल जीव मै आपजी।
माया मोहु करि जगत भुलाया। घटि घटि व्यापक बापजी॥
—सं० ना० हि० प०, पद ४८।
२. ऐसो रामराइ अंतरजामी। जैसे दरपनमाहि बदन परवानी।
बसै घटाघट छीप न छीपै। बंधनमुकता जानु न दीसै॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ५८।
३. द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥
—ऋग्वेद १। १६४। २०।
४. अयमात्मा ब्रह्म। —बृहद० २। ५। १६।
५. अहं ब्रह्मास्मि। —बृहद० १ ४। १०।
६. अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः। —बृहद० ४। ३। ६।
७. अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः। —बृहद० २। ५। १६।

१७० नामदेव की हिन्दी कविता
उपनिषद् मे कहा गया है—इस आत्मा की खोज करनी चाहिए ।'१ तथा आत्मा है, इस
प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिए ।२ यहाँ आत्मा को परमार्थ सत्य एवं मूल तत्त्व
माना गया है ।
शांकर वेदांत के अनुसार जिस तत्त्व का व्यतिरेक अथवा बाध नही हो सकता,
वह अन्वयी तत्त्व ही सत्य एव नित्य है ।३ आचार्य शंकर कहते है कि कोई भी व्यक्ति
अपने अस्तित्व से इनकार नही कर सकता । मे हूँ, यह अनुभव सभी को होता है ।'४
वही ज्ञाता है और वही ज्ञेय है । उसे जानने के लिए किसी ज्ञान की अपेक्षा नहीं । वह
स्वयं सिद्ध है । आत्मा अकर्ता है, अभोक्ता है और सुख दुख से परे है । सुख दुख की
समस्त प्रतीतियाँ अंत करण, शरीर, इन्द्रियां आदि उपाधियों के संबंधो के कारण है, वे
आत्मा के निजी स्वरूप में नही है ।'५
स्वरूप लक्षण में आत्मा नित्य, मुक्त, अजन्मा, निराकार, अमर, अनन्त, सर्व-
व्यापी तथा चैतन्य-स्वरूप है ।
तटस्थ-लक्षण अथवा आत्मा की व्यावहारिक प्रतीति जीव होती है । अविद्या
जीव का अज्ञान है । यही आत्मा जब नाम-रूप की उपाधि से युक्त होता है, तब जीव
कहलाता है । जिसे व्यक्ति कहा जाता है वही जीव है । जब अन्त करण आत्मा को नाम
रूप की उपाधि से सीमित कर देता है तो इस चैतन्य को साक्षी कहा जाता है और
जब अन्त.करण व्यक्तित्व का निर्माण करता है तो इसे जीव कहा जाता है । जीव का
ही सम्बन्ध शुभ-अशुभ कर्मों के फल से होता है ।'६
जीव सम्बन्धी नामदेव के विचार
जीव और ब्रह्म का सम्बन्ध—नामदेव जीव को ब्रह्म का अंश मानते हैं । वे
कहते हैं कि 'हे माधव ! तुम मुझसे बाजी क्यो नही लगाते हो ? (तुम बताओ कि
१. आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः । —बृहद० २ । ४ । ५ ।
२. आत्मेत्येवोपासीत । —बृहद्० ६ । ४ । ७ ।
३. एक रूपेण हि अवस्थितो योऽर्थः सह परमार्थः ।
—शांकर भाष्य २ । १ । २ ।
४. सर्वो ह्यात्मास्तित्वं प्रत्येति न नाहम् अस्मीति ।
—शांकर भाष्य १ । १ । १ ।
५. तस्माद् उपाधिधर्माध्यासे नैवात्मन कर्तृत्वम् न स्वाभाविकम् ॥
—शांकर भाष्य, २ । ३ । ४० ।
६. अन्त.करणविशिष्टो जीव अन्त.करणोपहिता साक्षी ।
—वेदान्त परिभाषा, पृ० १०२ ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १७१
तुममें और मुझमें क्या अन्तर है ? अर्थात् कोई अन्तर नही है), भगवान् से भवत और
भवत से भगवान् है । अद्वैत का यही खेल भक्त और भगवान् के बीच चल रहा है ।
