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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १८१
महाराष्ट्रीय संतों को अद्वैत बोध की श्रेष्ठता, उपयुक्तता कितनी ही क्यों न
प्रतीत हुई हो तथापि उनके मन की अशांतता नाम रूपात्मक ईश्वर की भक्ति ही से दूर
हुई है। विट्ठल भक्त नामदेव तो सगुणोपासकों के अग्रणी थे। उनके मराठी गाथा के
आधे से अधिक अभंग सगुण भक्ति-परक हैं। नामदेव को अपने गुरु विसोबा खेचर से
अद्वैत बोध होने पर 'सर्व नारायण हरो दिसे' की प्रतीति क्षण क्षण को होने लगी।
इस अनुभूति के बल पर वे 'अद्वैतनिष्ठ भक्ति योग' का सांगोपांग आविष्कार अपने
अभंगों में कर सके।
नामदेव ने अपने अभंग में कहा है कि 'भक्ति के बहाने निर्गुण ने विट्ठल के
रूप में सगुण रूप धारण कर लिया। विट्ठल का यह रूप 'नामरूपातीत' है। यह ब्रह्म
ज्ञानरूप है, सगुण तथा निर्गुण दोनों से परे है। उसका वर्णन करते हुए वेद मौन हो
जाते हैं, जो श्रुतियों के लिए भी दुर्बोध है, पुराणों से भी इसका वर्णन नहीं हो सकता।'¹
विसोबा खेचर ने नामदेव को निर्गुण की अनुभूति दिलाकर निर्गुण परब्रह्म ही
के विश्व रूप में सगुण होने का 'अन्वयात्मक' ज्ञान दिया। उन्होंने नामदेव से कहा—
'अन्वयात्मक विचार से तू ऐसे स्थान पर मेरे पैर रख जहाँ परमात्मा नहीं है।'²
यह अन्वयात्मक ज्ञान होने पर नामदेव को अनुभूति हुई कि 'कोई स्थान पर-
मात्मा से रिक्त नहीं है। वह सारे संसार में समाया हुआ है।'³
नामदेव एक ही परमात्मा के सगुण स्वरूप का यह अन्वयात्मक विचार निर्गुण
के अद्वैत का व्यतिरेकात्मक वर्णन कर, प्रस्तुत करते हैं। यह विश्व निर्गुण ब्रह्म का
सगुण रूप है। इसका अर्थ यह उससे भिन्न है, विश्व नाम का उससे भिन्न अस्तित्व
रखने वाला कोई पदार्थ है ऐसा नहीं। यह भासमान विश्व उसकी माया है।
१. निर्गुणीचे वैभव आले भक्ति मिषे । तें हें विठ्ठल वेषे ठसावले ।
चोविसा वेगळे सहस्रा आगळे । निर्गुणा निराळे शुद्ध बुद्ध ।
वेदा पडे मोन श्रुतीतो कानडे । वर्णिता कुवाडे पुराणासी ।
भावाचे आलुक भुजले भक्ति सुखें । दिधले पुंडलीके साचूनिया ।
नामा म्हणे आम्हा अनाथा लागुनि । निडारले नयनी वाट पाहे ।
—सकल संत गाथा, अभंग ३२१ ।
२. जेथे देव नसे तेथे माझे पाय । ठेवी पा 'अन्वय' विचारोनी ।
३. नामा पाहे अवघा जिकडे तिकडे देव ।
कोठे रिता ठाव न दिसेचि ॥
श्रीनामदेव गाथा, अभंग १३४६ ।
( महाराष्ट्र शासन प्रकाशन )

