सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
१४० नामदेव की हिन्दी कविता
में उसकी प्राप्ति होती है । उसको सहज रूप समझने से वह सहज प्राप्त हो सकता है ।
उसको सुख अथवा दुख रूप समझने से सुख अथवा दुख में उसकी प्राप्ति हो सकती है ।
ज्ञान तथा ध्यान रूप समझने से वह ज्ञान तथा ध्यान रूप में प्राप्त हो सकता है । नाम-
देव कहते है—'यदि मैं कहूँ कि मैंने उसका साक्षात्कार कर लिया तो मैं झूठा और यदि
मैं कहूँ कि मैंने उसे नहीं देखा तो मेरा कथन सत्य से दूर होगा । जब मैं कहता हूँ कि
वह अगम है तो उसकी खोज निरर्थक है । तब उसके बारे में पूछना न पूछने के बराबर
ही है ।'¹
नामदेव अपनी मुक्तावस्था का वर्णन इस प्रकार करते हैं—'हे देव ! तुम्हारा
डंका बजा । पखावज, वीणा आदि वाद्यों के मेल से एक ही सुर निकला । मेरे पैरों में
लोहे की बेड़ी पड़ी है । भव सागर का भय दूर हुआ । मुक्ति मेरी दासी हुई है । बकरी
जब सिंह को खाने लगी तब वह पीठ दिखाकर भागा । नामदेव कहते हैं कि मैंने बाहर
जाते हुए भीतर देखा और इस प्रकार अपनी भक्ति निभाई ।'²
संतों की दृष्टि में सहजशील की साधना ही उनके मत का सार है । इस सहज-
[
नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४१
सद्गुरु के प्रसाद अथवा अपार कृपा पर निर्भर है ।१
सब प्रकार की समाधियो में सहज समाधि को सर्वोत्तम एवं उत्कृष्ट कहा गया
है क्योकि इसमें साधक को आसन, मुद्रा, प्राणायाम, ध्यान, धारणा आदि क्लिष्ट साधना
करने की आवश्यकता नही होती । योग-युक्ति के द्वारा मन को अन्तर्मुखी किया जाता
है । मन केन्द्रीभूत हो जाने पर अपने विकारों से शून्य हो जाता है । केन्द्रीभूत मन
सहजवृत्ति में परिवर्तित हो जाता है । मन साधना की उत्कृष्ट अवस्था सहज समाधि है ।
इसमे मन की सभी वृत्तियां अन्तर्मुखी होकर अन्तर्निहित हो जाती हैं ।
संतों के अनुसार जिस साधना के लिए विशेष प्रयत्न नही करना पडता वही
साधना सहज साधना है ।२
दादू इस सहज साधना के लिए सुमिरन का मार्ग बताते हैं ।३
कबीर कहते है कि ईश्वर प्राप्ति को सभी सरल बताते है लेकिन उस सरल को
जानता कोई नही । जिन भक्तो को सरलतापूर्वक ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है उसी को
वास्तविक सहजावस्था कहते है ।४
कबीर अच्छी तरह जानते थे कि यह देनंदिन व्यवहार की दुनिया और साधारण
मानव जीवन कितना ही तुच्छ और हेय क्यो न हो यदि आत्मा-विस्मृतकारी परम
उल्लासमय साक्षात्कार किया जा सकता है तो इसी के द्वारा किया जा सकता है । वे
सगुण और निर्गुण के झगड़े को व्यर्थ बताते हैं । वे कहते हैं—हे संतो ! मे धोखे की
बात किस सें कहूँ ? गुण मे ही निर्गुण है और निर्गुण में गुण । इस सीधे रास्ते को
छोड़कर कहाँ बहता फिरता जाय ?५
१. सती संतोपी सावधान सबद भेद सुविचार ।
सतगुरु के प्रसाद थें, सहजसील मत सार ॥
--कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ६३ ।
२. कहि कबीर राम नाम न छोड़ी सहजे होइ सु होइ रे ।
कबीर ग्रन्थावली, पृ० २६६ ।
३. साँसै साँस सम्हालना, इक दिन मिलि है आई ।
सुमिरन पेड़ा सहज का सतगुरु दिया बताय ॥
संत वाणी संग्रह भाग १, पृ० ७८ ।
४. सहज सहज सबको कहै, सहज न चीन्हे कोई ।
जिन्ह सहजैं हरिजी मिले, सहज कहीजै सोइ ॥
कबीर ग्रन्थावली, पृ० ४२ ।
५. संतों धोखा कासूं कहिये ।
गुण मे निरगुण निरगुंण मे गुंण है बाट छांड़ि क्यो बहिये ।
कबीर ग्रन्थावली, पद १८०, पृ० १४६ ।
१४२ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर ने सहज समाधि को सर्वोत्तम बताया है। आँखें मूंदे बिना, कान बन्द
किये बिना ही इसकी सिद्धि हो जाती है। सहजभाव के साथ खुली आँखों से भगवान्
को देखना ही सहज समाधि है। एक बार यदि यह सिद्ध हो जाय तो साधक निरन्तर
परमानन्द का रस पान करने में तल्लीन रहता है ।१
यहाँ कबीर ने उन्मनि रहनी को सहज समाधि कहा है। इस स्थिति में द्वैत का
भाव नष्ट हो जाता है। यह अद्वैतावस्था है, सम्पूर्ण विश्व आत्ममय हो जाता है। जीवन
के सभी क्षेत्रों में सहज रूप से आत्म दर्शन उपलब्ध होता रहता है। योगी परिपूर्ण हो
जाता है। उसका मन विकार-रहित होकर केन्द्रीभूत हो जाता है।
हठयोग की साधना
संतों की साधना पद्धति के विषय में विद्वानों ने भिन्न-भिन्न प्रकार के अनुमान
किये हैं। आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार संतों की साधना को वस्तुत आत्मविचार
की साधना कहना उपयुक्त होगा।२ संतों की साधना के स्वरूप निर्धारण में संत कबीर
का प्रमुख हाथ है। डॉ० त्रिगुणायत का अनुमान है कि संत कबीर ने योग के क्षेत्र में
प्रचलित समस्त योग साधनाओं की परीक्षा करके अपना स्वानुभूतिमूलक सहज योग
प्रतिपादित किया जिसका पर्यवसान प्रवृत्तिमूलक भक्ति योग में हुआ।३
संतों ने जिस आत्मविचार को प्रधानता दी है उसके साथ ही अनेक परम्परागत
साधनाओं को भी अपने अन्दर पल्लवित पाया है जिनका प्रभाव मध्य-युग की साधना
पद्धति पर विशेष रूप से था। ये साधनाएँ मुख्यतः हठयोग की साधनाएँ तथा तान्त्रिक
१. सन्तो सहज समाधि भली।
साँई तै मिलन भयो जा दिन ते, सुरत न अंत चली॥
आँख न मूंदूँ कान न रूँधूँ, काया कष्ट न धारूँ।
खुले नैन में हँस हँस देखूं सुन्दर रूप निहारूँ॥
जँह जँह जाऊँ सोइ परिकरमा, जो कुछ करूँ सो सेवा।
जब सोऊँ तब करूँ दंडवत, पूजूं ओर न देवा॥
शब्द निरन्तर मनवा राता, मलिन वचन का त्यागी।
कहै कबीर यह उनमनि रहनी, सो परगट करि गाई।
सुख दुख के इक परे परम सुख, तेहि में रहा समाई॥
—संक्षिप्त संत-सुधा-सार, पृ० ४१।
२. कबीर साहित्य की परख, पृ० ६६।
३. कबीर की विचारधारा, पृ० २६८।
नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४३
उपासनाएँ थी। तांत्रिक उपासनाएँ लोकविरोधी होने के कारण संतों को कभी ग्राह्य न
न हो सकी। इसका कारण सम्भवतः यही है कि संत अपनी मूल विचारधारा में समस्त
धर्म साधनाओ के विकृत एवं जटिल रूप को बाह्याचार ही समझते थे। डॉ० हजारी-
प्रसाद द्विवेदी ने कबीर की साधना पद्धति पर दृष्टिपात करते हुए एक स्थल पर ठीक ही
लिखा है कि कबीर यौगिक क्रियाओ को भी बाह्याचार ही मानते थे। वे उन सारी
क्रियाओं को सहजावस्था की प्राप्ति का कारण नही मानते थे।¹ यही कारण है कि संत
योग की साधनाओ को अपनी साधना का मूल हेतु न मान सके। स्वयं कबीर अनहद का
बजना स्वीकार तो करते है पर वही एक परम सत्य नहीं है, सत्य है उसे बजाने
वाला।²
संतो मे हठयोग का क्लिष्ट रूप नही मिलता। ऐसा प्रतीत होता है कि हठयोग
के जटिल रूप का वर्णन केवल परम्परा निर्वाह मात्र है। यथार्थ में तो मन, वायु तथा
बिंदु की साधना में से किसी एक ही साधना को जब नाथ पंथियो ने स्वीकार कर लिया
तब संतों ने चंचल मन को प्राणायाम की क्रियाओं से अपने अधीन करने के लिए योग
की मूल स्थिति को स्वीकार कर लिया। योग की परिभाषा भी चित्तवृत्तियों के निरोध
को लेकर चलती है।³
हठयोग की भावना संतों में बहुत पहले से चली आई है। नामदेव ने भी इसे
अपनाया है। योगो विसोबा खेचर से दीक्षा लेने के उपरांत प्रतीत होता है कि नामदेव
कुंडलिनी योग साधना में प्रवृत्त हुए और तभी से उनके पदो तथा अभंगो में उसका
उल्लेख होने लगा। नामदेव कहते है—
जहाँ ब्रह्मनाद रूपी सूर्य का प्रकाश है वहाँ संसार के सूर्य, चन्द्रमा आदि दीपक
धूमिल हो जाते है, गुरु-कृपा से मैने उसको जान लिया है। नामदेव कहते है कि इसके
फलस्वरूप मुझ जैसा भक्त भगवान के सहज रूप में समा गया है।⁴
१. कबीर—डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ६३ ।
२. वाजे जंत्र नाद धुनि होई। जो बजावै सो औरे कोई।
बाजो नाचै कौतिग देखा। जो नचावै सो कितहु न पेखा॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० २३१।
३. योगश्चित्तवृत्ति निरोधः । योग दर्शन १, २।
४. जह अनहत सूर उजारा। तह दीपक जले छंछारा।
गुरु परसादी जानिआ। जनु नामा सहज समानिआ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २००।
१४४ नामदेव की हिन्दी कविता
इडा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियो से सम्बन्धित प्राणायाम को मैं रोक रखूँगा।
चन्द्र और नाड़ियो को सम कर मैं ब्रह्म की ज्योति में मिल जाऊँगा। १
योगी दीर्घ-जीवी होते हैं। उनका शासन दीर्घ काल तक चलता है। वह सांस
का निरोध कर उसको नीचे के भाग तक ले जाता है। और लबालब भरे हुए अमृत पात्र
से अमृत प्राशन करता है। नामदेव कहते हैं कि हे साधक ! तू सहज समाधि लगाकर
निरंजन की सेवा कर । २
अपने दिव्य अनुभव का वर्णन करते हुए नामदेव कहते हैं। कि हे परमात्मा !
गुड्डी (पतंग) उडी और आकाश में समा गई। बोलने वाला डोरी में समा गया।
आवागमन का फेर मिट गया। यह गुडी कागज़ की नही है। उसने सहज आनंद की
प्राप्ति होती है। ३
हे विट्ठल ! भौंरे को कमलिनी प्राप्त नही होती अतः वह जनम जनम ठगा जाता
है। मेंढक कुमुदिनी के पास रहता है उसको उसका बुरा-भला कोई स्वाद नही मिलता।
पुष्प की सुगंध पर लुब्ध भ्रमर सो योजन का चक्कर काट कर आता है। पचासो
विषयो का त्याग करने पर भक्ति उत्पन्न होती है और फिर जन्म नही लेना पड़ता। ४
१. इडा पिंगला सुषमनि नारी। पवना भंषि रहाउँगा।
चंद सूर दोउ समि करि राखूँ। ब्रह्म ज्योति मिलि जाऊँगा।
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६६।
२. जोगी जन ग्याइ जुगे जुगि जीवै।
आकाश बाँधि पाताल चलावै आप भरे भरि पीवै ॥ टेक ॥
भणत नामदेव सेवि निरंजन सहज समाधि लगाइ रै॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ६७।
३. देवा आज गुडी सहज उडी, गगन माँहि समाई।
बोलनहारा डोरी समांना। नही आवै नही जाई।
कागद थैं रहित गुडी। सहज आनन्द होई॥
संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७७।
४. वीठला भैंवरा कँवल न पावै। ताथै जन्म जन्म डहरूावै ॥ टेक ॥
दादुर एक बसै पहवणितलि। स्वाद कुस्वाद न पावै।
पहप वास का लुब्धौ भौरा। सो जोजन फिरि आवै ॥ १ ॥
उपजी भगति पचीसूँ परिहरि। बहोरि जन्म नही आवै।
अखंड मंडल निराकार मैं। दास नामदेव गावै ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७८।
नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४५
साक्षात्कार परमार्थ सोपान की अंतिम सीढ़ी है। साक्षात्कार होने के पहले
साधक बहुत बेचैन रहता है, व्याकुल रहता है। उसकी आँखो के सामने अँधेरा छा
जाता है। इसी को ईसाई साधको मे Dark night of the Soul कहा जाता है।
साक्षात्कार की परम उल्लासमयी घड़ी का वर्णन करते हुए नामदेव कहते हैं कि जहाँ
वह दिव्य कांति झिलमिल झिलमिल चमक रही है, जहाँ तूर ढोल, दमामे आदि बाजो
के बजने पर अनहद नाद सुनाई देता है, जहाँ कोटि सूर्यों की तेजोरशि प्रकाशित हो
रही है वहाँ दास नामदेव का मन निश्चल होता है।¹
यद्यपि चित्त की वृत्तियों का निरोध एक कठिन कार्य है फिर भी संतों के लिए
योग का आकर्षण सदैव बना रहा है। संत कबीर इड़ा-पिंगला के माध्यम से गगन
मंडल में घर बनाने की बात करते हैं।² धर्मदास ने हठयोगजनित शून्य महल में
झरनेवाले रस को अपनी साधना का एक अंग माना था।³
वास्तव मे योग मार्ग भी भक्ति मार्ग के ही आश्रित है। यदि भक्ति नही है तो
योग मार्ग वृथा ही है।⁴
यद्यपि संतों ने हठयोग और कुण्डलिनी योग की चर्चा की है किन्तु वह उनका