तुम्हीं देवता हो, तुम्ही मंदिर हो और तुम्ही पुजारी हो—जल से ही लहरें और लहरों
से ही जल होता है, दोनों अभिन्न हैं—कहने-सुनने में दोनो भले ही अलग हों । 'हे
भगवान् ! तुम ही गाते हो, नाचते हो और वाद्य बजाते हो । नामदेव कहते हैं—हे
भगवान् ! तुम मेरे स्वामी हो । तुम्हारा भक्त अपूर्ण है, तुम पूर्ण हो ।'१
नामदेव के अनुसार सभी जीवों की उत्पत्ति ब्रह्म से होती है । वह सब जीवों
में समाया हुआ है । यह माया ही है जिसने सारे संसार को मोह लिया है । अन्यथा तुम
घट-घट वासी हो ।२ यहाँ पर नामदेव ने आत्मा का निरूपण बहुत कुछ गीता की शैली
पर किया है ।
अज्ञानी जीव को मोहिनी माया अपने पाश में अकड़ लेती है । ऐसे अज्ञानी
जीव को चेतावनी देते हुए नामदेव कहते हैं—'हे जड़ ! तू सचेत हो जा । तुझे यह
औघट घाट पार करना है ।'३
आत्म तत्त्व सारे संसार में व्याप्त है । उसी को लोग विश्वात्मा कहते है । आत्मा
और विश्वात्मा मूलतः एक ही है । यह माया है जो आत्मा को पंचतत्त्वमय शरीर से
आबद्ध कर के अपने वश में कर लेती है ।४ माया से आबद्ध आत्मा ही जीव के नाम
से प्रसिद्ध है ।
१. बदहु की न होइ माधऊ मोसिऊ ।
ठाकुर ते जनु जन ते ठाकुर खेलु परिउ है तोसिऊ ॥
जल ते तरंग तरंग ते है जल कहन सुनन कऊ दूजा ॥
—स० ना० हिं० प०, पद १६१ ।
२. जामै सकल जीव की उतपति । सकल जीव मै आप जी ॥
माया मोहु करि जगतु भुलाया । घटि घटि व्यापक बाप जी ॥
—स० ना० हिं० प०, पद ४८ ।
३. जागि रे जीव कहा भुलाना ।
आगे पीछे जाना ही जाना ॥ टेक ॥
भणत नामदेव चेति अयाना ।
ओघट घाट अरन दूरि पयाना ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १२२ ।
४. बीही बीही तरी सबल माया ।
आगे दूति अनेक भरमाया ॥ टेक ॥

१७२ नामदेव की हिन्दी कविता
जीव की एकता और अद्वैतता
हम माया के कारण आत्मा और ब्रह्म की अद्वैतता पहचान नही पाते । नामदेव
भी आत्मा और ब्रह्म में भेद नहीं मानते । वे कहते हैं—'हे परमात्मा ! तुम्हारा वियोग
मुझे असह्य है । तुम्हारे बिना मैं घडी भर भी नहीं रह सकता । यदि तुम गिरिवर हो
तो मैं मोर हूँ । यदि तुम चंद्रमा हो तो मैं चकोर हूँ । तुम तरुवर हो तो मैं पक्षी ।
तुम यदि सरोवर हो तो मैं उसमें रहने वाली मछली हूँ ।'१ इस प्रकार जीव और ब्रह्म
की एकता एव अद्वैतता को नामदेव ने स्पष्टतया घोषित किया है ।
'हे जीव ! तेरी गति तू जानता है । मैं उसका क्या वर्णन करूँ ? जैसे लवण
(नमक) पानी में द्रवित होने पर अलग नही किया जा सकता उसी प्रकार का मेरा
और मेरे स्वामी का संबंध है । सत्संग से मुझे उसकी प्राप्ति हुई । मैं प्रेमातिशय से
उसकी वंदना करता हूँ । २
माया
मायावाद की परंपरा—मायावाद भारतीय दर्शन में अपना विशिष्ट स्थान
रखता है । ऋग्वेद में उल्लेख है कि इन्द्र अपनी शक्ति से अनेक प्रकार के रूप धारण
कर लेता है ।३ वेदों में रूप बदलने की क्रिया को माया कहा गया है ।
उपनिषदों में नाम रूप के अर्थ में माया शब्द का प्रयोग हुआ है । कठोप
माया अंतर ब्रह्म न दीसै ।
ब्रह्म के अंतर माया नहीं दीसै ॥ १ ॥
— स० ना० हिं० प०, पद ३६ ।
१ तुम बिनु धरि येक, रहूँ नहिं न्यारा ।