१६२ नामदेव की हिन्दी कविता
निर्गुण सगुण की एकता
निर्गुण सगुण की एकता नामदेव सुवर्ण तथा सुवर्ण से बनी अशरफी के दृष्टांत
द्वारा प्रमाणित करते हैं—'जो सगुण तथा निर्गुण दोनो से परे है, जिसका कोई आकार
नही, वही साकार होकर उपलब्ध हुआ । जल से जैसे बर्फ बनती है उसी प्रकार निरा-
कार पाडुरंग (ब्रह्म) साकार हुआ । जिस प्रकार सुवर्ण तथा उससे बनी अशरफी अभिन्न
होते हैं उसी प्रकार निर्गुण तथा सगुण एक ही ब्रह्म के दो रूप है । पाडुरंग ही संसार
है, संसार ही पाडुरङ्ग है ।'१
आकार के कारण मूल वस्तु से भिन्न कोई अन्य वस्तु निर्मित हुई है ऐसा भास
होता है । वह दूर करने के लिए नामदेव विवर्तवाद का दृष्टांत देते हुए कहते हैं—'एक
ही तत्व एकाकार रूप से सारे संसार में व्याप्त है । वही सारे संसार का संचालन करता
है । इस एकमेव ब्रह्म की प्रतीति हम प्राप्त करें । उससे भिन्न भासमान होने वाला विश्व
मायिक है अतः मिथ्या है ।'२ यहाँ ज्ञानेश्वर के चिद्विलासवाद का प्रभाव स्पष्ट रूप
से दिखाई देता है ।
वेदो का भी यही निष्कर्ष है कि द्वैत तथा अद्वैत से परे सर्वत्र अन्य निरपेक्ष
एकमेव ब्रह्म है—
(१) एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ।
(२) सर्वं खल्विदं ब्रह्म ।
(३) नेह नानास्ति किंचन ।
नामदेव ने अद्वैत सम्बन्धी इन वैदिक सिद्धान्तों का ही उद्घाटन किया है ।
अपने अभिमत अद्वैत सिद्धांत को मृगजल के दृष्टांत द्वारा पुष्ट करते हुए नामदेव
१. निर्गुण सगुण नाही ज्या आकार । होऊनी साकार तोचि ठेला ।
जली जलगार दिसे जैसा परी । तैसा निराकारी साकार हा ॥
सुवर्ण ची घन, घन ची सुवर्ण । निर्गुणी सगुण यथापरी ॥
पाडुरंगी अंगे सर्व झाले जग । निववी सर्वांग नामा म्हणे ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ३३० ।
२. एक तत्व एकाकार सर्व देशी । एक तो देखेसी सकल जनीं ।
ऐसे ब्रह्म पहा आहे सर्व एक । न लगे विवेक करतों कांहीं ।
मिथ्या हे डंबर माया मथितार्थ । हरि हाचि स्वार्थं वेगी करी ।
नामा म्हणे समर्थ बोलिला तो वेद । नाही भेदाभेद ब्रह्मरूपी ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ३३२ ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १८३
कहते हैं—'ब्रह्म में ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। चिन्मय परमात्मा से भिन्न
भासमान होने वाला विश्व मायिक है। मृगजल का जैसे वास्तव में अस्तित्व नहीं होता
उसी प्रकार जड़ विश्व का भी वास्तव में अस्तित्व नहीं है। यहाँ सच्चा अद्वैत की बात
श्रवण करो और उसी आत्म स्वरूप में तल्लीन हो जाओ।'
ज्ञानेश्वर ने 'ज्ञानेश्वरी' में अपने जिस अद्वैत सिद्धांत का सविस्तार प्रतिपादन
किया उसको नामदेव ने संक्षेप में केवल तीन अभंगों में समझाया है। मानो वेदान्त का
सार (निचोड़) ही उन्होंने संक्षेप में परस्पर पूरक दृष्टांतों द्वारा प्रस्तुत किया है।
कुछ विद्वानों की यह धारणा कि नामदेव केवल सगुण भक्त थे, दर्शन से उनका
दूर का भी वास्ता नहीं था, वे ज्ञानी नहीं थे, समीचीन नहीं जान पड़ती। डॉ० पेंडसे
ऐसे विद्वानों की धारणा का खण्डन करते हुए कहते हैं—
'अपनी इस धारणा के अनुसार पांगारकर, रानडे, आजगावकर और विनोबा
भावे द्वारा संकलित नामदेव के अभंगों में, जिनमें उनके दार्शनिक विचार व्यक्त हुए हैं,
ऐसे अभंग नहीं हैं। इसी प्रकार विट्ठल को निर्गुण परब्रह्म के सगुण प्रतीक के रूप में
वर्णन करने वाले अभंगों को उन्होंने प्रधानता नहीं दी। ज्ञानदेव केवल योगी और
ज्ञानी थे तथा नामदेव केवल सगुण भक्त थे। ज्ञान और भक्ति का इन दोनों में जो
बटवारा किया गया है वह भी ठीक नहीं जान पड़ता। निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेव तथा
नामदेव को निर्गुणानुभूति हुई थी। तीनों ज्ञानी भक्त थे। अन्तर इतना ही था कि
ज्ञानेश्वर का यदि ज्ञान मार्ग पर अधिक विश्वास था तो नामदेव का सर्वजन सुलभ
सगुण भक्ति पर। ज्ञानेश्वर की अपील यदि बुद्धि को थी तो नामदेव की भावना को।
इसीलिए एक ज्ञान राज (ज्ञानियों का राजा) हुआ तो दूसरा भक्त-राज अथवा भक्त
शिरोमणि।'
महाराष्ट्रीय संतों ने ज्ञान और भक्ति का अलग-अलग बटवारा नहीं किया जैसा
कि उत्तरी भारत की संत परंपरा में परिलक्षित होता है।
ब्रह्म चाहे निर्गुण हो अथवा सगुण नाम स्मरण के लिए उसे नाम के बंधन में
बंधना ही पड़ता है। नामदेव कहते हैं—'निर्गुण निराकार ब्रह्म जब सगुण रूप धारण
करता है तब उसको नाम और रूप के बंधन में फँसना पड़ता है। अतः उन्होंने 'नाम
वेद' की स्थापना की।'२
१. ज्ञानदेव आणि नामदेवः डॉ० शं० दा० पेंडसे—पृ० ३०१।
२. नाम तेंचि रूप , रूप तेंचि नाम । नामरूपा भिन्न नाही नाही ॥१॥
आकारला देव नामरूपा आला । म्हणोनी स्थापिला नामवेदी ।२।
—सकल संत गाथा अभङ्ग ६६०।

१८४ नामदेव की हिन्दी कविता
भक्तो में ज्ञानी भक्त श्रेष्ठ होता है। नामदेव भक्त शिरोमणि हुए। यदि वे
केवल आर्त भक्त होते तो उनको यह उपाधि न मिलती। विट्ठल के सगुण रूप को भक्ति
करते हुए, उसके मूल निर्गुण स्वरूप से उनका मन यत्किंचित भी विचलित नहीं हुआ।
पंढरपुर में पांडुरंग की मूर्ति की यह विशेषता है कि वह परात्पर निर्गुण परब्रह्म की
प्रतीक है, किसी एक साम्प्रदायिक देवता की नहीं।
अपनी एक मराठी रचना में नामदेव कहते हैं—'निर्गुण ब्रह्म विट्ठल के रूप में
सगुण रूप में व्यक्त हुआ। यह निर्गुण ब्रह्म संध्या वन्दनादि करते समय जो चौबीस
नाम लिए जाते हैं उनसे भिन्न है। 'विष्णुसहस्रनाम' में जिन सहस्र नामों का उल्लेख
आता है उससे अनोखा है, निराला है। इसका वर्णन करते हुए वेद मौन हो जाते हैं।
यह श्रुतियों के लिए भी अगम्य है पुराणों के लिए भी अवर्णनीय है। यह ब्रह्म भक्ति के
वश में है। यह भाव-भक्ति का भूखा है। भक्तवर पुण्डलीक ने यह परब्रह्म विट्ठल की
मूर्ति के रूप में हमारे लिए उपलब्ध कर दिया। यह विट्ठल मूर्ति अनिमेष नेत्रों से हमारी
ओर देख रही है।'१
यह निर्गुण ब्रह्म ही ज्ञानियों का 'ज्ञेय' है।२
ज्ञानोत्तर भक्ति
'ज्ञानी सबके आत्म स्वरूप निर्गुण परब्रह्म का साक्षात्कार होने पर भी भावुकता-
पूर्ण अंतःकरण से तथा निष्काम बुद्धि से ईश्वर के सगुण रूप की भक्ति करते हैं।'३
नामदेव ने आमरण यह ज्ञानोत्तर भक्ति का तथा उसका प्रचार भी किया।
उनके दीक्षा गुरु विसोबा खेचर ने उनको यही उपदेश दिया था। वे कहते हैं—'पंढर-
१ निर्गुणीचे वैष्णव आलें भक्ति मिषें । ते हे विट्ठल वेषें ठसावले ॥
चोविसा वेगळे सहस्रा आगळे । निर्गुणा निराळे शुद्ध बुद्ध ॥
वेदां पडे मौन श्रुतीसी पानडे । वर्णिता कुंठाडे पुराणांसी ॥
भावाचें आसुक भुललें भक्ति सुखें । दिधलें पुंडलीके साधूनिया ॥
नामा म्हणे आम्हां अनाथा लागुनि । निहारले नयनी वाट पाहे ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ३२१ ।
२. ज्ञानियांचे ज्ञेय ध्यानियांचे ध्येय । पुण्डलीकाचे प्रिय सुख वस्तु ॥
ते हे समचरण उभें विटेवरी । पहा भीमातीरी विट्ठल रूप ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ३२४ ।
३. ज्ञानिनस्त्वात्मभूतं मां साक्षात्कृत्यापि निर्गुणम् ।
निर्निमित्तं भजन्त्येव सगुणं द्रुत चेतस ॥

