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सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

१६ सहजो बाई
द्वादस प्रकार के बचन दुष्ट के
१ पाहन बोली । ४ अग्नि सरूप बोली । ७ खट्टी बोली । १० भरमिक बोली ।
२ काँटेदार बोली । ५ अकड़े खटक बोली । ८ कडुई दुर्गंध बोली । ११ निगुरी बोली ।
३ बिष भुवंग बोली । ६ हिया-बेध बोली । ९ झूठी बोली । १२ डिगमिगाट बोली
बैराग उपजावन का अंग
॥ दोहा ॥
सहजो भज हरि नाम कूँ, तजो जगत सूँ नेह ।
अपना तो कोइ है नहीं, अपनी सगी न देह ॥ १ ॥
यही कही गुरुदेवजू, यही पुकारैं सन्त ।
सहजो तज या जगत कूँ, तोहि तजैगो अन्त ॥ २ ॥
कलह कलपना दुख घना, सदा रहै मन भंग ।
अकस¹ भरे कूँ छोड़िये, सहजो जग बेढंग ॥ ३ ॥
जैसे सँड़सी लौह की, छिन पानी छिन आग ।
ऐसे दुख सुख जगत के, सहजो तू मत पाग ॥ ४ ॥
अचरज जीवन जगत में, मरिबो साँचो जान ।
सहजो अवसर जात है, हरि सूँ ना पहिचान ॥ ५ ॥
जग से या जग में पगा, जग संग दीन्हे प्रान ।
राम तजै जग सूँ रचै, सहजो निश्चय हान ॥ ६ ॥
झूठा नाता जगत का, झूठा है घर बास ।
यह तन झूठा देख कर, सहजो भई उदास ॥ ७ ॥
जब लग चावल धान में, तब लग उपजै आय ।
जग छिलके कूँ तजि निकस, मुक्ति रूप है जाय ॥ ८ ॥
कुटँब सँगाती बीच में, आदि अन्त नहिं होय ।
बीच मिले बिच ही गये, सहजो संग न कोय ॥ ९ ॥
सहजो स्वारथ सब लगे, दारा सुत औ बीर ।
जीवत जोतैं बैल ज्यों, मुए चढ़ावैं सोर² ॥१०॥
(१) बैर । (२) जीते जी तो कड़ी मेहनत लेते हैं और मरने पर अपने मतलब के लिए मन्नत
चढ़ाते हैं।

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बैराग उपावन का अङ्ग १७


कोई किसी के संग ना, रोग मरन दुख बन्ध ।
इतने पर अपनौ कहैं, सहजो ये नर अन्ध ॥११॥
दरद बटाय सकैं नहीं, मुए न चालैं साथ ।
सहजो क्योंकर आपने, सब नाते बरबाद ॥१२॥
मर बिछुड़ै जो कुटँब सूँ, बहुर न देखै आय ।
महल द्रव्य सन्तान कू, सहजो पचै बलाय ॥१३॥
मरि बिछुड़न यों होइगो, ज्यों तरवर सूँ पात ।
सहजो काया प्रान यों, मुख सेती ज्यों बात ॥१४॥
सहजो जीवत सब सगे, मुए निकट नहिं जायँ ।
रोवैं स्वारथ आपने, सुपने देख डरायँ ॥१५॥
सहजो धन माँगे कुटँब, गाड़ा धरा बताय ।
जो कछु है सो दे हमें, फिर पाछे मरि जाय ॥१६॥
मुख देखै ढाँपै भजै, तड़ दे तोड़े नेह ।
सहजो पति सुत निज हितू, जारि करेंगे खेह ॥१७॥
काढ़ काढ़ बेगी कहैं, भीतर बाहर लोय ।
जीव छुटे सहजो कहै, तन का सगा न कोय ॥१८॥
यह मन्दिर यह नारि है, यह धन यह सन्तान ।
तेरो ना सहजो कहै, काहे करत गुमान ॥१९॥
जन्म जुवा सों हारिहो, कियो न लाहा सूल ।
डार पात फल सींच कर, सहजो काटत मूल ॥२०॥
सहजो गुरु परताप सूँ, ऐसी जान पड़ी ।
नहीं भरोसा स्वास का, आगे मौत खड़ी ॥२१॥
भीतर का भीतर खुलै, कै बाहर खुलि जाय ।
देह खेह है जायगी, जैहौ जन्म गँवाय ॥२२॥
स्वासा दीपक के बुझे, होत अँधेरी देह ।
सहजो सूनी प्रान बिनु, जब कैसो हरि नेह ॥२३॥