सुन यहु केसव नियम हमारा ॥
जहाँ तुम गिरीवर तहाँ हम मोरा ।
जहाँ तुम चंदा तहाँ मैं चकोरा ॥ १ ॥
—स० ना० हिं० प०, पद १६१ ।
२ तेरी गति तू ही जाने । अल्प जीव गति कहा बपाने । टेक ।
जैसा तू कहिये तैसा तूं नाही । जैसा तू है तैसा आद्धि गुसाई ॥ १ ॥
लून नीर घे नाहिं न्यारा । ठाकुर साहिब प्राण हमारा ॥ २ ॥
साध की संगति संत सू भेटा । प्रणवत नामा राम सहेटा ॥ ३ ॥
—स० ना० हिं० प०, पद १४ ।
३. इन्द्रो मायाभि पुरुरूप ईयते । ऋग्वेद ६ । ४७ । १८ ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १७३
निषद् में लिखा है—‘आत्मा-स्वरूप परम पुरुष सब प्राणियों में रहता हुआ भी माया
के पर्दे में छिपा हुआ रहने के कारण सबको प्रत्यक्ष नहीं दीखता। केवल सूक्ष्म तत्वों
को समझने वाले पुरुषों द्वारा ही सूक्ष्म तथा तीक्ष्ण बुद्धि से देखा जाता है।’¹
श्वेताश्वेतर उपनिषद् में माया का उपयुक्त वर्णन है जो इस प्रकार है—
‘माया तो प्रकृति को समझना चाहिए और महेश्वर को मायापति। उसी के अंगभूत
कारण-कार्य-समुदाय से यह संपूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है।² यहीं पर लिखा है कि—
संपूर्ण जगत् को माया का अधिपति परमेश्वर पंच महाभूतादि से रचता है तथा दूसरा
जीवात्मा उस प्रपंच में माया के द्वारा भली भाँति बँधा हुआ है।’³
इस प्रकार उपनिषदों में नामरूपात्मक जगत् को, अविद्या को, भ्रम को तथा
प्रकृति को माया कहा गया है।
गीता में माया को कृष्ण की शक्ति कहा गया है। गीता का कथन है—‘मेरी
यह गुणमयी और दिव्य माया दुस्तर है। इस माया को वे ही पार कर पाते हैं, जो
मेरी शरण में आते हैं।’⁴ और भी कहा है—‘माया ने जिनका ज्ञान नष्ट कर
दिया है ऐसे मूढ और दुष्कर्मी नराधम आसुरी बुद्धि में पड़कर मेरी शरण में नहीं
आते।’⁵
गीता में माया को अविद्या, भ्रम तथा प्रकृति रूप में कहा है।
शास्त्रीय ढंग से माया का विवेचन आचार्य शंकर ने किया। कालान्तर में माया-
वाद मध्यकालीन दार्शनिकों के लिए एक आवश्यक तत्त्व हो गया।
१. एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ कठोप. १ । ३ । १२ ।
२. मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥
श्वेताश्वतर उपनिषद् ४ । १० ।
३. अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत् तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ।
—श्वेताश्वतर उपनिषद् ४ । ९ ।
४. दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ।
—गीता ७ । १४ ।
५. न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥
—गीता ७ । १५ ।

१७४ नामदेव की हिन्दी कविता
माया का अर्थ है ईश्वर की विचित्रार्थ-सर्गंकरी (अद्भुत विषयों की सृष्टि
करने वाली) शक्ति ।'
द्वैताद्वैत, द्वैत तथा शुद्धाद्वैत आदि सभी दर्शनों ने मायावाद को स्वीकार किया
है। इसे ब्रह्म की शक्ति भी बताया गया है।
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि मायावाद की परंपरा प्राचीन काल
में वेदों से प्रारंभ हुई और सभी भारतीय दार्शनिकों पर उसका प्रभाव पड़ा। विचारकों