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १८५
पुर ही मेरा तीर्थस्थान है क्योंकि यहाँ अदृश्य, अव्यक्त निर्गुण परब्रह्म का निधान
विट्ठल के रूप में सदैव सामने रहता है। पहले भी महान् भक्तों ने यह निधान प्राप्त
किया था। खेचरजी ने नामदेव को निर्गुण ब्रह्म की अनुभूति कराई ।१ निर्गुण की
अनुभूति होने पर विसोबा खेचर ने नामदेव से सगुण रूप विट्ठल की भक्ति करने के लिए
कहा । इसका कारण यही है कि विट्ठल परब्रह्म के प्रतीक हैं।
परमार्थ ज्ञान की प्राप्ति के कारण मुक्ति तो उनको मिल ही गई थी परन्तु
'ज्ञानादेवतु कैवल्यम् ।' अर्थात् केवल ज्ञान के कारण प्राप्त होने वाली (केवल परब्रह्म
रूप होकर रहने की) कैवल्य मुक्ति नामदेव नहीं चाहते थे। मुक्ति प्राप्त होने पर भी
वे भक्ति-सरिता में अवगाहन करना चाहते थे।
नामदेव ने मुक्ति-सहित भक्ति के निम्नलिखित लक्षण बताये हैं-
(१) परमात्मा के निर्गुण तथा सगुण दोनों रूपों के प्रति समान आकर्षण ।
(२) वृत्ति-सहित मन से चिदाकाश में डुबकी लगाना ।
(३) देह की सुध-बुध भूल जाना ।
(४) ब्रह्मानन्द सहोदर आनन्द की इस अवस्था में कीर्तन करते हुए भावावेश
में आकर गाना तथा नाचना ।२
नामदेव ने अपने अनेक अभंगों में परमात्मा के निर्गुण-परक ज्ञान से मुक्ति का
तथा उसी के सगुण-स्वरूप की भक्ति का वरदान माँगा है-'अन्तःकरण में तेरा त्रिगुण,
निराकार तथा अव्यक्त रूप और बाहर तेरा सगुण, साकार, व्यक्त रूप देखकर मेरा
मन उन्मन हुआ। सन्तों की कृपा से तेरी अंतर्बाह्य व्यापकता मुझे प्रतीत हुई और मुझ
में परिवर्तन हुआ। नामदेव याचना करते हैं कि हे परमात्मा ! तुझमें और मुझमें
१. माझे तीर्थ क्षेत्र पंढरी पे जाण । उघडे निधान दृष्टीपुढे ।
मागे थोर थोरी हेचि पै साधिले । नामयासि दिधले खेचर याने ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १८०७ ।
२. आम्हां वैष्णवांचा कुलधर्म कुळीचा । विश्वास नामाचा सर्व भावें ॥
तरी त्याचे दास म्हणतां लाघिजे । निर्वासना कीजे चित्त आधी ॥
गाऊँ नाचूँ आम्ही आनंदे कीर्तनीं । भक्ति मुक्ति दोन्ही मागूँ देवा ॥
वृत्ति-सहित मन बुडे प्रेम डोही । नाठवती देही देहभाव ॥
सगुणो निर्गुणो एकच आवडी । मनें दिली बुडी चिदाकाशी ॥
नामा म्हणे देवा ऐसी मज सेवा । द्यावी जी केशवा जन्मोजन्मी ॥
—सन्त वचनामृत; रा० द० रानडे, पृ० १०४ ।

१८६ नामदेव की हिन्दी कविता
स्वामी-सेवक भाव हो।१'
नामदेव कहते हैं—'मैंने मोक्ष की कथा सुनी है। उससे मुझे भय लगता है।
मैं केवल मोक्ष, समाधि अथवा स्वर्ग सुख नही चाहता। हे पांडुरंग। अभयदान देकर
मुझे अपने प्रेम की निशानी दो।
'मैं उस मुक्ति को लेकर क्या करूँ जिससे तेरा वियोग हो। वासना-रहित मन
से तेरा स्मरण किया तो तू मुझे सायुज्य मुक्ति देगा। फिर हे वैकुठनायक ! भक्ति का
आनंद मुझे कैसे प्राप्त होगा ?'२
'हे परमात्मा ! पंचेंद्रियों के विषयों के कारण चित्त में जो खलबली मचती है
उसको शांत कर अपने प्रेम-रस के लिए मेरे मन में रुचि निर्माण कर।३
'हे विट्ठल ! तुम कहोगे कि नामदेव इस भक्ति सुख के प्रेम को लेकर क्या बैठे
हो ? 'तत्वमसि' इस महावाक्य के अनुसार तुझे अनुभूति होगी कि तू शुद्ध बुद्ध चैतन्य
है, तू सर्वगत है, सर्वव्यापी है। इस अद्वैत अवस्था में क्रिया, कर्म, कर्ता, भक्त, भजन,
पूजिता, ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, ध्याता, ध्यान, ध्येय आदि जो भेद-मूलक त्रिपुटियाँ हैं, वे
मिथ्या हैं। तेरे लिए ये साधन अनावश्यक हैं। नामदेव कहते हैं—हे पांडुरंग। मैं
केवल्य मुक्ति नही चाहता। वर दे कि जन्म-जन्मांतर में मैं तेरी सेवा करूँ। अपनी
१. बाहेरी भीतरी तुजचि मी देखे। चित तेणे सुखे बेहावले।
सन्त संगे मज पालट हा झाला। पाहता विट्ठला रूप तुझे।
मी-पणा सहित आनन्दी बुडाले। न निघो काही केले चित माझे।
नामा म्हणे एक उरली से वासना। स्वामी सेवकपणा देई देवा॥
—सकल सन्त गाथा, अभंग १६६८।
२. ऐके मोक्षाची मी कथा। तेणे भय वाटे चित्ता।
नामा म्हणे अभयदान। देऊनि सांगे प्रेम खूण॥
—अभंग १७२०।
३. मुक्ति पद भो गा नभिलाषी न चित्ती।
भणी अंतरती पाय तुझे ॥
—अभंग १७३७।
४. इंद्रियाचे व्यापार अवघेचि तोडी।
प्रेम रस गोडी देई मातें ॥
—अभंग १७२१।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १८७
भक्ति का मुझे वर दे।"
सगुणोपासक नामदेव में एक महान् परिवर्तन हुआ। अद्वैत का यह उपदेश कि
ईश्वर तथा भक्त, पूज्य तथा पूजिता, गुरु तथा शिष्य सब तू ही है, नामदेव ने ग्रहण
किया। तदनंतर की अद्वैतानुभूति का वर्णन वे इस प्रकार करते हैं—'मैं अब उस
अवस्था को पहुँच गया हूँ कि जहाँ पहुँचकर मैं ही अपनी भक्ति का आलंबन पंढरीनाथ
हुआ हूँ। मैं ही अपना भक्त हो गया हूँ। बंध और मोक्ष केवल माया-जन्य कल्पनाएँ
हैं। विट्ठलराय की कृपा से मुझे इस सत्य का साक्षात्कार हुआ। अब मे हरि का दास
हो गया हूँ।'२
'हरि का दास होना' का अभिप्राय है अपना व्यक्तित्व हरि के व्यक्तित्व में
विलीन कर देना। इस अवस्था में ईश्वर और भक्त का द्वैत नहीं रहता। यही ज्ञानोत्तर
भक्ति है।
भक्तों में ज्ञानी भक्त सर्वश्रेष्ठ होता है। वह अपने व्यक्तित्व के साथ अपना
सर्वस्व परमात्मा को समर्पण करने के कारण ईश्वर-रूप हो जाता है। उससे भिन्न नहीं
रहता। भक्ति की यह चरम सीमा है। एकरूपता का यह आनन्द अनुभूति से सम्बन्ध
रखता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
नामदेव कहते हैं—केशव के अर्थात् भगवंत के हृदय में अपने भक्तों के लिए
कितना प्रेम है यह नामदेव ही जानते हैं। उसी प्रकार नामदेव के अंतःकरण में
भगवद्विषयक कितना प्रेम है यह केशवराय (पांडुरंग) जानते हैं। नामदेव ही केशव हैं
१. घेऊनिया नाम्या बैससील किती । पहाशील स्थिति अंतरीची ॥
काहीच न होशी विचारी मानसी । चैतन्य तत्त्वमसि शुद्ध बुद्ध ॥
क्रिया कर्म कर्ता नव्हेसी सर्वथा । आहे सर्वगता रूप तुझे ॥
भजता भजन पूजिताशी पूज्य । हेही काय तुज अति विंथा ॥
ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय, ध्याता ध्यान ध्येय । साधिले उपाय नाही तुज ॥
नामा म्हणे मज नकलेचि देवा । मज देई सेवा जन्मोजन्मो ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १७६८ ।
२. मोच माझा देव मोच माझा भक्त । मी माझा कृतार्थ सहज असे ॥
बंध आणि मोक्ष मायेची कल्पना । पडली होती मना कैसी भ्रांती ॥
विठ्ठले विचारे दाखविले सुख । होतें जें असंख्य हारपलें ॥
नामा म्हणे सोय सापडली निकी । झालो एकाएकी हरिचा दास ।
—सकल संत गाथा, अभंग १७६५ ।