लक्ष्य नही है। ऐसा प्रतीत होता है कि हठयोग की क्रियाओ का संतो के आविर्भाव
काल में विशेष प्रभाव था। परंपरागत रूप में हठयोग की क्रियाएँ उत्तर भारत में
व्याप्त थीं। संतों में भी इनका निर्वाह मात्र हुआ है। हठयोग का यही रूप हमें संतो
१. झिलिमिलि झिलिमिलि नूरा रे । जहँ बाजे अनहद तूरा रे ॥ टेक ॥
ढोल दमामां बाजै रे । तहाँ शब्द अनाहद गाजै रे ॥ १ ॥
फिर राया जोति प्रकासी रे । जहाँ आपै आप अविनासी रे ॥ २ ॥
जहाँ सूरिज कोटि प्रकासा रे । तहाँ निश्चल नामदेव दासा रे ॥ ३३ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १७० ।
२. अवधू गगन मंडल घर कीजै ।
अमृत झरै सदा सुख उपजै बंकनालि रस पीजै ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ११० ।
३. झरि लागे महलिया गगन घहराय खन गरजै खन बिजुली चमकै ।
लहर उठै शोभा बरनि न जाय । सुन्न महल से अमृत बरसें ॥
—संत काव्य पृष्ठ २४६ ।
४. हिरदै कपट हरि सूं नाही साचौं ।
कहा भयौ जे अनहद नाचौ ।
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १८२ ।
१०
१४६ नामदेव की हिन्दी कविता
की वाणियो में मिलता है।
उलटवासियाँ
'उलटवासी' की व्युत्पत्ति का ठीक पता नही चलता । इसकी रचना का प्रमुख
उद्देश्य किसी बात का किसी विपरीत वा असाधारण कथन के द्वारा वर्णन करना है ।
तदनुसार 'उलटवासी' शब्द को भी 'उलटा' तथा 'वास' जैसे दो शब्दो को जोडकर
बनाया गया, माना जा सकता है। इस दशा में इसका तात्पर्य उस रचना से होगा
जिसमे किसी न किसी अश में उलटी बातें मिलती हो ।
नामदेव की अधिकांश आध्यात्मिक उक्तियाँ उलटवासियो के रूप में अभिव्यक्त
हुई हैं। उलटवासियो की शैली के कारण उनकी शुष्क और नीरस दार्शनिक उक्तियो में
एक विचित्र चमत्कार का समावेश हो गया है। चमत्कार काव्य का प्राण माना जाता
है। नामदेव की उलटवासियो में व्यंजना के विविध रूप भी परिलक्षित होते हैं। प्राय
सभी उलटवासियो मे एक विशेषता पाई जाती है। उनमें विरोध भावना के साथ
प्रतीक शैली और रूपक शैली का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है।
अपनी एक उलटवासी में कहते है—'कितने अचरज की बात है कि पतुरिया
बज रही है और मादल नामक वाद्य नाच रहा है। अग्नि जल में डूब गया। छोटी
ब्याई और उसने हाथी को जन्म दिया। यह देखकर मुझे अचभा हुआ। मदमत्त हाथी
को तुरत काबू मे लाया गया। पंछी बिना पख के उड़ा और कुमुदिनी की डाली पर
जा बैठा। कड़वी निबोरी मुझे मीठी लगती है। मक्खी अपनी आँखों में अंजन आजने
लगी। नामदेव कहते हैं कि गुरु कृपा से जो खोजता है वह पाता है।'१
१. देवा पातुर बाजै मादल नाचे । येवढा अचभा दीठा ।
पूछौ पड़िया पडिता । जल बैसंदर बूठा ॥ टेक ॥
छोटी ब्याई हस्ती जाया । येवढा अचभा पाया ।
ऊभी ऊभी नाथीला । मैमत घूमत आया ॥ १ ॥
पांइन पषि बिनाहो उड़िया । कैर ढाली बैठा ।
नीव सदाफल सुफल फलिया । सो मोहि लागे मीठा ॥ २ ॥
ससे खोग मधे पुरी । भेड तडका काना ।
माषी काजन सारन लागी । ऐसा ब्रह्म गियन्ता ॥ ३ ॥
गाई बियाई बछो जाई । गाई बछो कूं धावै ।
प्रणवत नामदेव गुरु परसादे । जो खोजे सो पावै ॥ ४ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १०१ ।
नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४७
एक ऐसो आश्चर्यजनक घटना घटी कि जिसका वर्णन नही किया जा सकता ।
चोटी की आँखो में गजेन्द्र समा गया । कोई कहता है कि वह (परमात्मा) पास ही है
तो कोई कहता है कि दूर । पानी में रहने वाली मछली खजूर के पेड़ पर चढ सकती
है ? कोई कहता है कि वह इंद्रियों के अधीन है तो कोई कहता है कि यह मुक्त है ।
मूर्ख को वह सहज समाधि द्वारा प्राप्त नही हो सकता । कोई वेद पुराणा का स्मरण
करने के लिए कहता है । सद्गुरु ने निर्वाण पद का वर्णन किया । नामदेव कहते है कि
जिस परम तत्त्व की रूपरेखा नहीं है उसका वर्णन मै कैसे कर सकता हूँ ?'१
'पंडितो इस पद का अर्थ बताओ । मै जब सात वर्ष का था तब मेरी माता पाँच
वर्ष की थी । अगम्य तथा अलक्ष्य का विचार कर देखो । खरगोश ने कुत्ते को छिराया ।
जल की मछली आकाश पर चढ़ गई । गाय बाघ का पीछा कर रही है । बूंद मे
समुद्र नाचता है और बूंद समुद्र में समा गई । नामदेव का एकमात्र सहारा तू ही है ।
तू अलक्ष्य है । मुझे देखा नही जा सकता ।'२
'आहिस्ता आहिस्ता भोजन कैमे किया जाय, यह कहा नही जा सकता । हम
खायें और निर्मल होवें । पहले मै अपनी माता को ही खा गया । तत्पश्चात् सगे जामात
को खा गया । सूर्य को निगल गया तब चंद्र को उगल दिया । फिर मैं श्वशुर को खा
जाऊँगा । तत्पश्चात् पंच लोक निगल जाऊँगा । नामदेव कहते हैं कि यह सिद्धो का
योग है ।'३
१. अदबुद अचंभा कथ्या न जाई । चोटी के नेत्र कैसे गजिंद्र समाई ।
कोई बोले नेरे कोई बोले दूरि । जल की मछली कैसे चढ़ै पजूरि ॥ १ ॥
कोई बोले इंद्री बाध्या कोई बोले मुक्ता । सहजि समाधिन चीन्हे मुगधा । २ ।
कोई बोले वेद सुमृत पुराना । सतगुरु कथीया पद निरवाना ॥ ३ ॥
कहै नामदेव परम तत है ऐसा है । जाके रूष न रेख वरण कहो कैसा ॥४॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७६ ।
२. पांडे एह अरथि लगाई ।
सात वरस को मांहि हो । तब पाँच वरस की माई ॥ टेक ॥
अगम अलेप विचारि देषौ । ससु स्वान छिपाई ।
मीन जलको गगन चढीयी । बाघ पेदे गाई ॥ १ ॥
समंद भीतरि बूँद जावै । बूँद समंद समाई ।
नामदेव के एक सोई । अलप लख्यो न जाई ॥ २ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १०४ ।
३. धोरे धीरे पाइबो कचन न जेवो । आपन पैबो तब नूमल ह्वै बो ॥
पहली पेह्रौं आई माई । पीछे पेह्रौं सगा जंवाई । १ ॥
!