१८ सहजो बाई
सहजो फिर पछितायगो, स्वास निकसि जब जाय ।
जब लग रहै सरीर में, राम सुमिर गुन गाय ॥२४॥
स्वास खजानो जातु है, ता की सोधो नाहिं ।
सहजो खर्चों का रह्यो, कर हिसाब घर माहिं ॥२५॥
सहजो नौबत स्वास की, बाजत है दिन रैन ।
मूरख सोवत है महा, चेतन कूँ नहिं चैन ॥२६॥
हिरनाकुस से ह्वै मिटे, दुर्जोधन सिसुपाल ।
कुंभकरन रावन गये, सहजो खाया काल ॥२७॥
निश्चै मरना सहजिया, जीवन की नहिं आस ।
क टूटी सी झोपड़ी, कै मन्दिर में बास ॥२८॥
कै गरीब सिर टोकरी, क सिर छत्तर होय ।
जन्म मरन में एक से, सहजो भाँति न दोय ॥२६॥
मरना है रहना नहीं, जाना वाही ठौर ।
सहजो कै कङ्गाल हो, कै हो द्रव्य कड़ोर ॥३०॥
आपन हूँ थिर होहिं जो, करै और को सोग ।
सहजो साथी नाव के, सभी बटाऊ लोग ॥३१॥
बैठि बैठि बहुतक गये, जग तरवर की छाँहिं ।
सहजो बटाऊ बाट के, मिलि मिलि बिछुड़त जाहिं ॥३२॥
यह रस्ता बहता रहै, थमै नहीं छिन एक ।
बहु आवैं बहु जातु हैं, सहजो आँखन देख ॥३३॥
जग देखत तुम जावगे, तुम देखत जग जाय ।
सहजो योंही रीति है, मत कर सोच उपाय ॥३४॥
मुए सो काया जारई, बहुरि न मिलिहै आय ।
रोये तें कहा होत है, सहजो झुरै बलाय ॥३५॥
झुरि झुरि के पिंजर भये, रोय गँवाये नैन ।
मरे गये सो ना मिले, सहजो सुने न बैन ॥३६॥

बैराग उपजावन का अंग १६
जो रोये सूँ बाहुरै, तौ रोवौ दिन रात।
तन छीजै वह न मिलै, सहजो कूड़ी बात ॥३७॥
काहे कूँ रोवत रहौ, कल्प न होवै काज।
सहजो मुए सो मरि गये, आवैं काल्ह न आज ॥३८॥
देह निकट तेरे पड़ी, जीव अमर है नित्त।
दुइ में मूवा कौन सा, का सूँ तेरा हित्त ॥३६॥
जो तेरा हित देह सूँ, नख सिख ताही¹ खंड।
जीव अमर सहजो कहै, ब्यापक और अखंड ॥४०॥
तेरा थानी क्यों मुवा, क्यों न रखा गहि बाहिं।
सहजो बहुतक मिलि छुटे, चौरासी के माहिं ॥४१॥
कभुवक तेरा बाप है, कभुवक तेरा पूत।
कभुवक तेरा मित्र है, कभुवक तेरा सूत² ॥४२॥
जो तेरे सँग प्यार था, जाता वाके साथ।
कै वाही कूँ राखता, सहजो गहि कर हाथ ॥४३॥
कलप रोय पछिताय थक, नेह तजौगे कूर।
पहिले ही सूँ जो तजै, सहजो सो जन³ सूर ॥४४॥
यों खाता यों सोवता, मीठे कहता बोल।
यह बिचार तू मत करै, चित रहै डाँवाडोल ॥४५॥
बैठि पहिरि यों चलता, बस्तर भूषण लाल।
यह बिचार तू मत करै, छल रूपी जग जाल ॥४६॥
आगे रो रो क्या किया, अब क्यों रोवै भाँड।
संग न आया ना चलै, यह जग झूठी माँड ॥४७॥
आगे मुए सो जा चुके, तू भी रहै न कोय।
सहजो पर कूँ क्या झुरै, आपन ही कूँ रोय ॥४८॥
(१) नाहीं। (२) शत्रु, दूत। (३) सावंत।

१० सहजो बाई
बहुत गई थोड़ी रही, यह भां रहसी नाहिं ।
जन्म जाय हरि भक्ति बिनु, सहजो झुर मन माहिं ॥४६॥
कर्म अनुसार योनि
॥ दोहा ॥
उपजि उपजि फिर फिर मरौ, जम दे दारुन दुक्ख ।
लाज नहीं सहजो कहै, धिर्ग तुम्हारो मुक्ख ॥५०॥
पसु पंछी नर सुर असुर, जलचर१ कीट पतंग ।
सबही उतपति कर्म की, सहजो नाना अंग ॥५१॥
कर्मन के प्रेरे फिरौ, जन्म जन्म दुख होय ।
मुक्ति बिचारो सहजिया, आवागवन जु खोय ॥५२॥
जन्म चलो ही जातु है, ये दिन आछे जाहिं ।
जीवत जागह ना करी, बैठोगे केहि ठांहि ॥५३॥
सहजो रहै मन बासना, तैसी पावै ठौर ।
जहाँ आस तहँ बास है, निस्चै करी कठोर ॥५४॥
देह छूटै मन में रहे, सहजो जैसी आस ।
देह जन्म जैसो मिलैँ, जैसे ही घर बास ॥५५॥
॥ चौपाई ॥
जा को आस रहै मन्दिर में। होकर घूँस बसै सो घर में ॥
रहै बासना द्रव्य मँझारा । जन्मै नाग होय पुनि कारा ॥
रहै बासना तिरिया माहीं। कोटी२ स्वान धरै तन आई ॥
रहै बासना पुर्षा बर की । कुतिया होय चूहड़े३ घर की ॥
जा की रहै पुत्र में आसा । सूवर जन्म नीच घर बासा ॥
जा का मन रहै राज दुवारे । हस्ती हो सिर मेलै छारे ॥
रहै बासना नीर पियासी । मीन देह धरि जल की बासी ॥
रहै बासना बाहन संगा । होय जन्म ले बाहन४ अंगा ॥
(१) थिरचर । (२) योनि । (