१८८ नामदेव की हिन्दी कविता
तथा केशव ही नामदेव है। दोनो एक दूसरे से अभिन्न हैं। हम में (और मुझ में)
द्वैत भाव नहीं है। नामदेव कहते हैं—मैने अपना सर्वस्व तुम्हारे पदकमलों पर अर्पित
कर दिया है।'१
सर्वं खलु इदं ब्रह्म
ईश्वर का साक्षात्कार होने पर नामदेव कहने लगे—'जिधर देखता हूँ उधर
वही एक ईश्वर है जो सर्वव्यापक और सर्वपूरक है। तरंग, फेन और बुद्बुदा जैसे जल
से भिन्न नहीं हैं वैसे ही यह प्रपंच (संसार) ब्रह्म की लीला है और उससे अभिन्न है।
इस संसार में जीव के रूप में ईश्वर के अतिरिक्त कोई अन्य विचरण नही करता है।
नामदेव कहते हैं—रे मानव ! ईश्वर की सृष्टि को अपने हृदय में विचार कर देख,
एक ईश्वर ही घट-घट और चराचर में समान रूप से व्याप्त है।'२
यही 'सर्वं खलु इदं ब्रह्म' महावाक्य की अनुभूति है। नामदेव को सब ओर हरि
चरण दिखाई देने लगे। उनका मन उन्मन हुआ। वासनाएँ ईश्वर में विलीन हुईं।
'सब कुछ ब्रह्म है' की उनको अनुभूति हुई।
निष्काम बुद्धि से राम का जप करने पर राम का साक्षात्कार होता है। भक्त
स्वयं राम हो जाता है। उसको सारा संसार राममय दिखाई देता है। वह आवा-
गौन के फेर से मुक्त हो जाता है जैसे दूध से घी बनने पर वह दूध में परिवर्तित नहीं
हो सकता।
'भगवान से भक्त और भक्त से भगवान है। अद्वैत का यही खेल भक्त और
भगवान के बीच हो रहा है। स्वयं ही देवता, स्वयं ही भक्त तथा स्वयं पुजारी होकर

१. केशवाचे प्रेम नामयाचि जाणे । नाम्या हृदयीं असणें केशवातें ॥
नामा तो केशव, केशव तो नामा । अभिन्नत्व आम्हां केशवासी ।
नामा म्हणे केशवा दुजेपण नाही। परि प्रेम तुझ्या ठायो ठेवियेले ।
—सकल संत गाथा, अभंग १२५६ ।
२. सभु गोबिंदु है सभु गोबिंदु है गोबिंदु बिनु नहि कोई ।
जल तरंग अरु फेन बुदबुदा जल तें भिन्न न कोई ॥
इहु पर पंचु पारब्रह्म की लीला विचरत आन न होई ॥
कहत नामदेउ हरि की रचना देखहु रिदै विचारी ॥
घट घट अंतरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी ॥
—सं० ना० हि० प०, पद १५० ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १८६
वह अपने आपको पूजता है । नामदेव कहते हैं—तुम्हारा भक्त अपूर्ण है, तुम पूर्ण हो ।
इसमे उसे तुम्हारे आश्रय की आवश्यकता है ।'¹
भगवान् तथा भक्त के एकरूप (अभिन्न) होने पर भी भगवान् पूर्ण तथा भक्त
अपूर्ण ही रहता है । नामदेव की इस अनुभूति पर अद्वैत सिद्धांत के महान् प्रतिपादक
श्री० शंकराचार्य के इस श्लोक की छाया दिखाई देती है, जिसमे वे कहते हैं—'हे
प्रभो ! यद्यपि मुझे इस बात का ज्ञान हुआ कि हम दोनों अभिन्न हैं फिर भी मैं तेरा
तथा तू मेरा नहीं है । कहा जाता है कि समुद्र तथा तरंग में भेद नहीं है परन्तु लोग
समुद्र की तरंग कहते हैं न कि तरंग का समुद्र ।'² आचार्य को भी यही अभिप्रेत है कि
भक्त अपूर्ण तथा भगवान् पूर्ण हैं ।
वात्सल्य भक्ति
बारहवी तथा तेरहवी शताब्दी में महाराष्ट्र में स्थिरता-प्राप्त नाथ तथा महानु-
भाव संप्रदायो की अपेक्षा वारकरी संप्रदाय का स्थान असाधारण है । महानुभावों की
कृष्ण भक्ति अधिक तर पुष्टिमार्ग के ढर्रे पर गई है । वारकरियों की विट्ठल भक्ति पावन
गंगा है । उनकी धारणा है—'विठ्ठल माउली प्रेम पान्हा पाल्हावली' अर्थात् विट्ठल-रूपी
माता अपने भक्त-रूपी बालक को स्तन पान कराती है ।
नाथ पंथ के आद्य पुरस्कर्ताओं ने हठयोग पर अधिक बल दिया । पुष्टि-मार्गीय
भक्तो ने अपनी प्रेम लक्षणा भक्ति के लिए कृष्ण का मधुर रूप ही पर्याप्त समझा । नाथ
पंथियों ने अपनी कृच्छ साधना द्वारा मायामोह तथा इंद्रिय-दमन किया परन्तु ज्ञानेश्वर,
नामदेव आदि संतों ने इस भावना का उदात्तीकरण कर उसको पावन किया । भगवान्
तथा भक्त, प्रेमी तथा प्रेयसी की कामुकता पर आधारित वैषयिक संबंध नष्ट होकर,
माता तथा पुत्र की वात्सल्य भावना पर आधारित एक शुद्ध भाव बना ।
१. ठाकुर ते जनु जन ते ठाकुर खेलु परिउ है तोसिऊ ।
आपन देउ देहुरा आपन आप लगावै पूजा ।
जल ते तरंग तरंग ते है जल कहन सुनन कऊ दूजा ॥
कहत नामदेऊ तू मेरो ठाकुर जनु ऊरा तू पूरा ॥
सं० ना० हि० प०, पद १६१ ।
२. सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् ।
सामुद्रो हि तरंगः क्वचन समुद्रो न तारंगः ॥
—श्रीमच्छङ्कराचार्य रचित षट्पदी स्तोत्र, श्लोक ३ ।

