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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

१२० नामदेव की हिन्दी कविता
हिंदू और मुसलमान दोनो में तीर्थ व्रतादि पाखंडो की सिद्धो और नाथों
दोनो ने कटु आलोचना की है ।
मूर्ति पूजा आदि पूजा की विधिया और बाह्याडम्बरो का तिरस्कार सिद्धो तथा
हठयोगियो दोनो ने किया । इन्ही की परंपरा के कारण सत मत में बाह्य विधानों के
प्रति घोर उपेक्षा बुद्धि का पूर्ण प्रचार था । मुसलमानो के कारण संतो की इस प्रवृत्ति
को प्रोत्साहन मिला । इस प्रकार सत मत पर मुसलमानी प्रभाव मूर्ति पूजा के खडन के
रूप में मिलता है ।
यद्यपि प्रथमत नामदेव विट्ठल मूर्ति के उपासक थे परन्तु बाद में अपने दीक्षा
गुरु बिसोबा खेचर से निगुण निराकार ब्रह्म का उपदेश पाकर वे गदगद हुए । उनकी
भक्ति में जो अध भाव था वह दूर हो गया । अपने मराठी के एक अभग में वे कहते हैं
कि पत्थर की मूर्ति अपने भक्तो के साथ बातें करती है ऐसा कहने वाले तथा सुनने
वाले दोनो भी मूर्ख हैं । १
नामदेव के अनुसार भैरउ, भूत तथा शीतला की उपासना और पूजा व्यर्थ हैं ।
ये कहते हैं कि मै तो मात्र भगवान की भक्ति करता हूँ । २
नामदेव ने बाह्याचारो और मिथ्याडम्बरो का घोर विरोध किया है । वे अपने
मन को सबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मन । अश्वमेध यज्ञ, तुला दान, प्रयाग के
सगम में स्नान, गया म पिण्ड दान आदि सभी बाह्याचार एकनिष्ठ भक्ति के समक्ष हेय
है । हे मन ! तू सभी भेदो का त्याग कर और निरंतर गोविन्द का स्मरण कर । तू
निश्चय ही ससार सागर से तर जायेगा । इसमें सदेह नहीं । ३
भगवान् की पूजा के लिए जल, पुष्प माला, नैवेद्य, दूध आदि का प्रबंध आडम्बर
१ पाषाणाचा देव बोला भक्तांतें ।
सांगते एकने मूर्ख दोघे ।
—पाँच सत कवी, पृ० १५० ।
२ भैरऊ भूत सीतला धावै । खर वाहन ऊहु छार उड़ावै ॥
हऊ तउ एक रमईआ लेअऊ । आन देव बदलाबनि देहऊ ॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २०७ ।
३ असुमेध जगने । तुला पुरख दाने । प्राग इस्नाने ॥
तऊ न पूजहि हरि कीरति नामा ॥
अपुने रामहि भजु रे मन आनसीआ ॥
सिमरि सिमिर गोविंद । भजु नामा तरसि भव सिंध ॥
—पजाबातील नामदेव, पृ० १०४ ।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १२१
पूर्ण है । भले ही पुजारी इन्हे विशुद्ध और पवित्र समझे । कीटो, भ्रमरों, बछड़ो
आदि के द्वारा ये पहले ही जुठला दिये गये है । इससे वे अपवित्र और अशुद्ध है । फिर
ये पूजा की सामग्री कैसे हो सकते हैं ? १
करोड़ो तीर्थ यात्राएं, पिण्ड दान तथा अन्य सभी प्रकार के दान व्यर्थ है । नाम-
देव अपने मन को प्रबोधित करते हुए कहते है कि हे मन ! तू पाखण्ड को छोड़ दे,
कपट न कर तथा नित्य मनोयोग से हरि नाम ले । २
मूर्ति पूजा का खण्डन करते हुए वे कहते है—एक पत्थर पूजा जाता है और
दूसरा ठुकराया जाता है। यदि एक में देवत्व की अनुभूति है तो दूसरे में क्यो
नही ? ३
संत नामदेव का यह तार्किक मन्तव्य सहज भक्ति की मान्यता और आडम्बर
पूर्ण मूर्ति पूजा की व्यर्थता प्रतिपादित करता है ।
योग, यज्ञ, तप, होम, नेम-व्रत आदि बाह्याडम्बर किस काम के ? हे मन ! तू
राम नाम जप । ४
१. आणिले कुसुम गूँथिले माला बाल गोविद हि हार रचूँ ।
पहली बास जुं भंवरे लोनो, जूठनि भेला काई करुँ ।।
आणिने तंदुल रांधिले खीरा बाल गोविंद हि भोग रचूँ ।
पहली दूध जु बछा विटाल्या जूठानि भेला काइ करुँ ।।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६१ ।
२. बानारसी तपु करै उलटि तीरंथ मरै
अगनि दहै काइआ कलपु कीजै ।
असुमेध जगु कीजै सोना परमादानु दीजै ।
रामनाम सरि तऊ त पूजै ।।
छोड़ि छोड़ि रे पाखंडा मन कपटु न कीजै ।
हरिवा नामु नित नित ही लीजै ।।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५६ ।
३. एकै पाथर कीजै भाउ । दूजै पाथर धरीए पाउ ।।
जे ओहु देउ त ओहु भी देवा । कहि नामदेऊ हम हरि की सेवा ।।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५२
४. भइया कोई तू ले रे राम नाम ।
जोग जिग तप होम नेम व्रत ए सब कोने काम ।। टेक ।।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १३८ ।