ने अपने अपने विचारों के अनुकूल उसका वर्णन किया । माया, अविद्या, भ्रम, अज्ञान,
मिथ्या ज्ञान, नामरूपात्मक जगत् आदि शब्दों का प्रयोग माया के अर्थ में होता
रहता है ।
नामदेव का माया वर्णन
नामदेव ने भी अपनी रचनाओं में माया का वर्णन किया है । उनके अनुसार
माया ही जीव को ब्रह्म से विमुख करती है । कोई विरला ही व्यक्ति गुरु उपदेश द्वारा
माया के प्रभाव से बचकर ब्रह्म तक पहुँच सकता है ।
माया के दो रूप हैं—एक अविद्या माया तथा दूसरी विद्या माया । अविद्या
माया के वशीभूत होकर जीव संसार के मोहजाल में फँस जाता है । विद्या माया, सब
गुण जिसके वश में हैं और जो ईश्वर की प्रेरणा से संसार की रचना करती है, जीव
को संसार के मोहनाल से छुड़ा कर ब्रह्म की भक्ति की ओर ले जाती है ।
नामदेव कहते हैं—'हे विट्ठल ! तेरी माया बहुत ही प्रबल है । पहले ही से
वह भक्तों को भरमाती आई है । तथ्य यह है कि माया के प्रबल हो जाने पर ब्रह्म तथा
ब्रह्म के प्रबल हो जाने पर माया दृष्टिगोचर नहीं होती ।'२
'हे माधव ! यह माया तुम्हारी भक्ति में बाधक होती है । यह भक्तों को तुमसे
मिलने नहीं देती ।'३
'जीव का गर्भयोनि में आना ही माया है, यदि वह छूट सके तो दर्शन हो
१. भारतीय दर्शन : सतीशचंद्र चट्टोपाध्याय
—गीता, पृ० २७० ।
२. बीहौ बीहौ तेरी सबल माया । आगे इनि अनेक भरमाया ॥ टेक ॥
माया अंतर ब्रह्म न दीसै । ब्रह्म के अंतर माया नहीं दीसै ॥ १ ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ३६ ।
३. माधौ त्री माया मिलन न देई । जन जीवै तो करै सनेही ॥ टेक ॥
सं० ना० हिं० प०, पद १०६ ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १७५
सकते हैं। आगे चल कर कहते हैं कि अब माया मुझसे नहीं लिपटेगी, मैं इस संसार से
मुक्त हो जाऊँगा ।'१ भगवत्कृपा होने पर ही परब्रह्म परमेश्वर को जाना जा सकता है,
अन्यथा नहीं।
'इस संसार में उत्पन्न प्राणी माया-पाश के कारण अपने को भूल गये हैं। हे
भगवन् ! जिस व्यक्ति को तुम ज्ञान देते हो केवल वही तुमको जान पाता है।'२
'माया वस्तुतः जीव मात्र को मुग्ध कर लेती है। इससे उसका रहस्य जान
सकना कठिन है। इसी से माया अनिर्वचनीय कही जाती है।'३
'हे मन रूपी पंछी ! तू संसार रूपी जाल को स्पर्श न कर। माया दिन में तीन
फेरे लगाती है। काल तुझ पर झपट रहा है।'४
अभिमानी मनुष्य को चेतावनी देते हुए नामदेव कहते हैं—'यह संसार धोखे
की टट्टी है, मायाजाल है। धन, यौवन, पुत्र तथा स्त्री को तू अपना न समझ । ये बालू
के मंदिर के समान नष्ट हो जायेंगे।'५
जगत्
जड़ जगत् का भौतिक स्वरूप .—सभी प्रकार की प्रतीतियों का नाम जगत् या
संसार है। समस्त जगत् या इसके प्रत्येक विषय को एक-सा अन्त-तम सत्य या पार-
मार्थिक सत्य नहीं कह सकते। जगत् जब नामरूपात्मक हो लिया जाता है तब वह केवल
व्यावहारिक दृष्टि से सत्य है या यों कहें कि प्रातिभासिक सत्ता की अपेक्षा अधिक सत्य है
और पारमार्थिक सत्ता की अपेक्षा कम सत्य ।
१. इहु संसार ते तब ही छूटउ जउ माइया नह लपटावउ ।
माइआ नामु गरभ जोनि का तिह तजि दरसन पावउ ॥
—ग्रन्थ साहब, रागु धनासरी २ ।