१६० नामदेव की हिन्दी कविता
ज्ञानदेव की भाँति नामदेव ने भी इस वात्सल्य भावना का आविष्कार किया है।
वे कहते हैं—'विठ्ठल-मैया का मुझ पर कृपा-छत्र है। स्मरण करते ही वह मुझे स्तन-
पान कराती है। मेरी भूख प्यास बिना बताये ही वह जान लेती है। घड़ी भर के लिए
भी वह मुझे छोड़ने के लिए तैयार नही है।'१
संत जनाबाई ने विठ्ठल को एक ऐसी माता के रूप में चित्रित किया है जिसकी
गोद में तप, कंधे पर सत-रूपी बालक है।२
संत एकनाथ के एक 'भारुड' में यही प्रेम भावना व्यक्त हुई है।३
संत तुकाराम कहते हैं कि विट्ठल रूपी माता के भरोसे हम निश्चित हैं।४
एक अन्य स्थल पर पांडुरंग को 'विठाई माउली' (विट्ठल रूपी मैया) के नाम
से संबोधित करते हुए नामदेव कहते हैं—'यदि तू मेरी माता है तो मैं तेरा बछड़ा हूँ।
तू मेरी हरिणी है तो मैं तेरा छोना हूँ। हे पांडुरंग ! मेरे भव पाश तोड़ दो। तू मेरी
पक्षिणी है तो मैं तेरा अंडज हूँ। तू मुझे दाना चुगा। नामदेव कहते हैं कि परमात्मा
प्रीति के वश होते हैं, आगे पीछे खड़े होकर वे अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।'५
नामदेव की हिंदी रचनाओं में भी भक्त की भगवान के प्रति मिलन उत्कंठा
की मधुर अभिव्यक्ति है। इसे वे 'ताल बेली' शब्द से परिचित कराते हैं जिसका अर्थ
— — — —
१. विठ्ठल माउली कृपेची सावली। आठवितां घाली प्रेम पान्हा।
न सांगता जाणे तान्हे भूक। जवळी व्यापक न विसंबे ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ४७८ ।
२. विठु माझा लेकुरवाला। संगे गोपालाचा मेळा।
जनी म्हणे गोपाला। करो भवताचा सोहळा ॥
—जनाबाईचे अभंग, अभंग ३० ।
३. देव एकनाथाचा वछड़ा ।
४. विट्ठल माझी माय। आम्हा सुखा उणें काय ?
—तुकाराम गाथा, अभंग २२३१ ।
५. तू माझी माउली मी वो तुझा तान्हा। पाजी प्रेम पान्हा पांडुरंगे ।
तू माझी हरिणी मी तुझें पाडस। तोडी भव पाश पांडुरंगे ॥
तू माझी पक्षिणी मी तुझें अंडज। चारा घाली मज पांडुरंगे ॥
नामा म्हणे होसी भक्तीचा वल्लभ। मागे पुढें आम्हा सांभाळिसी ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १५११ ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६१
है व्याकुलता । ऐसी व्याकुलता जिसमें तीव्रता है, आतुरता है। नामदेव कहते हैं—'हे
प्रभो ! तुमसे मिलने के लिए मैं इतना आतुर हूँ जितना एक बछड़ा गाय से मिलने के
लिए व्याकुल होता है। जैसे मछली पानी के बिना तड़पती है—ठीक वैसा ही राम-
नाम के बिना बेचारा नामदेव पीड़ित है ।' १
'हे विट्ठल तू ही मेरी माता है, मेरा पिता है। तुम ही मेरे कुटुम्बी हो ।'२
'गोविंद मेरी माता है। गोविंद मेरे पिता हैं। मेरे सब कुछ गोविंद ही हैं ।' ३
वात्सल्य रस से सिक्त इस प्रेमा भक्ति को वारकरी संप्रदाय के संतों ने अधि-
ष्ठित किया ।
भक्ति और साधना सम्बन्धी व्यावहारिक विचार
आचार्य विनोबा भावे ने संतों के लक्षण इस प्रकार बताये हैं—'आजीविका के
लिए कोई उद्योग निरंतर करते रहना (स्वकर्मणि समाधान), अपने देह से यथाशक्ति
दूसरो का उपकार करना (परदुःख निवारणम्), नाम साधना का अभ्यास करना (नाम
निष्ठा), सत्संग करना (सतो संग.) और अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह
का निरपेक्षतापूर्वक पालन करना ।'४
इनमें से अधिकांश लक्षण नामदेव पर चरितार्थ होते हैं ।
परन्तु संत केवल उपरिलिखित बातों पर ही सहमत नहीं हैं। इसके अतिरिक्त
उनका एक दर्शन है जिसे 'नया वेदांत' कहा जा सकता है। इसमें प्राचीन वेदांत के
अनेक सिद्धांतो का खंडन है। जैसे वर्णाश्रम का खंडन, वेद-पांडित्य का खंडन, ज्ञान
१. पाणीया बिन मीन तलफै । ऐसे राम नाम बिन बापुरो नामा ॥टेक॥
तन लागिले ताला बेली । बछा बिन गाइ अकेली ॥१॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ५६ ।
२. माई तूं मेरे बाप तू । कुटुंबी मेरा बीठला ॥टेक॥
—सं० ना० हिं० प०, पद २४ ।
३. माइ गोव्यंदा बाप गोव्यंदा ।
जाति पांति गुरुदेव गोव्यंदा ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ३५
४. स्वकर्मणि समाधानं परदुःख निवारणम् ।
नाम निष्ठा, सता संगः, चारित्र्य परिपालनम् ॥
—'माध्यम' (नवंबर १९६७) : 'नया वेदांत' शीर्षक लेख ।

line 7: स्वयंभू देव को पहचानते नही।'