१२२ नामदेव की हिन्दी कविता
बिना प्रभु पर पूर्ण विश्वास किए तीर्थ व्रत आदि व्यर्थ है। एकादशी का व्रत
एक साधन है। नामदेव कहते हैं कि मै जब गन्तव्य स्थान पर पहुँचा तो मैंने सीढी
का त्याग किया।१
ढोंगी भक्तों पर नामदेव को तरस आता है और वे व्यंग्यपूर्वक कहते हैं—उस
भक्त का क्या कहना जो बिना प्रतीति के पत्थर को पूजता है। नहाता धोता है, गले
में तुलसी की माला पहनता है परन्तु उसका अंत करण कोयले-सा काला है।२
मूर्ति पूजा और बलि का खण्डन नामदेव ने बार बार किया है।३
यदि कोई शरीर को लगे कीचड को कीचड़ ही से स्वच्छ करना चाहे तो उसका
यह प्रयास व्यर्थ होगा। जो भीतर से मलिन और बाहर से स्वच्छ है वह धोखेबाज
है। नामदेव कहते हैं कि हे मन ! सुरभी को छोड़कर भेड़ की पूँछ पकड़ कर तू भव-
सागर को कैसे पार कर सकेगा ?४
लोगों के आडम्बर पर नामदेव को बहुत क्षोभ होता है।५
१. तीरथ बरत जगत् की आस।
फोकट कीजै बिन विस्वास॥ २॥
एकादसी जगत् की करनी।
पाया महल तब तजो निसरनी। —संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५६
२. भगत भला बाबा काढता। बिन प्रतीतिं पूजै सिला॥ टेक॥
न्हायै धोवै करै सनान। हिरदै अँपिन माथै कान॥ १॥
गलि पहिरै तुलसी की माला। अंतरगति कोइला सा काला॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २४।
३. पाहन आगे देव कटीला। वाको प्राण नही वाकी पूजा रचीला॥
निरजीव आगे सरजीव मारै। देषत जनम आपनो हारै॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४७।
४. लागी पंक पंक तै धोवै निर्मल न होवै जनम बिगौवै।
भीतरि मैला बाहरि चोप। पाणी पिह्न पषाले धोपा।
नामदेव कहै सुरही परहरिये। भेड पूँछ कैसे भवजल तरिये।
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २२।
५. मन थिर होइ वा रे न होइ। ऐसा चिह्न करे संसार।
भीतरि मैला धूतिग फिरै। क्यूँ उतरे भव पार॥ टेक॥
रुद्राष सषा जप माला मंडै। ताको मरम न जानै कोई।
आप न देषै और दिपावै। कपट मुक्ति क्यो होई॥ १॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६४।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १२३
हिन्दू धर्म और समाज की बुराइयों पर कबीर ने भी कुठाराघात किया है।
हिन्दुओं के तीर्थ, व्रत, मूर्ति पूजा आदि से उन्हे बेहद चिड़ है। मूर्ति पूजा का खण्डन
करते हुए वे कहते हैं कि पत्थर की मूर्ति को पूजने से यदि परमात्मा मिल सकता है तो
मै पहाड़ को पूजा करूँगा। उसकी अपेक्षा तो यह चक्की भली जिसका पीसा सारा
संसार खाता है। १
जो लोग पत्थर की मूर्ति बनाकर उसे करतार समझकर उसकी पूजा करने हे वे
पाप की धारा में डूब जाते हैं। २
तीर्थ और व्रत बेल के समान संपूर्ण संसार पर छाए हुए हैं। कबीर ने इन
बाह्याचारों को जड़ से ही नष्ट कर दिया। इस विष को कौन खायगा ? ३
भक्ति से रहित जप-तप तथा तीर्थों एवं व्रतों पर विश्वास करना भी भ्रम है। ये
सब तो सेमर के फूल के समान हैं जो देखने में बड़ा आकर्षक पर वस्तुतः सारहीन
है। ४
हे जीवात्मा ! केशों के मुड़ाने से भी कुछ नहीं होता। बंधन का कारण तो
वेश नहीं मन के विकार हैं। तू उस मन को क्यों नहीं मारता जिसमें विषय-विकार
भरे पड़े हैं। ५
केवल वैष्णव बनने से काम नहीं चलता। बिना विवेक के संसार की कोई
१. पाहन पूजे हरि मिले तो मै पूजूँ पहार।
ताते वह चाकी भली पीस खाय संसार ॥
—साखी संग्रह, पृष्ठ १८३ ।
२. पाहण केरा पूतला करि पूजै करतार ।
इही भरोसे जे रहे बूड़े काली धार ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ४३।
३. तीरथ त सब बेलड़ी, सब जग मेल्या छाइ ।
कबीर मूल निकंदिया, कौण हलाहल खाइ ।
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ४४ ।
४. जप तप दीसै थोथरा तीरथ व्रत बेसास ।
सूवै सेंबल सेविया यो जग चल्या निरास ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ४४ ।
५. केसन कहा बिगाड़िया, जे मूंड़े सौ बार ।
मन कौं काहे न मूंडिए जामै विषै विकार ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ४६ ।