जन्म दशा २१
जहाँ बासना जित ही जाई । यह मत बेद पुरानन गाई ॥
चरनदास गुरु मोहिं बताई । तजो बासना सहजोबाई ॥
॥ दोहा ॥
सहजो लोक प्रलोक की, नहीं बासना ताहि ।
सो वह ब्रह्म सरूप है, सागर लहर समाय ॥५७॥
जा की गुरु में बासना, सो पावै भगवान ।
सहजो चौथे पद बसै, गावत बेद पुरान ॥५८॥
परमेसुर की बासना, अन्त समय मन माहिं ।
तन छूटै हरि कूँ मिलै, उपजै बिनसै नाहिं ॥५६॥
साध संग की बासना, जेहि घट पूरी सोय ।
मनुष जन्म सतसंग मिलै, भक्ति परापत होय ॥६०॥
सहजो हरि के नाम की, रहै बासना बीर ।
चौरासी संकट कटै, जम की छूटै पीर ॥६१॥
चौरासी काया पहिर, दुख सहे नाना त्रास ।
भली भई अब के कुसल, चरनदास की आस ॥६२॥
चौरासी के त्रास सुनि, जम किंकर की मार ।
सहजो आई गुरु सरन, सुमिरचो सिरजनहार ॥६३॥
धन जोबन सुख सम्पदा, बाहर की सी छाहँ ।
सहजो आखिर धूप है, चौरासी के माहँ ॥६४॥
चौरासी जोनी भुगत, पायौ मनुष सरीर ।
सहजो चूके भक्ति बिनु, फिर चौरासी पीर ॥६५॥
जन्म दशा
॥ दोहा ॥
जन्म मरन अब कहत हूँ, कहूँ अवस्था चार ।
चौरासी जमदंड कूँ, भिन्न भिन्न बिस्तार ॥६६॥
चरनदास आज्ञा दई, सहजो परगट गाय ।
ता सूँ पढ़ि सुनि जीव की, सकल बन्ध कटि जाय ॥६७॥

२२ सहजो बाई
॥ चौपाई ॥
पापी जीव गर्भ जब आवै । भवन अँधेरे बहु दुख पावै ॥
तल मूड़ी ऊपर को पाऊँ । मुख लिगी१ और बिष्टा ठाऊँ ॥
जठर अगिन इक रस जहँ लागी । अधिक तपै जहँ पतित अभागी ॥
खट्टा मीठा माता खावै । लागि छुरी सी बहु दुख पावै ॥
आप दुखो माता दुख पाया । दसें महीने जग में आया ॥
जग जंजाल देखकर रोया । नर नारी मिलि सभी बिगोया ॥
माया मोह पवन लगि भूला । सहजो गोद पालने झूला ॥
नाते सभी लगे उठि झूठे । पड़ा बन्ध में कैसे छूटे ॥६८॥
॥ दोहा ॥
सब नाते उठि उठि लगे, रोम रोम लिया बन्ध ।
सहजो यह भी रलि मिला, फिर फिर भूला अन्ध ॥६६॥
॥ चौपाई ॥
कोई कहै मैं इसकी माई । कोई कहै लाला की दाई ॥
कोई कहै यह सुन्दर हीरा । गोद खेलाऊँ अपना बीरा ॥
कोई कहै में या का बापू । बालक पाया पुत्र प्रतापू ॥
कोई कहै मैं या की बूवा । चाचा कहै भतीजा हूवा ॥
कोई कहै यह मेरा भाई । कोई कहै मैं दादी आई ॥
कोई कहै मैं मा की बहिनी । कोई कहै मैं या की नानी ॥
कोई कहै मैं इसका मामा । लाया खाँड़ खड़ूले जामा ॥
कोई कहै मैं या का नाना । मामी ने भांजा करि जाना ॥
कोई कहै यह पोता बाल२ । कोई कहै यह मेरा लाल३ ॥७०॥
॥ दोहा ॥
सब नाते लिये मान कर, घेरा घेरी घेर ।
झूठे साँचे से लगैं, सुपने कंचन मेर४ ॥७१॥
(१) मूत्र या पेशाब । (२) बाला । (३) साला । (४) पहाड़ ।