Line 30:
"सटबयो आछे सांगीला। ताद्यै मोक्ष न मुक्ती ॥ ४ ॥"
Wait, let's look at each word in line 30:
Word 1: 'सटबयो' or 'सटवयो'? स + ट + ब/व + य + ो. It looks like 'सटबयो' or 'सटवयो'.
Word 2: 'आछे' (आ + छ + े).
Word 3: 'सांगीला' (स + ा + ं + ग + ी + ल + ा) or 'सांगिला'? There is a matra 'ी' on 'ग': 'सांगीला'।
Word 4: 'ताद्यै' or 'ताथै' or 'ताद्यै'?
Look at the prose: "उसको मोक्ष अथवा मुक्ति नहीं।"
"ताथै" or "ताद्यै"?
Look at line 32: "ताथै जनमि जनमि भटकाये".
In line 30, the word is: त + ा + ध + ् + य + ै ? Or त + ा + थ + ै ?
Wait, look at line 30, fourth word:
It has: त, ा, then a letter with a tail/loop like 'द्य' or 'थ'? In line 32, "ताथै": त, ा, थ, ै.
In line 30, it
नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४६
यदि इस उलटबांसी की इन दो पंक्तियों पर थोड़ा सा ध्यान दिया जाय तो
पता चलेगा कि कबीर जिस 'घड़े' की ओर संकेत कर रहे हैं वह किसी ऐसी वस्तु का
प्रतीक है जो नष्ट कर देने पर ही समुचित उपयोग में लायी जा सकती है। वह वस्तु
(नर-देह) मानव-जीवन से भिन्न नहीं है जिसमें आमूल परिवर्तन लाने पर ही जीवन्मुक्त
की सहज दशा उपलब्ध हो पाती है।
'कबीर ग्रन्थावली' के अंतर्गत उलटबासी का एक अन्य पद इस प्रकार आता
है : 'हे अवधू ! जागते समय नीद मे नही आना चाहिए। ऐसा करना चाहिए जिसमें
न तो हम काल का ग्रास बनें, न हमारा शरीर जरा के कारण जीर्ण हो सके। इसके
लिए चाहिए कि गंगा उलट कर समुद्र को सोख ले, चंद्रमा सूर्य को निगल जाय, रोगी
नव ग्रहों को मार डाले और जल में बिंब प्रकाशित हो उठे। डाल के पकड़ने से मूल
नही दीख पड़ता और मूल के पकड़ने पर फल की प्राप्ति हो जाती है। बाँबी उलटकर
सर्प को लग जाती है और पृथ्वी महारस का पान करती है। गुफा में बैठे रहने पर
सारा संसार दीखने लगता है, बाहर कुछ भी नही सूझ पड़ता। मनुष्य उलटकर बाण
चलाने वाले को ही मार डालता है और यह आश्चर्य विरला ही बूझ पाता है औंधा
घड़ा जल में नही डूबता, सीधा रहने पर पूरा-पूरा भर जाता है और जिसके प्रति
जगत् घृणा प्रदर्शित करता है उसी के प्रसाद से निस्तार होता है।'
एक और उलटबासी को अर्थ-सहित देखिये—
'ऐ भाई ! एक अचंभा देखो। सिंह खड़ा गाय को चरा रहा है। पहले पुत्र
हुआ और तत्पश्चात् माता हुई। गुरु शिष्य के पांव पकड़ रहा है। जल में रहने वाली
मछली पेड़ पर जाकर जनती है। मुर्गे ने बिल्ली को पकड़ कर खा लिया। बैल तो
खड़ा ही रहा और गोनी गृह में प्रवेश कर गई। बिल्ली कुत्ते को दबोच ले गई। पेड़
१. अवधू जागत नीद न कीजै।
काल न खाइ कल्प नही व्यापै देही जरा न छीजै ॥ टेक ॥
उलटी गंग समुंद्र हि सोखै ससिहर सूर गरासै।
नव ग्रिह मारि रोगिया बैठै, जल मे ब्यंब प्रकासै ॥
डाल गह्या थै मूल न सूझै, मूल गह्या फल पावा।
बंबई उलटि सरप कौ लागी, धरणि महा रस खावा।
बैठि गुफा मे सब जग देख्या, बाहरि कछु न सूझै।
उलटै धन कि पारथी मान्यौ, यहु अचिरज कोई बूझै।
औंधा घड़ा न जलमै डुबै, सूधा सूभर भरिया।
जाकौ यहु जग धिणा करि चालै, ता प्रसादि निस्तरिया।
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ १४१-१४२।
१५० नामदेव की हिन्दी कविता
की जड़ को ऊपर रख और डाली, पत्ती आदि को नीचे कर दे। इस जड़ में फूल खिले
हैं। इस पद को जो समझ जाये, वह त्रिलोक को समझ सकता है।' १
इस पद का आध्यात्मिक पक्ष में उत्तर होगा—
ज्ञान द्वारा वाणी समृद्ध होती है। प्रथम जीव उत्पन्न हुआ और पश्चात् माया
प्रकट हुई। शब्द जीवात्मा की शरण में जाता है। कुण्डलिनी जागृत होकर मेरुदण्ड पर
चढ़कर फलवती होती है। कायाने अज्ञानी (सुग्गा या कुत्ता) को नष्ट कर दिया। पंच
प्राण तो घरे ही रह गये, स्वरूप की सिद्धि घर में बस गई। मूल तो मस्तिष्क में है
जिसमें कमल खिले हैं और शाखा आदि नीचे हैं। ऐसा शरीर में वृक्ष का बोध कर, तब
तीनों लोकों का ज्ञान प्राप्त होगा।
कबीर साहब कहते हैं कि हठयोगियों का ज्योति के दर्शन आदि का उपर्युक्त
ढंग से परिचय दे देना तथा इसी पर संतुष्ट होकर अपने को अमरत्व का अधिकारी तक
समझबैठना उनमें किसी कमी का होना सूचित करता है। आत्मोपलब्धि की सबसे
बड़ी विशेषता यह है कि उसमें सफल हो जाने वाले व्यक्ति में अपनी अनुभूति को
अभिव्यक्ति के लिए क्षमता नहीं रहती।
इस प्रकार हम देखते हैं कि नामदेव के पश्चात् हिंदी निर्गुण काव्य की जो
प्रवृत्तियाँ हैं वे नामदेव की हिंदी रचनाओं में मिलती हैं। नामदेव की रचनाओं में इन
प्रवृत्तियों और तत्संबंधित विषयों पर संक्षेप में कहा गया है। नामदेवोत्तर कालीन संतों
ने इन पर विस्तारपूर्वक कहा है।
☐ ☐
१. एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढा सिंघ चरावै गाई ।। टेक ।।
पहले पूत पीछे भई माइ, चेला कै गुर लगे पाई ।
जल की मछली तरवर ब्याई, पड़ि बिलाई मुरगे खाई ।
बैलहि डारि गूँनि घरि आई, कुत्ता कूं ले गई बिलाई ॥
तलि करि साखा ऊपरि करि मूल, बहुत भांति जड़ लागे फूल ।
कहै कबीर या पद कौं बूझै ताकूं तीन्यूं त्रिभुवन सूझै ॥
—कबीर ग्रंथावली, पद ११, पृष्ठ ६२।