१२४ नामदेव की हिन्दी कविता
साधना सफल नही हो सकती। माला तिलक लगाने से ही सफलता नही मिल
सकती।¹
एकेश्वरवाद का प्रतिपादन
जिन परिस्थितियो ने निर्गुंण पथ को जन्म दिया था, एकेश्वरवाद उनकी सब
से बडी आवश्यकता थी। वेदात के अद्वैतवादी सिद्धांतो को मानने पर भी हिन्दू बहुदेव-
वाद में बुरी तरह फँसे हुए थे। एक अल्लाह को माननेवाले मुसलमान भी स्वयं एक
प्रकार से बहुदेववादी हो रहे थे। अतएव निर्गुणवादियो ने हिन्दू और मुसलमानो को
एकेश्वरवाद का संदेश सुनाया और बहुदेववाद का विरोध किया।
वारकरी संप्रदाय में एक देवोपासना का ही महत्त्व है। नामदेव ने बहुदेववाद
का विरोध किया है और एकेश्वरवाद का प्रतिपादन। अपने 'गोविन्द' का परिचय देते
हुए उन्होने कहा है—'वह एक है और अनेक भी है, वह व्यापक है और पूरक भी
है। मैं जहाँ देखता हूँ वहाँ पर वही दीख पड़ता है। माया की चित्र विचित्र बातों
द्वारा मुग्ध होने के कारण सभी कोई इस रहस्य को समझ नही पाते। सर्वत्र गोविन्द
ही गोविन्द है, उसके अतिरिक्त अन्य कोई भी वस्तु नही। वह सहस्त्रो मणियो के भीतर
ओत प्रोत धागे की भाँति इस विश्व मे सर्वत्र वर्तमान है। नामदेव का कथन है कि इस
बात को अपने हृदय में भली भाँति समझ लो कि मुरारी ही एक मात्र घट घट में और
सर्वत्र एक रस भाव से व्याप्त है।२
१. बेसनो भया तो का भया बूझा नही विवेक।
छापा तिलक बनाइ करि दगध्या लोक अनेक ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ४६।
२ एक अनेक विआपक पूरन जत देखउ तत सोई ॥
माइआ चित्र विचित्र विमोहित बिरला बूझै कोई।
सभु गोविन्द है सभु गोबिन्दु है गोविन्द बिनु नहि कोई ॥
सूत एकू मणि सत सहस जैसे उतिपोति प्रभु सोई ॥
जलतरंग अर फेन बुदबुदा जलते भिन्न न होई ॥
इहु परपंचु पारब्रह्म की लीला बिचरत आन न होई ॥
मिथिआ भरमु अरु सुपनु मनोरथ सति पदारथु जानिआ ॥
मुकि मनसा गुरु उपदेसी जागत ही मनु मानिआ।
कहत नामदेउ हरि की रचना देखहु रिदै विचारो ॥
घट घट अंतरि सरब निरंतरौ केवल एक मुरारी ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १५० ।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १२५
संत नामदेव उस एक मात्र राम के प्रति ही अपनी भक्ति का प्रदर्शन करते हैं।
उनका कहना है कि 'जिस प्रकार नाद को श्रवण कर मृग उसमें निरत हो जाता है
और उसका ध्यान मर जाने तक नही टूटता, जिस प्रकार बगला मछली की ओर दृष्टि
लगाये रहता है, उसी प्रकार मेरी दृष्टि भी उसी एक 'राम की ओर लगी हुई है। जहाँ
देखता हूँ यहाँ वही है उसके सिवा और कुछ भी नही।'१
इसीलिए उन्होने उस एक की ही भक्ति को अपनाया था और अन्य देवी-देवताओं
की पूजा को व्यर्थ बतलाया था। उनका कहना है कि जो लोग भैरव का ध्यान करते
है वे भूत होगे और जो शीतला का ध्यान करते हे गधा उनका बाहन होगा और निरंतर
धूल उड़ायेंगे। अब रहा मे, मैं तो मात्र भगवान की भक्ति करता हूँ—भगवान की तुलना
में मै अन्य देवताओ की उपेक्षा करता हूँ।२
अन्य एक स्थान पर वे लिखते है—'एक राम की वदना करने पर मे और
किसी की वंदना न करूँगा। राम-रसायन प्राशन कर मै अन्य देवताओ के सामने न
गिघियाऊँगा। नामदेव कहते है कि एक मात्र राम मेरे जीवन मे रमे हुए है। अन्य
देवता निकम्मे है।३
उस एक के प्रति अपनी अनन्य भावना व्यक्त करते हुए नामदेव कहते है—'मै
अन्य देवो देवताओ को नही जानता। तू सुख का सागर है। मेरे प्राण, माता-पिता,
गुरु आदि तुम ही हो। तुम मेरे सर्वस्व हो, अन्य कोई नही।'४
१. नादि भ्रम जैसे मिरगाए। प्रान तजे वाको धिआनु न जाए॥
ऐसे रामा ऐसे हेरऊ। राम छोड़ि चितु अनत न फेरऊ॥
जह जह देखऊ तह तह नामा। हरिके चरन नित धिआवै नामा॥
—पंजाबातील नामदेव, पृ० १०५।
२. भैरऊ भूत सीतला धावै। खर वाहन ऊहु छार उड़ावै॥
हऊ तऊ एक रमईआ लेअऊ। आन देव बदलावनि देहऊ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद २०७।
३. राम जुहारि न और जुहारौ। जीवनि जाइ जनम कत हारौँ।
आन देव सौं दीन न भाषौँ। राम रसायन रसना चाषौँ।
भणत नामदेव जीवनि रामा। आन देव फोकट बेकामा॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ३०।
४. आन न जानौं देव न देवा। जित जित प्राण तित ही तेरो सेवा ॥१॥
तूं सुख सागर आगर दाता। तूं ही मेरे प्राण पिता गुर माता ॥२॥
नामौ भणै मेरे सब कुछ साईं। मनसा वाचा दूसर नाही ॥३॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १२६।

१२६ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर ने ब्रह्म को निर्गुण एव अरूप बताया है । कई स्थलो पर उन्होंने एक
विशेषण से ब्रह्म को विशिष्ट करके उसका वर्णन किया है। यथा—
जिसने उस एक को जान लिया, उसने सब कुछ ही जान लिया। यदि उस एक
को जाने बिना अन्य अनेको विषयो का ज्ञान प्राप्त कर लिया, तो वह अज्ञान के अति-
रिक्त कुछ नही ।¹
कबीर कहते है कि एक ब्रह्म ज्ञान को प्राप्त न करके यदि अनेको ज्ञान प्राप्त कर
लिए तो उनसे कुछ नही होता । एक से सब हो जाते है पर सबने एक नही बनाया जा
सकता ।²
केवल एक राम को आशा ही उचित है अन्य आशाएं तो व्यर्थ है । जो लोग
ईश्वर की आशा को छोड़कर अन्य की आशा करते हैं वे उन लोगो के समान है जो
पानी मे रह कर भी प्यास मरते हैं ।³
इस कलियुग म मनुष्य अनेक मित्रो को बनाता है लेकिन ये सब दुख-दुख देने
वाले होत हे । परन्तु जिनका हृदय एक से बंध जाता है वही निश्चिंत सो सकता है।⁴
हमन तो एक ही का समझा है, जो दो कहते है उनका तथा जिन्होने उस एक
को नही पहचाना

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १२७
कबीर भगवान को विश्वकर्ता, रक्षक, नियन्ता आदि व्यवहार के लिए मानते
हैं। भगवान का यह स्वरूप कबीर के लिए गौण है। कबीर का ब्रह्म घट-घट वासी एक
सर्वव्यास तत्त्व है। उसका रक्षक, संहारक स्वरूप तो केवल जगत् व्यवहार के
लिए है।१
कबीर ने इस्लामी एकेश्वर तथा अपने ब्रह्मैक्य के अंतर को स्पष्ट कर दिया
है।२ एक खुदा या अल्लाह संख्या में बँध जाता है परन्तु कबीर का सत्य तत्त्व सर्व-
व्यापी है और संख्या से अतीत है।
जब प्रभु सर्वत्र व्याप्त है तब उसे मंदिर या मसजिद की परिधि में नहीं बाँधा
जा सकता ।३
अखण्ड एवं सर्वत्र व्याप्त सत्ता को भेद-बुद्धि से दो या अनेक कहना मोटी बुद्धि
अथवा मूर्खता का काम ही कहा जा सकता है।४
निर्गुणी एकेश्वर के भक्त को अलंकारिक भाषा में पतिव्रता नारी कहते हैं।
कबीर की दृष्टि में बहुदेववादी उस व्यभिचारिणी स्त्री के समान है जो अपने पति को
छोड़कर जारों पर आसक्त रहती है।५
चरनदास कहते हैं कि सिर टूट कर पृथ्वी पर भले ही लोटने लगे, मृत्यु भले
ही आ उपस्थित हो परन्तु राम के सिवा किसी अन्य देवता के सामने मेरा सिर
न झुके।६
१. कहै कबीर विचारी करि ये ऊले व्योहार ।
याही थे जे अगम है सो बरतै रह्या संसारि ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २४३ ।
२. मुसलमान कहे एक खुदाई,
कबीरा को स्वामी घटि घटि रह्यो समाइ ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २०० ।
३. खालिक खलक, खलक में खालिक सब घट रह्या समाई ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १०४ ।
४. कहै कबीर तरक दोइ साधे ताकी मति है मोटी ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १०५ ।
५. नारि कहावै पीव की रहे और संग सोय ।
जार सदा मनमे वसै, खसममुखी क्यो होय ॥
—संत वाणी संग्रह, पृष्ठ १८ ।
३. यह सिर नवे त राम कूँ नाही गिरयो टूट ।
आन देव नाहि परसिए यहु तन जायौ छूट ॥
—सत वाणी संग्रह, पृष्ठ १४७ ।