  • In L25: स्वभू - it is written स्वभू (or स्यभू? The loop of व is clear, attached to स: स्वभू).
  1. Examine Pad 4 citations:

    • L20: —सं० ना० हि० प०, पद १ ।
    • L23: —सं० ना० हि० प०, पद २ ।
    • L25: —सं० ना० हि० प०, पद २० ।
    • L28: —सं० ना० हि० प०, पद १८ ।
      • Wait, in L28: look at the text: —सं० ना० हि० प०, पद १८ ।
      • Wait, look at पद १८: प०, प द १८ । (there is a space between प and द, looks like प द १८ । or पद १८ ।).
  2. Check line-by-line boundaries precisely:

    • Line 1: मार्ग का खंडन आदि। एक प्रकार से यह प्राचीन अद्वैतवाद का संशोधन है। इसकी कुछ
    • Line 2: विशेषताएं ये हैं—
    • Line 3: `(१) आत्मा को पहचानो और उसका प्रत

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६३
करता हूँ।'१
(४) करनी तथा कथनी में एकता :- सांसारिक व्यक्तियों की सामान्य प्रवृत्ति
होती है कि वे कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। परोपदेश-कुशल तो बहुतेरे होते हैं
परन्तु उपदेश के अनुसार आचरण करने वाले बहुत कम। नामदेव कहते हैं—'जब तक
आत्मा शुद्ध नहीं है तब तक ध्यान, जप, तप आदि करने से क्या लाभ।'२
'पाखण्ड-पूर्ण भक्ति से राम नहीं रीझते, रीझते हैं तो आँख के अंधे ही।३
(५) दुःखी तथा पीड़ितों के प्रति सम्वेदना :- संतों की सब से बड़ी विशेषता
है मानववाद। संत साहित्य मानववाद की भावना से ओत-प्रोत है। मानव के आधा-
त्मिक और लौकिक जीवन को सुखी बनाने के लिए उन्होंने बार-बार सन्मार्ग तथा
कल्याणकारी पथ की ओर संकेत किया है। उन्होंने वर्ग भेद की कटु आलोचना की
है। नामदेव जैसे उदारारय व्यक्ति संसार में सभी को सुख, देखने के आकांक्षी थे।
(६) हरिजनों के सुखी होने की कामना :- हरि के भक्तो के कल्याण की
कामना करते हुए नामदेव कहते हैं—'हरि के दास दीर्घायु हों। अहंकार रूपी पवन
का उनको स्पर्श न हो। वे सदा सुखी रहे। नामदेव कहते हैं कि पाडुरंग जिनकी
वाणी का निधान (थाती) बन गया है, ऐसे संत सदा सुखी हों।'४
(७) जन भाषा का प्रयोग :- संस्कृत और जन भाषा के भेद को बताते हुए
संत रज्जब ने कहा है—'वेद वाणी कूप जल है। वह कष्ट से मिलता है। साखी,
१. मन मेरो गजु जिभ्या मेरी काती। राम रमे काटो जम की फाँसी।
रांगनि रांगउ सीवनि सीवउ। राम नाम बिनु घरीअ न जीवउ॥
—स० ना० हिं० पृ०, पद १८।
२. काहे कू कीजै ध्यान जपना। जो मन नाही सुध अपना॥टेक॥
साँप काँचली छाड़े, विष नहो छाड़े। उदिक मै वग ध्यान मांडे॥
—सं० ना० हिं० पृ०, पद २३।
३. पाषंड भगति राम नहीं रीझै। बाहरि अंधा लोक पतीजै॥
—सं० ना० हिं० पृ०, पद २१
४. आकल्प आयुष्य व्हावे तया कुला। माझिया सकला हरिच्या दासा।
कल्पनेची बाधा न हो कोणे काली। हे संत मंडळी सुखो असो॥
अहंकाराचा वारा न लागो रजसा। माझ्या विष्णुदासा भाविकांसी।
नामा म्हणे तथा असावे कल्याण। ज्या मुखी निधान पांडुरंग॥
—सकल संत गाथा, अभंग ८५३।
१३

१६४ नामदेव की हिन्दी कविता
सबद और रमैनी तालाब का पानी है जो सर्व सुलभ है ।'¹
संतों ने संस्कृत को त्याग कर जन भाषा अपनायी । नामदेव को भागवत धर्म
का महान् संदेश देना था अतः उन्होंने मराठी में रचना की । बाद में उन्होंने हिंदी में
कुछ वाणियाँ कही, जिनका देशभर में प्रचार हुआ ।
इस प्रकार इन विचारों से यह लगता है कि संत नामदेव ने एक नये प्रकार
के वेदांत का निर्माण किया ।
१. वेद सुवाणी कूप जल दुख सू प्रापति होय ।
सबद साखि सरवर सलिल सुख पीवै सब कोय ॥
—रज्जबजी की वाणी ।