जन्म दशा २३
पित्र देवता गोतिया, गरह नछत्तर सौन १।
सहजो बन्धन बँधि गये, ताहि छुड़ावै कौन ॥७२॥
॥ चौपाई ॥
गूँगा घी कहना जब सोखा। सेढू नाम मदारी भीखा ॥
माय बाप ले नाम पुकारैं। जब किलकौ तब तन मन वारैं ॥
मुख चुमैँ और कंठ लगावै। देवी देवा बहुत मनावैं ॥
रोग होय तो बहु दुख पावैं। ले ले जहाँ तहाँ पग धावैं ॥
कबहूँ झरि पिंजर है जावै। कबहूँ खाँसी बहुत सतावै ॥
चलै पेट कबहूँ बहु रोवै। खीजै बहुत नेक नहिं सोवै ॥
ज्वर कबहूँ दुखै दोउ नैना। पुनः पुनः२ दुख लहै न चैना ॥
निकसै दाँत दाढ़ दुख भैया। जबसूँ जन्म सदा दुख पैया ॥७३॥
॥ दोहा ॥
दुक्ख सुख बढ़ने लगा, पाँच बरस भइ देह।
जब पढ़ने बैठाइया, अपनी बिद्या लेह ॥७४॥
॥ चौपाई ॥
बालक का चित खेल मँझारे। ज्यौं ज्यौं पाधा छड़ियन मारै ॥
बैठि रहै तौ पकड़ बुलावै। बाँधि बाँधि दुख देत पढ़ावै ॥
मन ही मन सोचै दुख भारी। दुर्जन भये बाप महतारी ॥
दुख दे दे कर बहुत पढ़ाया। खोट कपट में घना सँधाया ॥
ऐसे भया बरस द्वादश का। रहा नहीं उनहूँ के बस का ॥
मन में आवै सो पुनि करई। मात पिता सूँ नेक न डरई ॥
खेलै खेल बहुत परकारा। सबही बिधि लड़कापन हारा ॥
बालपना हस खेल गँवाया। गुरु की टहल सरन नहिं ओया ॥
पाप पुन्न कूँ ना पहिचाना। सहजो कर्ता राम न जाना ॥७५॥
(१) शायद "सरवन" से मतलब है जो बड़े भारी भक्त मां बाप के थे और उनको
बहँगी पर लिये फिरते थे। इनका चित्र सावन में लोग दीवार पर लिख कर पूजते हैं।
(२) बार-बार।

२४ सहजो बाई
॥ दोहा ॥
तरुणापा फिर आइया, पाँच भूत लै संग।
जोबन मद मातो रहै, पियै बिषय को रंग ॥७६॥
॥ चौपाई ॥
तरुणापा भया सकल सरीरा। अंधा भया बिसरि हरि हीरा ॥
बिषय बासना के मद मातो। अहं आपदा के रंग रातो ॥
मूँछ मरोड़ अकड़ता डोलै। काहू तें मुख मीठ न बोलै ॥
कहै बराबर मेरे नाहीं। बुद्धिवान कोइ या जग माहीं ॥
मैं बलवन्त सबन पर भारी। द्रब्य कमाऊँ नरन अगारी ॥
महा दुखी सुख मान लियो है। मोह अमल अज्ञान पियो है ॥
भया कुटुम्बी जब सुख कैसा। सहजो बन्ध१ पड़ै कोइ जैसा ॥
सुत पुत्री उपजै मरि जावै। सोच सोच तन मन दुख पावै ॥७७॥
॥ दोहा ॥
द्रब्यहीन भटकत फिरै, ज्यों सराय को स्वान।
झिड़कि दियो जेहि घर गया, सहजो रह्यौ न मान ॥७८॥
॥ चौपाई ॥
द्रब्यहीन सब को मुख जोहै। जाति बरन देखै नहिं को है ॥
निहुरि निहुरि ज्यों बन्दर नाचै। राम तजो इन बातन राचै ॥
बेटी ब्याह जोग घर माहीं। और भूखे सब कित सूँ खाहीं ॥
कहै हवेली एक बनाऊँ। अपने कुल में इज्जत पाऊँ ॥
कलपै बहुत सीस धुनि माथा। सहजो दुखी कुटँब के साथा ॥
आवै न सतसंगति माहीं। कुटँब जाल छुटकारा नाहीं ॥
हरि की भक्ति नहीं लौ लाई। दारा सुत धन की गुमराई२ ॥
दुख धन्धा करि जन्म गँवाया। सहज सहज बूढ़ापन आया॥७६॥
वृद्ध अवस्था
॥ दोहा ॥
सहजो धौले३ आइया, झड़ने लागे दाँत।
तन गु'भल४ पड़ने लगो, सूखन लागी आँत ॥८०॥
(१) कैदखाना। (२) गुमराही, अभिमान। (३) सफेद बाल। (४) झुर्री, गुलझट।

वृद्ध अवस्था २५
॥ चौपाई ॥
डबडबाय आँखन में पानी । बूढ़े तन की यही निसानी ॥
नैनन में जल भरि भरि आवै । दाँत हिलै दारुन दुख पावै ॥
गोड़े थके दरद बाई का । कफ खाँसी हिये दुख वाही का ॥
खों खों करै नींद नहिं आवै । आप जगै और लोग जगावै ॥
बेबस इन्द्री सिथल भई हैं । अब क्या जीतै सहज गई हैं ॥
पूत बहू लख नाक चढ़ावैं । बहुत पुकारै निकट न आवैं ॥
निहुरि चलै लकड़ी लै हाथा । स्वजन कुटँब नहिं दुख के साथा ॥
असी बरस लग बीते साठी१ । सहजो कहै बहक बुधि नाठी२ ॥८१॥
॥ दोहा ॥
असी बरस ऊपर लगी, बिरध अवस्था होय ।
आगे की थिरता नहीं, पिछली गइ सब खोय ॥८२॥
तीन अवस्था बीत कर, चौथी आई मन्द ।
वृद्ध अवस्था सिर चढ़ी, तहु न चेता अन्ध ॥८३॥
॥ चौपाई ॥
लागी बिरध अवस्था चौथी । सहजो आगे मौत हि मौतौ ॥
हाथ पैर सिर काँपन लागे । नैन भये बिनु जोति अभागे ॥
सर्वैन तें कछु सुनियत नाहीं । दाँत दाढ़ नहिं मुख के माहीं ॥
कंठ रुके कफ बाई घेरे । हाड़ हाड़ सब दुख में पेरे ॥
बात कहै घर बाहर हाँसा । कुटँब दियौ मिल पौरी३ बासा ॥
मन चालै सब रस कूँ तरसै । नर नारी कोइ हितू न दरसै ॥
आप आप कूँ इत उतै डोलै । बिन पौरुष कोइ मुखहुँ न बोलै ॥
जिन कारन पचिया दिन राती । बात करैं नहिं कुटँब सँगाती ॥
सुत पोते दुर्गंध घिनावैं । टहल करैं तब नाक चढ़ावैं ॥
तिन के मोह तजे जगदीसा । अब मन में कलपै धुनि सीसा ॥
चरनदास गुरु कही बिसेषी । हरि बिन यों जग जाता देखी ॥८४॥
(१) सठिया गया । (२) जाती रही । (३) द्वारे ।