२. सभ ते उपाई भरम भुलाई । जिस तू देहि तिहहि बुझाई ॥
—ग्रन्थ साहब, रागु आसा—१ ।
३. माइआ चित्र विचित्र विमोहित बिरला बूझै कोई ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १५० ।
४. रे मन पंछीया न परसि पिंजरै । संसार माया जाल रे ।
येक दिन मे तीन फेरा । तोहि सदा झपै काल रे ॥ टेक ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ७५ ।
५. यहु ममिता अपनी जिनि जानौ । धन जोवन सुत दारा ।
बालू के मंदिर बिनसि जाँहिगे । झूठे करहु पसारा रे नर ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ६२ ।

१७६ नामदेव की हिन्दी कविता
व्यावहारिक ज्ञान के लिए जगत् वास्तविक है। मनुष्य जब इसी में उलझ जाता
है और माया में फँसकर पारमार्थिक सत्य को भूल जाता है तथा अपने नित्य मुक्त, शुद्ध-
बुद्ध स्वभाव को बिसार देता है, तब यह जगत् दुःखमय है, असत्य ही है।
अपरा विद्या की दृष्टि से जीव और जड़ पदार्थ अनेक दिखाई पड़ते हैं। इनके
बिना संसार का चलना कठिन है। यही व्यावहारिक ज्ञान है। व्यावहारिक ज्ञान अथवा
जगत् व्यवहार के लिए जगत् वास्तविक है किन्तु इसे पारमार्थिक सत्ता नहीं मान सकते।
पारमार्थिक सत्य तो ब्रह्म ही है। जगत् परिवर्तनशील तथा विनाशशील है, इसका क्षय
हो जाता है अतः यह अबाधित तत्त्व नहीं और इसलिए सत्य नहीं कहा जा सकता।
यह सत्य दिखाई पड़ता है क्योंकि अध्यारोप के सहारे इन्द्रियाँ उसमें अपने
विषयों का आरोप कर लेती हैं और यह अत्यन्त आकर्षक प्रतीत होने लगता है। यद्यपि
तात्त्विक दृष्टि से यह असत् है, मिथ्या है।
नाम रूपात्मक जगत् का अधिष्ठान मूल तत्त्व ब्रह्म है। उसकी पारमार्थिक सत्ता
है। वह सर्वत्र व्याप्त है। नाम रूपात्मक जगत् का उत्पत्ति, स्थिति तथा लय सब
अन्यतम सत्यन्मय है। वह स्वयं ही जगत् में अभिव्यक्त हो रहा है, उसके अतिरिक्त जगत्
का कोई अस्तित्व नहीं। अतः पारमार्थिक दृष्टि से जगत् मिथ्या है। व्यावहारिक दृष्टि
से जगत् की वास्तविक एवं व्यावहारिक सत्ता है।
ब्रह्म-स्वरूप विश्व का वर्णन नामदेव इस प्रकार करते हैं—'माधव रूपी माली
सयाना है। वह आप ही बगीचा है तथा आप ही माली है। वह आप ही पानी है और
आप ही पवन है। वह आप अपने से प्रेम करता है। वह स्वयं ही चन्द्र तथा सूरज है।
आप ही धरती तथा आकाश है। जिस सृष्टिकर्त्ता ने इस प्रकार सृष्टि की रचना की,
नामदेव उसका दास है।'¹
'तरंग, फेन और बुदबुदा जैसे जल से भिन्न नहीं हैं, वैसे ही यह प्रपंच (संसार)
ब्रह्म की लीला है और उससे अभिन्न है। इस संसार में जीव के रूप में ईश्वर के अति-
१. माधो माली एक सयाना। अंतरिगत रहै लुकानां ॥ टेक ॥
आपै बाड़ी आपै माली, फलौ फलौ कर जोड़े।
आपै पवन आप ही पाणी आपै बरिये मेहा।
आपै पुरिष, नारि पुनि आपै, आपै नेहु सनेहा ॥
आपै चन्द सूर पुनि आपै, आपै धरनि अकासा।
रचनहार बिधि ऐसी रची है, भणवै नामदेव दासा ॥
—सं० ना० हि० प०, पद ११०।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १७७
रिक्त कोई अन्य विचरण नहो करता है ।'१
नामदेव अपने मन को चेतावनी देते हुए कहते है—'रे मन ! तू विषय रूपो