पंचम अध्याय
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन
भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानो के काव्य के प्रयोजन
संतों का का आदर्श
काव्य के मूल्यांकन के दो प्रकार
नामदेव की कविता का सामाजिक पक्ष
काव्य निर्मिति के प्रमुख कारण
(१) प्रतिभा (२) व्युत्पन्नता (३) परिश्रम (४) भावात्मकता
नामदेव की कविता का भाव पक्ष
आत्मनिवेदन-परक काव्य, संत काव्य और भक्ति
संत नामदेव की अभंग रचना
आसंतः नामदेव के काव्य का प्रेरणा स्रोत
साक्षात्कार की अनुभूति
नामदेव की कविता में रस
वात्सल्य, शांत और करुण
नामदेव की कविता का कला पक्ष
गीति काव्य
नामदेव का अलंकार विधान, बिंब विधान
नामदेव की छंदो रचना
शैली, नामदेव का असाधारण कर्तृत्व
नामदेव की हिंदी पदावली की भाषा की कुछ विशेषताएं
वाक्य रचना, शब्द-क्रम, बल (emphasis)
नामदेव की हिंदी के कुछ विशिष्ट प्रयोग
विशिष्ट व्याकरणिक रूपों का प्रयोग
संयुक्त क्रियाओं का प्रयोग
नामदेव की हिंदी पर अन्य भाषाओं का प्रभाव
रूप रचना, सर्वनामो का प्रयोग
परसर्गों का प्रयोग, ध्वनि ।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन
किसी कवि की रचनाओं का आलोचनात्मक एवं विवेचनात्मक अनुशीलन करने
के पूर्व यह सर्वथा अपेक्षित होता है कि उसके काव्यादर्श का अध्ययन कर लिया जाय।
साहित्यकार के दृष्टिकोण, तथा उसके लक्ष्य के आदर्श का अध्ययन कर लेने से उसकी
चिंतन पद्धति, विचार शैली और जीवन दर्शन स्वतः स्पष्ट हो जाता है। साहित्यकार
एक जागरूक जीव होता है। उसकी चेतना, व्यापक दृष्टिकोण और दर्शन साहित्य के
पृष्ठों में प्रतिबिंबित होता है।
भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों के काव्य के प्रयोजन
साहित्य के प्रयोजन के विषय में आचार्यों में मतभेद है। कतिपय विद्वान
आनन्द को ही काव्य का मूल प्रयोजन मानते हैं। भामह के मत से काव्य धर्म, अर्थ,
काम, मोक्ष की प्राप्ति का साधन है।¹ 'साहित्य दर्पण' कार भामह के कथन से पूर्णतया
सहमत हैं। भरत, आनन्दवर्धन एवं अभिनव गुप्त आदि विचारक नैतिकता एवं धार्मिकता
के विकास के लिए काव्य को प्रयोजनीय मानते हैं।
पाश्चात्य लेखकों में ब्रैडले के अनुसार काव्य स्वयं अपना साध्य है। वह धर्म,
संस्कृति और शिक्षा आदि का साधन नहीं है। टॉल्स्टॉय के अनुसार काव्य की मुख्य
कसौटी नीति और धर्म है।²
१. धर्मार्थ काम मोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च ।
प्रीति करोति कीर्तिञ्च साधु काव्य निषेवणम् ॥
—भामह
2. In every age and in every human society there exists a religious
sense of what is good and what is bad, common to that
whole society and it is this religious conception that decides
the values of the feelings transferred by Art.
—What is Art (Oxford) p. 128-129.

१६८ नामदेव की हिन्दी कविता
आय० ए० रिचर्डस् का मत अंशतः मम्मट से मिलता है । उसके अनुसार कवि
अपनी कविता 'स्वान्त-सुखाय' या उपदेश देने के लिए करते है अथवा दोनो दृष्टिकोणो
से भी ।१
भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानो के काव्यादर्शों एवं काव्य के प्रयोजनो का अध्ययन
करने पर ज्ञात होता है कि हिंदी के संत कवियो में से किसी ने भी उपर्युक्त आदर्शों
एवं प्रयोजनो मे से एक को भी स्वीकार नहीं किया ।
संतो का काव्यादर्श
नामदेव आदि संतो का काव्य इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने काव्य का
कोई प्रचलित आदर्श ग्रहण नहीं किया । काव्य, काव्य शास्त्र, छन्द, पिंगल आदि के
नियमो का न उन्होंने अध्ययन किया था न इन सब के प्रति उनकी कोई आस्था थी ।
संतों ने यह बात प्रमाणित कर दी कि काव्यशास्त्र के नियमो से अनभिज्ञ भी काव्य
रचना कर सकता है । उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि काव्य के लिए तीव्र अनुभूति
और चिंतन की गहनता अपेक्षित है न कि छन्द, अलंकार, शब्द शक्ति और अन्य गुण ।
संतो ने यह भी सिद्ध कर दिया कि भाव ही काव्य की आत्मा है और जब
काव्य की आत्मा दृढ़ और उच्च है तब फिर बाह्यावरण और अन्य उपकरण स्वतः
जुट जायेंगे । उन्होंने सचेष्ट होकर कविता की रचना नहीं की । उनकी कविता
उस्फूर्त है ।
दत्त-चित होकर संत साहित्य का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि संतो के
साहित्य में उनके काव्यादर्शों की अभिव्यक्ति हुई है । उन्होंने काव्य को कला की दृष्टि से
से नहीं देखा, न उन्होंने काव्य एवं कवि को समाज का सम्मानित सदस्य ही माना है ।
उन्होंने काव्य को आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया । इन कवियों की
रचनाओं में उनके काव्य विषयक आदर्श निहित मिलते है ।
सभी संतो के उद्देश्य ब्रह्म का गुणगान, बाह्याचारों की अवहेलना, सहज भाषा,
सरल शैली तथा अलंकारादि विहीन जनता में प्रचलित अति साधारण छन्द हैं । संतो ने
काव्य के महत्त्व को यहाँ तक स्वीकार किया है, जहाँ तक वह ब्रह्म के स्मरण में सहायक
हो सके, अन्यथा उसकी कोई उपयोगिता नहीं है । उन्होंने आध्यात्मिक जीवन की उन्नति
एवं विकास के लिए काव्य के महत्त्व को स्वीकार किया है । दरिया साहब मारवाड़ वाले
The poets either wish to instruct or to delight or to combine
the both.
—Principles of Literary critcism.

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन १६६
ने संतों का काव्यादर्श सुन्दरतापूर्वक व्यक्त किया है।¹
काव्य के मूल्यांकन के दो प्रकार
किसी भी काव्य का मूल्यांकन दो प्रकार से होता है—साहित्यिक और सामा-
जिक। काव्य समाज के लिए लिखा जाता है अतः उसके सामाजिक पक्ष को भुलाया नहीं जा
सकता। संतों ने साहित्य में अमर स्थान पाने के लिए नहीं बल्कि जनता को प्रबुद्ध
करने के लिए काव्य रचना की। उनमें लोक मंगल या परोपकार की भावना सदैव
जागृत थी। प्रथम हम नामदेव की कविता के सामाजिक पक्ष पर विचार करेंगे।
नामदेव की कविता का सामाजिक पक्ष
संत साहित्य की सर्वप्रथम विशेषता है मानवता को प्रमुखता देना। संत नाम-
देव की कविता भी मानवता के भाव से ओतप्रोत है। वे एक आर्त भक्त थे। परोपकारी
संत थे। उनका अन्तःकरण परदुःखकातर था। अज्ञ जनों के लिए उनके हृदय में अपार
करुणा थी। ऐसे अज्ञ जनों का उद्धार करने की प्रार्थना करते हुए वे कहते हैं, 'ये
संसारी, विषयासक्त तथा पामर जीव परब्रह्म की भक्ति का आनन्द क्या जानें? ईश्वर से
विमुख होने के कारण, समक्ष प्रत्यक्ष अमृत का कलश होने पर भी ये उसकी मिठास
नहीं जानते। ऐसे लोगों के उद्धार की नामदेव प्रार्थना करते हैं।'²
संत साहित्य की दूसरी विशेषता मानववाद है। मानववाद का मूल लक्ष्य है
संसार के सभी जीवों के कष्ट को मिटाना और मानव के अस्तित्व को स्वीकार
करना। मानववादी नामदेव संसार को सुखी और प्रसन्न देखना चाहते हैं। वे प्रार्थना
करते हैं कि 'हरि के दासों को दीर्घायु प्राप्त हो और संत जन सदा सुखी हों।'³
संत साहित्य की तीसरी विशेषता है धार्मिकता। संतों ने धर्म-विषयक विचार
धारा और धारणा में क्रांति उपस्थित कर दी। नामदेव ने स्थान-स्थान पर बाह्याचार
१. सकल कवित्त का अर्थ है सकल बात की बात।
दरिया सुमिरन राम का कर लीजै दिन रात॥
—दरिया साहब का बानी, पृ० ६।
२. तैसी चूक लीजै रे जग जीवना।
अनभवह्या बिना ऐसी लपी न कुरुसनां ॥टेक॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १४८।
३. आकल्प आयुष्य व्हावे तया कुला। माझिया सकळा हरिच्या दासा।
कल्पनेची बाधा न हो कोणो काळी। हे संत मंडळी सुखी असो॥
—सकल संत गाथा।

