सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की दार्शनिक विचारधारा १८६
वह अपने आपको पूजता है । नामदेव कहते हैं—तुम्हारा भक्त अपूर्ण है, तुम पूर्ण हो ।
इसमे उसे तुम्हारे आश्रय की आवश्यकता है ।'¹
भगवान् तथा भक्त के एकरूप (अभिन्न) होने पर भी भगवान् पूर्ण तथा भक्त
अपूर्ण ही रहता है । नामदेव की इस अनुभूति पर अद्वैत सिद्धांत के महान् प्रतिपादक
श्री० शंकराचार्य के इस श्लोक की छाया दिखाई देती है, जिसमे वे कहते हैं—'हे
प्रभो ! यद्यपि मुझे इस बात का ज्ञान हुआ कि हम दोनों अभिन्न हैं फिर भी मैं तेरा
तथा तू मेरा नहीं है । कहा जाता है कि समुद्र तथा तरंग में भेद नहीं है परन्तु लोग
समुद्र की तरंग कहते हैं न कि तरंग का समुद्र ।'² आचार्य को भी यही अभिप्रेत है कि
भक्त अपूर्ण तथा भगवान् पूर्ण हैं ।
वात्सल्य भक्ति
बारहवी तथा तेरहवी शताब्दी में महाराष्ट्र में स्थिरता-प्राप्त नाथ तथा महानु-
भाव संप्रदायो की अपेक्षा वारकरी संप्रदाय का स्थान असाधारण है । महानुभावों की
कृष्ण भक्ति अधिक तर पुष्टिमार्ग के ढर्रे पर गई है । वारकरियों की विट्ठल भक्ति पावन
गंगा है । उनकी धारणा है—'विठ्ठल माउली प्रेम पान्हा पाल्हावली' अर्थात् विट्ठल-रूपी
माता अपने भक्त-रूपी बालक को स्तन पान कराती है ।
नाथ पंथ के आद्य पुरस्कर्ताओं ने हठयोग पर अधिक बल दिया । पुष्टि-मार्गीय
भक्तो ने अपनी प्रेम लक्षणा भक्ति के लिए कृष्ण का मधुर रूप ही पर्याप्त समझा । नाथ
पंथियों ने अपनी कृच्छ साधना द्वारा मायामोह तथा इंद्रिय-दमन किया परन्तु ज्ञानेश्वर,
नामदेव आदि संतों ने इस भावना का उदात्तीकरण कर उसको पावन किया । भगवान्
तथा भक्त, प्रेमी तथा प्रेयसी की कामुकता पर आधारित वैषयिक संबंध नष्ट होकर,
माता तथा पुत्र की वात्सल्य भावना पर आधारित एक शुद्ध भाव बना ।
१. ठाकुर ते जनु जन ते ठाकुर खेलु परिउ है तोसिऊ ।
आपन देउ देहुरा आपन आप लगावै पूजा ।
जल ते तरंग तरंग ते है जल कहन सुनन कऊ दूजा ॥
कहत नामदेऊ तू मेरो ठाकुर जनु ऊरा तू पूरा ॥
सं० ना० हि० प०, पद १६१ ।
२. सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् ।
सामुद्रो हि तरंगः क्वचन समुद्रो न तारंगः ॥
—श्रीमच्छङ्कराचार्य रचित षट्पदी स्तोत्र, श्लोक ३ ।