२६ सहजो बाई
॥ दोहा ॥
सेत रोम सब हो गये, सूख गई सब देह।
सहजो वह मुख ना रहा, उड़ने लागी खेह ॥८५॥
सहजो इन्द्री सब थकी, तन पौरुष भये छीन।
आसा तृस्ना ना घटी, सहज बचन भये दीन ॥८६॥
चार अवस्था खो दई, लियो न हरि को नाम।
तन छूटे जम कूटि है, पापी जम के ग्राम ॥८७॥
आय जगत में क्या किया, तन पाला कै पेट।
सहजो दिन धंधे गया, रैन गई सुख लेट ॥८८॥
मृत्यु दशा
॥ दोहा ॥
सहजो मृत्यू आइया, लेटा पाँव पसार।
नैन फटे नाड़ी छुटी, सोँही१ रहा निहार ॥८९॥
॥ चौपाई ॥
पित सरका बाई घिर२ आया। बाय सरक कफ ठौर बसाया॥
कफ सरका गल रोक लिया है। कंठ रुके कोइ नहिं जिया है॥
घुटर घुटर जब करने लागा। चेतनता सब तन का भागा॥
नाते घिर घिर सब ही आये। थोथे अपने नेह जनाये॥
आँखन सूँ जल भरि भरि लावैँ। आपस में सब मोह दिखावैँ॥
हाय हाय कर कोई बोलै। कोई ढूँढ़त औषध डोलै॥
कोई कहै कछु द्रव्य बतावो। धरा ढका कछु करज दिखावो॥
वाकूँ सुधि नहिं अपने तन की। जम किंकर मारत हैं घन की॥९०॥
॥ दोहा ॥
जम की सूरत देख करि, सुधि बुधि गई नसाय।
सहजो जो संकट बन्यो, मुख सूँ कह्यो न जाय ॥९१॥
सहजो मिरतू के समय, पीड़ा होय अपार।
बीछू एक हजार ज्यों, डंक लगै इकसार ॥९२॥
(१) सन्मुख, सामने। (२) घर।

काल मृत्यु २७
॥ चौपाई ॥
कोई कहै भज रामहि रामा । सहजो कहै कौन अब कामा ॥
आगू सूँ हरि सुमरे नाहीं । पचि पचि मुआ कुटँब के माहीं ॥
हिरदे रखता राम सँगातो । तौ रच्छा अब सब बनि आतो ॥
आगू सूँ अभ्यास जो रहता । तौ अब मुखसूँ हरि हरि कहता ॥
तन की पीड़ा सब मिटि जाती । जम की तो पै कहा बसाती ॥
राम राम मरते तू कहता । जो आगू सूँ कहता रहता ॥
तैं मन दिया कुटँब के साथा । हो बैठा घर बाहर नाथा ॥
अपना किया भुगत रे जोया । जो गुरु पूरा ढूँढ़ न कीया ॥६३॥
॥ दोहा ॥
पकरि बाँधि जम लै चले, धर्मराय के पास ।
कई बार आगे गये, छप्पन जहाँ तिरास ॥६४॥
कई भाँति के दंड हैं, सहजो नाना त्रास ।
नरक कुण्ड दुख भुगत करि, फिर चौरासी बास ॥६५॥
काल मृत्यु
॥ दोहा ॥
काल मृत्यु अब कहत हूँ, चौंक उठै अज्ञान ।
समझैगा कोइ साध जन, कै कोइ बिद्यावान ॥६६॥
जगत बिषय की वासना, हरि सूँ नाहीं हेत ।
काल मृत्यु कोई मरै, निस्चै होय परेत ॥६७॥
चार पहर का तेल भर, राखै दीवा बाल ।
तेल निबड़ बाती बुझै, सहजो पूरा काल ॥६८॥
कै मानुष कै वायु सूँ, कै पतंग करि देय ।
तेल रहै लोई बुझै, अकाल मृत्यु यों होय¹ ॥६६॥
॥ चौपाई ॥
बूढ़ा बाला कै ह तरुणा । काल मृत्यु इक कालहि मरना ॥१००॥
(१) कहि तेय।