चतुर्थ अध्याय
नामदेव की दार्शनिक विचारधारा
भारतीय दर्शन—आत्मा की श्रेष्ठता
आचार्यों द्वारा प्रतिपादित विभिन्न दार्शनिक सिद्धांत
विदेशी दार्शनिक सिद्धांतों का प्रभाव
संत कवियों पर अन्य विचार-धाराओं का प्रभाव
नामदेव पर अन्य दर्शन एवं विचार-धाराओं का प्रभाव
वैष्णव मत का प्रमुख उपादान—भक्ति तत्त्व
भगवान का लोकरक्षक एवं लोकरंजक स्वरूप
महाराष्ट्रीय वारकरी सम्प्रदाय
वारकरी सम्प्रदाय का उदय
वारकरी मत के सिद्धांत
(१) विट्ठल (२) भक्ति तथा अद्वैत ज्ञान (३) भगवत् रूप
वारकरी पंथ के सिद्धांत की विशेषता
नामदेव की रचनाओं में प्राप्त उनके दार्शनिक विचार
१. (अ) ब्रह्म (ब) ब्रह्म परंपरा (क) नामदेव का ब्रह्म वर्णन
२. जीवात्मा (आत्म दर्शन)—आत्म परंपरा—
(अ) जीव सम्बन्धी नामदेव के विचार
(ब) जीव और ब्रह्म का सम्बन्ध
(स) जीव की एकता और अद्वैतता
३. माया-माया की परंपरा
नामदेव का माया वर्णन
४. जगत्—जड़ जगत् का भौतिक स्वरूप
नामदेव का ऐहिक तत्त्व विचार
नामदेव का लौकिक जीवन विषयक दृष्टिकोण
अभेद भक्ति—अद्वैतपरक भक्ति कल्पना—
निर्गुण-सगुण की एकता—ज्ञानोत्तर भक्ति
सर्वं खलु इदं ब्रह्म—वात्सल्य भक्ति—
भक्ति और साधना सम्बन्धी व्यावहारिक विचार
नामदेव की दार्शनिक विचारधारा
भारतीय दर्शन
इस संसार में आकर जीवन संग्राम में अपने को विजयी बनाना प्रत्येक मनुष्य
का कर्तव्य है। अन्य जीवित प्राणियों के समान मनुष्य भी अपने को जीवित बनाये
रखने के लिए अपने परिवेश से निरंतर संघर्ष करता रहता है। परन्तु वह विवेक-प्रधान
जीव होने के कारण प्रत्येक अनुष्ठान के अवसर पर अपनी विचार शक्ति का उपयोग
करता है। शांत चित्त से विचार करने पर प्रतीत होगा कि प्रत्येक मानव दृश्य या
अदृश्य जगत् विषयक कतिपय श्रद्धाओं, विचारों तथा कल्पनाओं का एक समुदाय मात्र
है। निखिल मानवीय कार्य विधानों की आधारशिला मानवीय विचार है। गीता कहती
है कि श्रद्धाओं के अनुरूप ही मनुष्य होता है।१ उसकी कार्य प्रणाली निश्चित होती है
तथा उसी के अनुरूप उसे फल की उपलब्धि होती है। इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य की
एक दृष्टि होती है, उसका एक दर्शन होता है।
सृष्टि विभिन्न रूपा होकर भी एक है। अंग्रेजी में इसका नाम ही युनिव्हर्स
(Universe) है जिसे हिंदी में एकात्म काव्य कहा जा सकता है। वेद तो इसे देव का
काव्य कहता है। काव्य की संगीतात्मक, भावात्मक एवं कल्पनात्मक एकता उसके जनक
चेतन तत्त्व की एकरूपता को प्रकट करती है। इसी प्रकार सृष्टि का काव्यत्व
(Harmony) उसके एक स्रष्टा होने का संकेत देता है जो चेतन है।२ ब्रह्म विद्या में
इन सभी बातों पर विचार किया जाता है।
अध्यात्म विद्या भारतीय मनीषियों की प्रतिष्ठा की वस्तु रही है। सभी ज्ञान
तथा विषयों में इसे सर्वोत्कृष्ट कहा जाता रहा है। कठोपनिषद् में इस विद्या के संबंध में
लिखा है—
'ब्रह्म विद्या बहुतों को तो सुनने को भी नहो मिलती और बहुत से इसे सुनकर
समझ ही नहो पाते। इस गूढ़ अध्यात्म विद्या का वर्णन करनेवाला भी कठिनाई से
१. यो यच्छ्रद्धः स एव सः । गीता १७।३
२. भक्ति का विकास, डॉ० मुंशीराम शर्मा, पृ० ११ ।
१५४ नामदेव की हिन्दी कविता -
मिलता है और इसे जानने की इच्छा रखने वाला तो विरला ही होता है ।१
ब्रह्म विद्या की प्राप्ति के लिए की गयी जिज्ञासा- ब्रह्म जिज्ञासा कही जाती है,
इसी लिए वेदान्त ब्रह्म सूत्र का आरंभ 'अथा तो ब्रह्म जिज्ञासा' से किया गया है।
ब्रह्म विद्या अथवा ब्रह्म ज्ञान हर किसी को उपलब्ध नहीं होता। मुण्डकोप-
निषद में कहा है—
'परब्रह्म परमात्मा न तो प्रवचन से, न बुद्धि से और न बहुत सुनने से ही प्राप्त
हो सकता है। यह जिसको स्वीकार कर लेता है उसके लिए ही अपने यथार्थ स्वरूप
को प्रकट कर देता है।२
मुण्डकोपनिषद ने ब्रह्म विद्या को सर्व विद्या प्रतिष्ठा बतलाया है।३ भगवान्
श्रीकृष्ण ने गीता में अपनी व्यापक विभूतियों के वर्णन के अवसर पर समस्त विद्याओं में
अध्यात्म विद्या (दर्शन शास्त्र) को अपना स्वरूप बतलाकर उसकी महत्ता पूर्णरूपेण
प्रदर्शित की है।४
संक्षेप में जीव, जगत्, और परमात्मा का स्वरूप तथा उनके पारस्परिक संबंध
निश्चित करना दर्शनशास्त्र का उद्दिष्ट है। इस प्रकार दर्शनशास्त्र अंतिम सत्य
(Ultimate reality) के उद्घाटन का प्रयत्न करता है। पर इस अंतिम सत्य के
स्वरूप के संबंध में सभी दार्शनिक सहमत नहीं है।
भारतवर्ष में दर्शन तथा धर्म का, तत्त्वज्ञान तथा भारतीय जीवन का घनिष्ठ
संबंध है। ताप त्रय—आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक—से संतप्त मानव
की शांति के लिए, क्लेशमय संसार से आत्यंतिक दुःख निवृत्ति के लिए भारत में दर्शन
शास्त्र का आविर्भाव हुआ है। दर्शन शास्त्र के द्वारा सुचिंतित आध्यात्मिक तथ्यों पर ही
भारतीय धर्म की दृढ़ प्रतिष्ठा है।
१ श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते ॥
—कठोपनिषद् १।२।२।
२ नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ॥
—मुण्डकोपनिषद् ३।२।३ ।
३ स ब्रह्म विद्यां सर्व विद्या प्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठ पुत्राय प्राह ।
