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सर्वकोश
सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

सहजोबाई की बानी: सहज प्रकाश (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सन्त चरनदास शिष्या)

Sahjobai Ki Bani: Sahaj Prakash: Belvedere Press

साध्वी सहजोबाई (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 68 में से

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पृष्ठ 30

२६ सहजो बाई
॥ दोहा ॥
सेत रोम सब हो गये, सूख गई सब देह।
सहजो वह मुख ना रहा, उड़ने लागी खेह ॥८५॥
सहजो इन्द्री सब थकी, तन पौरुष भये छीन।
आसा तृस्ना ना घटी, सहज बचन भये दीन ॥८६॥
चार अवस्था खो दई, लियो न हरि को नाम।
तन छूटे जम कूटि है, पापी जम के ग्राम ॥८७॥
आय जगत में क्या किया, तन पाला कै पेट।
सहजो दिन धंधे गया, रैन गई सुख लेट ॥८८॥
मृत्यु दशा
॥ दोहा ॥
सहजो मृत्यू आइया, लेटा पाँव पसार।
नैन फटे नाड़ी छुटी, सोँही१ रहा निहार ॥८९॥
॥ चौपाई ॥
पित सरका बाई घिर२ आया। बाय सरक कफ ठौर बसाया॥
कफ सरका गल रोक लिया है। कंठ रुके कोइ नहिं जिया है॥
घुटर घुटर जब करने लागा। चेतनता सब तन का भागा॥
नाते घिर घिर सब ही आये। थोथे अपने नेह जनाये॥
आँखन सूँ जल भरि भरि लावैँ। आपस में सब मोह दिखावैँ॥
हाय हाय कर कोई बोलै। कोई ढूँढ़त औषध डोलै॥
कोई कहै कछु द्रव्य बतावो। धरा ढका कछु करज दिखावो॥
वाकूँ सुधि नहिं अपने तन की। जम किंकर मारत हैं घन की॥९०॥
॥ दोहा ॥
जम की सूरत देख करि, सुधि बुधि गई नसाय।
सहजो जो संकट बन्यो, मुख सूँ कह्यो न जाय ॥९१॥
सहजो मिरतू के समय, पीड़ा होय अपार।
बीछू एक हजार ज्यों, डंक लगै इकसार ॥९२॥
(१) सन्मुख, सामने। (२) घर।