२८ सहजो बाई
अकाल मृत्यु
॥ चौपाई ॥
काल मौत जो आगे गाई। अकाल मृत्यु कहै सहजो बाई॥
सस्तर मौत मरै जो कोई। यह भी मौत अकालहि होई॥
बिगड़ै रोग पथ्य नहिं कीन्हो। यह भी मौत अकालहि चीन्हो॥
कोई भाँति जो बिष खा मरै। और जीवत पावक में जरै॥
जल में डूबि जाय कोइ कैसे। लागे प्रेत मरै कोइ ऐसे॥
साँप डसे छूटै जो काया। महलापतनी१ तें दबि जाया॥
कोऊ ठग फाँसी दे मारै। जंगल पसू तोड़ जो डारै॥
ये सब मृत्यु अकाल दिखाई। मुए सुँ योनिपिसाचर पाई॥१०१॥
॥ दोहा ॥
प्रेत योनि कँ पाय कै, दुखा भये अज्ञान।
आप दुखी दुख देत हैं, उठ गइ सब पहिचान॥१०२॥
॥ चौपाई ॥
पेट बड़ा मुख सुई समाना। भूख प्यास में फिरै दिवाना॥
भटकत फिरै ठौर नहिं पावै। लागत फिरै जूतियाँ खावै॥
बासा लहै कुचौल ठिकाना। आप कुचोल कुचोलहि बाना॥
पाप करै हरि कूँ बिसरावै। सहजो कहै सो यह गति पावै॥१०३॥
॥ दोहा ॥
रही सो आयुर्दा कटै, मृत्यु लोक के माहिं।
जब हो पूरी हो चुकेँ, बाँधे नर्कहि जाहिँ॥१०४॥
अति कुचौल वह ठौर है, महा घोर भयमान।
त्राहि त्राहि पापी करैं, सुनैं न कानों कान॥१०५॥
॥ चौपाई ॥
बहुतक घोर नरक में पड़े। बहुतक थंभन बाँधे खड़े॥
बहुतन के सिर आरे धरिये। बहुतक पापी गुरजों२ गढ़िये॥
बहुतों का सिर नीचे किया। ऊपर बाँधि पाँव जो दिया॥
(१) मकान के गिरने से। (२) गदा।

अकाल मृत्यु २६
तले कड़ाहै तेल जलाया । भर भर करछे छौंक लगाया ॥
बहुतन पकरि कुण्ड में डारे । जिन सिर कागा चोंचन मारे ॥
कहँ लग कहूँ त्रास बहुतेरे । छप्पन त्रास कहे गुरु मेरे ॥
जम पेरत हैं सकल मँझारी । सबही भुगतैं नर कहा नारी ॥
फिरि फिरि मूँड़ो जाय कुटावैं । सहजो कहै नहीं सकुचावैं ॥१०६॥
॥ दोहा ॥
जम का लिंग सरीर है, पापी लिंग सरीर ।
जैसे कूँ तैसे गहै, वैसी वा कूँ पीर ॥१०७॥
त्रास दहन जम के कहे, सुन भजियो नर नारि ।
अब चौरासी कहत हूँ, भिन्न भिन्न बिस्तार ॥१०८॥
॥ चौपाई ॥
नौलख जल के जीव बताये । बहुत जन्म इन में भुगताये ॥
पंछी जाति कही दस लाखा । आगू सूँ चलि आई साखा ॥
ग्यारह लख कृमकीट लखाऊँ । जिमीं माहिं जो चलत दिखाऊँ ॥
बीस लाख थावर बिस्तारा । भरमत भरमत ही पचि हारा ॥
तीस लाख पसु जोनि सुनाया । घनी बार सो पहिरी काया ॥
चारहु लाख मनुख्खा देही । लख चौरासी यह सुनि लेही ॥
इक इक बार सबै तुम भये । कहिये कहा बहुत दुख सहे ॥
दुख खे खे करि यह तन पायौ । सहजो हरि गुरु बिना गँवायौ ॥
चरनदास गुरु पूरे पाये । चौरासी जम दंड छुटाये ॥१०९॥
नाम का अंग
॥ दोहा ॥
लख चौरासी यह कही, फेर फेर भुगतन्त ।
जन्म मरन छूटै नहीं, बिना सरन भगवन्त ॥ १ ॥
जज्ञ दान तीरथ करै, पूजा भाँति अनेक ।
मुक्ति न पावै सहजिया, बिना भक्त हरि एक ॥ २ ॥

ौ भी अधिको नाम । १४॥Wait, let's look at”ठो: Wait, is that a quotation mark? Yes, ”or^? It looks like ”. Wait, let's look at the danda before 14: पर्बत ”ठो तप करै, तौ भी अधिको नाम । १४॥- note there is a single danda।before१४॥! Yes, in line 18, it's नाम । १४॥(single danda, then space, then १४॥). Let's check line 10:भगवान ॥ ७ ॥Line 12:खोय ॥ ८ ॥Line 14:भूप ॥ ६ ॥Line 16:मँझधार ॥१०॥(no space around १०) Line 18:तोर ॥११॥Line 20:अन्ध ॥१२॥Line 22:समान ॥१३॥Line 24:नाम । १४॥`

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३० on the left, सहजो बाई in center.