संसार सागर को कैसे पार कर सकेगा ? तू तो झूठी माया को देखकर ही अपने को भूल
गया ।'२
मराठी रचनाओं से उदाहरण
नामदेव कहते है—'यह संसार असार है, माया है, मृगजलबत् है। इसको प्राप्ति
के प्रयत्नों मे अंत में निराश ही होना पड़ेगा अतः परमात्मा की शरण में जाओ ।
निष्काम भाव से भक्ति करो तो तुम्हारा उद्धार होगा ।'३
संसार दुःख पूर्ण होते हुए भी नामदेव कही भी उसका त्याग करने के लिये नही
कहते । उनके अनुसार प्रत्येक भक्त को उत्पादक धम करना चाहिए । प्रत्येक मानव को
अपनी जीविका का काम करते समय हरि-भजन या नाम-स्मरण भी करते रहना
चाहिए । नामदेव ने जीवन पर्यंत अपना पेशेवर कार्य-कपड़े सीने का अर्थात् दर्जी का
काम किया ।४
भक्ति का मार्ग प्रवृत्ति मार्ग है । अत, नामदेव ने भक्ति को अधिक महत्त्व
दिया । उन्होने मुक्ति का निरादर किया और मुक्ति को मुक्ति से उच्चतर मूल्य माना ।
१. जल तरंग अरु फेन बुदबुदा जल ते भिन्न न कोई ॥
इहु परपंचु पारब्रह्म की लीला विचरत आन न होई ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १५० ।
२. कैसे मन तरहिगा रे संसार सागरु बिखै को बना ।
झूठो माइआ देखि के भूला रे मना ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १५१ ।
३. मृगजल डोहो का उपससी वाया । बेगी लवलाह्या शरण रिघें ।
भजे तू विठ्ठला सर्वांभूती भावें । न लगति नावें आणिकाची ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १६८२ ।
४. का करौ जाती का करौ पांती । राजाराम सेऊँ दिन राती । टेक ।
मन मेरा गज जिभ्या मेरी काती । रामरमे काटौं जम की फासी ॥ १ ॥
अनंत नाम का सीऊँ बागा । जा सीजत जम का डर भागा ॥ २ ॥
सीवना सीऊँ हौंसीऊँ ईव सीऊँ । राम बिना हूँ कैसे जीऊँ ॥ ३ ॥
सुरति की सुई प्रेम का धागा । नामा का मन हरि सूँ लागा ॥ ४ ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १८ ।
१२

१७८ नामदेव की हिन्दी कविता
इसी से निष्काम कर्मयोग का सिद्धांत निकलता है। भाव भक्ति को ही कर्म-दृष्टि से
निष्काम कर्मयोग कहा जाता है।
नामदेव का ऐहिक तत्व विचार
नामदेव का लौकिक जीवन विषयक दृष्टिकोण —व्यक्ति अपना ऐहिक जीवन
किस प्रकार व्यतीत करे इस विषय में नामदेव ने जो विचार व्यक्त किये हैं उन्हें एक
पारमार्थिक का प्रकट चिंतन समझना समीचीन होगा। भौतिक जीवन या केवल सुखोप-
भोग का पक्ष ही उसमें व्यक्त नहीं हुआ है। नामदेव का यह ऐहिक तत्त्व विचार अँधेरे
में टटोलने वाले साधकों के लिए मानो उनका लगाया ज्ञान दीप है। अतः नामदेव के
ऐहिक तत्त्व-चिंतन में अंतर्भूत उपदेशों का विशेष महत्त्व है।
जगत्, मानवी जीवन, नर देह तथा कुल की मर्यादा संबंधी प्रदर्शित विचारों से
उनका लौकिक जीवन विषयक दृष्टिकोण स्पष्ट होता है।
नामदेव कहते हैं—'जन्म जन्मांतर के बाद नर-देह मिला है। दुर्लभ मनुष्य जन्म
पाकर भी यदि तूने ईश-भक्ति नहीं की तो तुझे पुनः आवागोन के फेर में पड़ना होगा।
अतः सुखोपभोग के विषयों का त्याग कर आत्मा राम से लौ लगाओ। घर गृहस्थी को
संभालते हुए भी हम उसके प्रति आसक्त न हो और निरन्तर नाम-स्मरण करते रहे।'१