—मुण्डकोपनिषद् १।१।
४ अध्यात्म विद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ।
—गीता १०।३२
नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १५५
इस भारतीय दर्शन की धारा सुदूर वैदिक काल से अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित
होती चली आ रही है। इस धारा में कभी भी विराम नही आया। लगातार ब्रह्म,
जीव और माया के संबंध में विचार होता चला आ रहा है। सभी दर्शनों ने लगभग
यही निष्कर्ष दिया है कि ब्रह्म कोई अलभ्य तथा अलौकिक और अद्भुत पदार्थ नहीं है
प्रत्युत प्रत्येक प्राणी अपने भीतर नियामक (अंतर्यामी) आत्मा के रूप में उसी की
सत्ता का अनुभव किया करता है। इसी लिए ब्रह्म का साक्षात्कार करने तथा उसे
पहचानने का सबसे बड़ा उपाय है आत्मा को पहचानना और उसका साक्षात्कार
करना।
आत्मा की श्रेष्ठता
जगत् के समस्त प्रिय पदार्थों में श्रेष्ठ पदार्थ आत्मा ही है। प्रियतम होने के
कारण ही पुत्रवत्सला, करुणामयी माता की भाँति श्रुति उपदेश देती है कि आत्म तत्व
का साक्षात्कार करो।१ मुक्ति की कल्पना में पर्याप्त मतभेद होने पर भी विभिन्न
दार्शनिक इस विषय में नितांत एकमत है। आत्मा का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना ही
मोक्ष है।२
आत्मा का ज्ञान कराना, चाहे वह ब्रह्म से भिन्न हो या अभिन्न हो प्रत्येक दर्शन
का लक्ष्य है। इस संदर्भ में दार्शनिक-शिरोमणि याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी मैत्रेयी को
जो आध्यात्मिक उपदेश दिया वह भारतीय धर्म तथा दर्शन के इतिहास में सदा अमर
रहेगा। उन्होंने कहा 'पति के लिए पति प्यारा नही है बल्कि आत्मा के लिये। पत्नी
के लिए पत्नी प्यारी नही है, बल्कि आत्मा के लिए। पुत्र के लिए पुत्र प्यारा नही है
बल्कि आत्मा के लिए। संसार की समस्त वस्तुएँ अपने लिये प्यारी नही होती बल्कि
आत्मा के लिए। अतः सबसे प्रिय वस्तु आत्मा ही है। इस लिए इस आत्मा का प्रत्यक्ष
करना चाहिए, श्रवण करना चाहिए, मनन करना चाहिए तथा निदिध्यासन (सतत्
ध्यान करना) चाहिए। क्योकि आत्मा के दर्शन से, श्रवण से, मनन से तथा विज्ञान
से सब कुछ जाना जा सकता है।’३
१. आत्मा वा अरे दृष्टव्यः ।
—बृहदारण्यकोपनिषद् ५।१।१५।
२. आत्मन. स्वरूपेणावस्थितिः मोक्षः ।
३. न वा अरे पत्यु. कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति ।
न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति ।
न वा अरे पुत्राणा कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया
भवन्ति ।
१५६ नामदेव की हिन्दी कविता
आचार्यों द्वारा प्रतिपादित विभिन्न दार्शनिक सिद्धांत
भारतवर्ष आदि काल से ही एक धर्म प्रधान देश रहा है। यहाँ के ऋषियों ने
समय समय पर धर्म तथा दर्शन की विस्तृत विवेचना की है। मध्ययुग के पूर्व भी यहाँ
अनेक आचार्यों द्वारा प्रतिपादित विभिन्न दार्शनिक सिद्धांत प्रचलित थे। इनमें प्रमुख
शंकराचार्य का अद्वैतवाद तथा मायावाद था। उन्होंने जैनों, बौद्धों तथा मंडन मिश्र
आदि कर्मकांडियों से शास्त्रार्थ करके अपने अद्वैतवाद का प्रतिपादन किया। उनके
अनुसार सब कुछ ब्रह्म है। यह संसार असत्य है, भ्रम है। १ जिस प्रकार हम अँधेरे में,
रस्सी को देखकर साँप की कल्पना कर भयभीत होते हैं उसी प्रकार इस संसार को,
असत्य जान ममता, मोह के बंधन में पड़कर हम दुःख भोगते हैं। उनके अनुसार जीव
और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं। जीव ब्रह्म का ही रूप है जो माया के कारण ब्रह्म से,
भिन्न प्रतीत होता है। इस प्रकार शंकराचार्य 'अहं ब्रह्मास्मि' के सिद्धांत को माननेवाले,
थे। उन्होंने बौद्ध दर्शन के स्थान पर अपने दार्शनिक सिद्धांतों को रखा जो अब तक
किसी न किसी रूप में चले आ रहे हैं।
वैष्णव आचार्यों की परम्परा में सर्वप्रथम नाम नाथमुनि का आता है। नाथ
मुनि का आविर्भाव नवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध अथवा दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ काल
में हुआ। कहा जाता है कि सर्वप्रथम उन्होंने ही आठवार भक्तों के पदों का संकलन
किया। उनकी परम्परा में पुण्डरीकाक्ष एवं राम मिश्र नामक दो अन्य आचार्य हुए।
तत्पश्चात् यामुनाचार्य तथा प्रसिद्ध स्वामी रामानुजाचार्य इस सम्प्रदाय के आचार्य हुए।
रामानुजाचार्य के पश्चात् भी थी सम्प्रदाय की परम्परा आगे चलती रही। इनकी चौथी
या पांचवी शिष्य परम्परा में सुप्रसिद्ध स्वामी रामानंद हुए। २
शंकराचार्य ने जिस अद्वैतवाद का निरूपण किया था वह भक्ति के सन्निवेश के
लिए उपयुक्त न था। अतः स्वामी रामानुजाचार्य ने एक अन्य मत विशिष्टाद्वैत की
स्थापना की। जिसके अनुसार जीव (चित्) और जगत् (अचित्) ब्रह्म के ही
विक्षेप हैं। माया उसी ब्रह्म की शक्ति है। जीव भक्ति द्वारा ब्रह्म का चिरंतन सामीप्य
प्राप्त कर लेता है जो उसका परम लक्ष्य है। जैसा कि अद्वैतवाद में माना जाता है,
जीव अपने अस्तित्व को ब्रह्म में खो नहीं देता।
न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति ।