२०० नामदेव की हिन्दी कविता
एवं आडंबर की निंदा की है। वे कहते हैं कि 'जब तक अपना मन शुद्ध नहीं तब तक
ध्यान और जप किस काम के ?'१ 'छापा, तिलक तथा तुलसी की माला गले में पहनने
से क्या फायदा ? जब हृदय कोयले जैसा काला हो ?'२
संत साहित्य की चौथी विशेषता है जातीयता । मध्ययुगीन संतों ने अपनी वाणी
द्वारा समस्त देश को एक महान् सांस्कृतिक चेतना में बाँध दिया । इस महान् सांस्कृतिक
चेतना के फलस्वरूप जातीयता का विकास हुआ । नामदेवादि संतों ने भाषा के द्वारा
जातीयता का प्रसार और प्रचार किया । कबीर,३ रज्जब४ आदि संतों ने दिखा दिया
कि भाषा की क्या आवश्यकता है और उसका महत्व क्या है । उन्होने उही छंदो का
प्रयोग किया जिनसे जनता परिचित थी । वास्तव में वे जीवन भर जनता के लिए जिये
और मरे ।
संत साहित्य की पाँचवी विशेषता प्रगतिशीलता है । संतों के काव्य के दो विषय
हैं—(१) आध्यात्मिक और (२) लौकिक । संतों से पूर्व उच्च वर्ग का स्वत्व था । मोक्ष
पर उन्हीं का अधिकार था । पर इन संतों ने आध्यात्मिक क्षेत्र में एक क्रांति उपस्थित
कर दी । नामदेव अपने आप को संबोधित करते हुए कहते हैं—'हे नामा ! तू षट् कर्मों
का अनुसरण करने वाले ब्राह्मणों से सरोकार न रख । तेरी भक्ति नष्ट हो जायेगी ।'५
इस प्रकार परंपरागत आध्यात्मिक विचार धारा में संतों ने प्रगति का भी समा-
वेश किया जो समय और देश के लिए अतीव अभीप्सित था ।
जनता को प्रबुद्ध करने के लिए उन्होंने 'संतो' शब्द का प्रयोग किया । जहाँ
जनता को संबोधित किया गया है, उपदेश दिया गया है वहीं भाव की गंभीरता कम है
१. जो सग राम नामे हित न भयो ।
तौ सग मेरी-मेरी करता जनम गयो ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद २२ ।
२. गलि पहिरै तुलसी की माला । अंतरगति कोइलासा काला ॥
—सं० ना० की० हिं० प०, पद २४ ।
३. संस्कीरति है कूप जल, भाषा बहता नीर ।
४. बेद सु वाणी कूप जल दुख सूं प्रापति होय ।
सबद साखि सरवर सलिल सुख पीवै सब कोय ॥
—संत काव्य ।
५. लोक कहै लोकाइ रे नामा ।
षट दरसन कै निकटि न जाइबो । भगति जाइगी जाइ रे नामा ॥
—सं० ना० की हिं० पदा०, पद १७ ।

नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २०१
किंतु जहाँ स्वानुभूति की अभिव्यक्ति है वहाँ घनता और गंभीरता दोनों हैं।
काव्य निर्मिति के प्रमुख कारण
हमारे यहाँ के साहित्यशास्त्रकारों ने काव्य निर्मिति के तीन आवश्यक अंग
बताये हैं। जैसे प्रतिभा, व्युत्पन्नता और परिश्रम। इसके साथ ही साथ भावनात्मकता
को भी काव्य रचना के लिए आवश्यक गुण बताया जाता है। वैसे नामदेव की हिंदी रच-
नाओं में कही भी कवित्व के कारणों की चर्चा नही है। उनकी मराठी की रचनाओं के
आधार पर उनके काव्य गुणों की हम परीक्षा कर सकते हैं।
प्रतिभा
दण्डी के अनुसार प्रतिभा निसर्ग की देन है।¹ यह प्रयत्न द्वारा अर्जित नहीं की
जा सकती। कवि जन्म-जात होता है। उसे ठोक-पीट कर कवि बनाया नहीं जा
सकता।² नामदेव की भी यही धारणा है। वे कहते हैं, 'हे हरि ! तुम्हारी कृपा के
फलस्वरूप वाक् सुमनों की यह माला मैं गूँथ सका।'³
विद्याभूषण के अनुसार प्रतिभा नव-नव उन्मेष धारण करने वाली शक्ति है।⁴
नामदेव की रचनाओं में प्रतिभा के ऐसे नये-नये उन्मेष स्थान स्थान पर पाये जाते हैं।
नन्द के यहाँ के पुत्रजन्मोत्सव का वर्णन करते हुए नामदेव कहते हैं कि 'जो विश्व का
पिता है, जो सारे संसार का सूत्र संभाले हुए है वह अपने आपको नन्द जी का पुत्र
कहलाता है।'⁵
पुराने विषयों को नूतन कल्पनाओं से सँवार कर, सजा कर प्रस्तुत करना प्रतिभा
की विशेषता है। इस दृष्टि से भी नामदेव का काव्य अध्ययनीय है। नरदेह नश्वर है।
१. नैसर्गिकी च प्रतिभा ।
—काव्यादर्श (१ । १०३) ।
2. Poets are born and not made.
३. नामा म्हणे हरि बोलिलो तुम्हिचा बले ।
वाहिली तुलसी दले स्वामी लागी ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १२१८ ।
४. प्रज्ञा नवनवोन्मेष शालिनी प्रतिभा मता ।
५. विश्वाचा जो बाप हाती ज्याच्या सूत्र ।
म्हणवितो तो पुत्र नंदजीचा ॥
—वही, अभंग ४१ ।