१२८ नामदेव की हिन्दी कविता
दादू के राम और अल्लाह, अलख, इलाही सब एक ही है ।१
कबीर कहते हैं कि जिन्होंने एक परमात्मा को माना उन्हों को सत्य का साक्षा-
त्कार हुआ । जो उससे लौ लगाते हैं वे आवा-गौन के फेर से मुक्त हो जाते हैं ।२
कथनी तथा करनी में एकरूपता
अपनी तीव्र सामाजिक चेतना के कारण संत व्यावहारिकता एवं आदर्श में
संतुलन स्थापित करने के पक्षपाती थे । इसलिए उनके साहित्य में किसी भी प्रकार की
अतिवादिता के प्रचार की गंध नहीं मिलती । व्यवहार और आदर्श के साथ ही इन
संतो ने विचार और आचरण में भी सामञ्जस्य लाने पर जोर दिया । उनके साहित्य में
भी केवल काल्पनिक बातों और विचारों का ही प्राचुर्य नहीं है । उन्होंने जो कुछ भी
लिखा है अपने अनुभव के आधार पर तथा अपने उपदेशा पर आचरण करके ही लिखा
है । उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तो एवं उनके दैनिक आचरण में कोई विरोध कदाचित
ही मिले ।
सांसारिक व्यक्तियों की सामान्य प्रवृत्ति होती है कि वे कहते कुछ हैं और करते
कुछ और हैं । संतो के अनुसार मनुष्य को वैसा ही आचरण करना चाहिए जैसा वह
उपदेश देता हो । सभी निर्गुण कवियों में इस ढंग की बात मिलती है । नामदेव ने भी
'करनी के बिना कथनी' की आलोचना की है । उनके अनुसार भक्त और परमात्मा में
कोई अन्तर नहीं है । जा इस प्रकार का अन्तर मानता है वह नर पशु है । जो परमात्मा
को छोड़कर वेद-विधि से कार्य करता है वह जल भुन कर मर जाता है । गर्वित बातें
तो बहुत बढ़ बढ़कर बनाता है किन्तु विरला ही कोई उनको कार्यान्वित करता है ।३
१. एकै अलह राम है समरथ सांई सोइ ।
मैदे के पकवान सम खाता होइ सो होइ ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २५६,
२. एक-एक जिनि जांणिया तिनहि सब पाया ।
प्रेम प्रीति ल्यौ लोन मन, तबहुरि न आया ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १६ ।
३. भगवंत भगता नही अंतरा ।
जै करि जानै पशुआ नरा ॥ टेक ॥
छाड़ि भगवत वेद विधि करै ।
दाझै सूजै जारंम परै ॥ १ ॥
कथनी बदनी सब कोई कहै ।
करनी जन कोई बिरला रहै ॥ २ ॥

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १२६
जब तक अंतःकरण शुद्ध नहीं है तब तक ध्यान, जप आदि के करने से क्या
लाभ ? सांप केंचुली छोड़ देता है परन्तु विष नही छोड़ता ।¹
पाखंड पूर्ण भक्ति से राम नहीं रीझते, रीझते हैं तो आँख के अंधे ही ।²
जब तक अंतःकरण शुद्ध न हो तब तक नहाने धोने से क्या लाभ ? गले में तो
तुलसी की माला है और अंतःकरण कोयले सा काला है ।³
नाचने गाने तथा घिस घिस कर चंदन लगाने से क्या लाभ ? यदि तूने स्वयं
को नहीं पहचाना तो समझना होगा कि भ्रम में पड़ा तेरा मन चारों ओर भटक रहा है ।⁴
कबीर ने 'करनी बिना कथनी' की निन्दा की है। उनके अनुसार जब तक
मनुष्य के वचन और कर्म में सामंजस्य नहीं होता तब तक उसका सारा परिश्रम व्यर्थ
है। जो लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं वे मनुष्य नहीं पशु हैं और अंत समय वे
नरक को प्राप्त होते हैं ।⁵
केवल बाह्य रूप से राम नाम की रट लगाने से कुछ नहीं होता जब तक हृदय
में उसका महत्त्व नहीं जाना जाता । कबीर कहते हैं कि मनुष्य राम नाम का कीर्तन
बड़े जोर से मुख उठाकर करता है। वह वास्तविकता को न पहचान कर बिना सिर
कहत नामदेव ममता जाइ।
तो साध संगति में रहा समाई ॥ ३ ॥
—सत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ११७ ।
१. काहे कू कीजै ध्यान जपना । जो मन नाही सुध अपना ॥
सांप कांचली छांड़ै बिख नहीं छाड़ै । उदिक में बग ध्यान माड़ै ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २३ ।
२. पापड भगति राम नही रीझै । बाहुरि आंधा लोक पतीजै ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २१ ।
३. न्हावै धोवै करै सनांन । हिरदै आपिन भाथै कान ॥१॥
गलि गलि पहिरै तुलसी की माला । अंतरगति कोइला सा काला ॥२॥
—सत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २४ ।
४. का नाचीला का गाईला । का घसि घसि चंदन लाईला ॥टेक॥
आपा पर नहिं चीन्हीला । तो चित चितारे डहकीला ॥१॥
—सत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २० ।
५. जैसी मुख तैं नीकसै, तैसो चालै नाहिं ।
मानिष नहिं ते स्वान गति, बांध्या जमपुर जाहिं ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ३८ ।
६