आत्मा वा रे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि ।
आत्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदं सर्वं विदितम् ।
—बृहदारण्यकोपनिषद् २।४।५ ।
१ ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ।
२ हिन्दी साहित्य की भूमिका डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ४७ ।
नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १५७
आचार्य रामानुज के महान् व्यक्तित्व के कारण वैष्णव सम्प्रदाय की लोक-
प्रियता बहुत बढ़ी। उन्होंने शंकराचार्य के मायावाद का खण्डन किया तथा यह सिद्ध
किया कि ब्रह्म की एकता अद्वितीय नहीं है अपितु वह चिन्मय आत्मा तथा जड़ प्रकृति
से विशिष्ट है। १
अन्य वैष्णव आचार्यों का लक्ष्य भी शंकराचार्य के मायावाद तथा विवर्तवाद से
पीछा छुड़ाना था जिसके अनुसार भक्ति अविद्या ठहरती है। शंकराचार्य ने केवल निरू-
पाधि निर्गुण ब्रह्म की ही पारमार्थिक सत्ता स्वीकार की है। वल्लभाचार्य ने ब्रह्म में
सर्व धर्म माने हैं। सारी सृष्टि को उन्होंने लीला के लिए ब्रह्म की आत्मकृति कहा है।
अक्षर ब्रह्म अपनी आविर्भाव तथा तिरोभाव की अचिन्त्य शक्ति से जगत् के रूप
में परिणत होता है और उससे परे भी रहता है। ब्रह्म सत्, चित्, तथा आनन्द से युक्त
है। जीव में आनन्द का तथा जड़ में चित् तथा आनन्द दोनों का तिरोभाव रहता है।
माया कोई वस्तु नहीं। श्रीकृष्ण ही परब्रह्म हैं जो पुरुषोत्तम कहलाते हैं। वे अपने
भक्तों के लिये 'व्यापी वैकुण्ठ' में (जो विष्णु के वैकुण्ठ से ऊपर है) अनेक प्रकार की
क्रीड़ाएँ करते रहते हैं। भगवान् की इस 'नित्य लीला सृष्टि' में प्रवेश करना ही जीव
की सबसे उत्तम गति है। शंकर ने निर्गुण को ही ब्रह्म का पारमार्थिक रूप कहा था
और सगुण को व्यावहारिक या मायिक। किन्तु वल्लभाचार्य ने बात उलटकर सगुण
रूप को ही असली पारमार्थिक रूप बताया और निर्गुण को उसका अंशतः तिरोहित
रूप कहा।
प्रायः सभी वैष्णव आचार्यों ने (मध्व, निम्बार्क, रामानुज, विष्णु स्वामी)
वेदान्त सूत्रों के प्रतिपादित अद्वैतवाद को लेकर चलते हुए मूल सिद्धान्तों में कुछ छोटे-
मोटे परिवर्तन भी किये हैं। फलस्वरूप अलग-अलग सिद्धान्तों की स्थापना हुई। वास्तव
में सभी ने सिद्धान्त की दृष्टि से अद्वैतवाद को माना है किन्तु साथ ही साथ व्यवहार
की दृष्टि से द्वैतद्वैतवाद का भी सहारा लिया है।
विदेशी दार्शनिक सिद्धान्तों का प्रभाव
वैष्णव आचार्यों के दार्शनिक सिद्धान्तो के अतिरिक्त तत्कालीन मुसलमान
सभ्यता के कारण विदेशी दार्शनिक सिद्धान्तो का भी प्रचार हुआ। मध्ययुग में हिन्दू
और बौद्ध धर्म के बाद इस्लाम धर्म की ही मान्यता और प्रतिष्ठा थी। शासक वर्ग का
धर्म होने के कारण उसका प्रसार व प्रचार और भी अधिक बढ़ा। शासक वर्ग का धर्म
शासित वर्ग को किसी न किसी रूप में अवश्य प्रभावित करता है। यद्यपि सन्त लोग
१. भारतीय दर्शन : डॉ० बलदेव उपाध्याय, पृ० ४६५।
१५८ नामदेव की हिन्दी कविता
सब प्रकार के सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक बंधनों से मुक्त थे फिर भी वे अपने
युग की क्रियाओं और प्रति क्रियाओं की उपेक्षा नहीं कर सके । यह अवश्य है कि उन
पर इस्लाम का प्रत्यक्ष और गहरा प्रभाव दिखलाई नहीं पड़ता । इस्लाम एक आस्था-
प्रधान धर्म है उसमें बुद्धिवादिता के लिए कोई स्थान नहीं है । इसके विपरीत सन्त मत
की आधारभूमि बुद्धिवादिता रही है । अतएव वे कोरी आस्था में, जो अन्धविश्वास की
सीमा तक पहुँच गयी थी, विश्वास नहीं करते थे । इसीलिए उन्होंने कोरे आस्था-प्रधान
इस्लाम धर्म का महत्त्व हृदय से नहीं स्वीकार किया । इस्लाम का जो कुछ प्रभाव उन
पर दिखाई पड़ता है वह अधिकतर परम्परागत संस्कार जनित और वातावरणमूलक
है। फिर भी मुसलमानों के एकेश्वरवाद तथा सूफी सन्तों के सर्वेश्वरवाद का प्रभाव
तत्कालीन साहित्य पर पड़ा । सूफियों के अनुसार यह संसार ब्रह्म कृत है । संसार में
उसी का स्वरूप प्रगट हुआ है । सूफियों ने यद्यपि माया को स्थान नहीं दिया फिर भी
शैतान के अस्तित्व को माना है जो जीव को भ्रम में डालकर ब्रह्म से मिलने में बाधा
पहुँचाता है ।
सन्त कवियों पर अन्य विचार-धाराओं का प्रभाव
साहित्य समाज का दर्पण होता है । वह अपने युग की प्रत्येक विचारधारा से
प्रभावित होता है । हिन्दी साहित्य के मध्ययुग के पूर्व, भारतवर्ष में अनेक दार्शनिक
विचार धाराओं का प्रचार था । जनता पर इन सभी सिद्धान्तों का मिले-जुले रूप में
प्रभाव पड़ा । फलतः इस काल में जो साहित्य रचा गया वह पूर्णतः धार्मिक साहित्य
रहा । साथ-साथ ब्रह्म, जीव, माया, जगत् आदि सम्बन्धी दार्शनिक विचारों की भी
विवेचना होती रही ।
सन्त कवियों पर कई विचार धाराओं का प्रभाव पड़ा । वे योग मार्ग, नाथ
पंथ, अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैत आदि सभी विचार धाराओं से प्रभावित हुए। उन्होंने
वेदान्त से ज्ञान तत्त्व, सूफियों से प्रेम तत्त्व, वैष्णवों से भक्ति तत्त्व, योगियों की बानियों
से सुरति निरत आदि शब्द अपना लिए । इस प्रकार सन्त काव्य में विशिष्ट दार्शनिक