'टूटे फूटे बर्तन चुराये जाने की आशंका नहीं रहती। स्वप्न में हम जिस सुख
का, ऐश्वर्य का उपभोग लेते हैं जागृतावस्था में वह हमारे लिए अनुपयुक्त होता है।
उसी प्रकार भाग्य वश पारिवारिक सुख प्राप्त होता है। नामदेव कहते हैं कि यह संसार
नाशवान् है।'२
यह जगत् (संसार) मदारी के खेल अथवा इंद्रजाल के समान है।३
१. शेवटली पाली तेह्वां मनुष्य जन्म। चुक लिया धर्म फेरा पड़े ॥
एक जन्मी ओलखी करा आत्माराम। संसार सुख भोगूं नका ॥
संसारी असावे असोनि नसावे। कीर्तन करावे वेळोवेळा ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग, १६७७ ।
२. फुटल्या घड्याचे नाही नागवणे ।
संसार भोगणे तेणे न्याये ॥
—सकल संत गाथा, १६६२ ।
३. गारड्याचा खेळ दिसे क्षण भर।
तैसा हा संसार दिसे खरा ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग, १६५७ ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १७६
भवसागर को पार करना दुस्तर है । नामदेव कहते हैं कि संसार से मेरा जी
ऊब गया । काल (यम) मेरे समक्ष उपस्थित है और वह मुझे अपना ग्रास (निवाला)
बनाना चाहता है । १
ऐसे दुःखपूर्ण संसार से ऊबकर नामदेव कहते हैं कि 'हे विठ्ठल ! तूने मुझे भव-
सागर में ढकेल दिया । वे आर्त स्वर से विनय करते हैं कि जन्म-मृत्यु के बीज अज्ञान को
जड़ से नष्ट कर दे ।' २
अभेद भक्ति
ज्ञानेश्वर 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इस उपनिषत्प्रणीत अद्वैत सिद्धात के पुरस्कर्ता थे ।
उनका विश्वास था कि अद्वैत की एकता का संदेश घर-घर पहुँचाने के लिए 'गीता' एक
उत्कृष्ट साधन है । इस प्रकार संत ज्ञानेश्वर के अनुसार भगवद गीता भागवत धर्म का
आद्य तथा प्रमुख अद्वैत प्रतिपादक ग्रन्थ है ।
पंढरपुर का भक्ति संप्रदाय भी अद्वैती है । अतः ज्ञानेश्वर के समान नामदेव भी
अद्वैती है । ज्ञानेश्वर के अनुसार अद्वैत में भक्ति है यह बात न तो सिद्ध करने की है
और न उसका वर्णन ही किया जा सकता है, यह स्वय केवल अपने अनुभव से संबंध
रखता है । अपने 'अमृतानुभव' में वे इसके लिए एक दृष्टांत भी देते हैं—'जैसे एक ही
चट्टान में गुफा, मंदिर, मूर्ति एवं भक्त के भी आकार खुदवाये जाते हैं वैसे ही हमें अभेद
भक्ति का व्यवहार भी समझ लेना चाहिये तथा विश्व एवं विश्वात्मक देव को अभिन्न
मानकर अभेद-भक्ति करनी चाहिए ।' ३
इस प्रकार महाराष्ट्र के संतो की वास्तविक साधना निर्गुण भक्ति ही प्रतीत
होती है और उनकी रचनाओं में जो कुछ उदाहरण सगुण भक्ति के मिलते हैं वे उसके
लिये किये गये प्रारंभिक प्रयोगों जैसे जान पडते है तथा केवल उसी दृष्टि से उनका
कोई महत्त्व भी हो सकता है ।
१. नामा म्हणे थोर उवगलो संसारा ।
काल वैरी पुढ़ारा ग्रासू पाहे ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग, १४२४ ।
२. नामा म्हणे नको पाहो माझी लाज ।
संसाराचे बीज मूल खुड़ी ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग, १६५६ ।
३. देव देऊल परिवारु । कीजे कोरूनि डोंगरु ।
तैसा भक्तीचा वेव्हारु । कां न व्हावा ?
—हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास (चतुर्थ भाग) में उद्धृत, पृ० ८ ।