१३० नामदेव की हिन्दी कविता
के ढोर के समान कार्य करता है । १
कबीर साहब कहते हैं कि कथनी खाड के समान मीठी है परन्तु करनी अर्थात्
कृति प्रत्यक्ष जहर का घूंट है । मनुष्य यदि लंबी-चौड़ी बातें बनाना छोड़कर कृति को
महत्त्व दे तो विष का अमृत बन जाये । २
कबीर साहब ने अपनी एक साखी में बतलाया है कि वास्तव में 'सहजसील'
के ही अभ्यास में मेरे 'मत' का सार आ जाता है । इस 'सहजसील' का परिचय देते
हुए वे एक स्थान पर कहते हैं कि इसके लिए कम से कम सती, संतोषी, सावधान,
शब्दभेदी तथा सुविचारवान होने की आवश्यकता है जो सद्गुरु के प्रसाद अथवा अपार
कृपा पर निर्भर है । ३
इनमें से 'सुविचार' का गुण हमारे भीतर सारग्राहिता की भावना जागृत करता
है तथा उसी प्रकार कथनी और करनी के बीच सामंजस्य बनाये रखने का भी यत्न
करता है । इस प्रकार के सहजसील का अभ्यास निरंतर होना रहना चाहिये । इसके
सफल हो जाने पर ही हमें उस सहजावस्था की भी उपलब्धि हो जाती है जिसमें
'अपनी पांचो ज्ञानेन्द्रियाँ पूर्णत अपने कहने में आ जाती हैं और ऐसा प्रतीत होने
लगता है कि हमें स्वयं परमात्मा का ही स्पर्श अथवा प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है ।' ४
अब कथनी एवं करनी में कोई अंतर नहीं रह जाता । जैसा मुख से निकलता है वैसा
ही अपना दैनिक व्यवहार भी चलता है ।
संत रज्जब करनी तथा कथनी की एकरूपता पर बल देते हुए कहते हैं कि
औषधि बिना पथ्य के तथा पथ्य बिना औषधि का किस काम का ? यदि नामस्मरण
१. करता दीसे कीरतन ऊँचा करि करि तूँड ।
आगे बूझे कुछ नही योही आंधा रूँड ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ३८ ।
२. कथनी मीठी खांड सी करनी विष की सोय ।
कथनी तजि करनी करै विष तैं अमृत होय ॥
—कबीर वचनावली, पृष्ठ २४ ।
३. सती संतोषी सावधान सब्द भेद सुविचार ।
सतगुरु के प्रसाद थैं सहजसील मत सार ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ६३ ।
४. जैसी मुख तैं नीकसै, तैसी चालै चाल ।
पारब्रह्म नेड़ा रहै, पल में करै निहाल ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ३८ ।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १३१
और कृति में मेल न हो तो दोनो की प्रशंसा नही होती ।¹
मनुष्य भजन और साखी गाकर आनंदित होता है कि उसने ईश्वर की भक्ति
कर ली । लेकिन यह सब व्यर्थ है जब तक उस परम तत्व के नाम का ध्यान नही
किया । उसके कंठ में यम का फंदा अवश्य पड़ेगा ।²
भक्ति और ऐहिक कार्य में एकता :
भक्ति और सांसारिक कार्यों को संतो ने अलग अलग नही समझा । भक्ति और
जीविका के कर्मों में कोई विरोध नही क्योकि भक्ति हृदय से होती है और कर्म हाथों
से । इसीलिए उन्होने श्रम और भक्ति दोनों को एक दूसरे का पूरक माना है। श्रम से
भक्ति सहज होती है और भक्ति से श्रम सहज । संतो ने नाम-स्मरण और श्रम साथ
साथ किया ।
इस प्रकार नामस्मरण और कर्म का समन्वय नये वेदांत की अद्वितीय विशेषता
है । कबीर³ भजन और बुनकरी, नामदेव भजन और दर्जी का काम, रैदास भजन
और मोची का काम, सेना भजन और नाई का काम साथ-साथ करते थे । रैदास ने⁴
अपनी समस्या का समाधान करते हुए कहा कि सब प्रतिवाद छोड़कर अहर्निश हरि
स्मरण करना चाहिए ।
प्राचीन वेदांत में भक्ति केवल साधन है, साध्य नही है । इसके विपरीत नया
वेदांत भक्ति को परम साध्य मानता है । यही एक मात्र सार वस्तु है। यह भजन है या
नाम की साधना है । भक्त निशि-दिन भजन करता है । इसका भजन अजपा जप है ।
१. ओषध बिना पथ्य का करै पथ्य बिना ओषधि आदि ।
यूँ सुमिरण सुकृत अमिल, उभे न पावहि दादि ॥
—संत काव्य, पृष्ठ ३४० ।
२. पद गाए मन हरषियां, साषी कहयां आनंद ।
सो तत नाव न जाणिया, गलमे पड़िया फंध ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ३८ ।
३. 'हम घरि सूतु तनहि नित ताना'
—गुरु ग्रन्थ साहब, राग आसा, पद २६ ।
'बूनि बुनि आप आपु पहिरावउ'
—गुरु ग्रन्थ साहब, राग भैरऊ, पद ७ ।
४. अहनिसि हरि सुमिरिये छांडि सकल प्रतिवाद ।
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ ६६ ।

१३२ नामदेव की हिन्दी कविता
भजन के बिना वह जी नहीं सकता। यही उसकी रहनी है। यह भाव-भक्ति है। इसी
को प्रेम लक्षण भक्ति भी कहा जाता है।
नामदेव की भक्ति भी भाव-भक्ति है। वे भी भक्ति तथा ऐहिक कार्य की एकता
पर बल देते हैं। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीविका का काम करते समय
हरि भजन या नाम स्मरण भी करते रहना चाहिए। नामदेव कहते हैं कि मेरा मन
गज है और जिह्वा कैंची है। मैं मन रूपी गज और जिह्वा रूपी कैंची की सहायता से
यम का बंधन काटता हूँ। मैं कपड़ा रंगने और सिलने का काम करता हूँ—घड़ी भर
के लिए भी भगवन्नाम विस्मृत नहीं करता हूँ। १
नामदेव के विचार से राम का ध्यान संसार के सभी आवश्यक कार्य करते हुए
करना चाहिए। उनका कथन है कि 'मेरा मन राम नाम से इस प्रकार बिंधा हुआ है
जैसे स्वर्ण तोलते समय सुवर्णकार का ध्यान तुला की ओर बना रहता है। जिस प्रकार
युवतियाँ सिर पर पानी से भरे घड़े लेकर आपस में मनोविनोद करती हुई चलती हैं
किंतु उनका ध्यान सदा घड़ों पर ही रहता है, जिस प्रकार माता का मन घरेलू झंझटों
में फँसे रहने पर भी पलने में पौढ़ाये हुए अपने बालक की ओर रहता है उसी प्रकार
मेरा मन उसमें लगा रहता है।' २
भाव भगति का प्रतिपादन करते हुए नामदेव एक अन्य स्थान पर कहते हैं कि
हृदय में सच्चा भाव नहीं है और नामदेव हरि का नाम लेता है। हे केशव ! पानी के
बिना नाव कैसे तरेगी ? ३
१. मन मेरो गजु जिह्वा मेरी काती।
मरि मरि काटउ जम की फासी ॥१॥
राँगनि राँगउ सीवनि सीवउ।
राम नाम बिनु घरीय न जीवउ ॥२॥
— संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १८।
२. ऐसो मन राम नामै बेधिला। जैसे कनक तुला चित राखिला ॥टेक॥
आनिले कुंभ भराइले उदिक, राजकुंवारि पुरंदरिये।
हसत बिनोद देत करताली चित सू गागरि राखिला ॥
भणत नामदेव सुनो त्रिलोचन, बालक पलनि पोढ़िला।
अपने मंदिर काज करती, चित सू बालक राखिला ॥
— संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६।
३. अभि अंतर नही भाव, नाम कहै हरि नाव सू।
नीर बिहूनी नाव, कैसे तिरिबो केसवे ॥
— संत नामदेव की हिंदी पदावली, पृष्ठ ११४ (साखी १)