सिद्धान्त नहीं मिलते वरन् सभी का मिश्रित रूप से उन पर प्रभाव पड़ा है ।
नामदेव पर अन्य दर्शनों एवं विचारधाराओं का प्रभाव
(क) वैष्णव परम्परा का प्रभाव
वैष्णव मत अत्यन्त प्राचीन मत है । भगवान् के विष्णु और उनके अवतारों
की उपासना ही इस मत की प्रमुखता है ।
विष्णु इस मत के परम आराध्य हैं । ऋग्वेद में विष्णु से सम्बन्धित सूक्त हैं।
नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १५६
विष्णु अन्य देवताओ की अपेक्षा मानवोचित गुणो से विभूषित है । उनमें अत्यन्त व्या-
पकत्व, अतुलनीय पराक्रम, विश्व धारण सामर्थ्य, अमृतत्व, पोषण-शक्ति, अवतार-
धारणा-शक्ति आदि की प्रतिष्ठा है।
कालांतर में विष्णु के दिव्य गुणो मे वृद्धि होती गयी और वे शील, शक्ति एवं
सौंदर्य इन तीनो विभूतियो से प्रतिष्ठित किये गये । इस प्रकार विष्णु के निर्गुण एवं
सगुण दोनो स्वरूपो का विकास हुआ।
डॉ० भांडारकर के अनुसार वैष्णव मत का प्रारम्भिक नाम ऐकान्ति धर्म था । १
भगवद्गीता इसका प्रमुख आधार ग्रंथ था। इसने साम्प्रदायिक रूप धारण कर
लिया और यह पांचरात्र या भागवत् धर्म के नाम से प्रसिद्ध हो गया । आगे चलकर
नारायणीय धर्म से इसका सम्मिलन हुआ । कालांतर में उस पर योग एवं सांख्य दर्शन
का भी प्रभाव पड़ा ।
पांचवी शताब्दी में इसका प्रभाव कम हो गया । छठी तथा सातवी शताब्दी में
आलवार भक्तो के रूप में इसका पुनः स्फुरण हुआ । मध्ययुग के आचार्यों ने इसको
पल्लवित किया । रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, विष्णु स्वामी, निम्बार्काचार्य तथा वल्लभा-
चार्य आदि ने इस मत को अच्छी प्रगति दी ।
वैष्णव धर्म का अपना विस्तृत साहित्य है । महाभारत का नारायणीयोपाख्यान,
गीता, भागवत्, नारद भक्ति सूत्र, शांडिल्य भक्ति सूत्र, विष्णु पुराण, पद्म संहिता
और लक्ष्मी तन्त्र आदि इसके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं ।
वैष्णव धर्म के सभी ग्रन्थो में भगवान् के दोनो-निर्गुण एवं सगुण-स्वरूपो का
वर्णन मिलता है । निर्गुण ब्रह्म से क्रमशः सगुण भगवान् का विकास हो जाता है ।
महाराष्ट्र का वारकरी सम्प्रदाय 'भागवत् सम्प्रदाय' है । बहुत प्राचीन काल से
महाराष्ट्र भागवत् धर्म का मुख्य क्षेत्र बना हुआ है । अपनी लोकप्रियता तथा विपुल
प्रचार के कारण वारकरी पंथ महाराष्ट्र का सार्वभौम पंथ है ।
महाराष्ट्रीय संतो की परंपरा का उदय संत ज्ञानेश्वर से माना जाता है ।
वारकरी अर्थात् वैष्णव संप्रदाय के प्रधान प्रवर्तक यही माने जाते हैं । इस संप्रदाय में
पंढरपुर के विट्ठल (पांडुरंग) की उपासना पर ही सबसे अधिक बल दिया गया है ।
भगवान् विट्ठल विष्णु के ही प्रतिरूप समझे जाते हैं। इसलिए यह संप्रदाय वैष्णव संप्रदाय
कहा जाता है । संत ज्ञानेश्वर के अतिरिक्त नामदेव, एकनाथ, तुकाराम आदि अन्य
महाराष्ट्रीय संतो ने भी इस संप्रदाय का प्रचार किया ।
१. वैष्णविज्म शैविज्म एण्ड अदर मायनर रिलीजस सेक्ट्स
—डॉ० आर० जी० भांडारकर—पृ० ९८-१०० ।
१६० नामदेव की हिन्दी कविता
उत्तर भारत में भागवत धर्म की पताका फहराने वाले पहले संत नामदेव थे।
ये परम वैष्णव थे। उन्होंने हरि के दासों (वैष्णवों) की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। संत
(वैष्णव) सदा सुखी हों। उनको दीर्घायु प्राप्त हो। उनको अहंकार का स्पर्श न हो।
पांडुरंग का नाम जिनकी वाणी के लिए थाती बन गया है, ऐसे संतजनों की नामदेव
मंगल कामना करते हैं।१
वैष्णव मत का उपादान—भक्ति तत्व
वैष्णव मत का दूसरा प्रमुख उपादान भक्ति तत्त्व है। वैष्णव धर्म की इस भक्ति
में प्रेम का विशेष महत्त्व है। वैष्णव धर्म का प्रेम प्रधान भक्ति तत्त्व नामदेव को पूर्णतया
मान्य है। उनकी भक्ति प्रेमा भक्ति है। उन्होंने स्थान स्थान पर इस भक्ति की महिमा
का वर्णन किया है—
'मै बावरी हूँ, राम मेरे पति हैं, मैं बडे मनोयोग से रच-रच कर उनके लिए
श्रृंगार करती हूँ।'२
'हे प्रभु ! तुम्हारे सामीप्य के लिए मैं व्यग्र हूँ। जैसे बछड़े के बिना गाय व्याकुल
रहती है, और पानी के बिना मछली तड़पती है—ठीक वैसे ही राम नाम के बिना
बेचारा नामदेव पीड़ित है।'३
'जैसे मारवाड़ी को जल और ऊंट को वनस्पति प्रिय है वैसे ही मेरे मन को
ईश्वर प्रिय है। जैसे पत्नी को पति प्रिय है वैसे ही ईश्वर मेरे मन को प्रिय है।'४
१. आखंड आयुष्य व्हावें तया कुळा । माझिया सकळा हरिच्या दासा ।१।
छलनेची बाधा न हो कोणे काळी । हे संत मंडळी सुखी असो ।२।
अहंकाराचा वारा न लागो राजसा । माझिया विष्णु दासा भाविकासी ।३।
नामा म्हणे तया असावें कल्याण । ज्या मुखा निधान पांडुरंग ।४।
—सकल संत गाथा, अभंग ८८३ ।
२. मैं बउरो मेरा रामु भरतारु
रचि रचि ताकउ करउ सिंगारु । —संत० ना० की हिं० प०, पद २७४ ।
३. मोहि लागी ताला बेली । बछरे बिनु गाइ अरला ।
पानीया बिनु मीनु तलफै । ऐंगे राम नामा बिनु बापुरो नामा ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद २६ ।
४ मारवाड़ी जेम नीरु वाल्हा, बेलि वाल्हा करहला ।
जिउ तरणी कउ कंतु वाल्हा तिउ मरे मनि रामईआ ॥
—स० ना० की हिं० प०, पद २०२।