सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 186, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६१
है व्याकुलता । ऐसी व्याकुलता जिसमें तीव्रता है, आतुरता है। नामदेव कहते हैं—'हे
प्रभो ! तुमसे मिलने के लिए मैं इतना आतुर हूँ जितना एक बछड़ा गाय से मिलने के
लिए व्याकुल होता है। जैसे मछली पानी के बिना तड़पती है—ठीक वैसा ही राम-
नाम के बिना बेचारा नामदेव पीड़ित है ।' १
'हे विट्ठल तू ही मेरी माता है, मेरा पिता है। तुम ही मेरे कुटुम्बी हो ।'२
'गोविंद मेरी माता है। गोविंद मेरे पिता हैं। मेरे सब कुछ गोविंद ही हैं ।' ३
वात्सल्य रस से सिक्त इस प्रेमा भक्ति को वारकरी संप्रदाय के संतों ने अधि-
ष्ठित किया ।
भक्ति और साधना सम्बन्धी व्यावहारिक विचार
आचार्य विनोबा भावे ने संतों के लक्षण इस प्रकार बताये हैं—'आजीविका के
लिए कोई उद्योग निरंतर करते रहना (स्वकर्मणि समाधान), अपने देह से यथाशक्ति
दूसरो का उपकार करना (परदुःख निवारणम्), नाम साधना का अभ्यास करना (नाम
निष्ठा), सत्संग करना (सतो संग.) और अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह
का निरपेक्षतापूर्वक पालन करना ।'४
इनमें से अधिकांश लक्षण नामदेव पर चरितार्थ होते हैं ।
परन्तु संत केवल उपरिलिखित बातों पर ही सहमत नहीं हैं। इसके अतिरिक्त
उनका एक दर्शन है जिसे 'नया वेदांत' कहा जा सकता है। इसमें प्राचीन वेदांत के
अनेक सिद्धांतो का खंडन है। जैसे वर्णाश्रम का खंडन, वेद-पांडित्य का खंडन, ज्ञान
१. पाणीया बिन मीन तलफै । ऐसे राम नाम बिन बापुरो नामा ॥टेक॥
तन लागिले ताला बेली । बछा बिन गाइ अकेली ॥१॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ५६ ।
२. माई तूं मेरे बाप तू । कुटुंबी मेरा बीठला ॥टेक॥
—सं० ना० हिं० प०, पद २४ ।
३. माइ गोव्यंदा बाप गोव्यंदा ।
जाति पांति गुरुदेव गोव्यंदा ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ३५
४. स्वकर्मणि समाधानं परदुःख निवारणम् ।
नाम निष्ठा, सता संगः, चारित्र्य परिपालनम् ॥
—'माध्यम' (नवंबर १९६७) : 'नया वेदांत' शीर्षक लेख ।