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १३३
अंतःकरण तो काला है और बाहर भक्ति का दिखावा करता है। नामदेव
कहते है कि हरि भजन के बिना उसे निश्चय ही नरकवास मिलेगा ।¹
अंतःकरण तो परमात्मा से अनुरक्त है परन्तु बाहर से उदास है। भाव भक्ति
के कारण मुझे परमात्मा का साक्षात्कार हुआ ।²
भाव-भगति को कबीर ने 'हरि सूं गठ जोरा' कहा है ।³ उनके अनुसार
'भगति' वा भक्ति से तात्पर्य 'हरि नाम का भजन' मात्र है। अन्य बातें अपार दुःख से
भरी हुई हैं ।⁴ नारद के समान कबीर ने भी भक्ति को कर्म, ज्ञान तथा योग से श्रेष्ठ
कहा है। वे उसे मुक्ति का एक मात्र उपाय मानते हैं ।⁵ जब तक भाव-भक्ति न करोगे
तब तक भव सागर कैसे पार कर सकते हो ?⁶
कर्मकांड को कबीर पाखंड ही के अंतर्गत मानते है क्योंकि परमात्मा की भक्ति
तन को स्वयं ही अपने अनुकूल बना लेगी। भक्ति की सच्ची भावना होने से कर्म भी
अनुकूल होने लगेंगे। परन्तु केवल माला जपने से अथवा पूजा पाठ करने से कुछ नही
१. अभि अंतरि काला रहै, बाहरि करै उजास ।
नाम कहै हरि भजन बिन, निहचे नरक निवास ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, साखी २, पृष्ठ ११४
२. अभि अंतरि राता रहै बाहरि रहै उदास ।
नाम कहै मै पाइयो, भाव भगति बिसवास ॥
संत नामदेव की हिंदी पदावली, साखी ३ पृष्ठ ११४
३. कहै कबीर तन मन का ओरा ।
भाव भगति हरि सूं गठ जोरा ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पद २१३, पृष्ठ १६०
४. भगति भजन हरि नांव है दूजा दुख अपार ।
मनसा वाचा कर्मना, कबीर सुमिरण सार ॥
—कबीर ग्रन्थावली साखी ४, पृष्ठ ५
५. भाव भगति बिसवास बिन कहै न संसै शूल ।
कहै कबीर हरि भगति बिन, मूकति नही रे मूल ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २४५
६. जब लग भाव भगति नहीं करिहौ !
तब लग भवसागर क्यूँ तिरिहौ !
—कबीर ग्रन्थावली पृष्ठ २४५

१३४ नामदेव की हिन्दी कविता
हो सकता। यह तो मानो और भी अधिक माया में पड़ना है।१ जब तक भगवान को
भाव-भक्ति से रिझा न लिया जाय तब तक जप, तप, व्रत, संयम, स्नान आदि से क्या
लाभ ?२
सत्संग की प्रधानता
पुरानी व्यवस्था ज्ञानमूलक समाज व्यवस्था की पक्षपाती थी। उसने चातुर्वर्ण्य
का समर्थन किया जिससे कालांतर में अनेक जातियाँ बनी। कबीर जाति-पाँति के
नियमो के कट्टर विरोधी थे। उनकी दृष्टि में सब मनुष्य समान थे तथा भगवद् भक्ति
का सबको समान अधिकार था। 'जाति पाँति पूछै नहि कोई। हरि को भजै सो हरि
का होई' उक्ति इसी सिद्धांत की द्योतक है।
जो हरि का भजन करता है वही हरिजन है। मनुष्य मात्र को हरिजन होना
चाहिये। संतो की जाति नही होती। सभी लोगो को संतो के चरित्र से शिक्षा लेनी है।३
जीवोत्पत्ति की दृष्टि से भी जाति व्यवस्था अप्राकृतिक है। पुराना वेदांत मानव
को उद्भिञ्ज मानता है किंतु कबीर के अनुसार सभी मानव योनिज हैं। भिन्न शरीरो
को धारण करने तथा वंशानुगत क्रमानुसार किसी जाति के परिवार विशेष में जन्म
ग्रहण करने के कारण लोग एक दूसरे को अपने से भिन्न मान लेते हैं। उस एक मात्र
सत्य के प्राकृतिक नियमो पर विचार करने से दो व्यक्तियो में कोई मौलिक अंतर नही
दीख पडता।
निर्गुण मत जाति व्यवस्था का उन्मूलन करता है। अलगाव की प्रथाओ का
खण्डन करता है, बाह्य आडम्बरो के निराकरण की अपील करता है और अंत में भक्ति
पूर्ण कथनी, करनी और रहनी की व्यवस्था करता है। इससे उसने एक नया समाज
बनाया जो 'सत्संग' के नाम से प्रसिद्ध है। यह सत्संग एक समतामूलक, भक्तिमूलक
तथा निजी आर्थिक व्यवस्था वाला संगठन है।
१. जप तप पूजा अरचा जोतिग जग बौराना ।
कागद लिखि लिखि जगत भुलाना मन ही मन न समाना ॥
२. क्या जप क्या तप सयम्रो क्या व्रत क्या इस्नान ।
जब लग जुक्ति न जानिये भाव भक्ति भगवान ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ३२६
३. संतन जात न पूछो निरगुनियां ।
हिंद तुकैं दुइ दीन बने है कछु नही पहुचनियां ॥
—संक्षिप्त संत-सुधा सार, पृष्ठ ४८