Let's check footnotes at the bottom:
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`(१) आयु। (२) बहाउ। (३) घूस, रिश्वत—यहाँ मतलब न्योछावर से

नाम का अंग ३१
चरनदास हरि नाम को, महिमा कही अपार।
सो सहजो हिरदे धरी, अचल धारना धार ॥१५॥
सहजो सुमिरन कीजिये, हिरदे माहिं दुराय¹।
होठ होठ सूं ना हिलै, सकै नहीं कोइ पाय ॥१६॥
राम नाम यों लीजिये, जानै सुमिरनहार।
सहजो कै कर्तार ही, जानै ना संसार ॥१७॥
बैठे लेटे चालते, खान पान ब्यौहार।
जहाँ तहाँ सुमिरन करै, सहजो हिये निहार ॥१८॥
जागत में सुमिरन करै, सोवत में लौ लाय।
सहजो एकरस ही रहै, तार टूटि नहिं जाय ॥१९॥
आठ पहर सुमिरन करै, बिसरै ना छिन एक।
अष्टादस और चार में, सहजो यही बिसेष ॥२०॥
सहजो सुमिरन सब करैं, सुमिरन माहिं बिबेक।
सुमिरन कोई जानि है, कोटों मद्धे एक ॥२१॥
जन्म मरन बन्धन कटै, टूटै जम की फाँस।
राम नाम ले सहजिया, होय नहीं जग हाँस ॥२२॥
चौरासी के दुख छुटैं, छप्पन नर्क तिरास।
राम नाम ले सहजिया, जम पुर मिलै न बास ॥२३॥
गर्भ बास संकट मिटै, जठर अगिन की आँच।
राम नाम ले सहजिया, मुख सूं बोलो साँच ॥२४॥
सील छिमा संतोष गहि, पाँचो इन्द्री जीत।
राम नाम ले सहजिया, मुक्ति होन की रीत ॥२५॥
काम क्रोध लोभ मोह मद, तजि भज हरि को नाम।
निश्चै सहजो मुक्ति ह्वै, लहै अमरपुर धाम ॥२६॥
(१) छिपाकर, गुप्त।
५

काम क्रोध मोह लोभ तन, ले सुमिरै हरि नाम ।
मुक्ति न पावै सहजिया, ना रीझैंगे राम ॥२७॥
कामी मति भिष्टल¹ सदा, चलै चाल बिपरीत ।
सील नहीं सहजो कहै, नैनन माहिं अनीत ॥२८॥
सदा रहै चित भंग ही, हिरदे थिरता नाहिं ।
राम नाम के फल जिते, काम लहर बहि जाहिं ॥२६॥
सहजो क्रोधी अति बुरो, उलटी समझै बात ।
सबही सूँ ऐंठो रहै, करै बचन की घात ॥३०॥
कूकर ज्यों भूसत फिरै, तामस मिलवाँ बोल ।
घर बाहर दुख रूप है, बुधि रहै डाँवाडोल ॥३१॥
मन मैला तन छीन है, हरि सूँ लगे न नेह ।
दुखी रहै सहजो कहै, मोह बसै जा देह ॥३२॥
मोह मिरग काया बसै, कैसे उबरै खेत ।
जो बोवै सोई चरै, लगै न हरि सूँ हेत ॥३३॥
नीच लोभ जा घट बसै, झूठ कपट सूँ काम ।
बौरायो चहुँ दिसि फिरै, सहजो कारन दाम ॥३४॥
द्रव्य हेत हरि कूँ भजै, धन ही की परतीत ।
स्वारथ ले सब सूँ मिलै, अन्तर की नहिं प्रीत ॥३५॥
अभिमानी मुख धूर है, चहै बड़ाई आप ।
डिंभ लिये फूलो फिरै, करतो डरै न पाप ॥३६॥
प्रभुताई कूँ चहत है, प्रभु को चहै न कोइ ।
अभिमानी घट नीच है, सहजो ऊँच न होय ॥३७॥
नन्हा महा उत्तम का अंग
॥ दोहा ॥
धन छोटापन सुख महा, धिरग बड़ाई ख्वार² ।
सहजो नन्हा हूजिये, गुरु के बचन सम्हार ॥ १ ॥
(१) भ्रष्ट, गन्दी । (२) खराब ।

नन्हा महा उत्तम का अङ्ग ३३
सहजो तारे सब सुखी, गहै१ चन्द और सूर ।
साधू चाहै दीनता, चहै बड़ाई क्रूर२ ॥ २ ॥
अभिमानी नाहर बड़ो, भरमत फिरत उजाड़ ।
सहजो नन्ही बाकरी, प्यार करै संसार ॥ ३ ॥
सीस कान मुख नासिका, ऊँचे ऊँचे नाँव ।
सहजो नीचे कारने, सब कोउ पूजै पाँव ॥ ४ ॥
नन्ही चींटी भवन में, जहाँ तहाँ रस लेह ।
सहजो कुञ्जर अति बड़ो, सिर में डारै खेह ॥ ५ ॥
सहजो चन्दा दूज का, दरस करै सब कोय ।
नन्हे सूँ दिन दिन बढ़ै, अधिको चाँदन होय ॥ ६ ॥
बड़ा भये आदर नहीं, सहजो आँखिन देख ।
कला सभी घट जायगो, कछू न रहसी रेख ॥ ७ ॥
सहजो नन्हा बालका, महल भप के जाय ।
नारी परदा ना करै, गोदहि गोद खेलाय ॥ ८ ॥
बड़ा न जाने पाइहै, साहेब के दरबार ।
द्वारे ही सूँ लागि है, सहजो मोटी मार ॥ ६ ॥
बारे दीवे चाँदना, बड़ा भये अँधियार३ ।
सहजो तृन हलका तिरै, डूबै पत्थर भार ॥१०॥
भली गरीबी नवनता, सकै नहीं कोइ मार ।
सहजो रुई कपास की, काटै ना तरवार ॥११॥
चरनदास सतगुरु कही, सहजो कूँ यह चाल ।
सकौ तो छोटा हूजिये, छूटै सब जंजाल ॥१२॥
साहन कूँ तो भय घना, सहजो निर्भय रंक ।
कुञ्जर के पग बेड़ियाँ, चींटी फिरै निसंक ॥१३॥