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १३५
यह सत्संग विरक्त साधुओं की जमात नहीं है। यह गृहस्थ भक्तों का संगठन
है। उनको यह उत्पादक श्रम तथा अध्यात्म दोनों की शिक्षा देता है। प्रत्येक भक्त को
उत्पादक श्रम करना चाहिए। नामदेव, कबीर, रैदास सेना आदि भक्तों ने जीवन
पर्यंत अपना पेशेवर कार्य किया। नया वेदांत कर्म और अध्यात्म भावना का समन्वय
करता है। सत्संग इस समन्वय को मूर्त रूप देता है।
सत्संगति को भक्ति का प्रमुख साधन माना जाता है। अध्यात्म रामायण में
तो इसे प्रथम साधन कहा ही है। इस साधन को नामदेव ने विशेष महत्व दिया है।
उन्होंने अपनी रचनाओं में उसके आदर्शों का प्रतिपादन किया है।
संतों के सहवास के लिए नामदेव आतुर हैं। वे अपनी आंतरिक अभिलाषा इस
प्रकार व्यक्त करते है—आज मुझे कोई हरि का दास मिले तो परम सुख होगा। वह
मेरे मन में भाव-भगति जाग्रत करेगा, मेरे मन की दुविधा दूर करेगा तब आत्मज्ञान
का प्रकाश फैलेगा। नामदेव कहते हैं कि जब मेरा मन उदास रहता है तब संत समा-
गम से मुझे अपार सुख होता है।१
संसार में ऐसा भक्त विरला ही होता है। हे पंडितो ! तुम वेद तथा पुराणों
का अनुशीलन कर देखो। दही बिलोकर निकाला घृत फिर दही से एक रूप नहीं होता
अग्नि लकड़ी के जितने हिस्से को जलाती है वह फिर लकड़ी नहीं हो सकता। पारस
के स्पर्श से जो लोहा सोना बनता है वह फिर से लोहा नहीं हो सकता। पलाश चंदन
से बेढ़े जाने पर चंदन होता है। इसी प्रकार जो लोग निष्काम भाव से राम से लौ
लगाते हैं वे राम रूप हो जाते हैं।२
१. आज कोई मिलसो मुने राम सनेही।
तब सुख पावै हमारी देही ॥टेक॥
भाव भगति मन में उपजावै। प्रेम प्रीति हरि अंतरि आवै ॥१॥
आपा पर दुविधा सब नासै। सहजै आतम ग्यान प्रकासै ॥२॥
जनु नामा मन परा उदास। तब सुष पावै मिलै हरिदास ॥३॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १०२
२. ऐसे जगथैं दास नियारा।
वेद पुरान सुमृत किन देखो पंडित करहु विचारा ॥ टेक ॥
दधि विलोइ जैसे घृत लीजे। बहुरि न एकठ थाई ॥
पावक दार जतन करि काढ्या, बहुरि न दार समाई ॥१॥
पारस परसि लोह जैसे कंचन बहुरि न म्यंछक होई।
आक पलास बेधीया चंदन, काष्ट कहै नही कोई ॥२॥

१३६ नामदेव की हिन्दी कविता
जो जितना ही हरि के भक्तो से दूर रहेगा वह हरि (परमात्मा) से भी उतना
ही दूर रहेगा । नामदेव कहते हैं कि हरि के उस दास अथवा भक्त की मुक्ति कैसे
होगी ?१
जो अंधे के समान स्थान स्थान पर टटोलता है और संतो को पहचानता नहीं,
नामदेव कहते हैं कि बिना हरि के भक्तो से परिचित हुए वह भगवान को कैसे पा
सकता है ?२
नामदेव कहते हैं कि सब से 'निरवेरता' रखने वाला साधु पूजने योग्य होता है ।३
हीन जाति में पैदा होने की बात नामदेव को खटकती थी ।४ अपने एक पद
में वे कहते हैं—हे परमात्मा ! मेरी जाति हीन है वह किसी से सही नहीं जाती ।५
मैने छीपे के घर जन्म लिया । मुझे गुरु का उपदेश मिला । साधु संतो के
प्रसाद से मुझे भगवान के दर्शन सुलभ हो गये ।६
जे जन राम नाम रंगि राता, छाड़ि करम की आसा ।
घे जन रामे राम समाने, प्रणवत नामदेव दासा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ८२
१. जेता

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १३७
मुझे भला जाति-पाँति से क्या लेना-देना ? मैं तो दिन-रात राम नाम जपता
हूँ । मेरी सोने की सुई और चाँदी का धागा है । नामदेव कहते हैं कि मेरा चित्त
भगवान में लगा हुआ है ।१
कबीर भी इस सत्संग के पुरस्कर्त्ता थे । इस साधन को उन्होंने विशेष महत्त्व
दिया है । वे कहते हैं कि यह शरीर मन के साथ रहता है अर्थात् यह पंछी हो रहा है ।
जहाँ पर मन हो वही शरीर उड़ जाता है । वास्तव में जो जिस संगति में रहता है उसे
उसी प्रकार का फल भी मिलता है ।२ एक अन्य स्थान पर वे कहते हैं कि सत् पुरुष के
समीप बैठना कभी निष्फल नहीं होता । चंदन का वृक्ष यदि छोटा भी हो तब भी उसको
कोई नीम नहीं कह सकता ।३
कबीर साहब कहते हैं कि यह संसार काजल की कोठरी के समान है । इसमें
पैठ कर जो बिना कालिख लगाये बाहर निकल आये उसकी बलिहारी है ।४
अगर तुझे प्रेम की पीर की अनुभूति करना है तो पक्के साधु की संगति कर ।
कच्ची सरसों को कोल्हू में पेलकर क्या फायदा ? उससे न खली मिलती है न तेल ।५
यों तो उन्होंने स्थान स्थान पर साधुओं के गुणों का वर्णन किया है किंतु एक
स्थल पर अत्यन्त संक्षेप में उसकी विशेषताएँ निर्देशित कर दी हैं—ये (संत) 'निरवैरी'
अर्थात् किसी से किसी प्रकार की शत्रुता न रखने वाले होते हैं, 'निहकाम' होने के
१. का करो जाती का करौं पाती । राजाराम सेऊँ दिन राती ।
सुइने की सुई रुपे का धागा । नामे का चितु हरि सू लागा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १८
२. कबीर तन पंछी भया जहाँ मन तहां उड़ि जाइ ।
जो जैसी संगति करे सो तैसे फल खाई ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ४८
३. कबीर संगति साध की कदे न निष्फल होइ ।
चंदन होसी बावना, नींब न कहसी कोइ ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ४६
४. काजल केरी कोठरी, तैसा यहु संसार ।
बलिहारी ता दास की पैसि ज निकसणहार ॥
—संक्षिप्त संत-सुधा-सार, पृष्ठ ७३
५ तोहि पीर जो प्रेम की, पाका सेती खेल ।
काँची सरसों पेरिके खली भया ना तेल ॥
—संक्षिप्त संत-सुधा-सार, पृष्ठ ७३