(१) ग्रहन लगता है। (२) दुष्ट। (३) दीवा या रोशनी “बढ़ा” देना मुहावरे में
चिराग़ बुझा देने को कहते हैं—इस साखी का अर्थ यह है कि नन्हा सा दीवा जब बाला
गया तो चाँदना करता है और जब “बढ़ाया” (बुझाया) गया तो अँधेरा हो जाता है।

३४ सहजो बाई
ऊँचे उज्जल भाग सूँ, आय मिले गुरुदेव ।
प्रेम दिया नन्हा किया, पूरन पायो भेव ॥१४॥
सहजो पूरन भाग सूँ, पाय लिये सुखदान ।
नख सिख आई दीनता, भजे बड़ाई मान ॥१५॥
सहजो पूरन भाग सूँ, पाय लिये सुखदैन ।
गये कुलच्छन देह सूँ, सुलच्छन पायो चैन ॥१६॥
औगुन थे सो सब गये, राज करैं उनतीस१।
प्रेम मिला प्रीतम मिला, सहजो वारा सीस ॥१७॥
प्रेम का अङ्ग
चरनदास सतगुरु दियो, प्रेम पियाला ज्ञान ।
सहजो मतवारे भये, तुरिया तत गलतान ॥ १ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, मन भयो चकनाचूर ।
छके रहैं घूमत रहैं, सहजो देख हजूर ॥ २ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, प्रीतम के रँग माहिं ।
सहजो सुधि बुधि सब गई, तन की सीधी नाहिं ॥ ३ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, पलटि गयो सब रूप ।
सहजो दृष्टि न आवई, कहा रंक कहा भूप ॥ ४ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, कहैं बहकते बैन ।
सहजो मुख हाँसो छुटै, कबहू टपकै नैन ॥ ५ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, जाति बरन गइ छूट ।
सहजो जग बौरा कहै, लोग गये सब फूट ॥ ६ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, नेम धरम गयो खोय ।
सहजो नर नारी हँसैं, वा मन आनँद होय ॥ ७ ॥
प्रेम दिवाने जो भये, सहजो डिगमिग देह२ ।
पाँव पड़ै कितकें किती, हरि सम्हाल जब लेह ॥ ८ ॥
(१) मन और ३ गुण और २५ प्रकृतियाँ । (२) शरीर ।

द्वितीय भाग: रागबद्ध पद, सहज-समाधि एवं सहज प्रकाश उपसंहार

सत्त बैराग जगत मिथ्या का अंग ३५
कबहुँ हकधक हो रहै, उठै प्रेम हित गाय।
सहजो आँख मूँदी रहै, कबहुँ सुधि हो जाय॥ ६॥
मन में तो आनँद रहै, तन बौरा सब अंग।
ना काहू के संग है, सहजो ना कोई संग॥१०॥
प्रेम लटक दुर्लभ महा, पावै गुरु के ध्यान।
अजपा सुमिरन कहत हूँ, उपजै केवल ज्ञान॥११॥
अजपा गायत्री का अंग
ऐसा सुमिरन कीजिये, सहज रहै लौ लाय।।
बिनु जिभ्या बिनु तालुवै, अन्तर सुरत लगाय॥ १॥
हंसा सोहं तार कर, सुरति मकरिया पोय।
उतर उतर फिरि फिरि चढ़ै, सहजो सुमिरन होय॥ २॥
बरत१ बाँध कर धरन में, कला गगन में खाय।
अ्रर्ध उध नट ज्यों फिरै, सहजो राम रिझाय॥ ३॥
लगै सुन्न में टकटकी, आसन पदम लगाय।
नाभि नासिका माहिं करि, सहजो रहै समाय॥ ४॥
सहज स्वाँस तीरथ बहै, सहजो जो कोई न्हाय।
पाप पुन्न दोनों छुटैं, हरि पद पहुँचे जाय॥ ५॥
हक्कारे२ उठि नाम सूँ, सक्कारे होय लीन।
सहजो अजपा जाप यह, चरनदास कहि दीन॥ ६॥
सब घट अजपा जाप है, हंसा सोहं पुर्ष।
सुरत हिये ठहराय के, सहजो या बिधि निखै॥ ७॥
सब घट ब्यापक राम है, देही नाना भेष।
राव रंक चंडाल घर, सहजो दीपक एक॥ ८॥
सत्त बैराग जगत मिथ्या का अंग
॥ दोहा॥
आतम में जागत नहीं, सपने सोवत लोग।
सहजो सपने होत हैं, रोग भोग और जोग॥ १॥
(१) रस्सी। (२) पुकारै।