१३८ नामदेव की हिन्दी कविता
कारण किसी वस्तु की कामना न रखते हुए नि:स्वार्थ होते हैं, उन्हें 'साईं सेती नेहु'
अर्थात् परमात्मा के प्रति पूर्ण प्रेम की भावना रहा करती है और वे सारे 'विषिया सू
न्यारा' अथवा अलग रहने के कारण निर्लिप्त व अनासक्त रहा करते हैं। १
सहज अवस्था
सहज समाधि की स्थिति में भाव-भगति से ओत-प्रोत स्वभाव को कबीर ने
'सहज सील' की संज्ञा दी है और बतलाया है कि किस प्रकार उक्त श्रेणी तक पहुँचे
हुए महापुरुष की प्रवृत्ति एक निराले ढंग की हो जाती है, जिसमें कुछ विशिष्ट गुणों का
समावेश रहा जाता है।
नामदेव ने कई बार 'सहज' शब्द का प्रयोग किया है। उनके अनुसार बाह्य
कर्म काण्डों से कोई लाभ नही। बिना प्रभु पर पूर्ण विश्वास किये तीर्थ व्रत आदि व्यर्थ
हैं। अत लोगो के आडम्बर पर उनको क्षोभ होता है। वे सहज कर्म करना चाहते हैं।
नामदेव सहज साधना को ईश्वर प्राप्ति का सबसे उत्तम मार्ग बतलाते थे।
सहज से उनका अभिप्राय उस निष्काम भक्ति में था जो बिना किसी साधना और कर्म
के तथा बिना पाखंड के सच्चे और सरल हृदय से की जाती है। हृदय में ईश्वर-प्रेम
की सच्ची अनुभूति ही साधक की सहज अवस्था कही जाती है।
नामदेव कहते है—हे परमात्मा ! वेणु बजती है और सारा आकाश गूंज उठता
है, जिससे अनहद-नाद उत्पन्न होता है। लोग अपने आप को नही पहचानते और भ्रम
में डोलते रहते हैं। चन्द्र और सूर्य नाड़ी को सम कर जीव ब्रह्म से मिल सकता है। मैं
सुषुम्ना को तारा मण्डल में लाता हूँ और तृष्णा पर काबू करता हूँ। बिना सायास के
मुझे गगन-मण्डल में स्थान मिला है। अन्तर ध्वनि पर में अपने मन को केन्द्रित करता
हूँ। यह स्थान किसी योगी को बड़ी कठिनाई से मिल सकता है। मैं फूलों तथा पत्तियों
से हरि की पूजा न करूँगा क्योकि वह मन्दिर में नही है। मैने हरि के चरणों पर अपने
आपको समर्पित कर दिया है, अब मेरा पुनर्जन्म न होगा।२
——————————————————
१. निरवैरी निष्कामता साई सेती नेहु।
विषिया सू न्यारा रहै, संतन का अंग एह ॥
—साध, साषीभूत को अंग, कबीर ग्रंथावली, पृ० ५०
२ देवा बेनु बाजै गगन गाजै। सबद अनाहद बोलै।
अंतरि गति की जाने नाही। मूरिख भरमत डोलै ॥ टेक ॥
गगन मडल मै रहनि हमारी। सहजि सुनि गृह मेला।
अंतरि धुनि मै मन बिरमाऊँ। कोई जोगी गम लहैला ॥

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १३६
'पतंग आकाश में उड़ी तब मैने उसे न देखा। जब तक मनुष्य जय-अपजय की
बात सोचता है तब तक उसको परमात्मा की प्राप्ति नही होती। कहना-सुनना जब
समाप्त हो जाता है तभी उसका परिचय मिलता है। जिन्होंने उसका गुणगान किया वे
गये। जो इस संसार को छोड़कर चले गये उनका दूसरो ने गुणगान किया। मैं ऐसे
प्रभु का गुण गाता हूँ जिसका गुण अब तक किसी ने नही गया। नामदेव कहते है—मैं
निष्काम होकर सदा सहज समाधि में मग्न रहता हूँ।''
योगी का शासन युग-युग तक चलता है। वह श्वास का निरोध करता है। वह
अमृत का पात्र भर कर उसका पान करता है। जब योगी ने इस अमृत को प्राप्त करने
का प्रयत्न किया तो उसके पिता ने उसको ऐसा करने से परावृत्त किया और उसकी
माता वियोग से मर गई। नातेदारो ने उससे जो अपेक्षाएँ रखी थी वे पूरी न होने के
कारण उन्होने उसका त्याग किया। योगी अपने चर्मचक्षु बन्द कर अन्त:चक्षु से देखने
लगा। निष्काम होकर वह पंचेन्द्रियों के दासत्व से मुक्त हुआ। नामदेव कहते हैं—योगी
ने सहज समाधि लगा कर निरंजन की सेवा की।२
'परमात्मा सारे संसार में व्याप्त है अतः लोग उसके बारे मे कुछ कह तथा सुन
सकते हैं। उसको अभेद-रूप समझने से अभेद रूप में तथा भेद-रूप समझने से भेद रूप
पाठी तोड़ि न पूजूं देवा। देवलि देव न होई।
नामा कहै मै हरि की सरना। पुनरपि जन्म न होई॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६५।
१. देवा गगन गुडी बैठी मै नाही तब दीठी॥ टेक॥
जब लगि आस निरास विचारे तब लगि ताहि न पावै॥ १ ॥
कहिबौ सुनिबौ जब गत होइबौ तब ताहि परचौ आवै॥ २ ॥
गाये गये गये ते गाये अगई कूँ अब गाऊँ॥ ३ ॥
प्रणवत नामा भए निहकामा, सहजि समाधि लगाऊँ॥ ४ ॥
संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६६
२. जोगी जन न्याइ जुगे जुगि जीवे।
आकास बांधि पाताल चलावै, आप भरे भरि पीवै॥ टेक॥
अमृत पात पिता परबोध्यौ माइ मुँई करि सोय।
भाई बंध की आस न पूगी भाजि गए सब लोग॥ १ ॥
बाहिली मूँदिले माहिली चौंधिले पंच की बास मिटाइ रे।
भणत नामदेव सेवि निरंजन सहज समाधि लगाइ रे॥ २ ॥
संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६७